बुधवार, 24 अक्तूबर 2007

अंग्रेजी से विभाजित होता समाज :

मुझे लेख एक मित्र ने ई-मेल के माध्यम से भेजा था। लगा बात आगे पहुचनी चाहिय। इसी गरज से बरखा दत्त जी का लेख साभार दे रहा हूँ। पर कहाँ से इसकी जानकारी खाकसार के पास नहीं है। दोस्त का आभार जिसने मेल भेजा।
- आशीष कुमार 'अंशु'
[९८६८४१९४५३]

लगभग सोलह वर्ष की एक लड़की उस दिन एक टीवी चैनल पर इंटरव्यू दे रही थी। 97 प्रतिशत अंक मिले भी उसे परीक्षा में, पर राजधानी के एक ऊंचे स्कूल में प्रवेश नहीं मिला। लेकिन उस लड़की की बातों ने विख्यात टीवी एंकर बरखा दत्त को ठहर कर सोचने के लिए विवश कर दिया। बरखा दत्त ने जो सोचा है , वह यह है


पत्रकारिता की एक कष्टदायक लेकिन जरूरी विशेषता यह है कि कभी-कभी आपका काम ही आपको अपनी जिंदगी के सामने आईना लेकर खड़ा कर देता है। एक शांत लेकिन दृढ़ निश्चयी 16 वर्षीया युवती ने अचानक मेरी शिक्षा को ऐसा ही आईना दिखा दिया था। मेरा यह मानना है कि मेरे स्कूल व कॉलेज के वर्ष मेरे व्यक्तित्व के प्रारंभिक निर्माता थे , हर मध्यमवर्गीय भारतीय की तरह मैंने जहां पढ़ाई की और जो मुझे पढ़ाया गया उस पर गर्व किया है, तथापि इस युवा लड़की के विनम्र आदर्शवाद ने मुझे ठहरकर सोचने को विवश कर दिया है - क्या मेरी पब्लिक स्कूल की शिक्षा शर्मनाक रूप से अभिजातवर्गीय थी ?

पहली नजर में बात सीधी-सादी थी , 97.6 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाली सीबीएसई की टॉपर गरिमा गोदारा ने अपने गांव के सबसे नजदीक दिल्ली स्थित द्वारका दिल्ली पब्लिक स्कूल के लिए प्रवेश परीक्षा दी। 6 हजार रुपए प्रतिमाह से भी कम पाने वाले पुलिस के सिपाही, उसके पिता के लिए इस स्कूल की फीस बड़ी समस्या रही होगी। लेकिन परिवार अविचलित था। छात्रवृत्ति या ऋण की आस थी। निश्चय ही स्कूल भी ऐसी छात्रा को प्रवेश देना ही चाहेगा जिसने राष्ट्रीय राजधानी की योग्यता सूची में शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। गरिमा के पिता ने अपने बुजुर्गों की संस्थापित पितृसत्तात्मकता और इन तांकू-झांकू पड़ोसियों से जूझने में महीनों खपाए थे जो यह बकवास करते थे कि लड़की रसोई में काम क्यों नहीं करती। अपनी बेटी को उसे प्राप्तांकों के अनुरूप शिक्षा दिलाने का उनका इरादा और भी मजबूत होता गया था। यह नए भारत और इसके मध्यम वर्ग का एक व्याख्यान हो सकता था। सपने देखने का दुस्साहस करने वाले देश का मील का पत्थर हो सकता था। लेकिन इसकी बजाय हुआ यह कि दिल्ली पब्लिक स्कूल ने उसे मना कर दिया। ठीक है। परिणाम अच्छा है लेकिन स्कूल के प्रिंसीपल ने कहा , अंक ही तो सब कुछ नहीं होते। फिर इसकी तो अंग्रेजी भी अच्छी नहीं है। बाद में गरिमा को सुनते हुए क्रुध्द या विचलित न होना मुश्किल था। जाहिर अन्याय के कारण क्रुध्द। वह अपने परिणाम के अनुरूप ही मेधावी थी और जैसी अंग्रेजी वह बोल रही थी उससे स्पष्ट था कि वह पाठयक्रम को समझने पूरी तरह सक्षम थी। हां , उसके उच्चारण में जरूर क्षेत्रीय स्पर्श था। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि वह न केवल जटिल विमर्श को समझ सकती थी, उसका बोला हुआ किसी भी अंग्रेजी वक्ता की समझ में भी आ सकता था।

उसका शांत भाव परेशान करने वाला था। एक मौन साहस था जो उसकी किशोरावस्था के कतई अनुरूप नहीं था। ऐसा लग रहा था मानो उसकी तुलना में हम ही अधिक अपमानित और क्रुध्द थे। कार्यक्रम के बीच देहरादून के एक सुपरिचित स्कूल के प्रिंसीपल ने फोन कर उसे छात्रवृत्ति सहित प्रवेश देने की पेशकश की तो अन्य ने डीपीएस का निर्णय बदलवाने के वादे किए। लेकिन आहत होने का किंचित भी आभास दिए बगैर उसने दृढ़ता से कहा कि अब तो उसका लक्ष्य दिल्ली पब्लिक स्कूल को यह बताना मात्र है कि वह अपने किसी भी विद्यार्थी से बेहतर हो सकती है। उसने एक अन्य स्कूल में प्रवेश ले लिया और दिल्ली पब्लिक स्कूल अब उसे भूल जाए। जब वह टीवी पर बोल रही थी , दर्शक भी स्पष्टत: मेरी ही तरह क्रुध्द थे। तात्कालिक ऑनलाइन जनमत संग्रह के अनुसार 90 प्रतिशत दर्शकों का खयाल था कि अंग्रेजी भाषा हमारी शिक्षा व्यवस्था पर एक असंतुलित प्रभाव डाल रही है। लेकिन क्या हम सबका बरताव पाखंडी और बेईमानों जैसा नहीं है? इस बार डीपीएस सामने आ गया, लेकिन क्या हममें से कोई भी उससे भिन्न है? कल्पना कीजिए, वह स्कूल में भी बहुत उम्दा प्रदर्शन करती है। अगला मुकाम है कॉलेज, मैं कल्पना करती हूं कि वह मेरे पुराने कॉलेज , दिल्ली के सेंट स्टीफेंस में दाखिले के लिए इंटरव्यू दे रही है। क्या उसे ले लिया जाएगा? क्या वे उसकी अकादमिक प्रखरता की सराहना करेंगे? या वे उसके उच्चारण का मजाक उड़ाएंगे और वह जब भी कोई व्याकरणिक गलती करेगी, उसका उपहास करेंगे और फिर उसे अपने दोस्त खोजते रहने के लिए अकेला छोड़ जाएंगे ?

गरिमा का यह उदाहरण भविष्य के साथ भारत के विकृत साक्षात्कार का एक रूपक है। कार्यक्रम खत्म होने के बाद मुझे पता चला और यह महत्वपूर्ण है कि यह बात उसने या उसके मां-बाप ने नहीं बताई कि वह अन्य पिछड़ा वर्ग से है। पिछले कुछ अर्से से आरक्षण पर बहस गर्म है। इसके विरोधियों ने बार-बार वही बात दुहराई है कि हमें योग्यता की कद्र करने वाला समाज बनाना चाहिए। निश्चय ही यह एक वजनदार तर्क है और मैं भी इसी के पक्ष में रही हूं।

लेकिन गलियों में आरक्षण विरोध की लड़ाई लड़ने वाले अब क्या कहेंगे ? यहां है वह लड़की जिसने मुख्यधारा में प्रतिस्पर्धा की है। उसका अपना दिल्ली पब्लिक स्कूल भी चमचमाते, अमीर , बड़े नामों के सामने टिका रहा है। लेकिन उसकी योग्यता तो उच्च वर्ग के धूर्तों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा एक धोखे भरा शब्द मात्र है। यह किस्सा भारत के वर्ग भेद पर भी एक कटु टिप्पणी है। तेजी से बढ़ रहे मध्यमवर्ग की बात करना बाजारबाजों और अर्थशास्त्रियों के लिए फैशन में शुमार हो चला है। भारतीय बाजार और नए मध्यमवर्ग के आकार को दर्शाने वाला कोई न कोई आंकड़ा रोज उछाला जाता है। हम इन आंकड़ों को गले लगाते हैं क्योंकि हमें भी यह विचार लुभाता है कि भारत नई शताब्दी का लोकप्रिय आर्थिक मुकाम बन रहा है। जब 'टाइम' पत्रिका अपने मुख पृष्ठ पर हमारे देश को सजाती है तो हम गर्वित होते हैं और खास तौर पर विदेशियों के सामने, धड़ल्ले से सामाजिक गतिशीलता और अमीर-गरीब के बीच संकुचित होती जा रही खाई की बात करने लगते हैं। हम कहते हैं कि भारत के भविष्य का निर्माण इसका उद्यमी और साहसी मध्यमवर्ग कर रहा है और महसूस करते हैं कि मानों अभी इसी वक्त वह भविष्य हमारे सामने साकार हो रहा है। लेकिन एक सच हम कभी स्वीकार नहीं करते। पिछले दशक की सामाजिक गतिशीलता का अर्थ है कि नया मध्यमवर्ग हम जैसों से निर्मित नहीं है। इसकी बजाय , यह गरिमा जैसे लोगों से बना है, जिन्हें अलग रखने के बहाने अभी भी हमारे पास है। हम पाश्चात्य सॉफिस्टिकेशन के उनके अभाव पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं, उनके उच्चारण का मजाक उड़ाते हैं और यह सुनिश्चित करने की भरसक कोशिश करते हैं कि हमारे बच्चे उनके बच्चों से अलग रहें , अलग दिखें।

और अंत में , गरिमा का आख्यान अंग्रेजी भाषा से भारत के रिश्ते की विडम्बना को भी उजागर करता है। पूरी दुनिया में कहीं भी हमारे जैसी अंग्रेजी नहीं बोली जाती। हमारा अपना मुहावरा है, अपनी शब्दावली और अपना उच्चारण। हम अपनी शैली की अंग्रेजी से प्यार का ढोंग करते हैं और इस बात की डींग हांकते हैं कि इसी कारण भारत ने विश्व के आउट सोर्सिंग बाजार में अपनी धाक जमा रखी है। लेकिन निश्चय ही अंतरमन में हम जानते हैं कि वाकई पश्चिम जिसे चाहता है वैसी अंग्रेजी हमारी नहीं है। और इसीलिए , जब भी हम किसी ब्रिटिश या अमेरिकी से बात करते हैं, अपनी शैली और उच्चारण के उतार-चढ़ाव में फेरबदल कर लेते हैं। जब हम अपने कॉल सेंटर स्थापित करते हैं तो हमारे अपने समाज के वाणी व्यवहार को पूरी तरह तिलांजलि दे देते हैं और भाषाई रूप से मध्य अमेरिका में प्रव्रजन कर ऐसे लोगों का छद्म-प्रतिरूप बन जाते हैं , जिनसे कभी हमारी मुलाकात तक नहीं होगी।

लेकिन भारत में हम अपनी अंग्रेजी को ही सामाजिक नियंता मानते हैं। हम क्षेत्रीय उच्चारणों पर हंसते हैं , व्याकरण की गलतियां करने वालों का मजाक उड़ाते हैं और उनके साथ सहज अनुभव करते हैं तो हमारी तरह से बोलते हैं। शेष सभी तो अंग्रेजी की इस विभाजक रेखा के उस पार हैं। स्वाभाविक ही है कि जो दूसरी तरफ हैं , उनकी जाति भी भिन्न है, वर्ग भी। शायद इस लघु समुदाय से हमारे मजबूती से चिपकने के मूल में हमारी असुरक्षा है। हमारे छोटे-से बुलबुले के बाहर भारत बदल रहा है। ताजा समय में हर बड़ा संस्थान चाहे वह संसद हो , नौकरशाही हो, सेना हो, स्कूल-कॉलेज हो, अपने नियमों का पुनर्लेखन करने को बाध्य हैं। भारतीयों की एक नई नस्ल जो अपनी स्वीकृति के लिए पश्चिम की मुखापेक्षी नहीं है , अपनी उपस्थिति महसूस कर रही है। हम इसे गुणवत्ता की कमी कहते हैं। लेकिन असल में तो यह शेष भारत के अंदर आने की कोशिश है। हम कब तक दरवाजे बंद रखेंगे?

9 टिप्‍पणियां:

हरिराम ने कहा…

अंग्रेजी में तोड़ा गया था विश्वप्रसिद्ध कोणार्क-सूर्यमन्दिर। प्रौद्योगिकी तथा वास्तुकला का यह तथा ताजमहल जैसे आश्चर्य अंग्रेजी में नहीं बनाए गए थे। 200 वर्ष पहले भारत में अंग्रेजी नहीं थी। विज्ञान और तकनीकी, साहित्य और गणित, सभी कुछ लोकभाषाओं में थे, तो भारत 'सोने की चिड़िया' था। आज अंग्रेजी का राज है तो भारत 'काठ का उल्लू' बन गया है।

Shastri JC Philip ने कहा…

ंअंग्रेज लुटेरे थे एवं वे सिर्फ लूटने के लिये हिन्दुस्तान आये थे. अफसोस यह है कि उन्की भाषा हिन्दी को अभी भी लूट रही है -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है

संजीव कुमार सिन्हा ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
संजीव कुमार सिन्हा ने कहा…

बहुत बढियां लेख प्रस्‍तुत किया है आपने। धन्‍यवाद आपको। जहां तक मुझे स्‍मरण है यह लेख रायपुर से प्रकाशित मीडिया विमर्श में प्रकाशित हो चुका है।

Durgaprasad ने कहा…

सुपरिचित पत्रकार बरखा दत्त का यह लेख हिन्दुस्तान टाइम्स में छपा था. इसका हिन्दी अनुवाद मैंने (डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल) किया था. अनुवाद मेरे नाम के साथ जयपुर से निकलने वाली शैक्षिक पत्रिका 'अनौपचारिका' में छप चुका है. बाद में यही अनुवाद 'सृजनगाथा' में भी छपा पर वे लोग अनुवाद का नाम छपने में कंजूसी कर गए.
बहरहाल, मुझे खुशी है कि यह शानदार लेख पढा जा रहा है.

Durgaprasad ने कहा…

अरे, मुझसे भी एक चूक हो गई.मैंने गलती से 'सृजनगाथा' लिख दिया. लिखना था 'मीडिया विमर्श'.

Srijan Shilpi ने कहा…

झकझोरने वाला ईमानदारी से भरा लेख। बरखा जी का लेख हिन्दी में पढ़ते समय मैं इसके अनुवादक के बारे में सोच रहा था। वाकई बहुत अच्छा अनुवाद किया है, दुर्गा प्रसाद जी, आपने।

ऋतेश पाठक ने कहा…

उस दोस्त को बेनाम ही रख दिया गया.....

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

Us Dost kaa naam Ritesh Pathak hai.
Beena tumhari sahamati ke tumhaaraa naam denaa theek nahin laga,lo ab baat yahaan tak pahuch hee gai to bataa dete hai.

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम