रविवार, 14 अक्तूबर 2007

पागलखाना

रूम नंबर १७ बी
राम प्रसाद सिंह
सन ऑफ़ दशरथ प्रसाद सिंह
यस सर
तुमसे कोई मिलने आया है।

हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा ...
एक पागल के साथ ऎसी दिल्लगी,
इश्वर तुम्हें कभी माफ़ नहीं करेगा।

दिल्लगी नहीं सच कोई आया था,

तुम आ गई तान्या
मुझे पुरा विश्वास था,
एक दिन तुम यहाँ जरुर भेज दी जाओगी।

तान्या यहाँ पागल नहीं रहते,
ये वे लोग हैं, जो समाज से पैन्तरों से वाकीफ नहीं थे।
सच को सच झूठ को झूठ बताते रहे
मन में मैल, चेहरे पर मुस्कान इनके नहीं था,
ये किसी की भावनाओ से नहीं खेलते थे,
किसी को इमोशनल ब्लैक मेल नहीं करते थे।
तान्या यहाँ ठहरे लोग पागल नहीं हैं,
पागल है इस पागलखाने के बहार की सारी दुनियां।

यहाँ हम घंटों-घंटों बतिया सकते हैं
एक दुसरे का दुःख-दर्द बाँट सकते हैं,
गलबहियां डाल कर घंटों रो सकते हैं
घंटों हँस सकते हैं।
यहाँ समाज की कोई पाबन्दी नहीं है
यहाँ कोई आयेगा कहने
तुम पागलों की तरह क्यों हँस रहे हो।

यहाँ हर उस बात की इजाजत है,
जिसकी इजाजत तुम्हारा सभ्य समाज कभी नहीं देगा,
रात को दो बजे तुम चीख-चीख कर रो सकती हो।
दुश्मन को दुश्मन, दोस्त को दोस्त कह सकती हो।
यहाँ चेहरे पर छद्म मुस्कान और
कलेजे पर पत्थर रखने की जरुरत नहीं है।
क्योंकि यहाँ दिखावा नहीं चलता सच्चाई चलती है।

आज तुम्हारी आंखों में मेरे लिय प्रेम नहीं था,
दया, तरस, सहानुभूति के मिश्रित भाव थे,
सभ्य समाज की एक विदुषी, एक पागल के लिय
मन में इसी तरह के भाव रख सकती है,
मुझे दुःख नहीं इस बात का
दुःख सिर्फ इतना है
तुमने भी औरों की तरह सोचा।

जा रही हो तान्या
तुमने साथ जीने मरने की कसमें खाई थी,
भूल गई!
शायद अब मैं तुम्हारे काबिल नहीं रहा
मैं भूल गया था
तुम भी उसी समाज का अंग हो
एक हिस्सा हो,
जीसे हम पागलखाना कहते हैं।

अगर तुम्हे हमारे जैसा होने में शर्म आती है
अय सभ्य समाज की विदुषी,
तो सुन ले
हम भी तुम्हारी तरह नहीं होना चाहते।

3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत खूब....


--जरा फॉन्ट साईज बढ़ायें भाई. पढ़ने में बड़ी दिक्कत होती है. मात्र सुझाव है.

विनीत कुमार ने कहा…

aur bhaiya jara spelling durust kar lo, galat hindi dekhi nahi jaati,waise har paagal kahta hai ki paagal nahi hoo,jaise mai

केवल सच ने कहा…

अगर अपने ब्लोग पर " कापी राइट सुरक्षित " लिखेगे तो आप उन ब्लोग लिखने वालो को आगाह करेगे जो केवल शोकिया या अज्ञानता से कापी कर रहें हैं ।

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम