गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

मॉडल -ए- बिहार (माल्या जी तनिक देखिए ना...)

इस तस्वीर में दिख रहे यह सभी मॉडल बिहार के बाढ़ग्रस्त सहरसा जिले के महपूरा गाँव के रहने वाले हैं. ये सभी मॉडल मिलिंद सोमन या बिपाशा से कम नहीं है. इनके साथ गलत सिर्फ इतना हुआ कि इन पर किसी अलिक पद्मसी या इब्राहम अलका जी की नजर नहीं पड़ी. यदि अपने किंगफिशर वाले विजय जी माल्या ही इन बच्चों के देख लेते तो अपने वार्षिक कैलेंडर के लिए मॉडल तलाशने उन्हें देश-विदेश नहीं जाना पड़ता. और यदि अनुराग कश्यप की नजर इन पर पड़ जाती तो विश्वास मानिए पटना एक नाम से किसी फिल्म की घोषणा वे कर देते. और उसमें प्रसून जोशी का गेंदा फूल के माफिक धतूरे के फूल पर एक बिंदास गीत होता.
लेकिन अफसोस ये मॉडल गाँव तक सीमित रह जाएंगे क्योंकि मुंबई का रास्ता इनको पता नहीं. और डेनी बॉयल जैसे लोग जब फिल्म भी बनाते हैं तो उनकी जरूरत 'धारावी' पूरी कर देता है.
बिहार की हालत देख कर कहा जा सकता है, उनका दर्द समझना किसी डेनी बॉयल के बस की बात नहीं. उम्मीद करते हैं हालात बदलेंगे? कुछ अच्छा होने की उम्मीद है. और इसी उम्मीद पर हम जैसे लाखों जी रहें हैं... हालात बदलेंगे. जय हो!!!

4 टिप्‍पणियां:

Alok Nandan ने कहा…

bhai taswir kuch aur kah rahi hai aur aap kuch aur kah rahe ho...aap kaya chahato ho in bachon ko swiming pool me dhus diya jaye...bachpan me kisi nadi ki laharon se khelana sabke nasib me nahi hai...aur sabse buri bat yeh lagi ki aapane bihar ko bhi isame ghusa diay...aur aap in bacho ki tulana dharawi se kar rahe hai...are lakh guna ache hai ye bache...vaise aapaki marji jo man me aaye karo....ati utsah me kiya gaya ek galat kam hai....

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

आलोक भाई, क्या मुझे बताना चाहिए कि यह एक व्यंग्य है. दूसरी बात इन बच्चों की धारावी के बच्चों से मैं तुलना नहीं कर रहा. और यह हो भी नहीं सकता लेकिन भाई जान ये जीन हालत में जी रहें हैं... उसे लिखने के लिए फिलवक्त मेरे पास उपयुक्त शब्द नहीं हैं... खैर!

परमजीत बाली ने कहा…

अच्छी पोस्ट लिखी है।

कुमार अम्बुजेश ने कहा…

भाई वाह .........निकाल दिया जूलूस आपने......नदी के लहरों में हिचकोले खाती संवेदनाएं जब तस्वीरों में उभरती है तो यही व्याख्या होगी.......मगर शायद थोड़ा सा अन्याय है इसलिए क्योंकि ऐसी तस्वीरों की भावना को इस तरह कैश कराने की कोशिश शायद कोई ना करे ......वैसे जिसका सन्दर्भ आपने दिया है उनके लिए ये कोई ऐसी बात नही कि वो ना कर सके .......क्योंकि उन्हे ऐसे ही काम करने में मजा आता है ......बहरहाल शुक्र मनाइये कि अनोखेलाल के नजर का फेरा इधर नहीं फिरा ........एक बार फिर अच्छी व्याख्या के लिए बधाई

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम