रविवार, 21 अगस्त 2016

शौहर, बेगम और दूसरी पत्नी

'‘बांग्लादेशी भारत में घुस रहे हैं और आदिवासी महिलाओं से शादी कर रहे हैं। केन्द्र और राज्य दोनों के लिए यह चिन्ता का विषय है। खासकर बांग्लादेश से सटे झारखंड के पाकुर, साहबगंज आदि जिलों में ऐसा चलन बढ़ रहा है। पिछले कुछ समय से ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं। इसलिए राज्य सरकार और पुलिस को अपना खुफिया तंत्र अधिक मजबूत करना होगा। जिससे बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोक कर उनकी मंशा पर लगाम लगाया जा सके।’'
सुदर्शन भगत, केन्द्रिय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री, भारत सरकार

झारखंड की आदिवासी महिलाएं राज्य की ताकत हैं। उन्हें अधिकार प्राप्त है। उनका समाज में सम्मान भी है। इन लड़कियों को गैर आदिवासी समाज जो दूसरी और तीसरी पत्नी के तौर पर अपने पास रखता है, उनके हाथों इनका शोषण भी हुआ है। ये गैर आदिवासी वे हैं, जो बाहर से आकर झारखंड में बसना चाहते हैं। झारखंड की सम्पदा पर कब्जा चाहते हैं। एक खास धर्म के लोगों को इस देश में एक से अधिक बेगम रखने की इजाजत है। उन लोगों ने अपने धर्म की इस कमजोरी का लाभ उठाकर एक एक पुरुष ने कई-कई स्त्रियों से शादी की। इस शादी की आड़ लेकर उन्होंने झारखंड की संपत्ति और संपदा पर कब्जा किया। साथ में आदिवासी लड़कियों का शारीरिक और आर्थिक शोषण भी किया। रांची के माडर से लेकर लोहरदगा तक बांग्लादेशी घुसपैठियों ने बड़ी संख्या में इस तरह की शादी की है। इतना ही नहीं इन शादियों में क्रिश्चियन बनी आदिवासी लड़कियों ने दूसरी और तीसरी पत्नी बनकर गैर आदिवासी पुरुषों से अधिक संख्या में शादी की है लेकिन किसी फादर या कॉर्डिनल ने इस संबंध में छोटा सा बयान भी नहीं दिया। लेकिन अब आदिवासी समाज जग रहा है और बेगम जमात की चालाकियों को खूब समझ रहा है। वह इस बदमाशी को अधिक समय तक आने वाले दिनों में बर्दाश्त करने वाला नहीं है।
पद्मश्री अशोक भगत, विकास भारती

समाज किसी का हो, दो पत्नी रखना सही नहीं ठहराया जा सकता। क्या तीन पत्नी रखने वाले अपनी तीनों पत्नियों को दो-दो और पत्नी रखने की इजाजत देंगे?
अमिता मुंडा, आदिम जाति सेवा मंडल

झारखंड में दूसरी या तीसरी पत्नी बनकर गैर आदिवासियांे के परिवार में जो लड़कियां जा रहीं हैं, उनमें ध्यान देने वाली बात यह है कि उन लड़कियों में अधिकांश कामकाजी लड़कियां हैं। वह अपनी आमदनी से अपने पति को भी मदद करती हैं। इन कामकाजी लड़कियों में आदिवासी क्रिश्चियन लड़कियों की संख्या अधिक है। जो दूसरी या तीसरी पत्नी बनकर जा रहीं हैं।
दिवाकर मिंज, प्राध्यापक, रांची विवि

रांची राजमार्ग से तीन किलोमीटर अंदर की तरफ जाने पर इटकी प्रखंड आता है। मुख्य सड़क से अंदर जाने का रास्ता कच्चा-पक्का है। जब आप इटकी में दाखिल होते हैं, बायीं तरफ लड़कियों का एक मदरसा है। इस मदरसे को देखकर आप अनुमान करते हैं कि यह प्रखंड स्त्रियों के अधिकार को लेकर जागरूक प्रखंड होगा। इसी प्रखंड में एक घर है परवेज आलम (काल्पनिक नाम) का। परवेज शादी शुदा पुरुष हैं लेकिन शादी इन्होंने एक बार नहीं तीन बार की है। इनके घर में पत्नी के तौर पर तीन औरतें रहती हैं। पहली शकीना खातून (काल्पनिक नाम) और बाकि दो औरतें आदिवासी हैं। दूसरी रंजना टोप्पो (काल्पनिक नाम) और तीसरी मीनाक्षी लाकड़ा (काल्पनिक नाम)। इटकी के आस-पास के लोगों से बातचीत करते हुए यह अनुमान लगाना आसान था कि परवेज का मामला अकेला नहीं है, इटकी प्रखंड में। इस तरह के कई दर्जन मामले हैं, जिसमें एक से अधिक शादी हुई है और गैर आदिवासी समाज से आने वाले पुरुष ने एक से अधिक शादी में कम से कम एक पत्नी आदिवासी स्त्री को रखा है। अपने अध्ययन में यह बात साफ तौर पर नजर आई कि दूसरी और तीसरी आदिवासी पत्नी चुनते हुए गैर आदिवासी पुरुष ने इस बात को प्राथमिकता दी है कि आदिवासी लड़की कामकाजी होनी चाहिए। आदिवासी युवति नर्स या शिक्षिका हो तो वह वह गैर आदिवासी पुरुष की पहली पसंद होती है।
झारखंड की सामाजिक कार्यकर्ता वासवी कीरो जो लम्बे समय से आदिवासी मुद्दों पर काम कर रहीं हैं, बताती हैं कि इस तरह की कामकाजी आदिवासी लड़कियों के लिए गैर आदिवासी युवकों के बीच एक शब्द इस्तेमाल होता है, बियरर चेक। वास्तव में कामकाजी महिलाएं उनके लिए बियरर चेक ही तो होती है, जो दूसरी या तीसरी पत्नी बनकर सेक्स की भूख मिटाती हैं और साथ-साथ हर महीने पैसे देकर पेट की भी।
वासवी पन्द्रह साल पहले अपने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहती हैं- 15 साल पहले हम लोगों ने एक अध्ययन किया था लेकिन चीजें अब भी प्रासंगिक हैं। जिन परिवारों में आदिवासी लड़की थी, दूसरी, तीसरी पत्नी बनकर, हमने पाया कि उन परिवारों में आदिवासी लड़की को वह महत्व नहीं मिल पा रहा है, जो परिवार में मौजूद गैर आदिवासी पत्नी को हासिल था। वासवी के अनुसार सीमडेगा, लोहरदगा और गुमला में बड़ी संख्या में इस तरह के मामले उन्हें देखने को मिले।
इस तरह की घटनाओं को सुनकर कम से कम झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता नहीं चौंकते क्योंकि समाज के बीच में काम करते हुए उनका सामना प्रति दिन ऐसे मामलों से होता है, जिसमें एक से अधिक शादियां हों और गैर आदिवासी परिवार में एक से अधिक शादियों में कम से कम एक आदिवासी लड़की हो। आम तौर पर इन आदिवासी लड़कियों की स्थिति परिवार में दोयम दर्जे की ही होती है।
नफीस से मेरी मुलाकात इटकी प्रखंड में हुई थी। नफीस मानते हैं कि इटकी में इस तरह की शादियां बड़ी संख्या में हुई है। नफीस इस तरह की शादियों को सही नहीं ठहराते। नफीस के मित्र हैं, अभय पांडेय। पांडेय के अनुसार - गैर आदिवासी युवकों द्वारा आदिवासी लड़कियों को दूसरी अथवा तीसरी पत्नी बनाने की घटनाएं बड़ी संख्या में है। लेकिन यह बताना भी नहीं भूलते कि इस मामले में इटकी में कोई बात करने को तैयार नहीं होगा।
जब उनसे पूछा कि ऐसा क्यों है? कोई बात करने को क्यों तैयार नहीं होगा? तो पांडेय इशारों-इशारों में बताते हैं कि जहां हमारी बातचीत हो रही है, वह मुस्लिम मोहल्ला है। यहां इस तरह की संवेदनशील बातचीत से खतरा हो सकता है। पांडेय यह सलाह देना नहीं भूलते कि प्रखंड कार्यालय से दो किलोमीटर दूर एक पिछड़ी जाति से ताल्लूक रखने वाले व्यक्ति से मिलना सही होगा। जिन्होंने दो आदिवासी महिलाओं से शादी की है। पांडेय दो किलोमीटर दूर वाले परिवार से मिलवाने की जिम्मेवारी नफीस साहब को देकर किसी जरूरी मीटिंग का बहाना बनाकर निकल लेते हैं।
यदि एक पुरुष और एक स्त्री धर्म जाति की परवाह किए बिना आपस में प्रेम करते हैं और शादी का निर्णय लेते हैं तो समाज को उसे स्वीकार करना ही चाहिए। लेकिन यदि यही प्रेम एक से अधिक स्त्रियों के साथ हो और इन सभी स्त्रियों को कोई एक व्यक्ति पत्नी बनाने की ख्वाहिश रखे तो क्या इसे प्रेम माना जाएगा? यह हवश है या कोई बड़ा गोरखधंधा। बताया जाता है कि इस्लाम में एक से अधिक शादी की इजाजत है लेकिन इस इजाजत के साथ जिन शर्तों का जिक्र है, उस पर कभी समाज में चर्चा नहीं हो पाती। ना उस पर अमल एक से अधिक शादी करने वाला शौहर कभी करता है। अब सवाल यह है कि फिर इस तरह के कानून की समाज में जरूरत ही क्या है? एक-एक पुरुष को शादी के लिए एक से अधिक स्त्री क्यों चाहिए?
अमिता मुंडा आदिम जाति सेवा मंडल से जुड़ी हुई हैं। अमिता के अनुसार- समाज में कोई भी धर्म हो, दो पत्नी रखना उचित नहीं है। दो पत्नियों के साथ बराबर का रिश्ता नहीं रखा जा सकता। क्या तीन पत्नी रखने वालों की तीनो ंपत्नियां दो-दो पति और रखने की इजाजत मांगे तो क्या तीन पत्नी रखने वाला पति तैयार होगा?
अमिता रांची स्थित हिंद पीढ़ी का जिक्र करते हुए कहती हैं कि आप वहां चले जाइए, इस तरह का बहुत सा मामला आपको देखने को मिलेगा।
एक से अधिक विवाह के संबंध में अपने अध्ययन के दौरान इंडिया फाउंडेशन फॉर रूरल डेवलपमेन्ट स्टडिज ने पाया कि रांची के आसपास के जिलों को मिलाकर ऐसे एक हजार से अधिक मामले इस क्षेत्र में मौजूद हैं। इस स्टोरी पर काम करते हुए ऐसे रिश्तों की जानकारी मिली जिसमें आदिवासी लड़की को दूसरी या तीसरी पत्नी बनाकर घर में रखा गया है। परिवार में साथ रहने के बावजूद स्त्री को पत्नी का दर्जा हासिल नहीं है। समाज इन्हें पत्नी के तौर पर जानता है लेकिन उन्हें पत्नी का कानूनी अधिकार हासिल नहीं है। कई मामलों में उन्हें मां बनने से रोका गया। आदिवासी लड़की, गैर आदिवासी परिवार में सिर्फ सेक्स की गुड़िया की हैसियत से रह रही है। यदि एक पुरुष एक स्त्री के साथ बिना शादी किए एक घर में रहता है और उसके साथ शारीरिक संबंध भी बनाता है तो इसे आप लिव इन रिलेशन कह सकते हैं लेकिन दो शादियों के बाद घर में तीसरी औरत को रखना और उसे पत्नी का कानूनी अधिकार भी ना देने को आप क्या नाम देना चाहेंगे? इस रिश्ते का कोई तो नाम होगा?
झारखंड के आदिवासी समाज में अशोक भगत लंबे समय से काम कर रहे हैं। उनकी संस्था विकास भारती आदिवासियों के बीच एक जाना पहचाना नाम है। अशोक भगत शोषण की बात स्वीकार करते हुए कहते हैं- एक खास धर्म के लोगों को एक से अधिक बेगम रखने की इजाजत है। उन लोगों ने अपने धर्म की इस कमजोरी का लाभ उठाकर एक-एक पुरुष ने झारखंड में कई-कई शादियां की हैं। आम तौर पर ये लोग झारखंड के बाहर से आए हैं और आदिवासी लड़कियों को दूसरी, तीसरी पत्नी बनाने के पिछे इनका मकसद झारखंड के संसाधनों पर कब्जा और इनके माध्यम से झारखंड में राजनीतिक शक्ति हासिल करना भी है। पंचायत से लेकर जिला परिषद तक के चुनावों में आरक्षित सीटों पर इस तरह वे आदिवासी लड़कियों को आगे करके अपने मोहरे सेट करते हैं। वास्तव में आदिवासी समाज की लड़कियों का इस तरह शोषण आदिवासी समाज के खिलाफ अन्याय है। अशोक भगत बताते हैं- रांची के मांडर से लेकर लोहरदग्गा तक और बांग्लादेशी घुसपैठियों ने पाकुड़ और साहेब गंज में बड़ी संख्या में इस तरह की शादियां की हैं।
श्री भगत इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि जब इतनी बड़ी संख्या में क्रिश्चियन आदिवासी लड़कियां दूसरी और तीसरी पत्नी बनकर गैर आदिवासियों के पास गई हैं लेकिन कभी चर्च ने या फिर कॉर्डिनल ने इस तरह की नाजायज शादी के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला। श्री भगत उम्मीद जताते हुए कहते हैं- आदिवासी समाज बेगम-जमात की चालाकियों को समझ रहा है। मुझे यकिन है कि आदिवासी समाज इन मुद्दों पर जागेगा। आने वाले दिनों में विरोध का स्वर उनके बीच से ही मखर होगा।
गैर आदिवासी पति के नाम को छुपाने का मामला भी झारखंड में छुप नहीं सका है। ऐसी आदिवासी महिलाएं जिनका इस्तेमाल आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ाने में गैर आदिवासी करते हैं, अच्छी संख्या में हैं। इन महिलाओं से चुनाव का फॉर्म भरवाते समय इस बात का विशेष ख्याल रखा जाता है कि वह अपने पति का नाम फॉर्म में ना भरे। इस तरह आदिवासी पिता का नाम आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ने वाली यह आदिवासी महिलाएं लिखती हैं। पति का नाम फॉर्म में नहीं लिखा जाता है। ऐसा एक मामला इन दिनों रांची में चर्चा में है। जिसमें एक विधायक प्रत्याशी ने आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ा जबकि उसका पति मुस्लिम समाज से आता है।
आदिवासी विषय के अध्ययेता रांची विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दिवाकर मिंज मानते हैं कि दूसरी या तीसरी पत्नी बनकर शादी में जाने वाली आदिवासी लड़कियां आम तौर पर, पढ़ी-लिखी, कामकाजी और क्रिश्चियन होती हैं।
झारखंड में एक दर्जन से अधिक सामाजिक संगठनों ने माना कि इस तरह की घटनाएं झारखंड में हैं, जिसमें एक से अधिक शादियां हुई हैं और इस तरह की शादियों में शोषण आदिवासी लड़कियों का हुआ है। सभी सामाजिक संगठनों ने इस तरह की शादियों को सामाजिक बुराई बताया। एक से अधिक शादी को आप चाहे जो नाम दे दें लेकिन इस तरह की शादियों को आप प्रेम विवाह नहीं कह सकते। अब समय आ गया है जब इस तरह की शादियों पर पाबंदी की मांग समाज से उठे और एक से अधिक शादियों पर कानूनी तौर पर पूरी तरह प्रतिबंध लगे। धर्म, जाति और क्षेत्र की परवाह किए बिना। यह सही समय है, जब हम सब समाज से इस बुराई को खत्म करने के लिए आवाज बुलन्द करें।

रविवार, 8 नवंबर 2015

जीता महागठबंधन - क्यों ‘हारा’ बिहार

सीता की जन्मभूमि ये बिहार, गांधी की कर्मभूमि ये बिहार, 
सम्राट अशोक की शक्तिभूमि-धर्मभूमि ये बिहार-ये बिहार।
वाल्मिकी ने रची रामायण, लव कूश को जाने संसार
ये है मेरा बिहार हां ये मेरा बिहार

ई टीवी के दर्शक इस बिहार गीत से जरूर परिचित होंगे। यह गीत किसी भी बिहारी को गौरवान्वित करता है। लेकिन क्या 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के जो परिणाम आए हैं, उसके बाद ऐसा नहीं लग रहा है कि यह जीत महागठबंधन की है लेकिन बिहार हार गया।
लालू प्रसाद के जंगलराज की वजह से ही बिहार से पलायन बढ़ा। बिहारी संबोधन को गाली बना देना लालूराज की एक बड़ी देन है बिहार को। उसी जंगलराज के खिलाफ नीतीश कुमार को बिहार की जनता ने चुना। उनके काम काज की वजह से ही उन्हें पूरे देश ने सुशासन बाबू के तौर पर स्वीकार किया। लेकिन यह कॉकटेल किसकी समझ में आ सकता था कि सुशासन बाबू और जंगलराज के मुखिया सत्ता के लिए मिल सकते हैं। यह राजनीति है यहां ना कोई परमानेन्ट दुश्मन है और ना दोस्त। यदि कल को नीतीश और भारतीय जनता पार्टी फिर मिल जाएं तो आश्चर्य ना कीजिएगा। 
वास्तव में यह सब इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि बिहार में नई सरकार की जीत को सभी सेलीब्रेट कर रहे हैं। ऐसे समय में हमें बिहार की हुई हार को नहीं भूलना चाहिए। इस चुनाव के बाद बीजेपी गठबंधन की जीत भी होती तो भी बिहार की हार होती। 
यह पूरा चुनाव लड़ा किन मुद्दों पर गया है? गाय, अखलाक जैसे मुद्दे। शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा जैसे मुद्दों की मानों किसी को सुध ही नहीं थी। भारतीय जनता पार्टी को यह नहीं भूलना चाहिए कि साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण के मास्टर इस देश में धर्म निरपेक्षता के पैरोकार हैं। उन्होंने पिछले साठ से अधिक सालों में देश में हिन्दू विरोधी माहौल ही बनाया है। तस्लीमा भी कहती है कि भारत में धर्म निरपेक्षता का अर्थ मुस्लिम तुष्टीकरण है। देश में सरकार किसी भी पार्टी की बनती हो, ध्रूव दो ही हैं। एक भारतीय जनता पार्टी और दूसरी भारतीय जनता पार्टी विरोधी। यह स्थिति उस समय भी थी जब पार्टी के खाते में गिनती के सांसद होते थे। 
नरेन्द्र मोदी की जीत की बड़ी वजह 2014 में यही थी कि उन्होंने धर्म और जाति को चुनाव का मुद्दा नहीं बनने दिया। बिहार चुनाव में अखलाक की मौत और असहिष्णुता के नाम पर जो माहौल देश में बनाया गया और उससे जिस तरह महागठबंधन को फायदा मिला, उससे संदेह यही होता है कि कथित हिन्दू संगठन को पैसे देकर खड़ा तो नहीं किया गया था। पैसों के दम पर यह कर पाना बहुत मुश्किल काम नहीं है आज के समय में।
जगत झा ने सही लिखा है बिहार के चुनाव का विश्लेषण करते हुए कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेता नरेन्द्र मोदी के चुनावी सभाओं की तैयारी में लगे रहे। जमीनी कार्यकर्ताओं की बात नेतृत्व तक पहुंच ही नहीं पाई। वास्तव में केन्द्रिय नेतृत्व के भरोसे विधायकी का चुनाव नहीं जीता जाता। क्षेत्रीय नेतृत्व को उभरने नहीं दिया गया। 
कहा यह भी जा रहा है कि अमित शाह ने गुजरात के चुनाव की तरह बिहार के चुनाव को लड़ा। चुनाव की नीति में स्थानीय नेताओं से समन्वय पर अध्यक्षजी का प्रबंधन हावी रहा। वास्तव में यह चुनाव अपने रंग रूप से भारतीय जनता पार्टी गठबंधन के राष्ट्रीय नेता बनाम महागठबंधन के क्षेत्रीय नेता हो गया था। अमित शाह बिहार को और बिहार की राजनीति को सही प्रकार से नहीं समझते और लालू प्रसाद-नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के पुराने उस्ताद हैं। 
बिहार के स्थानीय नेताओं को हासिए पर डाल कर बिहार फतह कैसे किया जा सकता है? सिन्हा साहब और सिंह साहब की नाराजगी चुनाव प्रचार के दौरान ही मीडिया में आ गई थी। उसके बाद भी इसे गम्भीरता से नही लिया गया। 
बिहार चुनाव 2015 एक ऐसी हारी हुई बाजी बनती गई अन्तिम चरण के चुनाव तक, जिसमें जीत की कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी।
वैसे नीतीश-लालू गठबंधन के सामने चुनौतीयां कई है। आने वाले पांच साल आसान नहीं है। खबर यह भी आ रही है कि नीतीश और लालू मिलकर नई पार्टी बनाएंगे। आने वाले सालों में नीतीश केन्द्र की राजनीति के लिए तैयार किए जाएंगे और लालूजी के दोनों लाल बिहार पर राज करने की तैयारी करेंगे।

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

किताब वापसी अभियानः ‘विरोध’ के स्वर को कौन दबा रहा है

देश में इस तरह का माहौल बनाने की कोशिश की गई मानो इस वक्त देश में कानून का शासन ना रह गया हो। असहिष्णुता जैसा एक शब्द उन लोगों द्वारा चुन कर लाया गया जो सरकार पर दबाव बनाना चाहते थे। ये सभी वह लोग हैं जो नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही यह घोषणा कर चुके थे कि यदि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो देश की सहिष्णुता खतरे में पड़ जाएगी। उनके इस विरोध को जनता ने अधिक तवज्जो नहीं दिया।
 इस वक्त मीडिया में इन मुट्ठी भर लोगों ने ऐसा माहौल बना दिया है, मानों पूरा देश वास्तव में किसी असहिष्णुता शिकार है। यहां हम उन लेखकों और बुद्धिजीवियों के नाम आपके साथ साझा कर रहे हैं, जो इस बात से सहमत नहीं हैं कि देश में साम्प्रदायिक सद्भाव कम हुआ है। समाज में किसी तरह की दूरी है। आप मित्रो से अपील है कि समाज को तोड़ने वालों के साथ नहीं बल्कि उन लोगों के साथ जुड़िए जो समाज को जोड़ना चाहते हैं। (यहां दिए गए नाम वरियता के क्रम में नहीं हैं) -

01. अनुपम खेर
02. गोपाल दास नीरज,
03. विवेकी राय
04. मनु शर्मा
05. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
06. डॉ नामवर सिंह
06. नरेन्द्र कोहली
07. गोविन्द मिश्र
08. विनोद शुक्ल
09. चित्रा मुद्गल
10. नरेन्द्र कोहली
11.कमल किशोर गोयनका
12. मृदुला गर्ग
13. तेजेन्द्र शर्मा
14. गिरीश पंकज
15. अशोक चक्रधर
16. सुधीश पचौरी
17. तेजेन्द्र शर्मा
18. आशीष कुमार ‘अंशु’
19. वेद प्रताप वैदिक
20. तवलीन सिंह
21. मनमोहन शर्मा
22. राजीव रंजन प्रसाद
23. डा दिलीप अग्निहोत्री
24. मृत्युंजय दीक्षित
25. डॉ मयंक चतुर्वेदी
26. संदीप देव
27. सुरेश चिपलूनकर
28. डा. अरूण भगत
29. सुधांशु त्रिवेदी
30. संजीव सिन्हा
31.तरुण विजय
32. हितेश शंकर
33. बलबीर पूंज
34. अरुण जेटली
35. अनिल पांडेय
36. चेतन भगत
37. हर्षवर्द्धन त्रिपाठी
38. प्रसून जोशी
39. व्यालोक पाठक
40. शिवानंद द्विवेदी सहर
41. डॉ सौरभ मालवीय
42. हरीश चंद्र वर्णवाल
42. हरगोविंद विश्वकर्मा
43. शिवशक्ति बख्शी
44. आभा खन्ना
45. पवन श्रीवास्तव
46. स्वामी आदित्य चैतन्य
47. अनुज अग्रवाल
48. डॉ प्रवीण तिवारी
49. कुलदीपचंद अग्निहोत्री
50. पश्यंति शुक्ला
51. राजीव सचान
52. प्रभु जोशी
53. डॉ जयकृष्ण गौड़
54. प्रमोद भार्गव
55. संजय द्विवेदी
56. अवधेश कुमार
57. अकांक्षा पारे
58. दिनेश मिश्र
59. संजय बेंगानी
60. आदर्श तिवारी
61. समन्वय नंद
62. पंकज झा
63. अकांक्षा अनन्या
64. अरुण कुमार जैमिनी
65. सुबोध के श्रीवास्तव
66. विक्की सैनी
67. संजीव कुमार
68. सुभाष चंद्र
69. निशांत नवीन
70. सुभाष शुक्ला
71. मनुकांत दीक्षित
72. मदन मोहन समर
73. आलोक राज
74. रामजी बाली
75. डॉ अविनाश सिंह
76. तारिक अनवर
77. नरेश कुमार चतुर्वेदी
78. वीनू कुमार वर्मा
79. प्रदीप अरोड़ा
80. दीपक झा
81. धीरज कुमार झा
82. अभय कुमार गुप्ता
83. कुणाल श्रीवास्तव
84. श्वेतांक रतनाम्बर
85. नागेन्द्र कौशिक
86. विवेक श्रीवास्तव
87. अशोक एस उपध्याय
88. गोपाल कुमार झा
89. विशाल भटनागर
90. सविता राज हिरेमठ
91. पंडित हरी प्रसाद चौरसिया
92. मधुर भंडारकर
93. विवेक अग्निहोत्री
94. विद्या बालन
95. एस एल भयरप्पा
96. श्याम बेनेगल
94 कमल हसन
95. अनूप जलोटा
96. मनिष मुन्द्रा
97. पंडित चेतन जोशी
98. दया प्रकाश सिन्हा
99. नरेश शांडिल्य
100. अमिष त्रिपाठी
101. चिदानंद मूर्ति
102. पाटिल पूतप्पा
103. पी वलसारा
104. यूए खादर
105. पी नारायण कुरुप
106. रवीना टंडन
107. विकास सिन्हा
108. सुदर्शन पटनायक
109. जी माधव नायर
110. हरीश चन्द्र वर्मा
111. प्रियदर्शन
112. अक्कीतम
113. एस रमेशन नायर
114. जी श्रीदत नायर
115. पी परमेश्वरन
116. थुरावूर विश्वम्बरन
117. प्रो मेलाथू चन्द्रशेखरन
118. के बी श्रीदेवी
119. सुरेशगोपी
120. मेजर रवि
121. अलप्पा रंगनाथ
122. जया विजया
123. विशेष गुप्ता
124. फिरोज बख्त अहमद
125. सुधांशु रंजन
126. उमेश चतुर्वेदी
127. भवदीप कांग
128. अनंत विजय
129. शोबरी गांगूली
130. हरीश कुमार
131. चन्द्रकांत प्रसाद सिंह
132. अशोक ज्योति







शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

कोई यह खत रवीश कुमार तक पहुंचा दे





रवीशजी कुमार,
आपको यह पत्र लिखने का आयडिया आपके पत्रों को पढ़कर आया। यह सोचकर लिख रहा हूं कि पत्र लिखने वाले को पत्र की कद्र होगी। आपको अपने लिखे किसी खत का जवाब नहीं मिला, लेकिन आप इस खत का जवाब देंगे। ऐसा मैं सोच रहा हूं।
मुझे याद है कि रवीश की रिपोर्ट का किस तरह एक समय इंतजार रहता था। रवीश की रिपोर्ट के साथ बड़े हो रहे पत्रकारिता के छात्रों के समूह में एक विद्यार्थी मैं भी था। आपकी रिपोर्ट की वजह से उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे और दलितों/ वंचितों के पक्ष में हमेशा खड़े रहे रिंकू राही से मिला और महाराष्ट्र में डिक्की वाले मिलिन्द काम्बले से। आपकी रिपोर्ट ने मुझे इनसे मिलने के लिए प्रेरित किया।
अचानक एक दिन एनडीटीवी का एक होर्डिंग नजर आया। यह होर्डिंग दिल्ली में चिड़िया घर और लोदी रोड़ के आस-पास कहीं लगा था, जिसका दावा यह था कि रवीश कुमार हिन्दी के नम्बर वन पत्रकार हैं। जबकि इस तरह का दावा यह होर्डिंग किस आधार पर कर रही थी, इसका उल्लेख पूरे होर्डिंग में कहीं नहीं था। जबकि मेरी जानकारी में रवीश की रिपोर्ट की टीआरपी भी अच्छी नहीं थी। जिसका रोना गाहे बगाहे आप भी रोते ही रहे हैं। 
हमे नम्बर से इतना प्रेम क्यों हैं रवीशजी? मैने जब आपको गांव और दलितों की कहानी करते देखा था तो सोचा था कि आपको नम्बर से प्रेम नहीं है। आप नम्बर के खेल से बाहर हैं। इसलिए आप प्रिय रहे हैं लेकिन आप भी नम्बर से प्रेम करने लगे। मेरा अपना अनुभव इस नम्बर गेम को लेकर अच्छा नहीं है। रवीश अगर एक ब्रांड है, जिसे एनडीटीवी बेच रहा है अच्छे पैकेजिंग के साथ तो यह उसकी मार्केटिंग पॉलिसी है, लेकिन रवीश कुमार इस सबके बावजूद अपने अंदर के रवीश कुमार को बचाए रखें, यह तो रवीश की जरूरत थी। लेकिन महानता के इस खेल के शिकार होते हुए आप प्राइम टाइम एंकर की नई भूमिका में नजर आए। जहां आप एंकर कम अपने पैनल के ‘पापा’ की भूमिका में अधिक थे। 
रवीशजी जबसे आपको मैने टीवी चैनल पर देखा है, आप सिर्फ सवाल पूछते हुए नजर आए हैं। कभी यह नहीं सोचा जो आपको देख रहे हैं, उनके अंदर भी बहुत से सवाल हैं। यही लोग जब आपसे सवाल पूछते हैं, आप झट से उन्हें गुंडा कह देते हैं। जब आप कहते हैं कि आपको मां बहन के नाम पर अपशब्द लिखा जा रहा है और यह हिन्दूवादी ताकतें या नरेन्द्र मोदी के पेड एजेन्ट कर रहे हैं तो एक पत्रकार होने के नाते आपको इस बात का प्रमाण भी देना चाहिए था। ना कि अन्ना हजारे के अभियान की तरह अभियान पर सवाल उठाने वाले हर एक शख्स को भ्रष्टाचारियों के पाले में डाल देना चाहिए। आप फेसबुक पर रहें या ना रहें लेकिन बुश की तरह यह घोषणा तो करते हुए विदा ना हों कि जो हमारे खिलाफ है वह आतंकवाद के साथ है। 
इंदिरा गांधी के समय भारत के लोग कहते थे कि इंदिरा नहीं रहेंगी तो यह देश कैसे चलेगा? आप भी कहीं इसी तरह के किसी भ्रम के साथ फेसबुक और ट्यूटर पर मौजूद तो नहीं थे?
एक साहित्यकार ने यह किस्सा मुझे सुनाया था कि जब उसकी जान खतरे में थी, उसने आपको फोन किया था। यह वह समय था, जब दिल्ली निर्भया मामले की वजह महिला सुरक्षा के अलग-अलग सवालों से जुझ रही थी, ऐसे समय में एक पत्रकार के नाते और इंसान के नाते जब आपको उसकी मदद करनी चाहिए थी, आपने कहा कि आप इस तरह की खबरों का लोड नहीं लेते। रवीशजी कुमार यही बात फोन पर एक पीड़िता को विजयजी गोयल, विजयजी जॉली या विजयकुमरजी मल्होत्रा ने कही होती तो आप उनसे किस किस्म के सवाल पूछते? एक बार उन्हीं संभावित सवालों के जवाब आप देना पसंद करेंगे? या -जवाब देने की सारी जिम्मेवारी राजनेताओं की है और पत्रकार सिर्फ सवाल पूछने के लिए पैदा होते हैं- इस तरह की राय में आप यकिन रखते हैं। 
रवीश बंगाल में एक चर्च में एक बुजूर्ग महिला के साथ बलात्कार की खबर आई थी। आपके मित्र और जनसत्ता के पूर्व संपादक ओमजी थानवी ने खुर्शीद अनवर कथित बलात्कार मामले में कहा था कि जब तक बलात्कारी के नाम की पुष्टी ना हो, आप मामले में कथित लगाइए। जबकि रवीशजी कुमार बंगाल चर्च की उन बुजूर्ग महिला के मेडिकल रिपोर्ट को पढ़े बिना आपने मामले को बलात्कार का मामला बताया। दूसरी बात आपने उस मामले के लिए दोषी हिन्दूवादी संगठनों को बताया। बाद में बंगाल में हुई उस घटना में कुछ मुस्लिम युवक गिरफ्तार हुए और आपकी माफी आज तक नहीं आई। 
प्राइम टाइम में दिखने वाला आपका अहंकार ही है जो आपकी आलोचना करने वाले हर एक व्यक्ति को आपकी नजर में ‘गुंडा’ बना देता है। इसी वजह से इन दिनों आपकी रिपोर्ट में वह धार भी नजर नहीं आती जो पुराने रिपोर्ट में हुआ करती थी। मुझपे यकिन ना कीजिए, अपनी ही रिपोर्ट की पुरानी फूटेज देखिए। 
जब एक राजनीतिक दल में हुई किसी घटना के लिए पूरी पार्टी जिम्मेवार होती है, ठीक इसी प्रकार एनडीटीवी पर उठ रहे सवालों से आप यह कहकर नहीं बच सकते कि आप वहां नौकरी करते हैं। चाहे वह कोका कोला के साथ मिलकर चलाया जा रहा कार्यक्रम हो या फिर बरखा दत्त से जुड़े सवाल। या फिर वेदांता से चैनला की मित्रता या फिर आपके द्वारा खुद को इस तरह पेश किया जाना मानों पूरी पत्रकारिता को आपने ही बचा कर रखा हो। इन सवालों के जवाब सार्वजनिक मंच पर आकर देने से आप क्यों बच रहे हैं? मीडिया स्कैन के मंच पर मैं आपको न्योता देता हूं। आइए। यकिन दिलाता हूं, पूरी बातचीत में कोई आपके लिए अपशब्द का इस्तेमाल नहीं करेंगा। वर्ना रोज रोज सवाल पूछते पूछते कहीं आपके साथ ऐसा ना हो कि आप जवाब देना ही भूल जाएं। 
बहरहाल रवीशजी, हिन्दी की पत्रकारिता की आप चिन्ता ना कीजिए। आप नहंी होंगे, कोई और होगा। आपके ही चैनल में रवीश रंजन ने बुंदेलखंड से और हृदयेश जोशी ने असम से बेहतरीन रिपोर्ट की। आपने भी देखी ही होगी। उनके मुकाबले पिछले दिनों आई आपकी रिपोर्ट कमजोर थी। बिना होमवर्क किए एक मोहल्ले में एक व्यक्ति को साथ लेकर जाना। वहां से फूटेज इकट्ठा करके आधा घंटे का प्रोग्राम बना देना। पिछले दिनों अपने रिपोर्ट में यही आपने किया। शायद आपको लगता है कि आप सेलिब्रिटी एंकर हैं और आप जो भी पड़ोस देंगे देखने वाले उसे वाह वाह करके देख लेंगे। रवीशजी आप गलत सोचते हैं, देखने वाले आपको पहले इसलिए पसंद करते थे क्योंकि पहले आप अपनी रिपोर्ट पर होमवर्क करते थे। 
अंत में फेसबुक और ट्वीटर से जाना किसी समस्या का समाधान नहीं है। इसलिए लौट आइए और सवाल पूछते हैं तो जवाब देने का भी हौसला रखिए। बाकि जो है सो हइए है...

 आपके रवीश की रिपोर्ट का नियमित दर्शक
आशीष कुमार ‘अंशु’



रविवार, 21 जून 2015

नई सरकार में क्यों हैं पावरफूल ‘गर्भस्थ स्वयंसवेक’?

नई सरकार बनने के बाद कई सारी कहानियां भी एक के बाद एक करके बन रहीं हैं। खबर तो अखबार और पत्रिकाओं में छप जाती है लेकिन कहानियां, इसे तो कोई भी नहीं छापता और यह कहानियां ना छपती हैं और ना दर्ज हो पाती हैं। वैसे इन कहानियांे को भी दर्ज होना चाहिए, जिसके बाद आने वाले समय में विचारधारा के साथ खड़े होने वाले नए रंगरुटों को उस धूर्तता का भी पता चले जो उसके पूर्ववर्ती करके गए हैं।
यूं तो यह कहानी नई सरकार और एक व्यक्ति के पुरानी वैचारिक प्रतिबद्धता के प्रति बरते जाने वाली धूर्तता की है। लेकिन सच तो यह है कि यह व्यक्ति की नहीं, प्रवृति की कहानी है। 
नरेन्द्र कई दिनों से नए वाले गृहमंत्री के घर और दफ्तर के चक्कर लगा रहे हैं। सुनने वाले बता रहे थे कि नई सरकार में उनकी कोई बात पक्की होनी है। नरेन्द्र की कहानी से पहले उनका थोड़ा सा परिचय। नरेन्द्र आईसा के साथ कॉलेज राजनीति में सक्रिय थे। बाद के दिनों में प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रमों में भी देखे जाते रहे हैं। स्वभाव से कवि हैं। बाबरी मस्जिद के गिरने को वे यूपीए की सरकार में विश्व इतिहास का सबसे काला दिन मानते थे। एनडीए सरकार के आन के बाद वह बाबरी मस्जिद को राम जन्मभूमि कहना पसंद करते हैं, चूंकि अब तक इस बयान का दस्तावेजीकरण नहीं हुआ है, इसलिए प्रमाण के अभाव में उस संज्ञा के जिक्र को प्रामाणिक ना माना जाए। देश में किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक तनाव के पीछे यूपीए काल में वे आरएसएस का हाथ देखते थे। एनडीए सरकार में उनका नजरिया बदल चुका है, जिसका जिक्र यहां नहीं किया जा रहा, कारण- ऊपर बताया गया है। उनकी एक कविता है, 
‘कौव्वा उड़ा मंदिर से और जा कर बैठा मस्जिद पर, ब्राम्हणवादी ताकतों ने कह कर धर्मान्तरण,
पूरे शहर में करा दिया दंगा। 
नीक्कर पहन के आ गए दंगाई, पुलिस वाला भी ना ले सका जिनसे पंगा।’
नरेन्द्र के परिचय के साथ अंिभ का परिचय कराना भी जरूरी है। जिनका इन्काउंटर गृहमंत्री के घर पर नरेन्द्र से हुआ और यह पूरी कहानी बनी। अंिभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हैं। दिल्ली में रहकर विद्यार्थी परिषद की राजनीति की। विश्व हिन्दू परिषद का दायित्व दो साल पहले तक उनके पास था। नई सरकार में ‘जायजा मंत्रालय’ उनके पास है। वे एक के बाद एक मंत्रालय का जायजा लेते रहते हैं। इस महती जिम्मेवारी को उठाने का संकल्प उन्होंने खुद अपने ऊपर ले रखा है। दिल्ली के हर एक मंत्रालय की छोटी बड़ी खबर आप उनसे पा सकते हैं। अंिभ को एक बार खबर मिल जाए इसका सीधा सा अर्थ है कि वह खबर आठ पहर में वायरल होने वाली है। 
गृहमंत्री के घर पर कॉमरेड नरेन्द्र ने जैसे ही स्वयंसेवक अंिभ को देखा, उससे नजरे चुराने लगे लेकिन कब तक? पकड़े गए। अंिभ जानते थे कि कॉमरेड नरेन्द्र कई दिनों से सरकार की एक सलाहकार समिति में जगह बनाने के लिए मंत्रीजी के घर और दफ्तर के चक्कर काट रहे हैं।
जब स्वयंसेवक अंिभ से नजर मिल गई तो कॉमरेड नरेन्द्र मुस्कुराते हुए उनसे मिले और उनके दोनों हाथों को अपने हाथ में लेकर झुलाने लगे। 
‘जानते हैं अंिभजी हमरा परिवार तो बाल्यकाल से ही स्वयंसेवक रहा है। मेरे चाचाजी, मेरे पिताजी सभी स्वयंसेवक हैं। मैं भी बचपन में शाखा जाता था। बाल्यकाल से स्वयंसेवक हूं। इस देश का ऐसा कौन सा हिन्दू बालक होगा जो बचपन में शाखा ना जाता हो?’
कॉमरेड नरेन्द्र की यह भाषा स्वयंसेवक अंिभ के लिए चौंकाने वाली थी। अंिभ मसखरी के मूड में थे, अंिभ ने कहा-
आप बाल्यकाल स्वयंसेवक हैं, यह अच्छी बात है लेकिन संघ में गर्भस्थ स्वयंसेवक की बात अधिक सुनी जाती है। यदि आप गर्भस्थ स्वयंसेवक होते तो यहां आने की जरूरत ही नहीं पड़ती। प्रचारक ही एक चिट्ठी लिख देते और घर बैठे-बैठे आपका काम हो जाता।’
कॉमरेड नरेन्द्र ने पहली बार गर्भस्थ स्वयंसेवक का जिक्र सुना था। उनकी रूचि जगी कि यह गर्भस्थ स्वयंसेवक क्या होता है और एनडीए सरकार में यह इतना पावरफूल क्यों है?
स्वयंसेवक अंिभ ने समझाया -
गर्भस्थ स्वयंसेवक उन संतानों को कहते हैं, जिनके मां-बाप दोनों स्वयंसेवक परिवार से आते हों। मतलब दादा और नाना दोनों संघी हों। 
कॉमरेड नरेन्द्र समझ गए थे कि गर्भस्थ स्वयंसेवक होना नई सरकार में बहुत काम की चीज है। लेकिन वे समझ नहीं पा रहे थे, कि खुद को गर्भस्थ स्वयंसेवक साबित कैसे किया जाए?
रास्ता स्वयंसेवक अंिभ ने सुझाया- संघ के इतने संगठन देश भर में चलते हैं कि संघ वालों को ही पता नहीं है। आगे से बता दिया कीजिए कि मैं गर्भस्थ स्वयंसेवक हूं और मेरे नाना जी ‘प्रगतिशील हिन्दू महासभा’ के संयोजक थे उज्जैन में। किसे पता चलेगा?
स्वयंसेवक अभि ने गर्भस्थ स्वयंसेवकों का महिमागान करते हुए फूसफूसा के कहा, मानों कोई अति राज की बात कर रहे हों- आप जानते हैं, प्रधानमंत्री के पीछे छह गर्भस्थ स्वयंसेवकों को लगाया गया है। प्रधानमंत्री कब मुतने जाते हैं, यह बात चाहे एसपीजी को पता ना हो लेकिन गर्भस्थ स्वयंसेवकों को उन्हें यहां तक की जानकारी रिपोर्ट करनी पड़ती है। गर्भस्थ स्वयंसेवकों का इस राज में कोई काम नहीं रूक रहा।
कॉमरेड नरेन्द्र को यह बात जम गई लेकिन इस तरह की बात स्वयंसेवक अंिभ से करते हुए वे झंेप गए थे। अपनी झेंप मिटाने का प्रयास करते हुए उन्होंने कहा- ‘वैसे मैने संघ का फर्स्ट ईयर किया है?’
स्वयंसेवक अंिभ ने पूछ लिया- पास हुए थे कि फेल?
एक बार पुनः कॉमरेड नरेन्द्र फंस गए। उन्होंने पूछा- ‘मतलब?’
‘आपने फर्स्ट ईयर किया है संघ का तो बताइए, एक गांव में एक सौ मुस्लिम परिवार रहता है और आपका परिवार अकेला हिन्दू परिवार है। ऐसे में एक संघ फर्स्ट ईयर पास स्टूडेन्ट होने के नाते आपका कर्तव्य क्या है?’
कॉमरेड नरेन्द्र ने सोचा भी नहीं था कि फर्स्ट ईयर पास करने के लिए ये संघ वाले इतना कम्यूनल किस्म का सवाल पूछते हैं।
स्वयंसेवक अंिभ ने मुस्कुराते हुए कहा- इसका मतलब आप फेल हुए थे, फर्स्ट ईयर में। 
कॉमरेड नरेन्द्र ने सिर झुकाकर कहा, बहुत पुरानी बात है, अब याद नहीं।
स्वयंसेवक अंिभ ने कहा- यह बात कोई संघ वाला नहीं भूल सकता क्योंकि उन्हें बताया जाता है कि अपना नाम भूल जाना लेकिन यह लेसन नहीं भूलना।
कॉमरेड नरेन्द्र से कुछ कहते नहीं बन रहा था। अंिभ ने उन्हें समझाया- नरेन्द्रजी इस तरह जब आप संघ वाला होने का झूठा दावा करेंगे तो यूं ही पकड़े जाएंगे। अच्छा होगा कि आप संघ की शाखा जाइए, वहां देखिए और जो देखिए वह लिखिए। 
कॉमरेड नरेन्द्र समझ गए थे कि उनका झूठ पकड़ा गया है। वैसे आज एक सरकार है और कल एक नई सरकार आज जाएगी। सरकार आज है कल बदल जाएगी लेकिन आपका बोला हुआ झूठ नहीं बदलेगा और किसी भी तरह के समझौते के लिए बोला गया झूठ आपको हमेशा झूठा बनाए रखेगा। यदि वैचारिक प्रतिबद्धता को निभाने का दम नहीं है तो बेवजह के झूठे दावों से बचना ही बेहतर है।
(उंगलबाज.कॉम, हमारी विश्वसनीयता संदिग्ध)

गुरुवार, 19 जून 2014

सब हमारे चाहने वाले हैं, हमारा कोई नहीं

पीर सोना गाजी कभी एशिया के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया में बसते थे। बाद में उन्हीं के नाम से इस रेड लाइट एरिया का नाम सोनागाछी पड़ गया। इतिहासकार देबोजीत बंदोपाध्याय और रजत रे के अनुसार एक समय यह नृत्य और कला का केन्द्र हुआ करता था। अंग्रेजो के आने के बाद यह जगह शास्त्रीय संगीत के केन्द्र से यौनकर्मियों के अड्डा के तौर पर विकसित हुआ। समय के साथ बहुत कुछ बदला और निश्चित तौर पर यौनकर्म भी बदला। इसी का परिणाम है कि कोलकाता की यौनकर्मी आज सरकार पर इस बात के लिए दबाव बना रहीं हैं कि सरकार यौन कर्मियों को कानूनी अधिकार दे और दलाल-पुलिस के गिरोह से मुक्त करे। यदि सरकार ऐसा करने में सक्षम नही होती तो कोलकाता की यौनकर्मी इस बार लोकसभा चुनाव में नोटा का बटन दबाएंगी।
कोलकाता शहर में यौनकर्मियों के बीच लंबे समय संे काम कर रही भारती देव बताती हैं-
‘बीस सालों से हम विभिन्न राजनीतिक दलों का वादा सुन रहे हैं कि ‘हमारी सारी मांगे वे पूरी कर देंगे।’ राजनीतिक दल वाले ना सिर्फ वादा करके गए बल्कि हमारी मांग पत्रों पर उनका हस्ताक्षर भी मिल जाएगा लेकिन जब बात आती है, चुनाव से पहले इसे अपने घोषणा पत्र में शामिल करो, सभी राजनीतिक दल शुचितावादी बन जाते हैं। कब तक हमें इस तरह ये राजनीतिक पार्टियां ऊल्लू बनाती रहेंगी?’
 यह खबर लिखे जाने तक सोनागछी की ग्यारह हजार यौनकर्मी महिला मतदाताओ ने तय किया है कि इस बार वे मतदान नहीं करेगी। यदि लोकतंत्र के सम्मान में उन्हें मतदान केन्द्र तक जाना पड़ा तो इनमें से कोई नहीं (नोटा) का बटन दबाएंगी।
भारती देव कहती हैं- ‘जब लोकतंत्र में यौनकर्मियों के लिए अपने रोजगार के साथ जीने का अधिकार नहीं है फिर अपनी कमाई का एक दिन कतार में लगकर व्यर्थ करने जैसा ही होगा, इनके लिए।’
कोलकाता (नॉर्थ), जहां इस बार लोकसभा चुनाव में कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है, इन ग्यारह हजार मतों की सही कीमत वे प्रत्याशी बता सकते हैं, जो इस क्षेत्र में खड़े हैं। लेकिन यौनकर्मियों के जीवन की यही विडम्बना है, उनका साथ हर कोई चाहता है लेकिन उनके साथ दिखना कोई नहीं चाहता।
यहां तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय, कांग्रेस से सोमेन मित्रा और सीपीएम की रूपा बागची में कड़ा मुकाबला है। ये सभी प्रत्याशी यौनकर्मियों से व्यक्तिगत बातचीत में उनके साथ होने के तमाम वादे करते हैं लेकिन यौनर्मियों की मांग उनके घोषणापत्र में शामिल क्यों नहीं है, का ठीक-ठीक जवाब वे नहीं दे पाते।
कोलकाता के रेड लाइट एरिया में रहने वाली महिलाओं का नाम 1990 तक मतदाता सूचि में शामिल नहीं था। इस नाम के लिए उन्हें लंबा संघर्ष करना पड़ा। पहचान पत्र ना होने की वजह से उनका राशन कार्ड नहीं बन सकता था। उनका बैंक में खाता नहीं खुल सकता था। उनके बच्चों का स्कूल में नामांकन नहीं हो सकता था।
सोनागाछी की सेक्स वर्कर्स ने कुछ समाज सेवियों की मदद से उषा कॉपरेटिव बनायां। उषा कॉपरेटिव बैक अपनीे तरह का अनोखा बैंक है, जिसे यौनकर्मियों द्वारा यौनकर्मियों के लिए चलाया जाता हैै। उषा सहकारी समिति ने चुनाव आयोग को निवेदन भेजा कि उषा सहकारी बैंक में चल रहे बचत खाते को पहचान पत्र माना जाए।
चुनाव आयोग ने इस निवेदन को स्वीकार किया और इस तरह उनके अपने उषा कॉपरेटिव ने उन्हें अपनी पहचान दी। डॉ. स्मरजीत जेना लंबे समय से यौनकर्मियों के अधिकार के लिए लड़ रहे है। डा जेना बताते हैं कि उषा कॉपरेटिव के लिए जब यौनकर्मियों का दल आवेदनपत्र लेकर पहली बार गया था तो परिचय में यौनकर्मी देखकर वहां मौजूद अधिकारी ने सुझाव दिया कि यौनकर्मी की जगह गृहिणी लिखना सही होगा।
आवेदन लेकर गई महिलाओं के समूह में से जब एक महिला ने अधिकारी को कहा कि अभी तो मैं यौनकर्मी ही हूं, यदि आप मुझसे शादी कर लें तो गृहिणी हो जाऊंगी। क्या आप मुझसे शादी करेगे?  इसका जवाब अधिकारी नहीं दे पाए। इस तरह यौनकर्मियों का पहला अपना कॉपरेटिव बैक बना।
2004 में सीपीएम के उम्मीदवार सुधांशु यौनकर्मियों द्वारा यौनकर्म को कानूनी अधिकार दिए जाने के संबंध में  निकाली गई यात्रा में शामिल हुए थे। 2009 में तृणमूल के सुदीप बंदोपाध्याय ने यौनकर्मियों द्वारा काूननी अधिकर दिए जाने संबंधी विज्ञप्ती और पुलिस-दलाल  की मिली भगत से मुक्ति से जुड़ी विज्ञप्ती पर हस्ताक्षर भी किया था। लेकिन नेताओं के हस्ताक्षर और वादे चुनाव तक के लिए होते हैं, इस बात को कोलकाता के यौनकर्मी इस बार समझ गई हैं।
आमतौर पर सोनागाछी की एक यौनकर्मी को कमरे के किराए का महीने में दो से ढाई हजार रुपए देना पड़ता है। उन्हें एक घंटे के लिए डेढ़ सौ रुपए मिलते हैं। जिसमें पैंतीस से चालिस फीसदी हिस्सा पुलिस, दलाल और स्थानीय गंुडों का होता है। यौनकर्मियों की मांग है कि पुलिस जब खुद यह धंधा चलवा रही है फिर इस धंधे को कनूनी अधिकार देने में क्या अर्चन है? अर्चन सिर्फ इतनी है कि दलालों और पुलिस की आमदनी पर रोक लग जाएगी। वैसे सोनागाछी में ऐसी यौनकर्मी भी हैं जो एक घंटे के लिए दस से पन्द्रह हजार रुपए भी लेती हैं। हाल में इंकम टैक्स के छापे में सोना गाछी से दो करोड़ रुपए नकद बरामद हुए। यही वजह है कि कोलकाता पुलिस की जुबान में इसे सोने की खदान कहते हैं।
खबर लिखे जाने तक कोलकाता की यौनकर्मियों ने तय कर लिया है कि इस बार वे ‘इनमें से कोई नहीं’ विकल्प के साथ मतदान केन्द्र तक जाएंगी क्योकि वे जान गईं हैं कि नेता यौनकर्म को कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त नहीं होने देंगे। दुर्बार की महासिता मुखर्जी कहती हैं- हालात यही रहे तो संभव है कि अगले चुनाव में यौनकर्मियों की तरफ से उनका अपना कोई उम्मीदवार मैदान में हो।


आशीष कुमार ‘अंशु’
09868419453

शुक्रवार, 23 मई 2014

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का रिजर्वेशन काउंटर कब होगा दलाल मुक्त?

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन अक्सर जाना होता है। दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी पुरानी दिल्ली स्टेशन के बिल्कुल सामने है और अपनी यात्राओं के लिए टिकट बनाने पुरानी दिल्ली स्टेशन के रिजर्वेशन टिकट काउंटर पर भी जाता हूं। बार-बार पुरानी दिल्ली के रेलवे रिजर्वेशन काउंटर पर इस उम्मीद से जाता हूं कि इस बार दिल्ली का यह टिकट काउंटर दलाल मुक्त हो गया होगा। हर बार निराश होकर ही लौटा हूं। दिल्ली में सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त टिकट एजेन्ट भी उसी कतार में खड़े होकर टिकट लेते हैं, जिसमें आम लोगों को टिकट लेना होता है।
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के एक काउंटर पर खड़े एजेन्ट ने ही बताया कि लगभग बारह सौ से लेकर पन्द्रह सौ एजेन्ट पुरानी दिल्ली में टिकट बेचने के लिए सक्रिय हैं। यह एजेन्ट जब इंटरनेट पर बुकिंग बंद दिखला रहा हो, उस समय भी अंतिम समय में टिकट करा सकते हैं। पैसे आप उन्हें वह दीजिए, जो उनको चाहिए और टिकट वे आपको वह दिला देंगे, जो आपको चाहिए। कई बार आपको भ्रम हो सकता है, यह टिकट के दलाल हैं या फिर जादूगर।
इन टिकट दलालों की शक्ति देखनी हो तो आप कभी पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के रिजर्वेशन काउंटर पर चले जाइए और देखिए वहां टिकट दलालों ने क्या हाल बना रखा है? दुखद यह है कि काउंटर पर बैठे टिकट बनाने वाले सरकारी कर्मचारी भी मानों उन्हीं के लिए अंदर बैठे हैं। इन टिकट दलालों द्वारा पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर फैलाई जा रही अव्यवस्था हर किसी को नजर आता है लेकिन ना जाने क्यों जीआरपी, सीआरपीएफ या फिर रेलवे इंटेलिजेन्स को यह बस क्यों नजर नहीं आता?
नियम से एक व्यक्ति को रेलवे काउंटर पर एक बार में दो से अधिक टिकट नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मानों यह कानून तो आम आदमी के लिए है, टिकट एजेन्ट पर कोई नियम लागू नहीं होता। पैसों के इस लेन-देन का खुला खेल कोई भी आम आदमी समझ सकता है लेकिन रेलवे इंटेलीजेन्स की समझ में ना जाने यह सारी बात क्यों नही आती?
दो तीन दिन पहले जब मैं अपना रेलवे टिकट वापस करने गया था, इसी तरह एक टिकट काउंटर पर कतार में लगे लोगों की अनदेखी करके जब काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने एक टिकट दलाल के लिए दो-तीन-चार-पांच-छह टिकट बना लिया तो उसका विरोध करना लाजमी था। मैने विरोध में बोला। यह देखकर दो तीन लोगों ने, जो कतार में लगे थे, मेरा साथ दिया।
इस शोर शराबे से स्थिति थोड़ी संभली। लेकिन यह स्थिति संभली सिर्फ एक काउंटर पर, जिस पर यह शोर शराबा हुआ था। उस वक्त शायद ही पुरानी दिल्ली में ऐसी कोई कतार हो, जिसमें सात-आठ ऐसे लोग ना हो, जो टिकट की दलाली करते हैं।
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन नीयमित जाने की वजह से कई ऐसे चेहरे अब पहचानने लगा हूं, जो सुबह से देर रात तक पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ही रहते हैं। संभव है, ये सब रेलवे द्वारा अधिकृत एजेन्ट के प्रतिनिधि हों।
इसी रेलवे स्टेशन पर सुनने को मिला, ‘
‘ये जो लोग काउंटर पर दलालों के खिलाफ शोर मचा रहे हैं, ये सभी अरविन्द (केजरीवाल) के लोग हैं।’
 यह सुनकर एक रेलवे टिकट दलाल बोला- ‘अरविन्द तो गए। अमेठी से उसके कवि की जमानत जप्त हो गई। अब अच्छें दिन आए हैं।’ 
इसका मतलब क्या, दिल्ली में बेईमानी के खिलाफ बोलने वाला हर एक व्यक्ति आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता माना जाएगा। यह सवाल मेरे लिए महत्वपूर्ण था। आम आदमी पार्टी और अरविन्द से तमाम असहतियों के बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ उठने वाली हर एक आवाज की पहचान, आम आदमी पार्टी बन गई है। 
इस बात पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों को सोचना चाहिए।
आज यह सवाल मेरे लिए जरूर अहम है, देश की राजधानी दिल्ली जब इतने प्रयासों के बावजूद दलाल मुक्त नहीं हो पा रही तो देश के दूसरे हिस्सों का मालिक अल्लाह ही होगा!

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम