गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

अरेवा की प्रयोगशाला



महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज च्वहाण जैतापुर परमाणु संयंत्र परियोजना पर जनवरी के पहले सप्ताह में ही बोल चुके हैं- ‘मैं राज्य सरकार की तरफ से कोई भी ऐसी तकनीक यहां आने नहीं दूंगा जो महाराष्ट्र की जनता के लिए असुरक्षित हो। हमारे राज्य मे ंपहले से छह रिएक्टर चालू हालत में हैं। यह कहना मूर्खतापूर्ण तर्क है कि यह असुरक्षित है। महाराष्ट्र में परमाणु रिएक्टर के खिलाफ एक सस्ती राजनीति की जा रही है।’ पृथ्वीराज चह्वाण उन दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री थे जब केन्द्र सरकार ने सारी ताकत झोंककर परमाणु उर्जा विधेयक को मंजूर करवाया था. पृथ्वीराज चह्वाण जानते हैं कि वे कितनी "मंहगी" राजनीति करने के बाद परमाणु उर्जा विधेयक पारित करवाने में सफल रहे हैं, इसलिए उनके राज्य में परमाणु बिजलीघरों के विरोध जैसी 'सस्ती' राजनीति को वे भला क्यों बर्दाश्त करेंगे?

9900 मेगावाट के जैतापुर परमाणु ऊर्जा प्रकल्प को लेकर कोंकण क्षेत्र में सस्ती ही सही, लेकिन राजनीति तेज हो गई है। परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पक्षकार जहां इसे विकास से जोड़कर देख रहें हैं, वहीं इस परियोजना के खिलाफ खड़े लोगों का स्पष्ट मानना है कि यह परियोजना कोंकण के विनाश की कहानी का पहला अध्याय होगी। 9900 मेगावाट के परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के काम को छह इकाइयों में फ्रांसिसी कंपनी अरेवा के हाथों पूरा होना है। योजना के अनुसार पहले चरण में प्रस्तावित छह ईकाइयों में 1650-1650 मेगावाट वाले दो इकाइयों का काम पूरा होगा। यह दोनों ईकाइयां रत्नागिरी जिले के मड़वन में होंगी। योजना के अनुसार इस परियोजना के पहले चरण को 2013-14 तक पूरा होना है और बचे चार ईकाइयों का काम भी 2018 तक पूरा कर लिया जाना है। वर्तमान में हमारे कुल बिजली उत्पादन मे ंपरमाणु ऊर्जा की भागीदारी 2.90 प्रतिशत की है। देश में इसे 2020 तक बढ़ाकर छह प्रतिशत तक ले जाने की योजना है। और 2030 तक इसे तेरह प्रतिशत की भागीदारी में बदल दिया जाएगा। इसके लिए मड़वन (जैतापुर) की तरह कई परियोजनाओं की देश को जरुरत होगी।

बहरहाल बात माड़वन (जैतापुर) की करते हैं। जिसमें पांच गांव माड़वन, मीठागवाने, करेल, वारिलवाडा और नीवेली की 938 हेक्टेयर जमीन जानी है। लेकिन चर्चा में माड़वन (जैतापुर) गांव का नाम ही बार-बार आ रहा है। इसकी पहली वजह यह है कि छह ईकाइयों में पूरे हो रहे इस परियोजना की पहली दो ईकाइयों का काम माड़वन में ही पूरा होना है। दूसरी वजह जनहित सेवा समिति के प्रवीण परशुराम गवाणकर बताते हैं, ‘परियोजना में जाने वाले कुल 938 हेक्टेयर जमीन में 669 हेक्टेयर जमीन माड़वन की है।"



परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के लिए चुनी गई यह जमीन पर्यावरण के लिहाल से अति संवेदनशील है। समुद्र का किनारा, 150 किस्म के पक्षियों का घर, 300 किस्म की वनस्पतियां। खास बात यह है कि इनमें कई वनस्पतियों और पक्षियों की किस्म दुर्लभ है। समुन्द्र के इस मनोरम तटिय क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक परमाणु ऊर्जा संबंधित प्रकल्प प्रस्तावित हैं। जबकि रत्नागिरी को राज्य सरकार ने ओद्यानिकी (हॉर्टिकल्चर) जिला घोषित किया है और इसका पड़ोसी जिला सिंधदुर्ग गोवा से भी लगा हुआ होने के कारण पर्यटकों की खास पसंद रहा है। बड़ी संख्या में गोवा देखने के लिए आने वाले पर्यटक सिधदुर्ग का रुख करते हैं। पर्यावरणविद इस बात से अचंभित है कि जिस रत्नागिरी को दुनिया भर मे जैव विविधता के हॉट स्पॉट के तौर पर देखा जाता है, उस जिले के लिए परमाणु ऊर्जा संबंधित परियोजना के करार पर उस साल हस्ताक्षर होता है, जब पूरी दुनिया ‘अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष’ का उत्सव मना रही है। 2010 को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष के रुप में मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र ने बर्लिन में की।

साखरी नाटे मछुआरों की बस्ती है। वहां मिले मच्छीमार कृति समिति के उपाध्यक्ष, अमजद बोरकर। वे और उनके साथी समुन्द्र को लेकर अपने रागात्मक रिश्तों की बात करते-करते भावुक हो गए। बकौल बोरकर- ‘समुद्र के साथ हमारा रिश्ता पीढ़ियों का है। हमारे पूर्वजों के समय से यह समुन्द्र हमें रोटी दे रहा है। सरकार परमाणु ऊर्जा प्रकल्प को कांेकण और महाराष्ट्र का विकास कहकर प्रचारित कर रही है। लेकिन यह विकास का नहीं कांेकण की बर्बादी का समझौता है।’ बोरकर के अनुसार महाराष्ट्र की सरकार प्रकल्प के नाम पर गंदी राजनीति कर रही है। वे बताते हैं कि किस तरह कोई डॉ. जयेन्द्र पुरुलेकर एक मराठी चैनल पर आकर और खुद को जैतापुरवाला बताकर परियोजना के पक्ष में बोलता रहा, जबकि उसका जैतापुर से कोई ताल्लुक नहीं है। बोरकर कहते हैं, ‘हम साखरी नाटे में रहने वाले लोगों ने मिलकर पुरलेकर के झूठ के खिलाफ उसका पुतला जलाया।’

टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंस (टिस) की एक रिपोट के अनुसार परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के लिए सरकार ने जो स्थान तय किया है। वह बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। 'टिस' की यह रिपोर्ट महेश कांबले ने इस इलाके के 120 गांवों में जाकर लोगों से मिलकर तैयार की है। कांबले के अनुसार इस परियोजना का स्थानीय और पर्यावरणीय परिवेश पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। रिपोर्ट यह भी कहती है कि सरकार तथ्य को तोड़ मरोड़ रही है। और मड़वन के उपजाऊ जमीन को बंजर बनाकर कर पेश कर रही है। जैतापुर के जिस 626.52 हेक्टेयर जमीन को अन उपजाऊ बताकर दिखाया जा रहा है। वहां के किसान उस जमीन पर धान, फल, सब्जी लगा रहे हैं। वर्ष 2007 में बाढ़ में सरकार ने राजापुर के किसानों को आम की फसल खराब होने पर एक करोड़ सैंतिस लाख सात हजार रुपए का मुआवजा दिया था।



अर्थक्वेक हजार्ड जोनिंग ऑफ इंडिया के अनुसार जैतापुर जोन तीन में आता है। जो भूकम्प के लिहाज से रिस्क जोन माना जाएगा। ऐसे इलाके में परमाणु से जुड़े किसी प्रकल्प को शुरु करना कम खतरे की बात नहीं है। स्थानीय लोगों के लिए रेडिएशन का मामला भी एक बड़ा मुद्दा है। परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के आस पास जो लोग होंगे, उनके स्वास्थ पर इसका दुष्प्रभाव एक बड़ी चिन्ता बना हुआ है। गांव वाले पूछते हैं, यदि यह प्रकल्प इतना सुरक्षित है तो यहां काम करने वाले अधिकारियों के लिए आवास की व्यवस्था प्रकल्प से पांच-सात किलोमीटर दूर क्यों प्रस्तावित है? उनके रहने के लिए आवास परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के परिसर में क्यों नहीं किया जा रहा?

माड़वन (जैतापुर) में रहने वाले जानना चाहते हैं, यदि फ्रांसिसि कंपनी अरेवा उनके गांव आ रही तो यहां वह कोई समाज सेवा करने तो नहीं आ रही है। वह एक निजी कंपनी है, जो यहां कमाई के इरादे से आएगी और कांेकणा की जमीन पर पहली बार वह अपने ईपीआर तकनीक की जांच भी कर पाएगी। जिसे पहले कहीं जांचा-परखा नहीं गया है। क्या अरेवा भारत को परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के नाम पर अपनी प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है?

सोमवार, 31 जनवरी 2011

हम जैतापुर परियोजना के खिलाफ हैं: प्रवीण परशुराम गवाणकर



जैतापुर में प्रस्तावित 9900 मेगावाट परमाणु ऊर्जा
संयंत्र के लिए कुल 938 हेक्टेयर जमीन ली जानी है,
जिसमें 669 हेक्टेयर जमीन हमारे गांव मडवन की
है। यह संयंत्र हमारे लिए षडयंत्र है। हमारे गांव के
लोग बिल्कुल इसके लिए तैयार नहीं हैं। सरकार हमसे इस
विषय पर बात करना चाहती है, लेकिन जब उसने फैसला कर
लिया है कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए मडवन की जमीन
ही ली जानी है तो कहिए बातचीत का क्या लाभ? वैसे
इस तरह के व्यवहार को तानाशाही कहा जा सकता है,
बातचीत तो कभी नहीं।
इस परियोजना का जब गांव के लोगों ने विरोध किया
तो गांव वालों को पुलिसिया ज्यादती का शिकार
होना पड़ा। लगभग दो सौ लोगों पर विभिन्न
धाराओं में मुकदमा चल रहा है। आधा दर्जन से
अधिक लोगों को तडीपार घोषित किया जा चुका
है। इरफान जो इस आंदोलन में हमारे साथ था,
पुलिस की गाड़ी के नीचे आने से उसकी मौत हुई।
अब इन सारी बातों का हम क्या अर्थ निकाले? ऐसे

बच्चों को पुलिस अपने साथ गांव से उठाकर ले गई
जो स्कूल से लौटे थे। बच्चों ने पुलिस को बस
का टिकट भी दिखलाया लेकिन कोई सुनवाई नहीं
हुई। हम गांव वालों का स्पष्ट मानना है कि सरकार
चाहे तो हमारी हत्या कर वह जमीन हमसे छीन ले लेकिन
जीते जी हम यह जमीन उन्हें नहीं सौंप सकते हैं।
मडवन परियोजना के विरोध में लगभग एक दर्जन
पंचायतें अब तक भंग हो चुकी हैं। हम सभी
लोगों ने मिलकर तय किया है, परियोजना की जमीन पर
चौकसी में लगे पुलिस वालों को गांव के लोग
किसी प्रकार का सहयोग नहीं करेंगे। मडवन हमारे लिए
क्यों जरुरी है, और हम इस परियोजना को अपने गांव
में क्यों नहीं चाहते, इसे लेकर हम लोगों ने
सिमित संसाधनों में एक डॉक्यूमेन्ट्री फिल्म
भी बनवाई है। हमारा क्षेत्र पर्यावरण के लिहाज
अति संवेदनशील है। सरकार को चाहिए, इस परियोजना
को मालाबार के तट पर लेकर जाए। तमाम तरह की समितियों
की रिपोर्ट आप देख लीजिए। इस जमीन को किसी भी
प्रकार से परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए उपयुक्त जमीन
नही ंमानी जा रही है। रत्नागिरी जिले के अलावा
सिंधुदुर्ग और रायगढ़ में भी कई प्रदूषण
फैलाने वाली परियोजनाओं पर एक साथ काम हो रहा
है। हमें फिक्र है कि इन परियोजनाओं की वजह से
इन जिलों में रहने वाले लोगों का स्वास्थ,

समुन्द्री जीव जन्तु और जैव विविधता पर असर पड़ेगा।
लेकिन महाराष्ट्र की सरकार ने इस जमीन के मुद्दे को
अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना लिया है। यदि मडवन में यह
संयंत्र बन गया तो यह सिर्फ हमारे गांव के जनजीवन को
नहीं बल्कि पुरे कोंकण के जनजीवन को प्रभावित
करेगा।
वर्ष 2003 में ही हमने पूर्व केन्द्रिय मंत्री सुरेश
प्रभू से इस संकट को लेकर बातचीत की थी। उस
वक्त हमारे गांव में आकर वे बोलकर गए थे कि यह
सिर्फ अफवाह है। ऐसी कोई परियोजना शुरु नहीं
हो रही। उस दिन के बाद वे कभी हमारे गांव में
लौटकर नहीं आए। महाराष्ट्र में मराठी मानुष की
राजनीति करने वाले भी इस मामले में दो कदम पिछे
खड़े हो गए। जबकि इस मामले में शत प्रतिशत मराठी
मानुषों की ही जमीन जा रही है।
हमें कदम-कदम पर छला गया और धोखे ंमें रखा
गया है। तारापुर परियोजना के लिए बताया गया कि वहां सब
अच्छा चल रहा हैै। मैं खुद उस गांव में गया।
वहां की स्थिति बिल्कुल दयनीय है। वहां सिर दर्द,
घुटनों में दर्द और गर्भ पात की संख्या में
आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। गांव में कमजोर बच्चे
पैदा हो रहे हैं। परियोजना से पहले इस गांव में
मछली पकड़ने के लिए 48 लॉंच थे, अब सिर्फ दो
ही रह गए हैं। मैं स्वष्ट शब्दों में कह देना
चाहता हूं, हम गांव वाले जैतापुर परमाणु ऊर्जा
संयंत्र परियोजना बिल्कुल खिलाफ हैं।
( गवाणकर जनहित सेवा समिति, मडवन के संयोजक
हैं)

सोमवार, 10 जनवरी 2011

बिग बॉस का मुकाबला कहीं फिक्स तो नहीं था

श्वेता तिवारी के बिग बॉस सीजन चार जीतने के बाद एडमॉल के बिग बॉस - बिगर तमाशा का अंत हुआ। श्वेता के हिस्से एक करोड़ रुपए आए और बाकि बचे लोग जो बिग बॉस के घर का हिस्सा बने थे, उन्हें भी पहचान और पैसा मिला। एक प्रतिभागी ने कैमरे के सामने स्वीकार किया। पहले जो लोग मिलने को भी तैयार नहीं थे, बिग बॉस में आने के बाद पहचानने लगे हैं। भाव देते हैं।


इस रियालिटी शो को देखने के दौरान इसकी रियालिटी पर हो सकता है कि कोई सवाल ना उठाए लेकिन शो में शामिल घर वालों को घर से अंदर बाहर करने में दर्शकों का रॉल कहीं नजर नहीं आया। बिग बॉस के घर से किसे निकालना है, इसका रिमोट दर्शकों के हाथ में नहीं बल्कि कार्यक्रम के प्रबंधकों के हाथ में था। वरना श्वेता तिवारी के नाम की घोषणा के साथ बिग बॉस को इस बात का भी ऐलान करना चाहिए कि यदि श्वेता द ग्रेट खली के मुकाबले विजयी हुईं हैं तो उसकी जीत के लिए तय पैमाने क्या थे? यदि उन्हें दर्शकों ने अपने वोट से जीताया है तो दर्शकों को यह जानने का पूरा हक है कि उनकी चहेती श्वेता तिवारी कितने मतों से विजयी हुए हैं। दूसरी तरफ खली द ग्रेट के प्रशंसकों को भी यह जानने का पूरा हक है कि यदि उनके प्रिय खली नहीं जीते तो इसके पिछे उनसे कहां चूक हुई? लेकिन बिग बॉस ने इसकी परवाह नहीं की।
बिग बॉस के पास तो इस सवाल का जवाब भी नहीं होगा कि जब घर के अंदर बाहर की खबर नहीं जा रही थी तो डॉली बिन्द्रा ने कैसे जाना कि बाहर सारा का तलाक हो चुका है?



चूंकि बिन्द्रा एक एपिसोड में यह कहती हुई मिली कि सारा तो दूसरी शादी की तैयारी कर रही है।
इस संदेह से इंकार नहीं किया जा सकता कि आने से पहले क्लोडिया, परवेश राणा, वगैरह वगैरह को पता हो कि उन्हें किन किन एपिसोड में बाहर होना है। डॉली बिन्द्रा जब कार्यक्रम से बाहर हो गईं उन्हें पता हो कि उन्हें फिर कार्यक्रम में वापस आना है।
बिग बॉस में डॉली बिन्द्रा की भूमिका को देखकर कोई भी समझ सकता है कि वह कार्यक्रम में एक तय एजेन्डे के साथ शामिल हुईं थीं। वह लगातार कार्यक्रम में अपने हंगामें का तड़काा लगा रही थी। कोई भी कह सकता था कि बिग बॉस की तरफ से उन्हें विश्वास पत्र मिला हुआ है कि अन्तिम चार तक कोई उनका बाल भी बांका नही ंकर सकता। और इस बात में भी शक की गुंजाइश कम ही थी कि बिग बॉस में वे टॉप फोर से आगे जाएंगी।



इस कार्यक्रम में द ग्रेट खली की जगह श्वेता तिवारी की जीत में सटोरियों की भूमिका का भी संदेंह होता है। कोई नहीं सोच सकता था कि इस मुकाबले में द ग्रेट खली की हार होगी। एक समाचार चैनल के अनुसार सट्टा बाजार में बड़ी रकम खली के नाम पर लग रही थी। ऐसे में करोड़ों रुपयों के खेल में श्वेता तिवारी के नाम एक करोड़ कर देना घाटे का सौदा तो नहीं लगता? इन्हीं बातों से संदेंह होता है कि श्वेता की जीत बिग बॉस फिक्सिंग का हिस्सा तो नहीं। बकौल श्वेता उसने भी नहीं सोचा था कि वह बिग बॉस सीजन चार में जीत हासिल करेगी। यदि श्वेता की जीत वाजीब थी तो बिग बॉस को श्वेता की जीत कैसे सुनिश्चित हुई, इस प्रक्रिया के खुलासे मंे पारदर्शिता बरतनी चाहिए।


टेलीविजन मनोरंजन का कारोबार करोड़ों का है, लेकिन जीन दर्शकों से यह बाजार बनता है, यूं लगता है मानों वे ही इस पूरे आयोजन में हासिए पर डाल दिए गए हैं।

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

पूणे के चित्रकार बापूसाहेब जानजे







पूणे के चित्रकार बापूसाहेब जानजे की तस्वीर को आप अपनी प्रतिक्रिया से नवाजिए...

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

रमेश गोर्जाला की पेंटिंग











मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

जी मनोहर जानते हैं ‘कला-जादू’ (इसे काला जादू ना पढ़े)











जी मनोहरजी की तस्वीरों में जानों कोई ‘कला-जादू’ (इसे काला जादू ना पढ़े) है, जो अपने कला पारखियों को अपने साथ बांध लेती है। आप इन्हें देखें तो हो सकता है, पेंटिंग से आपकी नजरें हटने से इंकार कर दें, क्यों?????

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

सूचना मांगने वाले खुद भी पारदर्शी बनें

सूचना अधिकार कार्यकर्ता मनीष सिसोदिया ने ‘अपना पन्ना’ (सूचना अधिकार की मासिक पत्रिका) के माध्यम से सूचना अधिकार की लोकप्रियता और इसके मार्ग में बाधा को लेकर एक सर्वेक्षण किया। इस सर्वेक्षण से यह बात सामने आई कि देश भर में सूचना के अधिकार की शक्ति से जन-जन को परिचित कराने में मीडिया ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सर्वेक्षण में 54 फीसदी लोगों ने माना कि उन्हें सूचना अधिकार कानून की जानकारी प्रिंट मीडिया से हुई। अर्थात अखबार और पत्रिकाओं ने उन्‍हें इस कानून से परिचित कराया। 09 फीसदी लोगों को इस कानून के संबंध में पहली जानकारी टीवी से प्राप्त हुई। 09 फीसदी लोग ऐसे भी थे, जिन्‍हें रेडियो ने बताया कि सूचना का अधिकार है क्या? 13 फीसदी लोगों को इसकी जानकारी किसी स्वयं सेवी संस्थान और 13 फीसदी लोगों को यह जानकारी मित्रों और सगे संबंधियों से मिली।



सिसोदिया के अनुसार सर्वे के परिणाम से दो बातें बिल्कुल साफ होती हैं। एक तरफ जहां आम जनता आरटीआई कानून की मदद से भ्रष्टाचार पर कारगर तरीके से नकेल कसने का प्रयास कर रही है तो दूसरी तरफ सरकार में बैठे भ्रष्ट अधिकारी, नेता, ठेकेदार मिल कर कानून की धार को कुन्द करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। अब देखना यह है कि जीत किसकी होती है? पारदर्शिता के जुड़ा हुआ ही एक दूसरा प्रश्‍न भी है, जो आजकल सूचना अधिकार के कानून के साथ काम कर रहे कार्यकर्ताओं और संगठनों के लिए बड़ा सवाल होगा। जिस पारदर्शिता की उम्मीद हम सरकार से करते हैं, वह पारदर्शिता उन संगठनों और व्यक्तियों को भी अपने जीवन, व्यवहार और काम काज में लाना चाहिए। इससे वे आम जन का विश्वास जीत पाएंगे। यह विश्वास उस समय बहुत काम आएगा, जब कोई सरकारी अधिकारी किसी सूचना अधिकार कार्यकर्ता को झूठे मुकदमे में फंसाने की कोशिश करेगा।

इसी वजह से सूचना का अधिकार कानून का इस्तेमाल कर, सूचना निकालना मानो जंग लड़कर, जंग जीतने के बराबर है। ऐसी ही एक जंग बिहार, बक्सर के भाई शिवप्रकाश राय ने जीती। उन्होंने जिले के करीब 70 बैंकों से प्रधानमंत्री रोजगार योजना के अन्तर्गत कृषि उपकरणों पर अनुदान संबंधी सूचना मांगी थी। बदले में जिलाधिकारी ने उनपर झूठा मुकदमा चलाया। जिसकी पुष्टि एसपी, बक्सर की जांच रिपोर्ट से होती है। जिसमें उन्होंने राय को बेकसूर पाया। जिसकी वजह से 29 दिन जेल की सजा काटने के बाद वे बाइज्जत बरी कर दिए गए। शिवप्रकाश राय ने अपने काम काज और जीवन में जो पारदर्शिता बरती है, उसी की वजह से यह फैसला उनके हक में आया। शिवप्रकाश राय के मामले में बिहार सूचना आयोग की पूर्ण पीठ ने बक्सर के जिलाधिकारी को 15,400 रुपए उन्हें यात्रा व्यय के एवज में देने का आदेश दिया। शिवप्रकाश राय सिर्फ एक व्यक्ति का नाम है, जो बक्सर में एक संस्था की तरह काम कर रहे हैं। आज भी वे लगातार सूचना अधिकार को लेकर सक्रिय हैं।



बात को आगे बढ़ाने से पहले एक कहानी। यह कहानी हो सकता है, आपने पहले कहीं सुनी होगी, जिसमें एक बच्चे को सात दिनों बाद बुलाकर महात्मा गांधीजी सिर्फ ईमली ना खाने का आग्रह इसलिए करते हैं, क्योकि जब वह पहली बार आया था उस वक्त तक वे खुद भी ईमली बड़े चाव से खाते थे। गांधीजी का मानना था यदि किसी को संयम की सीख देनी है तो यह संयम पहले खुद से ही शुरू होना चाहिए। यही बात सूचना के अधिकार कानून पर भी लागू होनी चाहिए। हाल में ही एक सूचना अधिकार कार्यकर्ता अफरोज आलम ने आधे दर्जन से अधिक सूचना अधिकार पर काम करने वाले संगठनों को एक पत्र लिखा, जिसमें उसने अपने कुछ सवाल दर्ज किए और साथ में दस रुपए का पोस्टल ऑर्डर भी लगाया। मतलब साफ था, वह उन लोगों से सूचना के अधिकार के अन्तर्गत सवाल पूछना चाहता था, जिनपर सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 लागू नहीं होता। तर्क स्पष्ट था, यदि कोई संगठन सूचना के अधिकार और पारदर्शिता की बात करता है तो उसे यह पारदर्शिता अपने संगठन से शुरू करनी चाहिए। हर बात के लिए यह जरूरी तो नहीं कि कानून का पेंच मौजूद ही हो। कुछ बातें नैतिकता के मानदंड पर भी तो तय होनी चाहिए।

वैसे सवाल का जवाब उन सभी संगठनों की तरफ से आया, जिनसे सवाल पूछे गए थे। दिलचस्प यह था कि सवाल जितने बेबाक और बेलाग थे, जवाब उतने ही गोलमोल तरीके से लिखे गए थे। मसलन अधिकांश संस्थानों से आए जवाबों का सार यही था कि हम आपके सूचना के अधिकार की अर्जी का हार्दिक स्वागत तो करते हैं, लेकिन हम पर सूचना अधिकार अधिनियम 2005 लागू नहीं होता। दो-तीन संगठनों ने जवाब के लिए अपनी वेबसाईट देखने की बात की लेकिन सवाल के बावत वहां कोई जानकारी नहीं मिली।

अफरोज द्वारा संगठनों से कुल आठ से दस सवाल पूछे गए थे। मसलन संस्था की स्थापना कब और क्यों की गई? स्थापना का उद्देश्य क्या था? पिछले तीन वर्षों में संस्था द्वारा कितने और कब कब कार्यक्रम आयोजित किए गए, पिछले तीन वर्षों में संस्था को कहां-कहां से कितनी राशि फंड के रुप में मिली है? पिछले तीन वर्षों में संस्था के लोगों ने कहां-कहां की यात्राएं की और इस पर आने वाले खर्च का ब्योरा क्या है? इस तरह के सवाल का जवाब देना एक दो संस्थाओं को छोड़कर लगभग सभी के लिए मुश्किल हो रहा था। इसलिए उन्होंने जवाब देना मुनासिब नहीं समझा।



जिन संगठनों से सवाल पूछे गए थे, उस सूची में राजस्थान के राजसमन्द जिले के देवडूंगरी की भी एक संस्था थी, ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन।' इस संगठन द्वारा जो जवाब दिया गया, वह वास्तव में काबिले तारीफ ही नहीं काबिले गौर भी है। यहां उल्लेखनीय यह भी है कि संस्था ने दस रुपए का पोस्टल ऑर्डर वापस नहीं किया और सभी सवालों का विस्तार से जवाब दिया। उन्होंने जवाब में यह दलील भी नहीं दी कि वे सूचना के अधिकार कानून के अंदर नहीं आते। संगठन से आए पत्र की शुरुआत कुछ इन शब्दों में थी-

' आपका आवेदन हमें प्राप्त हुआ। पत्र पढ़ते ही हमें बहुत अच्छा लगा कि आपने संगठन से सूचनाएं मांगी हैं। आपके पत्र का हम स्वागत करते हैं और निम्नलिखित सूचनाएं बिन्दुवार भिजवा रहे हैं।' उसके बाद एक एक करके मांगी गई सभी सूचनाओं के जवाब विस्तार से दिए गए हैं। सूचना के अधिकार पर काम करने वाले संगठनों के लिए ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन’ एक आदर्श संगठन हो सकता है। वास्तव में यदि कोई संगठन व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग करता है, तो यह बेहद जरुरी है कि वह सबसे पहले अपने काम काज के तरीके में पारदर्शिता लाए। वह खुद को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर नहीं बल्कि अंदर माने।

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम