शुक्रवार, 27 जून 2008

ब्रजेश्वर मादान

ब्रजेश्वर मदान वरिष्ठ पत्रकार हैं। श्रेठ तरीके से हिन्दी में फ़िल्म और कला के विषय में लिखने और समझने वाले गिने-चुने पत्रकारों में आते हैं।
उन्होंने इस ब्लॉग के लिए अपनी दो कविताएं उपलब्ध कराई। आभार

खाली हाथ

चमेली की जो बेल

लगाई थी तुमने

दूसरी मंजिल पर

दरवाजे तक आ गई है

तुम्हारे जाने के बाद

बिना फूलों के

जैसे बरसों बाद

कोई घर लौटे

खाली हाथ

और ठिठक कर

खड़ा रह जाए

दरवाजे पर।

भूख

अब तक है याद

उस आलू का स्वाद

जो तुम्हारे खाने

से उठाकर खाया

और लगा कि

आलू का एक छोटा सा

टूकडा भी

मिटा सकता है

सदियों की भूख

जो नहीं मिटा सकती

जो नहीं मिट सकती

दुनिया भर के खाद्यान से।

3 टिप्‍पणियां:

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बहुत खूबसूरत कवितायें हैं. ब्रजेश्वर मदान जी के इस पहलू को कभी नहीं देखा था.
बहुत अच्छा लगा.

pallavi trivedi ने कहा…

आलू का एक छोटा सा

टूकडा भी

मिटा सकता है

सदियों की भूख

kya baat hai...ati sundar ehsaas.

seema gupta ने कहा…

"really beautiful poetry"

Regards

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम