
मंगलवार, २९ अप्रैल २००८
रविवार, २७ अप्रैल २००८
ईमानदारी की एक परिभाषा यह भी
शम्भू भाई उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े तहसील मौरानीपुर में गाड़ी चलाने का काम करते हैं। उन्होंने ईमानदारी को इन शब्दों में परिभाषित किया।
'हमारे यहाँ भागीरथ चौधरी तीन बार पांच - पांच सालों के लिय कांग्रेस के विधायक रहे। भाई साहब वे इतने ईमानदार थे कि उनके बच्चे भूखों मर रहे हैं।'
आज के समय में क्या यही है, ईमानदारी की सच्ची परिभाषा।
'हमारे यहाँ भागीरथ चौधरी तीन बार पांच - पांच सालों के लिय कांग्रेस के विधायक रहे। भाई साहब वे इतने ईमानदार थे कि उनके बच्चे भूखों मर रहे हैं।'
आज के समय में क्या यही है, ईमानदारी की सच्ची परिभाषा।
शनिवार, २६ अप्रैल २००८
बुधवार, २३ अप्रैल २००८
चित्रकूट का पाठा क्षेत्र - भूख और गरीबी









चित्रकूट में पाठा क्षेत्र और भूख-गरीबी को पर्यायवाची मना जाता है। पिछ्ले दिनों अभिमन्यु भाई की मदद से उस इलाके को पास से देख सका। वहां उनका 'सर्वोदय सेवा आश्रम बहुत सुंदर काम कर रहा है। वहां मिले अपने तीन साथियों को भी मैं कैसे भुला सकता हूँ, जिन्होंने मुझे वह क्षेत्र दिखाया। जिस इलाके से मैं होकर आया हूँ, उसका नाम है बड्गढ़।
मंगलवार, २२ अप्रैल २००८
मन्दिर में चूने की बोरी



यह खजुराहो का प्रतापसुरी मन्दिर है। यह काफी दिनों से बंद पड़ा हुआ है। पिछ्ले दिनों मेरा यहां जाना हुआ। कुछ लोगों से बात हुई। तो उन्होंने बताया कि यह मन्दिर काफी दिनों से बंद पड़ा हुआ है। इसका इस्तेमाल चुने की बोरी और रेत रखने में किया जा रहा है। बताया जाता है इसके अंदर एक पुराना शिव लिंग भी रखा हुआ है। ईश्वर में आस्था रखने वालों के लिय यह शर्म की बात है। हमे इस सम्बन्ध में एक बार सोचना जरुर चाहिय.
यह भारत में ही रहते हैं


महोबा बुंदेलखंड के अन्दर आने वाले एक जिले का नाम है। इसके पास में ही है चरखारी जिसे बुंदेलखंड का कश्मीर कहते हैं। जिसके अंतर्गत आने वाला एक छोटा सा गाँव है टीलवापुरा। ये ७५ साल के बुजुर्ग अपनी ७० साल की पत्नी के साथ इसी गाँव में रहते हैं। ये बुजुर्ग अपनी रीढ़ की हड्डी की बीमारी की वजह से पिछ्ले १० सालों से चलने फिरने के काबिल नहीं हैं। इनकी पत्नी कंडे और लकडी बेचकर इनका लालन-पालन कर रही है। ज़रा सोचियेगा इस देश में कितना गम है, और आपका गम कितना कम है। इनका गम देखेगे तो अपना गम कम लागने लगेगा। रशीद साहब ने कमाल कर दिया
भाई साहब का नाम है रशीद सद्दीकी। बांदा के बड़े पत्रकार हैं। इनकी कृपा से इन दिनों बांदा की कई सडके चमक उठी हैं। हुआ यू कि जनाब ने अपने विश्वस्त सूत्रों के हवाले से यह ख़बर छाप दी कि राहुल गाँधी हवाई रास्ते से नहीं सड़क के रास्ते से बांदा आयेगे। बस इस ख़बर के छपने भर की देर थी। रातों-रात सडके दुरुस्त कर दी गई। वैसे कौन सा राहुल को सड़क के रास्ते आना था।जय हो रशीद साहब की।
सोमवार, २१ अप्रैल २००८
हनुमान धारा के जल का उपयोग

हनुमान धारा चित्रकूट का एक तीर्थ स्थल है। कहते आज भी इस धारा के आस-पास पवन पुत्र हनुमान निवास करते हैं। इस धारा से निकलने वाले जल को लेकर यह कहा जाता है कि इसके जल के सेवन से पेट की कैसी भी बीमारी हो दूर हो जाती है।
आप देख सकते है जिस जल को पीने के लिय सैकड़ों - हजारों किलो मीटर से से भक्त आते हैं, उसका इस्तेमाल भाई साहब कपडे की चमकार बढ़ाने में कर रहे हैं, है किसी में जो उन्हें रोक सके
शनिवार, १२ अप्रैल २००८
बुंदेलखंड कैमरे की नजर में ...
दोगली निति
हाल ही में केरल में उस संगठन का एक राष्ट्रीय अधिवेशन सम्पन्न हुआ। इसने अधिवेशन में शामिल अपने मुस्लिम प्रतिनिधियों को नमाज़ पढ़ने के लिय सभा के बीच में अंतराल दिया। इस नियम में कुछ भी ग़लत नहीं है। हमें भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में सभी धर्मों का सम्मान करना ही चाहिय।
लेकिन इस पार्टी के दोगली निति पर तब कोफ्त होती है, जब इसका कोई कार्यकर्ता (नेता) कोलकाता में मन्दिर में भगवान की पूजा-अर्चना करने की वजह से पार्टी से निकाल दिया जाता है। पार्टी को ऐसे मन्दिर जाने वालों पर सम्प्रदायिक होने का अंदेशा होता है। पार्टी की उलझन जो भी हो बहरहाल इसे कहा तो दोगली निति ही जायगा ना!
लेकिन इस पार्टी के दोगली निति पर तब कोफ्त होती है, जब इसका कोई कार्यकर्ता (नेता) कोलकाता में मन्दिर में भगवान की पूजा-अर्चना करने की वजह से पार्टी से निकाल दिया जाता है। पार्टी को ऐसे मन्दिर जाने वालों पर सम्प्रदायिक होने का अंदेशा होता है। पार्टी की उलझन जो भी हो बहरहाल इसे कहा तो दोगली निति ही जायगा ना!
तस्वीर की ज़ुबानी कहानी - हंगामा है क्यों बरपा
सरकार कहती है कि मतदाता पहचान पत्र बनवाओ, दूसरे शहर में इसे बनवाने वालों की क्या हालत होती होगी खुदा जाने। यहाँ कल्यानपुरी का हाल आपके सामने रखते हैं। यह मोहल्ला दिल्ली में ही आता है।इन तस्वीरों को उपलब्ध कराने वाले युवा पत्रकार अवधेश कुमार मल्लिक से पहचान पत्र बनवाने आय कुछ लोगों ने शिकायत की, 'यहाँ जिन लोगों ने कुछ पैसे खर्च किय उनका काम तो आसानी से हो गया, जो पैसे नहीं दे रहे उनको बेवजह परेशान किया जा रहा है। '

गुरुवार, १० अप्रैल २००८
ग्रामीण विकास की पत्रिका 'सोपान स्टेप'
सोपान स्टेप संवाददाता उमाशंकर के ब्लॉग से आपतक दो शब्द सोपान के संबध में,
नेहरू प्लेस स्थित वह जगह जो अपने और अपनों से मिलने का ठीकाना है।
पिछले ढाई सालों सोपान के साथ हूँ, सोपान में कार्यरत हूँ।
यहाँ काम करते हुय यह एहसास मन में है कि यहाँ पत्रकारिता के नाम पर हम कुछ और नहीं कर रहे, पत्रकारिता हीं कर रहे हैं।
फिलहाल उमाशंकर को पढिय-
ग्रामीण विकास को समर्पित पत्रिका सोपान step दो वर्ष से भी ज्यादा का सफर तय कर चुकी है। इस सफर में हमने न केवल ग्रामीण अंचलों की समस्याओं; बल्कि ग्रामीण परिवेश के निवासियों की उपलब्धियों और मुद्दों के आलावा विकास से जुडे राष्ट्रीय मुद्दों से आपको भी जोड़ने का प्रयास किया है। अपने लड़खड़ाते हुए क़दमों के बावजूद साहस नहीं खोया और धीरज से अपने काम में जुटे रहे। शायद इसी का परिणाम है कि सोपान को आज आप सब की प्रशंसा प्राप्त हो रही है। छ्होते से इस सफर मी हमने ढेरों अनुभव भी बटोरे हैं, कभी मिलकर साझा करेंगे कि, मीडिया जब विकास कि बात करता है तो उसके सामने किस तरह कि चुनोतियाँ आती हैं इस व्यावसायिक युग में; यह सोचने का विषय है। कितना सहयोग अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का विकास पत्रकारों को इस गलैमरस मीडिया के युग मे मिलता है, इस पर भी चर्चा करेंगे।
यदि आप सोपान देखना-पढ़ना या इसके ग्राहक बनना चाहते हैं, तो आप लिख सकते हैं, फ़ोन कर सकते हैं या चाहे तो आकर मिल भी सकते हैं -
पता और ठीकाना है:-
इंडिया फाऊंडेशन फॉर रूरल डेव्ल्प्मेंट स्टडीज ४९-५० रेड रोज बिल्डिंग, रूम नंबर-४०६ नेहरू प्लेस, नई दिल्ली - ११००१९फोन - ०११-४१६०७२४८
०११-४१६०७४७२
नेहरू प्लेस स्थित वह जगह जो अपने और अपनों से मिलने का ठीकाना है।
पिछले ढाई सालों सोपान के साथ हूँ, सोपान में कार्यरत हूँ।
यहाँ काम करते हुय यह एहसास मन में है कि यहाँ पत्रकारिता के नाम पर हम कुछ और नहीं कर रहे, पत्रकारिता हीं कर रहे हैं।
फिलहाल उमाशंकर को पढिय-
ग्रामीण विकास को समर्पित पत्रिका सोपान step दो वर्ष से भी ज्यादा का सफर तय कर चुकी है। इस सफर में हमने न केवल ग्रामीण अंचलों की समस्याओं; बल्कि ग्रामीण परिवेश के निवासियों की उपलब्धियों और मुद्दों के आलावा विकास से जुडे राष्ट्रीय मुद्दों से आपको भी जोड़ने का प्रयास किया है। अपने लड़खड़ाते हुए क़दमों के बावजूद साहस नहीं खोया और धीरज से अपने काम में जुटे रहे। शायद इसी का परिणाम है कि सोपान को आज आप सब की प्रशंसा प्राप्त हो रही है। छ्होते से इस सफर मी हमने ढेरों अनुभव भी बटोरे हैं, कभी मिलकर साझा करेंगे कि, मीडिया जब विकास कि बात करता है तो उसके सामने किस तरह कि चुनोतियाँ आती हैं इस व्यावसायिक युग में; यह सोचने का विषय है। कितना सहयोग अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का विकास पत्रकारों को इस गलैमरस मीडिया के युग मे मिलता है, इस पर भी चर्चा करेंगे।
यदि आप सोपान देखना-पढ़ना या इसके ग्राहक बनना चाहते हैं, तो आप लिख सकते हैं, फ़ोन कर सकते हैं या चाहे तो आकर मिल भी सकते हैं -
पता और ठीकाना है:-
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०११-४१६०७४७२
मंगलवार, ८ अप्रैल २००८
चली गईं सरोद रानी
-अशोक चक्रधर
कहते हैं कि जब मौत आती है तो इंसान को कहीं भी शरन नहीं मिलती, पर उलटा हो गया। मौत को शरन मिल गई। आठ अप्रैल दो हज़ार आठ को शरन रानी नहीं रहीं।
आज वे अस्सीवें वर्ष में प्रवेश करतीं पर एक दिन पहले ही अपनी ज़िन्दगी की सी. डी. रिलीज़ करा के सीढ़ी चढ़ गईं। यस्टरडे तक सरोद गुंजाया और अपना म्यूज़िक टुडे को दे गईं। लोग उन्हें कहते थे सरोद रानी। सघन अंधेरे में जैसे कौंध-कौंध उठती हो सरोद की विद्युत, उस तड़ित्तरंगीय गतिमयता में प्रारम्भ हो जाए आलाप, जो धीरे-धीरे बढ़ता जाए, झाला की नक्षत्र-माला तक। तारामंडल खिल उठें और फैल जाए उजाला, गुरु शरन रानी के नाम का।
शरन रानी जी का जन्म 9 अप्रैल, 1929 को दिल्ली के एक जाने माने कायस्थ माथुर परिवार में हुआ। उस कायस्थ परिवार में साहित्य, संगीत, कलाओं के प्रति प्रेम भाव तो था लेकिन लड़कियां उसमें आगे बढ़-चढ़कर हिस्सा लें इसकी मनाही थी। धुन की धनी शरन जी ने प्रतिकूल वातावरण को बचपन से ही अनुकूल बना लिया, और आगे भी संघर्ष करती रहीं।
सरोद घर में बड़े भैया लाए थे अपनी श्रीमती जी को सिखाने के लिए, पर नन्हीं शरन रानी ने देखा कि भाभी तो खान-पान, घर-परिवार और गृहस्थी में डूबी हुई हैं, कहां सीखेंगी। लिया एक सिक्का, छेड़ दिए स्वर, आनंद आया, सरगम निकाली। सा-रे-ग-म निकल आए तो फिर क्या था, वह वाद्य इनका हो गया और ये उस वाद्य की हो गईं।
बहुत सारे प्रथम जुड़े हैं उनके नाम के आगे। गुरु शरन रानी प्रथम महिला थीं जिन्होंने सरोद जैसे मर्दाना साज को संपूर्ण ऊंचाई दी। वे प्रथम महिला थीं जो संगीत को लेकर पूरे भूमंडल में घूमीं, विदेश गईं। वे प्रथम महिला थीं जिन्हें सरोद के कारण विभिन्न प्रकार के सम्मान मिले। वे प्रथम महिला थीं जिन्हें सरोद पर डॉक्टरेट की उपाधियों से नवाज़ा गया। वे प्रथम महिला थीं जिन्होंने पंद्रहवीं शताब्दी के बाद बने हुए वाद्य यंत्रों को न केवल संग्रहीत किया बल्कि राष्ट्रीय संग्रहालय को दान में दे दिया। वे प्रथमों में प्रथम थीं।
उनके प्रयत्नों में आई कभी कमी नहीं।
उनकी संगीत साधना कभी थमी नहीं।
नेहरू जी कहा करते थे कि शरन रानी तो हमारी कला और संस्कृति की राजदूत हैं। सही कहा था पंडित जी ने, शरन जी देश-देशांतर तक घूमीं। सरोद को उन्होंने विश्व-विख्यात किया।
उनके गुरु बाबा अलाउद्दीन खां गजब के इंसान थे। वे संसार का हर बाजा बजा सकते थे। जो चीज़ न भी बजे वह भी बज उठती थी उनके स्पर्श से।
युवा और अपूर्व सुन्दरी शरन रानी को यों ही शरन में नहीं लिया बाबा ने। शिष्यों को गाय की सानी करनी पड़ती थी, चिलम भरनी पड़ती थी। रसोई में समय देना होता था। और दस-दस घण्टे के रियाज़ की पाबन्दी। संभ्रांत-रईस परिवार की शरन रानी ने औघड़ बाबा की सारी बात मानीं।
नई पीढ़ी को अगर बताना हो कि क्या होती है गुरु-शिष्य परंपरा, क्या होता है परंपरा प्रदान करने की प्रक्रिया का सिलसिला, तो बाबा और शरन रानी जी के आपसी रिश्तों को बड़ी गहराई से समझना होगा। गुरु ऐसे ही विद्या नहीं देता, जब तक कि शिष्य में पूरी लगन न हो, निष्ठा न हो। उस निष्ठा की प्रतिमूर्ति बनकर शरन रानी बार-बार मैहर जाती रहीं। संगीत सीखना है तो गुरुभक्ति निष्ठा से करनी होगी। उन्होंने ठान लिया कि सीखकर ही मानेंगी। गगन को गुंजा देंगी सरोद के सुरों से।
कला मर जाती है, अगर जीवन-साथी सहारा न दे। पति भी सरोद जैसा ही मिला। सुरीला सुल्तान सिंह बाकलीवाल। उन्होंने शरन जी को सदा उत्साहित किया और आगे लाने के लिए पीछे-पीछे रहे।
आश्चर्य की बात है कि बाबा विभिन्न वाद्यों को सम्पूर्ण कुशलता से बजाते थे, कहां सितार, कहां बांसुरी, कहां सरोद! वे विलक्षण स्वर-सम्राट थे और सारे वाद्य-यंत्रों से प्यार करते थे। वाद्यों के प्रति यह प्रेम, परंपरा के रूप में शरन रानी जी के पास आया। वे भी वाद्यों से प्यार करने लगीं। पति सुल्तान सिंह बाकलीवाल के सहयोग से वाद्य-यंत्रों का एक विशाल भंडार उनके पास इकट्ठा हो गया। कहीं वो आदिवासी क्षेत्रों से अनूठे प्राचीन वाद्य लेकर आईं, कहीं उनको ग्रामीण लोक वाद्य मिले। तरह-तरह के तंत्री-वाद्य और ताल वाद्य। वे सब के सब उन्होंने भारत सरकार के अधीन राष्ट्रीय संग्रहालय को दान में दे दिए। 'शरन रानी बाकलीवाल गैलरी' बनी, जिसका उद्घाटन किया था श्रीमती इंदिरा गांधी ने। इस संग्रहालय को शरन जी निरंतर संपन्न करती रहीं। उनके वाद्यों पर डाक टिकट जारी हुए। सरोद पर भी, बांसुरी पर भी और मृदंग पर भी।
क्या चाहिए कलाकार को? पैसा। पैसा तो शरन जी के पास पहले से था। पैसे के लिए तो वो संगीत के पीछे भागी नहीं। संगीत तो एक प्यास थी, तड़प थी, एक आकर्षण था, एक चुंबक थी जिसके पीछे शरन दीवानी सी रहती थीं। क्या चाहिए कलाकार को? यश। हां, यश चाहिए। किसी के पीछे दौड़ी नहीं शरन जी। डॉ. ज़ाकिर हुसैन द्वारा सम्मानित किया गया। आर. के. नारायण द्वारा उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। न जाने कितने मंचों पर, न जाने कितनी बार उन्हें सम्मानित किया गया। सम्मान शरन जी के पीछे-पीछे दौड़ा, सम्मानों के पीछे शरन जी कभी नहीं दौड़ीं।
व्यवहार और शास्त्र दोनों साथ-साथ चलते हैं। जहां एक ओर शरन रानी जी ने सरोद को बजाया, वहीं उसके शास्त्रीय पक्ष को भी अनदेखा नहीं रखा। उन्होंने सरोद को लेकर काफी शोध-कार्य किया। कालिदास के 'मेघदूत' से यह सूत्र निकाला कि मेघों ने अपना रास्ता बदल लिया था चूंकि उनके अधिक नीचे आने पर अलकापुरी में रहने वाले संगीतकारों के साज़ों के सुर उतर जाते थे। यह बात तय है कि उन्हीं साज़ों के सुर उतरते हैं जो चमड़े से बने हुए होते हैं। सरोद एक ऐसा ही वाद्य है जिस पर चमड़ा लगा रहता है। यानी सरोद एक प्राचीन भारतीय वाद्य है। वे कहती थीं कि सरोद नाम के मूल में 'स्वरोदय' रहा है। संगीत के कुछ विद्वान मानते हैं कि सरोद वाद्य मध्य एशिया से आया। वे मतभेद रख सकते हैं। शोध और भी होनी चाहिए। वैसे शोध हो भी जाए तो लाभ क्या? एक समाचार चैनल में शरन जी के देहावसान की ख़बर देते समय उन्हें सितार-वादिका बताया जा रहा था। सरोद और सितार में उनके लिए कोई फ़र्क ही नहीं है। क्या कहें उनको, याद कर लिया यही क्या कम है।
बाबा अलाउद्दीन खां व्यवहार से शास्त्र गढ़ते थे। उन्होंने कितने ही नए वाद्य बना दिए। उनका बनाया हुआ एक सितार बैंजो मेरे पास भी है। मैहर बैंड बनाया था बाबा ने जिसमें अनेक सुरीले वाद्यों का समन्वय था।
शरन जी ने एक बार बताया कि कठिन परीक्षा लेते थे बाबा। सरोद पर कोई एक मींड़-मुरकी निकल नहीं पा रही थी। बाबा ने कई बार समझाया, लेकिन स्वरों के बीच से श्रुतियों की सही लड़ी पकड़ में नहीं आ रही थी। बाबा ने अपने हुक्के में गहरा कश मारा और चिलम से निकली एक लहराती हुई सी चिंगारी। बाबा ने कहा ऐसे, ऐसे, हां ऐसे निकालो। सरोद का तार उँगली के दबाव के साथ परदे पर चिंगारी की तरह लहराया और वह नाद अधिकतम सुरीला होकर निकल आया।
बाबा जब देह त्याग कर गए तो न तो उनके परम शिष्य रवि शंकर आ सके न उनके दूसरे कुटुम्बी जन। दिल्ली से दौड़ी-दौड़ी गई थीं शरन रानी। चाहती तो थीं बाबा की मैयत को कंधा देना, लेकिन परंपरावादियों ने मना कर दिया। अल्लाह का भेजा हुआ कोई एक मौलवी था जिसने कहा कि मिट्टी की पहली मुट्ठी शरन रानी की होगी।
ऐसे गए तो क्या गए जैसे बादल की छाया चली जाती है। जाओ तो ऐसे कि बादलों के जाने के बाद भी आंसुओं की तरह बरसते रहो। शरन जी की याद में आते हुए आंसू सिर्फ दुःख के नहीं हैं। इन बूंदों में हमारी शास्त्रीय संगीत की साधनाओं को सलाम है। कल उनकी चिता से जो लहराती हुई चिंगारियां निकल रही थीं, उनसे कितने लोगों ने श्रुतियों और मींड़ों को पकड़ा होगा। लोग आँख मींड़ कर आंसू पौंछ लेंगे पर वैसी मींड़ कौन निकालेगा?
सम्पर्क:- श्री अशोक चक्रधर
जे -११६, सरिता विहार,
नईं दिल्ली - ११००७६
०११- २६९४९४९४,
०११- २६९४१६१६,
फैक्स- ०११-४१४०१६३६
कहते हैं कि जब मौत आती है तो इंसान को कहीं भी शरन नहीं मिलती, पर उलटा हो गया। मौत को शरन मिल गई। आठ अप्रैल दो हज़ार आठ को शरन रानी नहीं रहीं।
आज वे अस्सीवें वर्ष में प्रवेश करतीं पर एक दिन पहले ही अपनी ज़िन्दगी की सी. डी. रिलीज़ करा के सीढ़ी चढ़ गईं। यस्टरडे तक सरोद गुंजाया और अपना म्यूज़िक टुडे को दे गईं। लोग उन्हें कहते थे सरोद रानी। सघन अंधेरे में जैसे कौंध-कौंध उठती हो सरोद की विद्युत, उस तड़ित्तरंगीय गतिमयता में प्रारम्भ हो जाए आलाप, जो धीरे-धीरे बढ़ता जाए, झाला की नक्षत्र-माला तक। तारामंडल खिल उठें और फैल जाए उजाला, गुरु शरन रानी के नाम का।
शरन रानी जी का जन्म 9 अप्रैल, 1929 को दिल्ली के एक जाने माने कायस्थ माथुर परिवार में हुआ। उस कायस्थ परिवार में साहित्य, संगीत, कलाओं के प्रति प्रेम भाव तो था लेकिन लड़कियां उसमें आगे बढ़-चढ़कर हिस्सा लें इसकी मनाही थी। धुन की धनी शरन जी ने प्रतिकूल वातावरण को बचपन से ही अनुकूल बना लिया, और आगे भी संघर्ष करती रहीं।
सरोद घर में बड़े भैया लाए थे अपनी श्रीमती जी को सिखाने के लिए, पर नन्हीं शरन रानी ने देखा कि भाभी तो खान-पान, घर-परिवार और गृहस्थी में डूबी हुई हैं, कहां सीखेंगी। लिया एक सिक्का, छेड़ दिए स्वर, आनंद आया, सरगम निकाली। सा-रे-ग-म निकल आए तो फिर क्या था, वह वाद्य इनका हो गया और ये उस वाद्य की हो गईं।
बहुत सारे प्रथम जुड़े हैं उनके नाम के आगे। गुरु शरन रानी प्रथम महिला थीं जिन्होंने सरोद जैसे मर्दाना साज को संपूर्ण ऊंचाई दी। वे प्रथम महिला थीं जो संगीत को लेकर पूरे भूमंडल में घूमीं, विदेश गईं। वे प्रथम महिला थीं जिन्हें सरोद के कारण विभिन्न प्रकार के सम्मान मिले। वे प्रथम महिला थीं जिन्हें सरोद पर डॉक्टरेट की उपाधियों से नवाज़ा गया। वे प्रथम महिला थीं जिन्होंने पंद्रहवीं शताब्दी के बाद बने हुए वाद्य यंत्रों को न केवल संग्रहीत किया बल्कि राष्ट्रीय संग्रहालय को दान में दे दिया। वे प्रथमों में प्रथम थीं।
उनके प्रयत्नों में आई कभी कमी नहीं।
उनकी संगीत साधना कभी थमी नहीं।
नेहरू जी कहा करते थे कि शरन रानी तो हमारी कला और संस्कृति की राजदूत हैं। सही कहा था पंडित जी ने, शरन जी देश-देशांतर तक घूमीं। सरोद को उन्होंने विश्व-विख्यात किया।
उनके गुरु बाबा अलाउद्दीन खां गजब के इंसान थे। वे संसार का हर बाजा बजा सकते थे। जो चीज़ न भी बजे वह भी बज उठती थी उनके स्पर्श से।
युवा और अपूर्व सुन्दरी शरन रानी को यों ही शरन में नहीं लिया बाबा ने। शिष्यों को गाय की सानी करनी पड़ती थी, चिलम भरनी पड़ती थी। रसोई में समय देना होता था। और दस-दस घण्टे के रियाज़ की पाबन्दी। संभ्रांत-रईस परिवार की शरन रानी ने औघड़ बाबा की सारी बात मानीं।
नई पीढ़ी को अगर बताना हो कि क्या होती है गुरु-शिष्य परंपरा, क्या होता है परंपरा प्रदान करने की प्रक्रिया का सिलसिला, तो बाबा और शरन रानी जी के आपसी रिश्तों को बड़ी गहराई से समझना होगा। गुरु ऐसे ही विद्या नहीं देता, जब तक कि शिष्य में पूरी लगन न हो, निष्ठा न हो। उस निष्ठा की प्रतिमूर्ति बनकर शरन रानी बार-बार मैहर जाती रहीं। संगीत सीखना है तो गुरुभक्ति निष्ठा से करनी होगी। उन्होंने ठान लिया कि सीखकर ही मानेंगी। गगन को गुंजा देंगी सरोद के सुरों से।
कला मर जाती है, अगर जीवन-साथी सहारा न दे। पति भी सरोद जैसा ही मिला। सुरीला सुल्तान सिंह बाकलीवाल। उन्होंने शरन जी को सदा उत्साहित किया और आगे लाने के लिए पीछे-पीछे रहे।
आश्चर्य की बात है कि बाबा विभिन्न वाद्यों को सम्पूर्ण कुशलता से बजाते थे, कहां सितार, कहां बांसुरी, कहां सरोद! वे विलक्षण स्वर-सम्राट थे और सारे वाद्य-यंत्रों से प्यार करते थे। वाद्यों के प्रति यह प्रेम, परंपरा के रूप में शरन रानी जी के पास आया। वे भी वाद्यों से प्यार करने लगीं। पति सुल्तान सिंह बाकलीवाल के सहयोग से वाद्य-यंत्रों का एक विशाल भंडार उनके पास इकट्ठा हो गया। कहीं वो आदिवासी क्षेत्रों से अनूठे प्राचीन वाद्य लेकर आईं, कहीं उनको ग्रामीण लोक वाद्य मिले। तरह-तरह के तंत्री-वाद्य और ताल वाद्य। वे सब के सब उन्होंने भारत सरकार के अधीन राष्ट्रीय संग्रहालय को दान में दे दिए। 'शरन रानी बाकलीवाल गैलरी' बनी, जिसका उद्घाटन किया था श्रीमती इंदिरा गांधी ने। इस संग्रहालय को शरन जी निरंतर संपन्न करती रहीं। उनके वाद्यों पर डाक टिकट जारी हुए। सरोद पर भी, बांसुरी पर भी और मृदंग पर भी।
क्या चाहिए कलाकार को? पैसा। पैसा तो शरन जी के पास पहले से था। पैसे के लिए तो वो संगीत के पीछे भागी नहीं। संगीत तो एक प्यास थी, तड़प थी, एक आकर्षण था, एक चुंबक थी जिसके पीछे शरन दीवानी सी रहती थीं। क्या चाहिए कलाकार को? यश। हां, यश चाहिए। किसी के पीछे दौड़ी नहीं शरन जी। डॉ. ज़ाकिर हुसैन द्वारा सम्मानित किया गया। आर. के. नारायण द्वारा उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। न जाने कितने मंचों पर, न जाने कितनी बार उन्हें सम्मानित किया गया। सम्मान शरन जी के पीछे-पीछे दौड़ा, सम्मानों के पीछे शरन जी कभी नहीं दौड़ीं।
व्यवहार और शास्त्र दोनों साथ-साथ चलते हैं। जहां एक ओर शरन रानी जी ने सरोद को बजाया, वहीं उसके शास्त्रीय पक्ष को भी अनदेखा नहीं रखा। उन्होंने सरोद को लेकर काफी शोध-कार्य किया। कालिदास के 'मेघदूत' से यह सूत्र निकाला कि मेघों ने अपना रास्ता बदल लिया था चूंकि उनके अधिक नीचे आने पर अलकापुरी में रहने वाले संगीतकारों के साज़ों के सुर उतर जाते थे। यह बात तय है कि उन्हीं साज़ों के सुर उतरते हैं जो चमड़े से बने हुए होते हैं। सरोद एक ऐसा ही वाद्य है जिस पर चमड़ा लगा रहता है। यानी सरोद एक प्राचीन भारतीय वाद्य है। वे कहती थीं कि सरोद नाम के मूल में 'स्वरोदय' रहा है। संगीत के कुछ विद्वान मानते हैं कि सरोद वाद्य मध्य एशिया से आया। वे मतभेद रख सकते हैं। शोध और भी होनी चाहिए। वैसे शोध हो भी जाए तो लाभ क्या? एक समाचार चैनल में शरन जी के देहावसान की ख़बर देते समय उन्हें सितार-वादिका बताया जा रहा था। सरोद और सितार में उनके लिए कोई फ़र्क ही नहीं है। क्या कहें उनको, याद कर लिया यही क्या कम है।
बाबा अलाउद्दीन खां व्यवहार से शास्त्र गढ़ते थे। उन्होंने कितने ही नए वाद्य बना दिए। उनका बनाया हुआ एक सितार बैंजो मेरे पास भी है। मैहर बैंड बनाया था बाबा ने जिसमें अनेक सुरीले वाद्यों का समन्वय था।
शरन जी ने एक बार बताया कि कठिन परीक्षा लेते थे बाबा। सरोद पर कोई एक मींड़-मुरकी निकल नहीं पा रही थी। बाबा ने कई बार समझाया, लेकिन स्वरों के बीच से श्रुतियों की सही लड़ी पकड़ में नहीं आ रही थी। बाबा ने अपने हुक्के में गहरा कश मारा और चिलम से निकली एक लहराती हुई सी चिंगारी। बाबा ने कहा ऐसे, ऐसे, हां ऐसे निकालो। सरोद का तार उँगली के दबाव के साथ परदे पर चिंगारी की तरह लहराया और वह नाद अधिकतम सुरीला होकर निकल आया।
बाबा जब देह त्याग कर गए तो न तो उनके परम शिष्य रवि शंकर आ सके न उनके दूसरे कुटुम्बी जन। दिल्ली से दौड़ी-दौड़ी गई थीं शरन रानी। चाहती तो थीं बाबा की मैयत को कंधा देना, लेकिन परंपरावादियों ने मना कर दिया। अल्लाह का भेजा हुआ कोई एक मौलवी था जिसने कहा कि मिट्टी की पहली मुट्ठी शरन रानी की होगी।
ऐसे गए तो क्या गए जैसे बादल की छाया चली जाती है। जाओ तो ऐसे कि बादलों के जाने के बाद भी आंसुओं की तरह बरसते रहो। शरन जी की याद में आते हुए आंसू सिर्फ दुःख के नहीं हैं। इन बूंदों में हमारी शास्त्रीय संगीत की साधनाओं को सलाम है। कल उनकी चिता से जो लहराती हुई चिंगारियां निकल रही थीं, उनसे कितने लोगों ने श्रुतियों और मींड़ों को पकड़ा होगा। लोग आँख मींड़ कर आंसू पौंछ लेंगे पर वैसी मींड़ कौन निकालेगा?
सम्पर्क:- श्री अशोक चक्रधर
जे -११६, सरिता विहार,
नईं दिल्ली - ११००७६
०११- २६९४९४९४,
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सोमवार, ७ अप्रैल २००८
लकवा डांस इन बिहार_ सिर्फ़ इसी ब्लॉग पर
आपने लकवा नृत्य का नाम सुना होगा। यह बेहद प्रसिद्ध नृत्य है।
शादी-विवाह के अवसरों पर अक्सर इस तरह का नृत्य आपको देखने को
मिल जायेगा।
इस बार बिहार के एक नक्सली इलाके मधुपुर (मोतिहारी) से आपके लिय लेकर आय
हैं, अपन बिहार का स्पेशल लकवा डांस।
http://www.youtube.com/watch?v=क्व्र्व्स्राक्स्द्म्स
देखिय और अपनी राय से अवगत कराइय
- सर बुझे की नहीं बुझे-
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- सर बुझे की नहीं बुझे-
शनिवार, ५ अप्रैल २००८
तैरने वाला समाज डूब रहा है - अनुपम मिश्र
अनुपम मिश्र जी का यह लेख बहुत कुछ कहता है -
जुलाई (2004) के पहले पखवाड़े में उत्तर बिहार में आई भयानक बाढ़ अब आगे निकल गई है। लाग उसे भूल गए हैं। लेकिन याद रखना चाहिए कि उत्तर बिहार उस बाढ़ की मंजिल नहीं था। वह एक पड़ाव भर था। बाढ़ की शुरुआत नेपाल से होती है, फिर वह उत्तर बिहार आती है। उसके बाद बंगाल जाती है। और फिर सबसे अंत में सितम्बर के अंत या अक्टूबर के प्रारंभ में वह बांग्लादेश में अपनी आखिरी उपस्थिति जताते हुए सागर में मिलती है। इस बार उत्तर बिहार में बाढ़ ने बहुत अधिक तबाही मचाई। कुछ दिन सभी का ध्यान इसकी तरफ गया। जैसा कि अक्सर होता है, हेलीकॉप्टर आदि से दौरे हुए। फिर हम इसको भूल गए।बाढ़ अतिथि नहीं है। यह काफी अचानक नहीं आती। दो-चार दिन को अंतर पड़ जाए तो बात अलग है। इसके आने की तिथियां बिल्कुल तय हैं। लेकिन जब बाढ़ आती है तो हम कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं कि यह अचानक आई विपत्ति है। इसके पहले जो तैयारियां करनी चाहिए, वे बिल्कुल नहीं हो पाती हैं। इसलिए अब बाढ़ की मारक क्षमता पहले से अधिक बढ़ चली है। पहले शायद हमारा समाज बिना इतने बड़े प्रशासन के या बिना इतने बड़े निकम्मे प्रशासन के अपना इंतजाम बखूबी करना जातना था। इसलिए बाढ़ आने पर वह इतना परेशान नहीं दिखता था।इस बार की बाढ़ ने उत्तर बिहार को कुछ अभिशप्त इलाके की तरफ छोड़ दिया है। सभी जगह बाढ़ से निपटने में अव्यवस्था की चर्चा हुई है। अव्यवस्था के कई कारण भी गिनाए गए हैं- वहां की असहाय गरीबी आदि। लेकिन बहुत कम लोगों को इस बात का अंदाज होगा कि उत्तर बिहार एक बहुत ही संपन्न टुकड़ा रहा है इस प्रदेश का। मुजफ्फरपुर की लीचियां, पूसा ढोली की ईख, दरभंगा का शहबसंत धान, शकरकंद, आम, चीनिया केला और बादाम और यहीं के कुछ इलाकों में पैदा होने वाली तंबाकू, जो पूरे शरीर की नसों को हिलाकर रख देती है। सिलोत क्षेत्र का पतले से पतला चूड़ा जिसके बारे में कहा जाता है कि वह नाक की हवा से उड़ जाता है, उसके स्वाद की चर्चा तो अलग ही है। वहां धान की ऐसी भी किस्में रही हैं जो बाढ़ के पानी के साथ-साथ खेलती हुई ऊपर उठती जाती थीं और फिर बाढ़ को विदा कर खलिहान में आती थीं। फिर दियारा के संपन्न खेत।.सुधी पाठक इस सूची को न जाने कितना बढ़ा सकते हैं। इसमें पटसन और नील भी जोड़ लें तो आप 'दुनिया के सबसे बड़े' यानी लंबे प्लेटफार्म पर अपने आपक को खड़ा पाएंगे। एक पूरा संपन्न इलाका उत्तर बिहार आज दयनीय स्थिति में क्यों पड़ गया है? हमें सोचना चाहिए। सोनपुर का प्लेटफार्म। ऐसा कहते हैं कि यह हमारे देश का सबसे बड़ा प्लेटफार्म? यह वहां की संपन्नतम चीजों को रेल से ढोकर देश के भीतर और बाहर ले जाने के लिए बनाया गया था। लेकिन आज हम इस इलाके की कोई चिंता नहीं कर रहे हैं और उसे एक तरह से लाचारी में छोड़ बैठे हैं।.बाढ़ आने पर सबसे पहला दोष तो हम नेपाल को देते हैं। नेपाल एक छोटा-सा देश है। बाढ़ के लिए हम उसे कब तक दोषी ठहराते रहेंगे? कहा जाता है कि नेपाल ने पानी छोड़ा, इसलिए उत्तर बिहार बह गया। यह देखने लायक बात होगी कि नेपाल कितना पानी छोड़ता है। मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि नेपाल बाढ़ का पहला हिस्सा है। वहां हिमालय की चोटियों से जो पानी गिरता है, उसे रोकने की उसके पास कोई क्षमता और साधन नहीं है। और शायद उसे रोकने की कोई व्यवहारिक जरूरत भी नहीं है। रोकने से खतरे और भी बढ़ सकते हैं। इसलिए नेपाल पर दोष थोपना बंद करना होगा।.यदि नेपाल पानी रोकेगा तो आज नहीं तो कल हमें अभी की बाढ़ से भी भयंकर बाढ़ झेलने की तैयारी करके रखनी पड़ेगी। हम सब जानते हैं कि हिमालय का यह हिस्सा कच्चा है और इसमें कितनी भी सावधानी और ईमानदारी से बनाए गए बांध किसी न किसी तरह से प्रकृति की किसी छोटी सी हलचल से टूट भी सकते हैं। और अब आज से कई गुना भयंकर बाढ़ हमारे सामने आ सकती है। यदि नेपाल को ही दोषी ठहराया जाए तो कम से कम बिहार के बाढ़ नियंत्रण का एक बड़ा भाग पैसों का, इंजीनियरों का, नेताओं का अप्रैल और मई में नेपाल जाना चाहिए ताकि वहां यहां की बाढ़ से निपटने के लिए पुख्ता इंतजामों के बारे में बातचीत की जा सके। बातचीत मित्रवत हो, तकनीकी तौर पर हो और जरूरत पड़े तो फिर मई में ही नेपाल जाएं और आगामी जुलाई में आने वाली बाढ़ के बारे में चर्चा करके देखें।.हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाढ़ के रास्ते में हैं। उत्तर बिहार से पहले नेपाल में काफी लाोगें को बाढ़ के कारण जान से हाथ धोना पड़ा है। पिछले साल नेपाल में भयंकर भूस्खलन हुए थे, और तब हमें पता चल जाना चाहिए था कि अगले साल हम पर भी बड़ा संकट आएगा, क्योंकि हिमालय के इस कच्चे भाग में जितने भूस्खलन हुए, उन सबका मलबा वहीं का वहीं पड़ा था और वह इस वर्ष की बरसात में नीचे उतर आने वाला था।.उत्तर बिहार की परिस्थिति भी अलग से समझने लायक है। यहां पर हिमालय से अनमिनत नदियां सीधे उतरती हैं और उनके उतरने का एक ही सरल उदाहरण दिया जा सकता है। जैसे पाठशाला में टीन की फिसलपट्टी होती है, उसी तरह से यह नदियां हिमलय से बर्फ की फिसलपट्टी से धड़ाधड़ नीचे उतारती हैं। हिमालय के इसी क्षेत्र में नेपाल के हिस्से में सबसे ऊंची चोटियां हैं और कम दूरी तय करके ये नदियां उत्तर भारत में नीचे उतरती हैं। इसलिए इन नदियों की पानी क्षमता, उनका वेग, उनके साथ कच्चे हिमालय से, शिवालिक से आने वाली मिट्टी और गाद इतनी अधिक होती है कि उसकी तुलना पश्चिमी हिमालय और उत्तर- पूर्वी हिमालय से नहीं कर सकते।एक तो यह सबसे ऊंचा क्षेत्र है, कच्चा भी है, फिर भ्रंश पर टिका हुआ इलाका है। यहां भौगोलिक परिस्थितियां ऐसी हैं जहां से हिमालय का जन्म हुआ है। बहुत कम लोगों को अंदाज होगा कि हमारा समाज भी भू- विज्ञान को, 'जिओ मार्फालॉजी' को खूब अच्छी तरह समझता है। इसी इलाके में ग्यारहवीं शताब्दी में बना वराह अवतार का मंदिर भी है जो किसी और इलाके में आसानी से मिलता नहीं है। यह हिस्सा कुछ करोड़ साल पहले किसी एक घटना के कारण हिमालय के रूप में सामने आया। यहीं से फिर नदियों का जाल बिछा। ये सरपट दौड़ती हुई आती हैं- सीधी उतरती हैं। इससे उनकी ताकत और बढ़ जाती है।.जब हिमालय बना तब कहते हैं कि उसके तीन पुर्जे थे। तीन तहें थीं। जैसे तीन पुड़े थे- आंतरिक, मध्य और वाह्य। वाह्य हिस्सा शिवालिक सबसे कमजोर माना जाता है। वैसे भी भूगोल की परिभाषा में हिमालय के लिए कहा जाता है कि यह अरावलेी, विंध्य और सतपुड़ा के मुकाबले बच्चा है। महीनों के बारह पन्ने पलटने से हमारे सभी तरह के कैलेंडर दीवार पर से उतर आते हैं। लेकिन प्रकृति के कैलेंडर में लाखों वर्षों का एक पन्ना होता है। उस कैलेंडर से देखें तो शायद अरावली की उम्र नब्बे वर्ष होगी और हिमालय, अभी चार-पांच बरस का शैतान बच्चा है। वह अभी उलछता-कूदता है, खेलता-डोलता है। टूट-फूट उसमें बहुत होती रहती है। अभी उसमें प्रौढ़ता या वयस्क वाला संयम, शांत, धीरज वाला गुण नहीं आया है। इसलिए हिमालय की ये नदियां सिर्फ पानी नहीं बहाती हैं वे साग, मिट्टी, पत्थर और बड़ी-बड़ी चट्टानें भी साथ लाती हैं। उत्तर बिहार का समाज अपनी स्मृति में इन बातों को दर्ज कर चुका था।.एक तो चंचल बच्चा हिमालय, फिर कच्चा और तिस पर भूकंप वाला क्षेत्र भी क्या कसर बाकी है? हिमालय के इसी क्षेत्र से भूकंप की एक बड़ी और प्रमुख पट्टी गुजरती है। दूसरी पट्टी इस पट्टी से थोड़े ऊपर के भाग के मध्य हिमालय में आती है। सारा भाग लाखों बरस पहले के अस्थिर मलबे के ढेर से बना है और फिर भूकंप इसे जब चाहे और अस्थिर बना देते है। भू- विज्ञान बताता है कि इस उत्तर बिहार में और नेपाल के क्षेत्र में धरती में समुद्र की तरह लहरें उठी थीं और फिर वे एक- दूसरे से टकरा कर ऊपर ही ऊपर उठती चली गई और फिर कुछ समय के लिए स्थिर हो गई, यह 'स्थिरता' तांडव नृत्य की तरह है। आधुनिक विज्ञान की भाषा में लाखों वर्ष पहले 'मियोसिन' कल में घटी इस घटना को उत्तरी बिहार के समाज ने अपनी स्मृति में वराह अवतार के रूप में जमा किया है। जिस डूबती पृथ्वी को वराह ने अपने थूथनों से ऊपर उठाया था, वह आज भी कभी भी कांप जाती है। 1934 में जो भूकंप आया था उसे अभी भी लोग भूले नहीं हैं।.लेकिन यहां के समजा ने इन सब परिस्थितियों अपनी जीवन शैली में, जीवन दर्शन में धीरे-धीरे आत्मसात किया था। प्रकृति के इस विराट रूप में वह एक छोटी सी बूंद की तरह शामिल हुआ। उसमें कोई घमंड नहीं था। वह इस प्रकृति से खेल लेगा, लड़ लेगा। वह उसकी ोद में कैसे रह सकता है- इसका उसने अभ्यास करके रखा था। क्षणभंगुर समाज ने करोड़ वर्ष की इस लीला में अपने को प्रौढ़ बना लिया और फिर अपनी प्रौढ़ता को हिमालय के लड़कपन की गोद में डाल दिया था। लेकिन पिछले सौ- डेढ़ सौ साल में हमारे समाज ने ऐसी बहुत सारी चीजें की हैं जिनसे उसका विनम्र स्वभाव बदला है और उसके मन में थोड़ा घमंड भी आया है। समाज के मन में न सही तो उसे नेताओं, के योजनाकारों के मन में यह घमंड आया है।.समाज ने पीढ़ियों से, शताब्दियों से, यहां फिसलगुंडी की तरह फर्ती से उतरने वाली नदियों के साथ जीवन जीने की कला सीखी थी, बाढ़ के साथ बढ़ने की कला सीखी थी। उसने और उसकी फसलों ने बाढ़ में डूबने के बदले तैरने की कला सीखी थी। वह कला आज धीरे- धीरे मिटती जा रही है। उत्तर बिहार में हिमालय से उतरने वाली नदियों की संख्या अनंत है। कोई गिनती नहीं है, फिर भी कुछ लोगों ने उनकी गिनती की है। आज लोग यह मानते हैं कि यहां पर इन नदियों ने दुख के अलावा कुछ नहीं दिया है। पर इनके नाम देखेंगे तो इनमें से किसी भी नदी के नाम में, विशेषण में दुख का कोई पर्यायवाची देखने को नहीं मिलेगा। लोगों ने नदियों को हमेशा देवियों के रूप में देखा है। लेकिन हम उनके विशेषण दूसरी तरह से देखें तो उनमें आपको बहुत तरह- तरह के ऐसे शब्द मिलेंगे जो उस समाज और नदियों के रिश्ते को बताते हैं। कुछ नाम संस्कृत से होंगे। कुछ गुणों पर होंगे और एकाध अवगुणों पर भी हो सकते हैं।.इन नदियों के विशेषणों में सबसे अधिक संख्या है- आभूषणों की। और ये आभूषण हंसुली, और चंद्रहार जैसे गहनों के नाम पर हैं। हम सभी जानते हैं कि ये आभूषण गोल आकार के होते हैं- यानी यहां पर नदियां उतरते समय इधर- उधर सीधी बहने के बदले आड़ी, तिरछी, गोल आकार में क्षेत्र को बांधती हैं- गांवों को लपेटती हैं और उन गांवों को आभूषणों की तरह श्रृंगार करती है॥ उत्तर बिहार के कई गांव इन 'आभूषणों' से ऐसे सजे हुए थे कि बिना पैर धोए आप इन गांवों में प्रवेश नहीं कर सकते थे। इनमें रहने वाले आपको गर्व से बताएंगे कि हमारे गांव की पवित्र धूल गांव से बाहर नहीं जा सकती, और आप अपनी (शायद अपवित्र) धूल गांव में ला नहीं सकते। कहीं- कहीं बहुत व्यावहारिक नाम भी मिलेंगे। एक नदी का नाम गोमूत्रिका है- जैसे कोई गाय चलते-चलते पेशाब करती है तो जमीन पर आड़े तिरछे निशान पड़ जाते हैं इतनी आड़ी तिरछी बहने वाली यह नदी है। इसमें एक-एक नदी का स्वभाव देखकर लोगों ने इसको अपनी स्मृति में रखा है।.एक तो इन नदियों का स्वभाव और ऊपर से पानी के साथ आने वाली साद के कारण ये अपना रास्ता बदलती रहती हैं। कोसी के बारे में कहा जाता है कि पिछले कुछ सौ साल में 148 किलोमीटर के क्षेत्र में अपनी धारा बदली है। उत्तर बिहार के दो जिलों की इंच भर जमीन भी कोसी ने नहीं छोड़ी है जहां से वह बही न हो। ऐसी नदियों को हम किसी तरह के तटबंध या बांध से बांध सकते हैं, यह कल्पना करना भी अपने आप में विचित्र है। समाज ने इन नदियों को अभिशाप की तरह नहीं देखा। उसने इनके वरदान को कृतज्ञता से देखा। उसने यह माना कि इन नदियों ने हिमालय की कीमती मिट्टी इस क्षेत्र के दलदल में पटक कर बहुत बड़ी मात्रा में खेती योग्य जमीन निकाली है। इसलिए वह इन नदियों को बहुत आदर के साथ देखता रहा है। कहा जाता है कि पूरा का पूरा दरभंगा खेती योग्य हो गस तो इन्हीं नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी के कारण ही। लेकिन इनमें भी समाज ने उन नदियों को छांटा है जो अपेक्षाकृत कम साद वाले इलाकों से आती हैं।.ऐसी नदियों में एक है- खिरोदी। कहा जाता है कि इसका नामकरण क्षीर अर्थात दूध से हुआ है, क्योंकि इसमें साफ पानी बहता है। एक नदी जीवछ है, जो शायद जीवात्मा या जीव इच्छा से बनी होगी। सोनबरसा भी है। इन नदियों के नामों में गुणों का वर्णन देखेंगे तो किसी में भी बाढ़ से लाचारी की झलक नहीं मिलेगी। कई जगह ललित्य है इन नदियों के स्वभाव में। सुंदर कहानी है मैथिली के कवि विद्यापति की। कवि जब अस्वस्थ हो गए तो उन्होंने अपने प्राण नदी में छोड़ने का प्रण किया। कवि प्राण छोड़ने नदी की तरफ चल पड़े, मगर बहुत अस्वस्थ होने के कारण नदी किनारे तक नहीं पहुंच सके। कुछ दूरी पर ही रह गए तो नदी से प्रार्थना की कि हे मां, मेरे साहित्य में कोई शक्ति हो, मेरे कुछ पुण्य हों तो मुझे ले जाओ। कहते हैं कि नदी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और कवि को बहा ले गई।.नदिया विहार करती हैं, उत्तर बिहार में। वे खेलती हैं, कूदती हैं। यह सारी जगह उनकी है। इसलिए वे कहीं भी जाएं उसे जगह बदलना नहीं माना जाता था। उत्तर बिहार में समाज का एक दर्पण साहित्य रहा होगा तो दूसरा तरल दर्पण नदियां थीं। इन संख्य नदियों में वहां का समाज अपना चेहरा देखता था और नदियों के चंचल स्वभाव को बड़े शांत भाव से देह में, अपने मन और अपने विचारों में उतारता था। इसलिए कभी वहां कवि विद्यापति जैसे सुंदर किस्से बनते तो कभी फुलपरास जैसी घटनाएं। रेत में उकेरी जातीं। नदियों की लहरें रेत में लिखी इन घटनाओं को मिटाती नहीं थीं- हर लहर इन्हें पक्के शिलालेखों में बदलती थी। ये शिलालेख इतिहास में मिलें न मिलें, लोगों के मन में, लोक स्मृति में मिलते थे। फुलपरास का किस्सा यहां दोहराने लायक है।
.कभी भुतही नदी फुलपरास नाम के एक स्थान से रास्ता बदलकर कहीं और भटक गई। तब भुतही को वापस बुलाने के लिए अनुष्ठान किया गया। नदी ने मनुहार स्वीकार की और अगले वर्ष वापस चली आई! ये कहानियां समाज इसलिए याद रखवाना चाहता है कि लोगों को मालूम रहे कि यहां की नदियां कवि के कहने से भी रास्ता बदल लेती हैं और साधारण लोगों का आग्रह स्वीकार कर अपना बदला हुआ रास्ता फिर से सुधार लेती हैं। इसलिए इन नदियों के स्वभाव को ध्यान में रखकर जीवन चलाओ। ये चीजें हम लोगों को इस तरफ ले जाती हैं कि जिन बाताें को भूल गए हैं उन्हें फिर से याद करें। कुछ नदियों के बहुत विचित्र नाम भी समाज ने हजारों साल के अनुभव से रखे थे। इनमें से एक विचित्र नाम है- अमरबेल। कहीं से आकाशबेल भी कहते हैं। इस नदी का उद्भव और संगम कहीं नहीं दिखाई देता है। कहां से निकलती है, किस नदी में मिलती है- ऐसी कोई पक्की जानकारी नहीं है। बरसात के दिनों में अचानक प्रकट होती है और जैसे पेड़ पर अमरबेल छा जाती है वैसे ही एक बड़े इलाके में इसकी कई धाराएं दिखाई देती हैं। फिर ये गायब भी हो जाती हैं। यह भी जरूरी नहीं कि वह अगले साल इन्हीं धाराओं में से बहे। तब यह अपना कोई दूसरा नया जाल खोल लेती है। एक नदी का नाम है दस्यु नदी। यह दस्यु की तरह दूसरी नदियों की 'कमाई' हुई जलराशि का, उनके वैभव का हरण कर लेती है। इसलिए पुराने साहित्य में इसका एक विशेषण वैभवहरण्ा भी मिलता है।
.फिर बिल्कुल चालू बोलियों में भी नदियों के नाम मिलते हैं। एक नदी का नाम मरने है। इसी तरह एक नदी मरगंगा है। भुतहा या भुतही का किस्सा तो ऊपर आ ही गया है। जहां ढेर सारी नदिया हर कभी हर कहीं से बहती हों सारे नियम तोड़ कर, वहां समाज ने एक ऐसी भी नदी खोज ली थी जो टस से मस नहीं होती थी। उसका नाम रखा गया- धर्ममूला। ऐसे भूगोलविद समझदार समाज के आज टुकड़े-टुकड़े हो गए हैं। ये सब बताते हैं कि नदियां वहां जीवंत भी हैं और कभी- कभी वे गायब भी हो जाती हैं, भूत भी बन जाती हैं, मर भी जाती हैं। यह सब इसलिए होता है कि ऊपर से आने वाली साद उनमें भरान और धसान की दो गतिविधियां इतनी तेजी से चलाती हैं कि उनके रूप हर बार बदलते जाते हैं।.बहुत छोटी-छोटी नदियों के वर्णन में ऐसा मिलता है कि इनमें ऐसे भंवर उठते हैं कि हाथियों को भी डुबो दे। इनमें चट्टानें और पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े आते हैं और जब वे आपस में टकराते हैं तो ऐसी आवाज आती है कि दिशाएं बहरी हो जाएं! ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि कुछ नदियों में बरसात के दिनों में मगरमच्छों का आना इतना अधिक हो जाता है कि उनके सिर या थूथने गोबर के कंडे की तरह तैरते हुए दिखाई देते हैं। ये नदियां एक-दूसरे से बहुत मिलती हैं, एक-दूसरे का पानी लेती हैं और देती भी हैं। इस आदान-प्रदान में जो खेल होता है उसे हमने एक हद तक अब बाढ़ में बदल दिया है। नहीं तो यहां के लोग इस खेल को दूसरे ढंग से देखते थे। वे बाढ़ की प्रतीक्षा करते थे।
.इन्हीं नदियों की बाढ़ के पानी को रोक कर समाज बड़े-बड़े तालाबों में डालता था और इससे इनकी बाढ़ का वेग कम करता था। एक पुराना पद मिलता है- 'चार कोसी झाड़ी।' इसके बारे में नए लोगों को अब ज्यादाकुछ पता नहीं है। पुराने लोगों से ऐसी जानकारी एकत्र कर यहां के इलाकों का स्वभाव समझना चाहिए। चार कोसी झाड़ी का कुछ हिस्सा शायद चम्पारण में बचा है। ऐसा कहते हैं कि पूरे हिमालय की तराई में चार कोस की चौड़ाई का एक घना जंगल बचा कर रखा गया था। इसकी लंबाई पूरे बिहार में ग्यारह- बारह सौ किलोमीटर तक चलती थी। यह पूर्वी उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र तक जाता था। चार कोस चौड़ाई और उसकी लंबाई हिमालय की पूरी तलहटी में थी। आज के खर्चीले, अव्यावहारिक तटबंधों के बदले यह विशाल वन- बंध बाढ़ में आने वाली नदियों को छानने का काम करता था। तब भी बाढ़ आती रही होगी, लेकिन उसकी मारक क्षमता ऐसी नहीं होगी।.ढाइ हजार साल पहले एक संवाद में बाढ़ का कुछ वर्णन मिलता है। संवाद भगवान बुध्द और एक ग्वाले के बीच है। ग्वाले के घर में किसी दिन भगवान बुध्द पहुंचे हैं। काली घटाएं छाई हुई हैं। ग्वाला बुध्द से कह रहा है कि उसने अपना छप्पर कस लिया है, गाय को मजबूती से खूंटे में बांध दिया है, फसल काट ली है। अब बाढ़ का कोई डर नहीं बचा है। आराम से चाहे जितना पानी बरसे। नदी देवी दर्शन देकर चली जाएंगी। इसके बाद भगावन बुध्द ग्वाले से कह रहे हैं कि मैंने तृष्णा की नावों को खोल दिया है। अब मुझे बाढ़ का कोई डर नहीं है। युगपुरुष साधारण ग्वाले की झोपड़ी में नदी किनारे रात बिताएंगे। उस नदी के किनारे, जिसमें रात को कभी भी बाढ़ आ जाएगी? पर दोनों निश्चिंत हैं। क्या ऐसा संवाद बाढ़ से ठीक पहले हो पाएगा?.ये सारी चीजें बताती हैं कि लोग इस पानी से, इस बाढ़ से खेलना जानते थे। यहां का समाज इस बाढ़ में तैरना जानता था इस बाढ़ में तरना जानता था। इस पूरे इलाके में हद और चौरा या चौर दो शब्द बड़े तालाबों के लिए हैं। इस इलाके में पुराने और बड़े तालाबों का वर्णन खूब मिलता है। दरभंगा का एक तालाब इतना बड़ा था कि उसका वर्णन करने वाले उसे अतिशयोक्ति तक ले गए। उसे बनाने वाले लोगों ने अगस्त्य मुनि तक को चुनौती दी कि तुमने समुद्र का पानी पीकर उसे सुखा दिया था, अब हमारे इस तालाब का पानी पीकर सुखा दो तब जानें। वैसे समुद्र जितना बड़ा कुछ भी न होगा- यह वहां के लोगों को भी पता था। पर यह खेल ै कि हम इतना बड़ा तालाब बनाना जानते हैं।
.उन्नीसवीं शताब्दी तक वहां के बड़े-बड़े तालाबों के बड़े-बड़े किस्से चलते थे। चौर में भी बाढ़ का अतिरिक्त पानी रोक लिया जाता था। परिहारपुर, भरवाहा और आलापुर आदि क्षेत्रों में दो-तीन मील लंबे- चौड़े तालाब थे। धीरे-धीरे बाद के नियोजकों के मन में यह आया कि इतनी जलराशि से भरे बड़े-बड़े तालाब बेकार की जगह घेरते हैं- इनका पानी सुखकार जमीन लोगों को खेती के लिए उपलब्ध करा दें। इस तरह हमने दो- चार खेत जरूर बढ़ा लिए। ये बड़े-बड़े तालाब वहां बाढ़ का पानी रोकने का काम करते थे।आज अंग्रेजी में रेन वॉटर हारवेस्टिंग शब्द है। इस तरह का पूरा ढांचा उत्तर बिहार के लोगों ने बनाया था। वह फ्लड वॉटर हारवेस्टिंग सिस्टम' था। उसी से उन्होंने यह खेल खेला था। तब भी बाढ़ आती थी, लेनिक वे बाढ़ की मार को कम से कम करना जानते थे। तालाब का एक विशेषण यहां मिलता है- नदिया ताल। मतलब है- वह वर्षा के पानी से नहीं, बल्कि नदी के पानी से भरता था। पूरे देश में वर्षा के पानी से भरने वाले तालाब मिलेंगे। लेकिन यहां हिमालय से उतरने वाला तालाब बनाना ज्यादा व्यावहारिक होता था। नदी का पानी धीरे-धीरे कहीं न कहीं रोकते- रोकते उसकी मारक क्षमता को उपकार में बदलते-बदलते आगे गंगा में मिलाया जाता था।.आज के नए लोग मानते हैं कि समाज अनपढ़ है, पिछड़ा है। नए लोग ऐसे दंभी हैं। उत्तर बिहार से निकलने वाली बाढ़ पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश में जाती है। एक मोटा अंदाला है कि बांग्लादेश में कुल जो जलराशि इकट्ठा होती है, उसका केवल दस प्रतिशत उसे बादलों से मिलता है। नब्बे फीसदी उसे बिहार, नेपाल और दूसरी तरफ से आने वाली नदियों से मिलता है। वहां तीन बड़ी नदियां गंगा, मेघना और ब्रह्मपुत्र हैं। ये तीनों नदियां नब्बे फीसदी पानी उस देश में लेकर आती हैं और कुल दस फीसदी वर्षा से मिलता है। बांग्लादेश का समाज सदियों से इन नदियों के किनारे इनके संगम के किनारे रहना जानता था।.वहां नदी अनेक मीलों फैल जाती है। हमारी जैसी नदियां नहीं होतीं कि एक तट से दूसरा तट दिखाई दे। वहां की नदियां क्षितिज तक चली जाती हैं। उन नदियों के किनारे भी वह न सिर्फ बाढ़ से खेलना जानता था, बल्कि उसे अपने लिए उपकारी भी बनाना जानता था। इसी में से अपनी अच्छी फसल निकालता था, आगे का जीवन चलाता था और इसीलिएसोना बांग्ला कहलाता था।.लेकिन धीरे- धीरे चार कोसी झाड़ी गई। हद और चौर चले गए। कम हिस्से में अच्छी खेती करते थे, उसको लालच में थोड़े बड़े हिस्से में फैलाकर देखने की कोशिश की। और हम अब बाढ़ में डूब जाते हैं। बस्तियां कहां बनेंगीख् कहां नहीं बनेंगी इसके लिए बहुत अनुशासन होता था। चौर के क्षेत्र में केवल खेती होगी, बस्ती नहीं बसेगी- ऐसे नियम टूट चुे हैं तो फिर बाढ़ भी नियम तोड़े लगी है। उसे भी धीरे-धीरे भूलकर चाहे आबादी का दबाव कहिए या अन्य अनियंत्रित विकास के कारण- अब हम नदियों के बाढ़ के रास्ते में सामान रखने लगे हैं, अपने घर बनाने लगे हैं। इसलिए नदियों का दोष नहीं है। अगर हमारी पहली मंजिल तक पानी भरता है तो इसका एक बड़ा कारण उसके रास्ते में विकास करना है।.एक और बहुत बड़ी चीज पिछले दो- एक सौ साल में हुई है। वे हैं तटबंध और बांध। छोटे से लेकर बड़े बांध इस इलाके में बनाए गए हैं, बगैर इन नदियों का स्वभाव समझे। नदियों की धारा इधर से उधर न भटके यह मानकर हमने एक नए भटकाव के विकास की योजना अपनाई है। उसको तटबंध कहते हैं। ये बांग्लादेश में भी बने हैं और इनकी लंबाई सैकड़ों मील तक जाती है। उसके बाद आज पता चलता है कि इनसे बाढ़ रुकने के बजाय बढ़ी है, नुकसान ही ज्यादा हुआ है। अभी तो कहीं-कहीं ये एकमात्र उपकार यह करते हैं कि एक बड़े इलाके की आबादी जब डूब से प्रभावित होती है, बाढ़ से प्रभावित होती हैतो लोग इन तटबंधों पर ही शरण लेने आ जाते हैं। जो बाढ़ से बचाने वाली योजना था वह केवल शरणस्थली में बदल गई है। इन सब चीजों के बारे में सोचना चाहिए। बहुत पहले से लोग ह रहे थे कि तटबंध व्यावहारिक नहीं हैं। लेकिन हमने देखा है कि पिछले डेढ़ सौसाल में हम लोगों ने तटबंधों के सिवाय और किसी चीज में पैसा नहीं लगाया है, ध्यान नहीं लगाया है।.बाढ़ अगले साल भी आएगी। यह अतिथि नहीं है। इसकी तिथियां तय हैं और हमारा समाज इससे खेलना जानता था। लेकिन अब हम जैसे- जैसे ज्यादा विकसित होते जा रहे हैं, इसकी तिथियां और इसका स्वभाव भूल रहे हैं। इस साल कहा जाता है कि बाढ़ राहत में खाना बांटने में, खाने के पैकेट गिराने में हेलीकाप्टर का जो इस्तेमाल किया गया, उसमें चौबीस करोड़ रुपए का खर्च आया था। शायद इस लागत से सिर्फ दो करोड़ की रोटी- सब्जी बांटी गई थी। ज्यादा अच्छा होता कि इस इलाके में चौबीस करोड़ के हेलीकाप्टर के बदले हम कम से कम बीस हजार नावें तैयार रखते और मछुआरे, नाविकों, मल्लाहों को सम्मान के साथ इस काम में लगाते। यह नदियों की गोदी में पला-बढ़ा समाज है। इसे बाढ़ भयानक नहीं दिखती। अपने घर की, परिवार की सदस्य की तरह दिखती है- उसके हाथ्ज्ञ में हमने बीस हजार नावें छोडी होतीं। इस साल नहीं छोड़ी गईं तो अगले साल इस तरह की योजना बन सकती है। नावें तैयार रखी जाएं- उनके नाविक तैयार हों, उनका रजिस्टर तैयार हो, जो वहां के जिलाधिकारी या इलाके की किसी प्रमुख संस्था या संगठन के पास हो, उसमें किसी राहत की सामग्रगी कहां- कहां से रखी जाएगी, यह सब तय हो। और हरेक नाव को निश्चित गांवों की संख्या दी जाए। डूब के प्रभाव को देखते हुए, पुराने अनुभव को देखते हुए, उनको सबसे पहले कहां- कहां अनाज या बना-बनाया खाना पहुंचाना है- इसकी तैयारी हो। तब हम पाएंगे कि चौबीस करोड़ के हेलीकाप्टर के बदले शायद यह काम एक या दो करोड़ में कर सकेंगे और इस राशि की एक-एक पाई उन लोगों तक जाएगी जिन तक बाढ़ के दिनों में उसे जाना चाहिए।
।बाढ़ आज से नहीं आ रही है। अगर आप बहुत पहले का साहित्य न भी देखें तो देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू की आत्मकथा में देखेंगे कि उसमें छपरा की भयानक बाढ़ का उल्लेख मिलेगा। उस समय कहा जाता है कि एक ही घंटे में छत्तीस इंच वर्षा हुई थी और पूरा छपना जिला पानी में डूब गया था। तब भी राहत का काम हुआ और तब पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सरकार से आगे बढ़कर काम किया था। उस समय भी आरोप लगे थे कि प्रशासन ने इसमें कोई खास मदद नहीं दी। आज भी ऐसे आरोप लगते हैं, ऐसी ही बाढ़ आती है तो चित्र बदलेगा ही नहीं। बड़े नेताओं की आत्मकथाओं में इसी तरह की लाइनें लिखी जाएंगी और अखबारों में भी इसी तरह की चीजें छपेंगी। लेकिन हमें कुछ विशेष करके दिखाना है तो हम लोगों को नेपाल, बिहार, बंगाल और बांग्लादेश- सभी को मिलकर बात करनी होगी। पुरानी स्मृतियों में बाढ़ से निपटने के क्या तरीके थे, उनका फिर से आदान-प्रदान करना होगा। उन्हें समझना होगा और उन्हें नई व्यवस्था में हम किस तरह से ज्यों का त्यों या कुछ सुधार कर अपना सकते हैं, इस पर ध्यान देना होगा।.जब शुरू- शुरू में अंग्रेजों ने इस इलाके में नहरों का, पानी का काम किया, तटबंधों का काम किया तब भी उनके बीच में एक- दो ऐसे सहृदहय समझदार और यहां की मिट्टी को जानने- समझने वाले अधिकारी रहे जिन्होंने ऐसा माना था कि जो कुछ किया गया है उससे यह इलाका सुधरने के बदले और अधिक बिगड़ा है। इस तरह की चीजें हमारे पुराने दस्तावेजों में हैं। इन सबको एक साथ समझना-बूझना चाहिए और इसमें से फिर कोई रास्ता निकालना चाहिए। नहीं तो उत्तर बिहार की बाढ़ का प्रश्न ज्यों का त्यों बना रहेगा। हम उसका उत्तर नहीं खोज पाएंगे।
श्री मिश्र का यह लेख जनसत्ता से लिया गया है। उनकी अनुमति से।
जुलाई (2004) के पहले पखवाड़े में उत्तर बिहार में आई भयानक बाढ़ अब आगे निकल गई है। लाग उसे भूल गए हैं। लेकिन याद रखना चाहिए कि उत्तर बिहार उस बाढ़ की मंजिल नहीं था। वह एक पड़ाव भर था। बाढ़ की शुरुआत नेपाल से होती है, फिर वह उत्तर बिहार आती है। उसके बाद बंगाल जाती है। और फिर सबसे अंत में सितम्बर के अंत या अक्टूबर के प्रारंभ में वह बांग्लादेश में अपनी आखिरी उपस्थिति जताते हुए सागर में मिलती है। इस बार उत्तर बिहार में बाढ़ ने बहुत अधिक तबाही मचाई। कुछ दिन सभी का ध्यान इसकी तरफ गया। जैसा कि अक्सर होता है, हेलीकॉप्टर आदि से दौरे हुए। फिर हम इसको भूल गए।बाढ़ अतिथि नहीं है। यह काफी अचानक नहीं आती। दो-चार दिन को अंतर पड़ जाए तो बात अलग है। इसके आने की तिथियां बिल्कुल तय हैं। लेकिन जब बाढ़ आती है तो हम कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं कि यह अचानक आई विपत्ति है। इसके पहले जो तैयारियां करनी चाहिए, वे बिल्कुल नहीं हो पाती हैं। इसलिए अब बाढ़ की मारक क्षमता पहले से अधिक बढ़ चली है। पहले शायद हमारा समाज बिना इतने बड़े प्रशासन के या बिना इतने बड़े निकम्मे प्रशासन के अपना इंतजाम बखूबी करना जातना था। इसलिए बाढ़ आने पर वह इतना परेशान नहीं दिखता था।इस बार की बाढ़ ने उत्तर बिहार को कुछ अभिशप्त इलाके की तरफ छोड़ दिया है। सभी जगह बाढ़ से निपटने में अव्यवस्था की चर्चा हुई है। अव्यवस्था के कई कारण भी गिनाए गए हैं- वहां की असहाय गरीबी आदि। लेकिन बहुत कम लोगों को इस बात का अंदाज होगा कि उत्तर बिहार एक बहुत ही संपन्न टुकड़ा रहा है इस प्रदेश का। मुजफ्फरपुर की लीचियां, पूसा ढोली की ईख, दरभंगा का शहबसंत धान, शकरकंद, आम, चीनिया केला और बादाम और यहीं के कुछ इलाकों में पैदा होने वाली तंबाकू, जो पूरे शरीर की नसों को हिलाकर रख देती है। सिलोत क्षेत्र का पतले से पतला चूड़ा जिसके बारे में कहा जाता है कि वह नाक की हवा से उड़ जाता है, उसके स्वाद की चर्चा तो अलग ही है। वहां धान की ऐसी भी किस्में रही हैं जो बाढ़ के पानी के साथ-साथ खेलती हुई ऊपर उठती जाती थीं और फिर बाढ़ को विदा कर खलिहान में आती थीं। फिर दियारा के संपन्न खेत।.सुधी पाठक इस सूची को न जाने कितना बढ़ा सकते हैं। इसमें पटसन और नील भी जोड़ लें तो आप 'दुनिया के सबसे बड़े' यानी लंबे प्लेटफार्म पर अपने आपक को खड़ा पाएंगे। एक पूरा संपन्न इलाका उत्तर बिहार आज दयनीय स्थिति में क्यों पड़ गया है? हमें सोचना चाहिए। सोनपुर का प्लेटफार्म। ऐसा कहते हैं कि यह हमारे देश का सबसे बड़ा प्लेटफार्म? यह वहां की संपन्नतम चीजों को रेल से ढोकर देश के भीतर और बाहर ले जाने के लिए बनाया गया था। लेकिन आज हम इस इलाके की कोई चिंता नहीं कर रहे हैं और उसे एक तरह से लाचारी में छोड़ बैठे हैं।.बाढ़ आने पर सबसे पहला दोष तो हम नेपाल को देते हैं। नेपाल एक छोटा-सा देश है। बाढ़ के लिए हम उसे कब तक दोषी ठहराते रहेंगे? कहा जाता है कि नेपाल ने पानी छोड़ा, इसलिए उत्तर बिहार बह गया। यह देखने लायक बात होगी कि नेपाल कितना पानी छोड़ता है। मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि नेपाल बाढ़ का पहला हिस्सा है। वहां हिमालय की चोटियों से जो पानी गिरता है, उसे रोकने की उसके पास कोई क्षमता और साधन नहीं है। और शायद उसे रोकने की कोई व्यवहारिक जरूरत भी नहीं है। रोकने से खतरे और भी बढ़ सकते हैं। इसलिए नेपाल पर दोष थोपना बंद करना होगा।.यदि नेपाल पानी रोकेगा तो आज नहीं तो कल हमें अभी की बाढ़ से भी भयंकर बाढ़ झेलने की तैयारी करके रखनी पड़ेगी। हम सब जानते हैं कि हिमालय का यह हिस्सा कच्चा है और इसमें कितनी भी सावधानी और ईमानदारी से बनाए गए बांध किसी न किसी तरह से प्रकृति की किसी छोटी सी हलचल से टूट भी सकते हैं। और अब आज से कई गुना भयंकर बाढ़ हमारे सामने आ सकती है। यदि नेपाल को ही दोषी ठहराया जाए तो कम से कम बिहार के बाढ़ नियंत्रण का एक बड़ा भाग पैसों का, इंजीनियरों का, नेताओं का अप्रैल और मई में नेपाल जाना चाहिए ताकि वहां यहां की बाढ़ से निपटने के लिए पुख्ता इंतजामों के बारे में बातचीत की जा सके। बातचीत मित्रवत हो, तकनीकी तौर पर हो और जरूरत पड़े तो फिर मई में ही नेपाल जाएं और आगामी जुलाई में आने वाली बाढ़ के बारे में चर्चा करके देखें।.हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाढ़ के रास्ते में हैं। उत्तर बिहार से पहले नेपाल में काफी लाोगें को बाढ़ के कारण जान से हाथ धोना पड़ा है। पिछले साल नेपाल में भयंकर भूस्खलन हुए थे, और तब हमें पता चल जाना चाहिए था कि अगले साल हम पर भी बड़ा संकट आएगा, क्योंकि हिमालय के इस कच्चे भाग में जितने भूस्खलन हुए, उन सबका मलबा वहीं का वहीं पड़ा था और वह इस वर्ष की बरसात में नीचे उतर आने वाला था।.उत्तर बिहार की परिस्थिति भी अलग से समझने लायक है। यहां पर हिमालय से अनमिनत नदियां सीधे उतरती हैं और उनके उतरने का एक ही सरल उदाहरण दिया जा सकता है। जैसे पाठशाला में टीन की फिसलपट्टी होती है, उसी तरह से यह नदियां हिमलय से बर्फ की फिसलपट्टी से धड़ाधड़ नीचे उतारती हैं। हिमालय के इसी क्षेत्र में नेपाल के हिस्से में सबसे ऊंची चोटियां हैं और कम दूरी तय करके ये नदियां उत्तर भारत में नीचे उतरती हैं। इसलिए इन नदियों की पानी क्षमता, उनका वेग, उनके साथ कच्चे हिमालय से, शिवालिक से आने वाली मिट्टी और गाद इतनी अधिक होती है कि उसकी तुलना पश्चिमी हिमालय और उत्तर- पूर्वी हिमालय से नहीं कर सकते।एक तो यह सबसे ऊंचा क्षेत्र है, कच्चा भी है, फिर भ्रंश पर टिका हुआ इलाका है। यहां भौगोलिक परिस्थितियां ऐसी हैं जहां से हिमालय का जन्म हुआ है। बहुत कम लोगों को अंदाज होगा कि हमारा समाज भी भू- विज्ञान को, 'जिओ मार्फालॉजी' को खूब अच्छी तरह समझता है। इसी इलाके में ग्यारहवीं शताब्दी में बना वराह अवतार का मंदिर भी है जो किसी और इलाके में आसानी से मिलता नहीं है। यह हिस्सा कुछ करोड़ साल पहले किसी एक घटना के कारण हिमालय के रूप में सामने आया। यहीं से फिर नदियों का जाल बिछा। ये सरपट दौड़ती हुई आती हैं- सीधी उतरती हैं। इससे उनकी ताकत और बढ़ जाती है।.जब हिमालय बना तब कहते हैं कि उसके तीन पुर्जे थे। तीन तहें थीं। जैसे तीन पुड़े थे- आंतरिक, मध्य और वाह्य। वाह्य हिस्सा शिवालिक सबसे कमजोर माना जाता है। वैसे भी भूगोल की परिभाषा में हिमालय के लिए कहा जाता है कि यह अरावलेी, विंध्य और सतपुड़ा के मुकाबले बच्चा है। महीनों के बारह पन्ने पलटने से हमारे सभी तरह के कैलेंडर दीवार पर से उतर आते हैं। लेकिन प्रकृति के कैलेंडर में लाखों वर्षों का एक पन्ना होता है। उस कैलेंडर से देखें तो शायद अरावली की उम्र नब्बे वर्ष होगी और हिमालय, अभी चार-पांच बरस का शैतान बच्चा है। वह अभी उलछता-कूदता है, खेलता-डोलता है। टूट-फूट उसमें बहुत होती रहती है। अभी उसमें प्रौढ़ता या वयस्क वाला संयम, शांत, धीरज वाला गुण नहीं आया है। इसलिए हिमालय की ये नदियां सिर्फ पानी नहीं बहाती हैं वे साग, मिट्टी, पत्थर और बड़ी-बड़ी चट्टानें भी साथ लाती हैं। उत्तर बिहार का समाज अपनी स्मृति में इन बातों को दर्ज कर चुका था।.एक तो चंचल बच्चा हिमालय, फिर कच्चा और तिस पर भूकंप वाला क्षेत्र भी क्या कसर बाकी है? हिमालय के इसी क्षेत्र से भूकंप की एक बड़ी और प्रमुख पट्टी गुजरती है। दूसरी पट्टी इस पट्टी से थोड़े ऊपर के भाग के मध्य हिमालय में आती है। सारा भाग लाखों बरस पहले के अस्थिर मलबे के ढेर से बना है और फिर भूकंप इसे जब चाहे और अस्थिर बना देते है। भू- विज्ञान बताता है कि इस उत्तर बिहार में और नेपाल के क्षेत्र में धरती में समुद्र की तरह लहरें उठी थीं और फिर वे एक- दूसरे से टकरा कर ऊपर ही ऊपर उठती चली गई और फिर कुछ समय के लिए स्थिर हो गई, यह 'स्थिरता' तांडव नृत्य की तरह है। आधुनिक विज्ञान की भाषा में लाखों वर्ष पहले 'मियोसिन' कल में घटी इस घटना को उत्तरी बिहार के समाज ने अपनी स्मृति में वराह अवतार के रूप में जमा किया है। जिस डूबती पृथ्वी को वराह ने अपने थूथनों से ऊपर उठाया था, वह आज भी कभी भी कांप जाती है। 1934 में जो भूकंप आया था उसे अभी भी लोग भूले नहीं हैं।.लेकिन यहां के समजा ने इन सब परिस्थितियों अपनी जीवन शैली में, जीवन दर्शन में धीरे-धीरे आत्मसात किया था। प्रकृति के इस विराट रूप में वह एक छोटी सी बूंद की तरह शामिल हुआ। उसमें कोई घमंड नहीं था। वह इस प्रकृति से खेल लेगा, लड़ लेगा। वह उसकी ोद में कैसे रह सकता है- इसका उसने अभ्यास करके रखा था। क्षणभंगुर समाज ने करोड़ वर्ष की इस लीला में अपने को प्रौढ़ बना लिया और फिर अपनी प्रौढ़ता को हिमालय के लड़कपन की गोद में डाल दिया था। लेकिन पिछले सौ- डेढ़ सौ साल में हमारे समाज ने ऐसी बहुत सारी चीजें की हैं जिनसे उसका विनम्र स्वभाव बदला है और उसके मन में थोड़ा घमंड भी आया है। समाज के मन में न सही तो उसे नेताओं, के योजनाकारों के मन में यह घमंड आया है।.समाज ने पीढ़ियों से, शताब्दियों से, यहां फिसलगुंडी की तरह फर्ती से उतरने वाली नदियों के साथ जीवन जीने की कला सीखी थी, बाढ़ के साथ बढ़ने की कला सीखी थी। उसने और उसकी फसलों ने बाढ़ में डूबने के बदले तैरने की कला सीखी थी। वह कला आज धीरे- धीरे मिटती जा रही है। उत्तर बिहार में हिमालय से उतरने वाली नदियों की संख्या अनंत है। कोई गिनती नहीं है, फिर भी कुछ लोगों ने उनकी गिनती की है। आज लोग यह मानते हैं कि यहां पर इन नदियों ने दुख के अलावा कुछ नहीं दिया है। पर इनके नाम देखेंगे तो इनमें से किसी भी नदी के नाम में, विशेषण में दुख का कोई पर्यायवाची देखने को नहीं मिलेगा। लोगों ने नदियों को हमेशा देवियों के रूप में देखा है। लेकिन हम उनके विशेषण दूसरी तरह से देखें तो उनमें आपको बहुत तरह- तरह के ऐसे शब्द मिलेंगे जो उस समाज और नदियों के रिश्ते को बताते हैं। कुछ नाम संस्कृत से होंगे। कुछ गुणों पर होंगे और एकाध अवगुणों पर भी हो सकते हैं।.इन नदियों के विशेषणों में सबसे अधिक संख्या है- आभूषणों की। और ये आभूषण हंसुली, और चंद्रहार जैसे गहनों के नाम पर हैं। हम सभी जानते हैं कि ये आभूषण गोल आकार के होते हैं- यानी यहां पर नदियां उतरते समय इधर- उधर सीधी बहने के बदले आड़ी, तिरछी, गोल आकार में क्षेत्र को बांधती हैं- गांवों को लपेटती हैं और उन गांवों को आभूषणों की तरह श्रृंगार करती है॥ उत्तर बिहार के कई गांव इन 'आभूषणों' से ऐसे सजे हुए थे कि बिना पैर धोए आप इन गांवों में प्रवेश नहीं कर सकते थे। इनमें रहने वाले आपको गर्व से बताएंगे कि हमारे गांव की पवित्र धूल गांव से बाहर नहीं जा सकती, और आप अपनी (शायद अपवित्र) धूल गांव में ला नहीं सकते। कहीं- कहीं बहुत व्यावहारिक नाम भी मिलेंगे। एक नदी का नाम गोमूत्रिका है- जैसे कोई गाय चलते-चलते पेशाब करती है तो जमीन पर आड़े तिरछे निशान पड़ जाते हैं इतनी आड़ी तिरछी बहने वाली यह नदी है। इसमें एक-एक नदी का स्वभाव देखकर लोगों ने इसको अपनी स्मृति में रखा है।.एक तो इन नदियों का स्वभाव और ऊपर से पानी के साथ आने वाली साद के कारण ये अपना रास्ता बदलती रहती हैं। कोसी के बारे में कहा जाता है कि पिछले कुछ सौ साल में 148 किलोमीटर के क्षेत्र में अपनी धारा बदली है। उत्तर बिहार के दो जिलों की इंच भर जमीन भी कोसी ने नहीं छोड़ी है जहां से वह बही न हो। ऐसी नदियों को हम किसी तरह के तटबंध या बांध से बांध सकते हैं, यह कल्पना करना भी अपने आप में विचित्र है। समाज ने इन नदियों को अभिशाप की तरह नहीं देखा। उसने इनके वरदान को कृतज्ञता से देखा। उसने यह माना कि इन नदियों ने हिमालय की कीमती मिट्टी इस क्षेत्र के दलदल में पटक कर बहुत बड़ी मात्रा में खेती योग्य जमीन निकाली है। इसलिए वह इन नदियों को बहुत आदर के साथ देखता रहा है। कहा जाता है कि पूरा का पूरा दरभंगा खेती योग्य हो गस तो इन्हीं नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी के कारण ही। लेकिन इनमें भी समाज ने उन नदियों को छांटा है जो अपेक्षाकृत कम साद वाले इलाकों से आती हैं।.ऐसी नदियों में एक है- खिरोदी। कहा जाता है कि इसका नामकरण क्षीर अर्थात दूध से हुआ है, क्योंकि इसमें साफ पानी बहता है। एक नदी जीवछ है, जो शायद जीवात्मा या जीव इच्छा से बनी होगी। सोनबरसा भी है। इन नदियों के नामों में गुणों का वर्णन देखेंगे तो किसी में भी बाढ़ से लाचारी की झलक नहीं मिलेगी। कई जगह ललित्य है इन नदियों के स्वभाव में। सुंदर कहानी है मैथिली के कवि विद्यापति की। कवि जब अस्वस्थ हो गए तो उन्होंने अपने प्राण नदी में छोड़ने का प्रण किया। कवि प्राण छोड़ने नदी की तरफ चल पड़े, मगर बहुत अस्वस्थ होने के कारण नदी किनारे तक नहीं पहुंच सके। कुछ दूरी पर ही रह गए तो नदी से प्रार्थना की कि हे मां, मेरे साहित्य में कोई शक्ति हो, मेरे कुछ पुण्य हों तो मुझे ले जाओ। कहते हैं कि नदी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और कवि को बहा ले गई।.नदिया विहार करती हैं, उत्तर बिहार में। वे खेलती हैं, कूदती हैं। यह सारी जगह उनकी है। इसलिए वे कहीं भी जाएं उसे जगह बदलना नहीं माना जाता था। उत्तर बिहार में समाज का एक दर्पण साहित्य रहा होगा तो दूसरा तरल दर्पण नदियां थीं। इन संख्य नदियों में वहां का समाज अपना चेहरा देखता था और नदियों के चंचल स्वभाव को बड़े शांत भाव से देह में, अपने मन और अपने विचारों में उतारता था। इसलिए कभी वहां कवि विद्यापति जैसे सुंदर किस्से बनते तो कभी फुलपरास जैसी घटनाएं। रेत में उकेरी जातीं। नदियों की लहरें रेत में लिखी इन घटनाओं को मिटाती नहीं थीं- हर लहर इन्हें पक्के शिलालेखों में बदलती थी। ये शिलालेख इतिहास में मिलें न मिलें, लोगों के मन में, लोक स्मृति में मिलते थे। फुलपरास का किस्सा यहां दोहराने लायक है।
.कभी भुतही नदी फुलपरास नाम के एक स्थान से रास्ता बदलकर कहीं और भटक गई। तब भुतही को वापस बुलाने के लिए अनुष्ठान किया गया। नदी ने मनुहार स्वीकार की और अगले वर्ष वापस चली आई! ये कहानियां समाज इसलिए याद रखवाना चाहता है कि लोगों को मालूम रहे कि यहां की नदियां कवि के कहने से भी रास्ता बदल लेती हैं और साधारण लोगों का आग्रह स्वीकार कर अपना बदला हुआ रास्ता फिर से सुधार लेती हैं। इसलिए इन नदियों के स्वभाव को ध्यान में रखकर जीवन चलाओ। ये चीजें हम लोगों को इस तरफ ले जाती हैं कि जिन बाताें को भूल गए हैं उन्हें फिर से याद करें। कुछ नदियों के बहुत विचित्र नाम भी समाज ने हजारों साल के अनुभव से रखे थे। इनमें से एक विचित्र नाम है- अमरबेल। कहीं से आकाशबेल भी कहते हैं। इस नदी का उद्भव और संगम कहीं नहीं दिखाई देता है। कहां से निकलती है, किस नदी में मिलती है- ऐसी कोई पक्की जानकारी नहीं है। बरसात के दिनों में अचानक प्रकट होती है और जैसे पेड़ पर अमरबेल छा जाती है वैसे ही एक बड़े इलाके में इसकी कई धाराएं दिखाई देती हैं। फिर ये गायब भी हो जाती हैं। यह भी जरूरी नहीं कि वह अगले साल इन्हीं धाराओं में से बहे। तब यह अपना कोई दूसरा नया जाल खोल लेती है। एक नदी का नाम है दस्यु नदी। यह दस्यु की तरह दूसरी नदियों की 'कमाई' हुई जलराशि का, उनके वैभव का हरण कर लेती है। इसलिए पुराने साहित्य में इसका एक विशेषण वैभवहरण्ा भी मिलता है।
.फिर बिल्कुल चालू बोलियों में भी नदियों के नाम मिलते हैं। एक नदी का नाम मरने है। इसी तरह एक नदी मरगंगा है। भुतहा या भुतही का किस्सा तो ऊपर आ ही गया है। जहां ढेर सारी नदिया हर कभी हर कहीं से बहती हों सारे नियम तोड़ कर, वहां समाज ने एक ऐसी भी नदी खोज ली थी जो टस से मस नहीं होती थी। उसका नाम रखा गया- धर्ममूला। ऐसे भूगोलविद समझदार समाज के आज टुकड़े-टुकड़े हो गए हैं। ये सब बताते हैं कि नदियां वहां जीवंत भी हैं और कभी- कभी वे गायब भी हो जाती हैं, भूत भी बन जाती हैं, मर भी जाती हैं। यह सब इसलिए होता है कि ऊपर से आने वाली साद उनमें भरान और धसान की दो गतिविधियां इतनी तेजी से चलाती हैं कि उनके रूप हर बार बदलते जाते हैं।.बहुत छोटी-छोटी नदियों के वर्णन में ऐसा मिलता है कि इनमें ऐसे भंवर उठते हैं कि हाथियों को भी डुबो दे। इनमें चट्टानें और पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े आते हैं और जब वे आपस में टकराते हैं तो ऐसी आवाज आती है कि दिशाएं बहरी हो जाएं! ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि कुछ नदियों में बरसात के दिनों में मगरमच्छों का आना इतना अधिक हो जाता है कि उनके सिर या थूथने गोबर के कंडे की तरह तैरते हुए दिखाई देते हैं। ये नदियां एक-दूसरे से बहुत मिलती हैं, एक-दूसरे का पानी लेती हैं और देती भी हैं। इस आदान-प्रदान में जो खेल होता है उसे हमने एक हद तक अब बाढ़ में बदल दिया है। नहीं तो यहां के लोग इस खेल को दूसरे ढंग से देखते थे। वे बाढ़ की प्रतीक्षा करते थे।
.इन्हीं नदियों की बाढ़ के पानी को रोक कर समाज बड़े-बड़े तालाबों में डालता था और इससे इनकी बाढ़ का वेग कम करता था। एक पुराना पद मिलता है- 'चार कोसी झाड़ी।' इसके बारे में नए लोगों को अब ज्यादाकुछ पता नहीं है। पुराने लोगों से ऐसी जानकारी एकत्र कर यहां के इलाकों का स्वभाव समझना चाहिए। चार कोसी झाड़ी का कुछ हिस्सा शायद चम्पारण में बचा है। ऐसा कहते हैं कि पूरे हिमालय की तराई में चार कोस की चौड़ाई का एक घना जंगल बचा कर रखा गया था। इसकी लंबाई पूरे बिहार में ग्यारह- बारह सौ किलोमीटर तक चलती थी। यह पूर्वी उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र तक जाता था। चार कोस चौड़ाई और उसकी लंबाई हिमालय की पूरी तलहटी में थी। आज के खर्चीले, अव्यावहारिक तटबंधों के बदले यह विशाल वन- बंध बाढ़ में आने वाली नदियों को छानने का काम करता था। तब भी बाढ़ आती रही होगी, लेकिन उसकी मारक क्षमता ऐसी नहीं होगी।.ढाइ हजार साल पहले एक संवाद में बाढ़ का कुछ वर्णन मिलता है। संवाद भगवान बुध्द और एक ग्वाले के बीच है। ग्वाले के घर में किसी दिन भगवान बुध्द पहुंचे हैं। काली घटाएं छाई हुई हैं। ग्वाला बुध्द से कह रहा है कि उसने अपना छप्पर कस लिया है, गाय को मजबूती से खूंटे में बांध दिया है, फसल काट ली है। अब बाढ़ का कोई डर नहीं बचा है। आराम से चाहे जितना पानी बरसे। नदी देवी दर्शन देकर चली जाएंगी। इसके बाद भगावन बुध्द ग्वाले से कह रहे हैं कि मैंने तृष्णा की नावों को खोल दिया है। अब मुझे बाढ़ का कोई डर नहीं है। युगपुरुष साधारण ग्वाले की झोपड़ी में नदी किनारे रात बिताएंगे। उस नदी के किनारे, जिसमें रात को कभी भी बाढ़ आ जाएगी? पर दोनों निश्चिंत हैं। क्या ऐसा संवाद बाढ़ से ठीक पहले हो पाएगा?.ये सारी चीजें बताती हैं कि लोग इस पानी से, इस बाढ़ से खेलना जानते थे। यहां का समाज इस बाढ़ में तैरना जानता था इस बाढ़ में तरना जानता था। इस पूरे इलाके में हद और चौरा या चौर दो शब्द बड़े तालाबों के लिए हैं। इस इलाके में पुराने और बड़े तालाबों का वर्णन खूब मिलता है। दरभंगा का एक तालाब इतना बड़ा था कि उसका वर्णन करने वाले उसे अतिशयोक्ति तक ले गए। उसे बनाने वाले लोगों ने अगस्त्य मुनि तक को चुनौती दी कि तुमने समुद्र का पानी पीकर उसे सुखा दिया था, अब हमारे इस तालाब का पानी पीकर सुखा दो तब जानें। वैसे समुद्र जितना बड़ा कुछ भी न होगा- यह वहां के लोगों को भी पता था। पर यह खेल ै कि हम इतना बड़ा तालाब बनाना जानते हैं।
.उन्नीसवीं शताब्दी तक वहां के बड़े-बड़े तालाबों के बड़े-बड़े किस्से चलते थे। चौर में भी बाढ़ का अतिरिक्त पानी रोक लिया जाता था। परिहारपुर, भरवाहा और आलापुर आदि क्षेत्रों में दो-तीन मील लंबे- चौड़े तालाब थे। धीरे-धीरे बाद के नियोजकों के मन में यह आया कि इतनी जलराशि से भरे बड़े-बड़े तालाब बेकार की जगह घेरते हैं- इनका पानी सुखकार जमीन लोगों को खेती के लिए उपलब्ध करा दें। इस तरह हमने दो- चार खेत जरूर बढ़ा लिए। ये बड़े-बड़े तालाब वहां बाढ़ का पानी रोकने का काम करते थे।आज अंग्रेजी में रेन वॉटर हारवेस्टिंग शब्द है। इस तरह का पूरा ढांचा उत्तर बिहार के लोगों ने बनाया था। वह फ्लड वॉटर हारवेस्टिंग सिस्टम' था। उसी से उन्होंने यह खेल खेला था। तब भी बाढ़ आती थी, लेनिक वे बाढ़ की मार को कम से कम करना जानते थे। तालाब का एक विशेषण यहां मिलता है- नदिया ताल। मतलब है- वह वर्षा के पानी से नहीं, बल्कि नदी के पानी से भरता था। पूरे देश में वर्षा के पानी से भरने वाले तालाब मिलेंगे। लेकिन यहां हिमालय से उतरने वाला तालाब बनाना ज्यादा व्यावहारिक होता था। नदी का पानी धीरे-धीरे कहीं न कहीं रोकते- रोकते उसकी मारक क्षमता को उपकार में बदलते-बदलते आगे गंगा में मिलाया जाता था।.आज के नए लोग मानते हैं कि समाज अनपढ़ है, पिछड़ा है। नए लोग ऐसे दंभी हैं। उत्तर बिहार से निकलने वाली बाढ़ पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश में जाती है। एक मोटा अंदाला है कि बांग्लादेश में कुल जो जलराशि इकट्ठा होती है, उसका केवल दस प्रतिशत उसे बादलों से मिलता है। नब्बे फीसदी उसे बिहार, नेपाल और दूसरी तरफ से आने वाली नदियों से मिलता है। वहां तीन बड़ी नदियां गंगा, मेघना और ब्रह्मपुत्र हैं। ये तीनों नदियां नब्बे फीसदी पानी उस देश में लेकर आती हैं और कुल दस फीसदी वर्षा से मिलता है। बांग्लादेश का समाज सदियों से इन नदियों के किनारे इनके संगम के किनारे रहना जानता था।.वहां नदी अनेक मीलों फैल जाती है। हमारी जैसी नदियां नहीं होतीं कि एक तट से दूसरा तट दिखाई दे। वहां की नदियां क्षितिज तक चली जाती हैं। उन नदियों के किनारे भी वह न सिर्फ बाढ़ से खेलना जानता था, बल्कि उसे अपने लिए उपकारी भी बनाना जानता था। इसी में से अपनी अच्छी फसल निकालता था, आगे का जीवन चलाता था और इसीलिएसोना बांग्ला कहलाता था।.लेकिन धीरे- धीरे चार कोसी झाड़ी गई। हद और चौर चले गए। कम हिस्से में अच्छी खेती करते थे, उसको लालच में थोड़े बड़े हिस्से में फैलाकर देखने की कोशिश की। और हम अब बाढ़ में डूब जाते हैं। बस्तियां कहां बनेंगीख् कहां नहीं बनेंगी इसके लिए बहुत अनुशासन होता था। चौर के क्षेत्र में केवल खेती होगी, बस्ती नहीं बसेगी- ऐसे नियम टूट चुे हैं तो फिर बाढ़ भी नियम तोड़े लगी है। उसे भी धीरे-धीरे भूलकर चाहे आबादी का दबाव कहिए या अन्य अनियंत्रित विकास के कारण- अब हम नदियों के बाढ़ के रास्ते में सामान रखने लगे हैं, अपने घर बनाने लगे हैं। इसलिए नदियों का दोष नहीं है। अगर हमारी पहली मंजिल तक पानी भरता है तो इसका एक बड़ा कारण उसके रास्ते में विकास करना है।.एक और बहुत बड़ी चीज पिछले दो- एक सौ साल में हुई है। वे हैं तटबंध और बांध। छोटे से लेकर बड़े बांध इस इलाके में बनाए गए हैं, बगैर इन नदियों का स्वभाव समझे। नदियों की धारा इधर से उधर न भटके यह मानकर हमने एक नए भटकाव के विकास की योजना अपनाई है। उसको तटबंध कहते हैं। ये बांग्लादेश में भी बने हैं और इनकी लंबाई सैकड़ों मील तक जाती है। उसके बाद आज पता चलता है कि इनसे बाढ़ रुकने के बजाय बढ़ी है, नुकसान ही ज्यादा हुआ है। अभी तो कहीं-कहीं ये एकमात्र उपकार यह करते हैं कि एक बड़े इलाके की आबादी जब डूब से प्रभावित होती है, बाढ़ से प्रभावित होती हैतो लोग इन तटबंधों पर ही शरण लेने आ जाते हैं। जो बाढ़ से बचाने वाली योजना था वह केवल शरणस्थली में बदल गई है। इन सब चीजों के बारे में सोचना चाहिए। बहुत पहले से लोग ह रहे थे कि तटबंध व्यावहारिक नहीं हैं। लेकिन हमने देखा है कि पिछले डेढ़ सौसाल में हम लोगों ने तटबंधों के सिवाय और किसी चीज में पैसा नहीं लगाया है, ध्यान नहीं लगाया है।.बाढ़ अगले साल भी आएगी। यह अतिथि नहीं है। इसकी तिथियां तय हैं और हमारा समाज इससे खेलना जानता था। लेकिन अब हम जैसे- जैसे ज्यादा विकसित होते जा रहे हैं, इसकी तिथियां और इसका स्वभाव भूल रहे हैं। इस साल कहा जाता है कि बाढ़ राहत में खाना बांटने में, खाने के पैकेट गिराने में हेलीकाप्टर का जो इस्तेमाल किया गया, उसमें चौबीस करोड़ रुपए का खर्च आया था। शायद इस लागत से सिर्फ दो करोड़ की रोटी- सब्जी बांटी गई थी। ज्यादा अच्छा होता कि इस इलाके में चौबीस करोड़ के हेलीकाप्टर के बदले हम कम से कम बीस हजार नावें तैयार रखते और मछुआरे, नाविकों, मल्लाहों को सम्मान के साथ इस काम में लगाते। यह नदियों की गोदी में पला-बढ़ा समाज है। इसे बाढ़ भयानक नहीं दिखती। अपने घर की, परिवार की सदस्य की तरह दिखती है- उसके हाथ्ज्ञ में हमने बीस हजार नावें छोडी होतीं। इस साल नहीं छोड़ी गईं तो अगले साल इस तरह की योजना बन सकती है। नावें तैयार रखी जाएं- उनके नाविक तैयार हों, उनका रजिस्टर तैयार हो, जो वहां के जिलाधिकारी या इलाके की किसी प्रमुख संस्था या संगठन के पास हो, उसमें किसी राहत की सामग्रगी कहां- कहां से रखी जाएगी, यह सब तय हो। और हरेक नाव को निश्चित गांवों की संख्या दी जाए। डूब के प्रभाव को देखते हुए, पुराने अनुभव को देखते हुए, उनको सबसे पहले कहां- कहां अनाज या बना-बनाया खाना पहुंचाना है- इसकी तैयारी हो। तब हम पाएंगे कि चौबीस करोड़ के हेलीकाप्टर के बदले शायद यह काम एक या दो करोड़ में कर सकेंगे और इस राशि की एक-एक पाई उन लोगों तक जाएगी जिन तक बाढ़ के दिनों में उसे जाना चाहिए।
।बाढ़ आज से नहीं आ रही है। अगर आप बहुत पहले का साहित्य न भी देखें तो देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू की आत्मकथा में देखेंगे कि उसमें छपरा की भयानक बाढ़ का उल्लेख मिलेगा। उस समय कहा जाता है कि एक ही घंटे में छत्तीस इंच वर्षा हुई थी और पूरा छपना जिला पानी में डूब गया था। तब भी राहत का काम हुआ और तब पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सरकार से आगे बढ़कर काम किया था। उस समय भी आरोप लगे थे कि प्रशासन ने इसमें कोई खास मदद नहीं दी। आज भी ऐसे आरोप लगते हैं, ऐसी ही बाढ़ आती है तो चित्र बदलेगा ही नहीं। बड़े नेताओं की आत्मकथाओं में इसी तरह की लाइनें लिखी जाएंगी और अखबारों में भी इसी तरह की चीजें छपेंगी। लेकिन हमें कुछ विशेष करके दिखाना है तो हम लोगों को नेपाल, बिहार, बंगाल और बांग्लादेश- सभी को मिलकर बात करनी होगी। पुरानी स्मृतियों में बाढ़ से निपटने के क्या तरीके थे, उनका फिर से आदान-प्रदान करना होगा। उन्हें समझना होगा और उन्हें नई व्यवस्था में हम किस तरह से ज्यों का त्यों या कुछ सुधार कर अपना सकते हैं, इस पर ध्यान देना होगा।.जब शुरू- शुरू में अंग्रेजों ने इस इलाके में नहरों का, पानी का काम किया, तटबंधों का काम किया तब भी उनके बीच में एक- दो ऐसे सहृदहय समझदार और यहां की मिट्टी को जानने- समझने वाले अधिकारी रहे जिन्होंने ऐसा माना था कि जो कुछ किया गया है उससे यह इलाका सुधरने के बदले और अधिक बिगड़ा है। इस तरह की चीजें हमारे पुराने दस्तावेजों में हैं। इन सबको एक साथ समझना-बूझना चाहिए और इसमें से फिर कोई रास्ता निकालना चाहिए। नहीं तो उत्तर बिहार की बाढ़ का प्रश्न ज्यों का त्यों बना रहेगा। हम उसका उत्तर नहीं खोज पाएंगे।
श्री मिश्र का यह लेख जनसत्ता से लिया गया है। उनकी अनुमति से।
गुरुवार, ३ अप्रैल २००८
न्यूज़ सेंस - या - न्यूड सेंस
'कल इतनी इम्पोर्टेन्ट न्यूज़ तुमने मिस कर दी। पता है तुम्हे मालीक का फ़ोन आ गया।'
'कौन सी ख़बर सर ?'
आउटपुट एडिटर अपनी धून में था। प्रोड्यूसर की बात उसने सुनी नहीं या जानबूझकर कर अनसुनी कर दी, कहा नहीं जा सकता है। वह चीख रहा था-
'न्यूज़ सेंस नाम की कोई चीज नहीं है तुम्हारे अंदर। अगर नौकरी नहीं करना चाहते तो चले जाओ, क्यों चॅनल की नाक कटाने पर तुले हो?'
'सर आपने बताया नहीं कौन सी महत्वपूर्ण ख़बर कल चल नहीं पाई ?'
'कल स्टेज पर राखी सावंत की चोली खुल गई। उस इम्पोर्टेन्ट ख़बर को दिखा-दिखाकर सभी चैनलों ने जमकर टीआरपी बटोरी। बस एक भोले बाबा आप तक ही यह ख़बर नहीं पहुच पाई।'
आउटपुट एडिटर मानों अपने आप से बात करता हुआ न्यूज़ रूम से बाहर निकल गया।
'पत्रकार बिरादरी में हमारी कितनी थू-थू हो रही है। न्यूज़ सेंस नाम की कोई चीज नहीं है यहाँ किसी के पास।'
'कौन सी ख़बर सर ?'
आउटपुट एडिटर अपनी धून में था। प्रोड्यूसर की बात उसने सुनी नहीं या जानबूझकर कर अनसुनी कर दी, कहा नहीं जा सकता है। वह चीख रहा था-
'न्यूज़ सेंस नाम की कोई चीज नहीं है तुम्हारे अंदर। अगर नौकरी नहीं करना चाहते तो चले जाओ, क्यों चॅनल की नाक कटाने पर तुले हो?'
'सर आपने बताया नहीं कौन सी महत्वपूर्ण ख़बर कल चल नहीं पाई ?'
'कल स्टेज पर राखी सावंत की चोली खुल गई। उस इम्पोर्टेन्ट ख़बर को दिखा-दिखाकर सभी चैनलों ने जमकर टीआरपी बटोरी। बस एक भोले बाबा आप तक ही यह ख़बर नहीं पहुच पाई।'
आउटपुट एडिटर मानों अपने आप से बात करता हुआ न्यूज़ रूम से बाहर निकल गया।
'पत्रकार बिरादरी में हमारी कितनी थू-थू हो रही है। न्यूज़ सेंस नाम की कोई चीज नहीं है यहाँ किसी के पास।'
बुधवार, २ अप्रैल २००८
रजत जी, रजत जी ..... माँ, बहन .... खबरों की
रजत जी, रजत जी तुम्हारे घर में कोई मां, बहन नहीं है क्या?
औघट बाबा ने सीधे-सीधे मिलते हीं उनसे यही सवाल पूछा।
रजत ने उनकी बात सुनी तो खी खी या कर हंस पड़े।
औघट बाबा रुकने वाले कहाँ थे सो चालू रहे,
दिन में तुम्हारा चॅनल मनोहर कहानियाँ होता है, और रात को १२ बजते ही इसे तुम मस्तराम की किताब बना देते हो।
मुझे तो लगता अब महिलाओं को तुम्हारे जैसे चॅनल वाले जागरूक बनाकर हीं रहेंगे।
जिस गंदगी को तुम खत्म करने की बात करते हो, तुम्हे पता है, ख़त्म करने के नाम पर तुम पूरे दिन में कितनी गंदगी अपने दर्शकों के सामने पडोसते हो?
औघट बाबा की बात सुनने के बाद रजत हंसा।
'बाबा घर में माँ, बहन, बेटी, पत्नी सभी हैं। लेकिन इनमे से कोई मेरा चॅनल नहीं देखता। सभी अंगरेजी का चॅनल देखते हैं।
वैसे भी हमारा चॅनल आम आदमी के लिय है।
आम आदमी की बात सुन कर बाबा बड़े प्रसन्न हुय। आजकल सुना है वह रजत के चॅनल पर दिखते हैं और रविवार से लेकर शनिवार तक किय जाने वाले व्रतों के लाभ बताते हैं।
औघट बाबा ने सीधे-सीधे मिलते हीं उनसे यही सवाल पूछा।
रजत ने उनकी बात सुनी तो खी खी या कर हंस पड़े।
औघट बाबा रुकने वाले कहाँ थे सो चालू रहे,
दिन में तुम्हारा चॅनल मनोहर कहानियाँ होता है, और रात को १२ बजते ही इसे तुम मस्तराम की किताब बना देते हो।
मुझे तो लगता अब महिलाओं को तुम्हारे जैसे चॅनल वाले जागरूक बनाकर हीं रहेंगे।
जिस गंदगी को तुम खत्म करने की बात करते हो, तुम्हे पता है, ख़त्म करने के नाम पर तुम पूरे दिन में कितनी गंदगी अपने दर्शकों के सामने पडोसते हो?
औघट बाबा की बात सुनने के बाद रजत हंसा।
'बाबा घर में माँ, बहन, बेटी, पत्नी सभी हैं। लेकिन इनमे से कोई मेरा चॅनल नहीं देखता। सभी अंगरेजी का चॅनल देखते हैं।
वैसे भी हमारा चॅनल आम आदमी के लिय है।
आम आदमी की बात सुन कर बाबा बड़े प्रसन्न हुय। आजकल सुना है वह रजत के चॅनल पर दिखते हैं और रविवार से लेकर शनिवार तक किय जाने वाले व्रतों के लाभ बताते हैं।
राम नाम सत्य है .....
राम का नाम सत्य है, इस बात पर किसे आपत्ति हो सकती है। मुझे तो कम से कम नहीं है। वैसे भी भारत में यदि रहना है तो जय श्री राम कहना होगा, जैसे नारे भी मैंने सुने हैं या किताबों में पढ़ा है। ठीक-ठीक बता नहीं सकता।
लेकिन यह शब्द है बड़े काम का यह तो मानना होगा। यदि राम ना होते तो क्या एन डी ऐ की सरकार कभी बन पाती। अटल जी कभी प्रधान मंत्री बन पाते। आडवानी किसके नाम पर रथयात्रा करते? सबसे कमाल की बात यह कि यदि राम ना होते तो आज़ादी के बाद से इस देश पर राज कराने वाली एक के बाद एक सरकार किसके भरोसे चलती।
राम की सच्चाई पर भारतीय जनमानस का भरोसा कितना मजबूत है इस बात का पता शोध के जरिय ही लग सकता है। क्योंकि राम की सच्चाई पर विश्वास कराने वाले हमारे समाज को राम की सच्चाई की याद सिर्फ़ उस वक़्त आती है जब किसी कि मौत होती है।
लेकिन यह शब्द है बड़े काम का यह तो मानना होगा। यदि राम ना होते तो क्या एन डी ऐ की सरकार कभी बन पाती। अटल जी कभी प्रधान मंत्री बन पाते। आडवानी किसके नाम पर रथयात्रा करते? सबसे कमाल की बात यह कि यदि राम ना होते तो आज़ादी के बाद से इस देश पर राज कराने वाली एक के बाद एक सरकार किसके भरोसे चलती।
राम की सच्चाई पर भारतीय जनमानस का भरोसा कितना मजबूत है इस बात का पता शोध के जरिय ही लग सकता है। क्योंकि राम की सच्चाई पर विश्वास कराने वाले हमारे समाज को राम की सच्चाई की याद सिर्फ़ उस वक़्त आती है जब किसी कि मौत होती है।
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