शनिवार, 12 अप्रैल 2008

दोगली निति

हाल ही में केरल में उस संगठन का एक राष्ट्रीय अधिवेशन सम्पन्न हुआ। इसने अधिवेशन में शामिल अपने मुस्लिम प्रतिनिधियों को नमाज़ पढ़ने के लिय सभा के बीच में अंतराल दिया। इस नियम में कुछ भी ग़लत नहीं है। हमें भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में सभी धर्मों का सम्मान करना ही चाहिय।
लेकिन इस पार्टी के दोगली निति पर तब कोफ्त होती है, जब इसका कोई कार्यकर्ता (नेता) कोलकाता में मन्दिर में भगवान की पूजा-अर्चना करने की वजह से पार्टी से निकाल दिया जाता है। पार्टी को ऐसे मन्दिर जाने वालों पर सम्प्रदायिक होने का अंदेशा होता है। पार्टी की उलझन जो भी हो बहरहाल इसे कहा तो दोगली निति ही जायगा ना!

5 टिप्‍पणियां:

अतुल ने कहा…

यह पार्टी सदा से ही भ्रम का शिकार रही है.

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

हा-हा-हा-हा. भ्रम नहीं अतुल जी, इसे सिर्फ़ दोगलापन ही कहते हैं.

बेनामी ने कहा…

दोगलापन या कहें कि दरिद्रता इस पार्टी की नसों में दौड़ती है। जिसकी विचारधारा ही आयातित हो वो क्या अपनी संस्कृति का मूल्य समझेगा। वरना अपने देश की ज़मीन पर कब्जा करने वाले चीन की गोद में खेलने की जुर्रत भला कोई कैसे कर सकता है।

संजीव कुमार सिन्हा ने कहा…
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संजीव कुमार सिन्हा ने कहा…

मार्क्सवाद की सडांध से भारत प्रदूषित हो रहा है।
http://www.hitchintak.blogspot.com/2007/10/blog-post_24.html

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम