शनिवार, 6 जून 2009

आपका क्या कहना है???????? (जय श्री राम)


मुस्लमान कभी भी मुहम्मद को मुहम्मदा,कुराण को कुराना,इस्लाम को इस्लामा आदि आदि नहीं कहेगे और ना ही कोइ इसाई क्राईस्ट को क्राईस्टा,बाईबल को बाईबला, रिलिज़न को रिलिज़ना आदि आदि ----- , ना ही कोई सिख गुरुनानक को गुरु नानका,ग्रन्थ साहिब को ग्रन्था-साहिबा,गुरु अर्जुन-देव को गुरु अर्जुना-देवा आदि आदि ---- कहेगा और ना ही किसी को कहने देगा किन्तु हिन्दू राम को रामा, रामायण को रामायणा , धर्म को धर्मा , योग को योगा आदि आदि कहेगे
एसा क्यों है जी????

7 टिप्‍पणियां:

AlbelaKhatri.com ने कहा…

aisa isliye hai ji........ke apne pas arthat hinduon k pas har cheej zaroorat se zyada hai : dharmik pustken bhi khoob,dharm karm ki paddtiyan bhi khoob,sampraday bhi khoob aur dharmik sthal bhi khoob............. bhagwanon ki sankhya karodon me hai, isliye koi kadra nahin.........ganeshji bechare bidiyan bechne me lage hain, laxmi mata patakhon aur bamon ki bikri karti dekhi ja sakti hai aur durgaji audio cessets par dikhti hain ...........jab ki any sab k pas ek ek bhagwan hain isliye unka samman ve bhi karte hain aur hum bhi karte hain ....................mamla bada samvedansheel hai isliye hamen sahansheel hokar rahna va sahna padta hai..
CHHODO YAAR..........BAAT NIKLEGI TOH FIR DOOR TAK JAAYEGI
aapka aalekh achha hai.......badhai!!!

जयराम "विप्लव" ने कहा…

baat to wahi hui kya aapne kisi ke naam ki angreji suni hai lekin bharat ko angreji me india kahte hain .

http://janokti.blogspot.com/2009/06/blog-post_05.html
sse this debate on m.f hussains painting controversy

जयराम दास. ने कहा…

चिंता बाजिव...अब इनके लिये `पाप` भी `पापा` हो जाएगा शायद.

Jayant Chaudhary ने कहा…

Kyonki ham hain hi janam se be-pendi ke lote.
Angrojon ke pitthu... unaki baat ko aasaan karane aur apani 'angrejiyat' dikhanaa jaroori hai bhai.

:)

Waise aapne meri dukhati rag par haath rakh diyaa hai.
Yeh meri varshon puraani shikaayat hai...

~JayantA

Suresh Chiplunkar ने कहा…

ये तो आपने हिन्दुओं को "अपने भीतर झाँकने" को कह दिया जी, ऐसा कुछ करने की आदत कहाँ रही अब… :) :) 60 साल से "सेकुलर" इंजेक्शन ले-लेकर मरणासन्न हो चुके हैं हम, अब इतनी ताकत नहीं बची…। रामा कहो, रामायणा कहो, योगा कहो, कुछ भी कहो…। "हमें क्या फ़र्क पड़ता है…" और "हमें ऐसी बातों से क्या लेना-देना…" जैसे सदाबहार वाक्य काफ़ी हैं मुँह छिपाने के लिये।

कुमार अम्बुजेश ने कहा…

यह कोई नई बात नहीं सन सैतालीस के बाद से ही पश्चिम की काफी चीजे हम आत्मसात कर चुके है...धर्म और धार्मिक प्रतीको से जुड़े प्रतिमानो के साथ तो यह होना ही था....हम भारतीयो की एक बड़ी बिडम्बना सदा से रही है कि अगर किसी ने हमे गाली भी दी तो उसमें सकारात्मकता का मर्म खोज ही लेते है शायद यही हमारी ताकत भी है और कमजोरी भी....अब जैसे कि राम को रामा और योग को योगा कहने की परम्परा भी वहीं से आयी है .....कुछ तथाकथित नवसनातनप्रेमियो के द्वारा....बहरहाल यह हमारी संस्कृति का ही हिस्सा है ....और संस्कृति को नाम भले ही कुछ भी दिया जाय ....लेकिन अगर मौलिकता बनी रहे तो कुछ भी बुरा नहीं है......वैसे एक सार्थक चर्चा शुरु करने के लिए धन्यवाद

Rahul ने कहा…

I don't think we should make a big deal of this. There is a more logical explanation so please do not encourage jingoism in the name of "rashtr prem".

The actual pronunciation of the word Rama in sanskrit is not "Raam" (with a clipped last syllable) but "Raamah" (usually written with a colon (:) in the end in sanskrit).

since English is not a phonetic language, perhaps the closest pronunciation of the word was 'Rama'. I don't think there is any disrespect here.

Kripya apna drishtikon badlein aur har vastu ko sandeh ki drishti se na dekhen.

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम