बुधवार, 25 जून 2008

हम भूईहार हैं













अरवल (यह जहानाबाद से कटकर अलग हुआ जिला है, नरसंहारों की वजह से १९८० से २००० तक बदनाम रहा) जिलान्तर्गत सेनारी गाँव से ०३ किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव है मंझीयामा। यह सभी बच्चे वहीं खेलते हुए मिले। यह बच्चे बहूत ही प्यारे लग रहे थे इसलिए इनकी फोटो लेने के लिए मैंने अपना कैमरा बाहर निकाल लिया । कैमरा देखकर एक बच्चा अपने साथियों से अलग जाकर खड़ा हो गया, मैंने जब कहा साथ आ जाओ तो उसका जवाब था मेरा फोटो लेना है तो अकेले में लीजिए। इनके साथ नहीं।
मैंने जिज्ञासा वश पूछ लिया इनके साथ आने में क्या कठिनाई है, बच्चे का जवाब चौकाने वाला था, 'आप नहीं जानते, हम भुईहार (भूमिहार) हैं।
क्या कोई बता सकता है कि इतने छोटे से बच्चे के दिमाग में जातिवाद का जहर कहाँ से आया है? उसे किसने समझाया की सिर्फ़ भूमिहार हो जाने की वजह से वह श्रेष्ठ हो गया। क्या हम सचमुच २१ सदी में प्रवेश पा चुके हैं, या यह कोई भ्रम है।

15 टिप्‍पणियां:

शोभा ने कहा…

मर्म को छू लेने वाली प्रस्तुति ।

advocate rashmi saurana ने कहा…

bhut aacha lekh likha hai.bilkul sahi bat.

Chiranjiv ने कहा…

बच्चा का तो मालुम नहीं लेकिन बडो को कौन सिखाता है कि तुम अपनी जाती वालॊ के साथ ही रहो. अब देखो ना तुम मैथिल ब्राह्मिन हो तो ओर्कुट मे मैथिल ब्राह्मिण कि कमुनीटी ज्वाइन कर रखे हो. http://www.orkut.co.in/ProfileC.aspx?uid=13449057633332419340&ct=&tab=0&pno=3
ये तुम्हारा हि प्रोफाइल है ना? शरम नही आती है इस तरह का लेख लिखते हुए जब खुद मैथिल ब्राह्मिण के नाम पर जाती वादी करते हो. तुम्हारि भुमिहार से दुश्मनी है तो ढंग से करो. अपने घर के बच्चो का फोटो लगा कर ब्लोग मे वाहवाही लुटना चाह रहे हो? ऐसे लेख पर कुकुर भी मुतने नहिं आया. दु गो महिला लोग आयिं जिन्हे तुम्हारी जाती का रुप मालुम नहीं था.
मैं खुद मैथिल ब्राह्मिण हुं और मुझे मालुम है मैथिल ब्राह्मिण किस हद तक जातियता करतें हैं. आज भी मैथिल ब्राह्मिण अछुतो का छुआ नहीं खाते. गावॊं मे उनका घर और अछुतो का घर अलग होता है. गांव मे जिस तरफ से मैथिल ब्राह्मिण निकलते हैं उधर से अछुत नहीं निकलते. अछुतो का गावं मे निकास दुसरे तरफ से होता है. ये जो लेख तुमने लिखी है उसके लिये तुम्हे अरवल जाने कि जरुरत नहीं थी. किसी भी मैथिल ब्राह्मिण (या खुद के गांव) मे चला जाता वहां ऐसा द्रिश्य (जैसा कि तुमने इस काल्पनिक कहानी मे लिखि है) मिल जाती.

Chiranjiv ने कहा…

इसका टाइटिल रख लो "मैं मैथिल ब्राह्मीण छी".
वैसे इस फोटो मे बच्चे खेल साथ मे रहे हैं. तुम्हारे ओर्कुट प्रोफाइल मे ज्यादातर लोग ब्राह्मिण हैं. ऐसा क्यों. कोइ दलित नहीं दिखाइ दिया. अगर दम है तो लिखो मैथिल ब्राह्मिण के बारे मे. हम मैथिल हैं. आज भी अगर हम गावं से गुजरते हैं और दलित खटिया पर से नहीं उठते तो डंडा से पिटाइ करते हैं. आज भी दलित जो मेरे उम्र से दुगने तिगुने हैं वो हाथ जोर कर प्रणाम करते हैं और हम खुश रहो का अशिर्वाद देते हुए आगे बढ जातें हैं. ऐसा हर मैथिल ब्राह्मिण के गावं मे होता है.

ये सब जानते हुए तुमने भुमिहार का सहारा कि क्यों जरुरत पर गयी? क्या तुम इतने नपुंसक और कमजोर हो की अपनी जाती के अन्दर कि बात लिखने मे डर हो गयी? ऐसे कमजोर इन्सान जिन्दगी मे कुछ नहीं कर सकता है.
तुम इस तरह का लेख लिख कर क्या साबित करना चाह रहे हो? कमुनिटि के नाम पर बेतिया, चम्पारण, मैथिल ब्राह्मिण जवाइन कर रखे हो. इसि से तुम्हारी मानसिकता झलकती है. बहुत कमुनिटि है बिहार, इन्डिया, नो जाती से सम्बन्धित वो पसंद नहिं है?

बेनामी ने कहा…

If I look at your first line you are more interested in massacres etc. Look how you have started the topic by introducting Arwal and relating with Shenari. Its cheap mentality which you carry. Mostly this type of thinking has been seen in brahmins. I am sure you are a Brahmin and that too a maithil Brahmin. Ridiculous and it shows how old a kid you are. Write something sensible which can have some meaning. Being part of mathil brahmin forums and networking communities, you are asking world that why kid in photo wants to be part of his own castemen? Don't you have the answer?
I will answer you on my own blog. Wait.

Pankaj ने कहा…

मुझे हसी आती है कि खावते भी सच होती है ! किसी ने कहा है कि "नया मुल्ला ज्यादा प्याज खता है" ! वाही हाल अंशु का है, बेचारे अपने नाम कि डुगडुगी पिटाने के लिए ब्लॉग का सहारा लेते है ! मैंने बहुत लोगो को देखा है जिनको अपने मित्र मंडली में नाम कमाने का शौक रहता है वे ब्लॉग या इसी टाइप का कुछ अंट शंट बकवास लिखा करते है ! भाई मैं खुद भूमिहार हू और हां रणवीर सेना को सपोर्ट भी करता था लेकिन अब नहीं ! लेकिन सच पूछो तो बच्चो को ऐसा कोई नहीं सिखाता ! जो भी हो तुम्हे नाम कमाने का शौक है तो कुछ अच्छा काम करो लोग खुद तुम्हारे पास खिचे चले आयेंगे ! ऐसा करने से तुम्हरे सामने तो साब वाह वाह करेंगे लेकिन तुम्हारे पीठ पीछे तुम्हारी माँ बहन करेंगे ! ये परम सत्य है ! ऐसा ही होता है ! आओ हाथ बटाओ जाती वाद मिटाने के लिए ! धन्यवाद !meet me at : pankaj.kits@gmail.com

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

चिरंजीव भाई और पंकज भाई,
आप मेरे ब्लॉग पर आए आभार। तीखी प्रतिक्रया दी अच्छा लगा। और जो कुछ भी लिखा बेनाम बनकर नहीं लिखा। (यह और बात है कि जब आपका पोस्ट पढ़ने की कोशीश की तो तकनीकी गडबडी के कारण असफल रहा)। अपने नाम के साथ लिखा। यह और भी अच्छा लगा।
आप यह सब लिखने से पहले एक बार मुझसे मिल लेते, तो उसके बाद आप जो कुछ भी लिखते वह आपका अनुभव होता। अभी आपने जो कुछ भी लिखा है, वह सिर्फ़ आपका अनुमान है। दोस्त यह बात तो आप भी मानेगे कि अनुमान की तुलना में अनुभव से लिखी हुई बात थोडी अधीक विश्वसनीय होती है।
यह तो अच्छा हुआ कि मैंने अपने पोस्ट में यह नहीं लिखा कि मंझीयामा से जब मुझे जहानाबाद आने के लिए बस नहीं मिल रही थी, उस वक़्त जिस उमेश शर्मा जी ने मुझे आश्रय दिया, रात में खाना खिलाया, रात में अपने घर में रखने का प्रबंध किया। वह भूमिहार ही थे। वरना हो सकता था, आप मुझे 'नमक हराम' भी कह देते। अगले दिन जहानाबाद के करौना हॉल्ट के पास जिन लालन दास जी के साथ दिन का खाना खाया वह समाज की नजर में दलित ही थे।
यदि आप अपने अनुभव से ब्रामणो के ख़िलाफ़ कोई लेख लिखकर भेजें तो मैं उसे अपने ब्लॉग पर स्थान देने का विश्वास दिलाता हूँ। यदि आप मुझे अपने कुछ दलित और भूमिहार मित्रों से मिलवाएं तो खुशी होगी। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि मैं 'ब्राहमणवादी' नहीं हूँ।
आप चाहे तो मुझे फ़ोन कर सकते हैं - ०९८६८४१९४५३
अंत सिर्फ़ इतना ही कि मेरे बारे में कोई राय ना कायम करना

Sudhir ram ने कहा…

@ऐसे लेख पर कुकुर भी मुतने नहिं आया.
hahah kya sahi likha bhai aapne. KItna gira huva INSAAn hai ye jo Bacho ke naam par Career bananae chal hai. Isko yaha jakar dekhiye
http://www.orkut.com/Album.aspx?uid=1896647466587816691&aid=1214780464

कुमार आलोक ने कहा…

अँशु भाइ चिंता ना करो आप प्रोग्रेसिव हो सच्चाइ कहना चाहिये ..मैंने भी उन दिनों को नजदीक से देखा है जब जहानाबाद जिले में उग्रवाद चरम पर था ...सेनारी से पहले शंकर बिगहा में रणवीर सेना ने दलितों का नरसंहार किया..प्रतिक्रियास्वरुप माओवादियों ने सेनारी में कत्लेआम किया ..और फिर रणवीर सेना ने मियांचक में ..दौर चलता रहा खौफ इस तरह का था कि दलितों के बस्ती में एक बार कोइ एक बार रणवीर सेना का नाम ले लो बस्ती खाली ..और गरीब और शातिप्रिय भूमिहारों के गांव में माओवादीयों का नाम ले लो वहां भी यही हाल ...तो ऐसा वातावरण तैयार किया गया कि सियासत के खिलाडियों के द्वारा ..आप ने जो कुछ भी कहा या लिखा है सच है ...बच्चे दोषी नही है बल्कि बच्चों के पालनहार जो सिखाते है तुम भूमिहार हो इसलिये तुम्हें कौन सा कोड आफ कंडक्ट ग्रहम करना चाहिये और हां सिर्फ भूमिहार ही नही बल्कि सारी जातियां जो उंची जाति होने का दंभ भरते है वो इस वणॆ व्यवस्था को बनाये रखना चाहते है ...चलो आप बहादूर हो लिखों डरिये मत ..कुछ लोगों का काम है गाली देना ये लोग न्यूटर जेंडर है .....

बेनामी ने कहा…

आशीष भाई,
किन शिखंड़ियों की बातों से परेशान हो गए, ये लोग बहस को दूसरी तरफ़ मोरने वाले लोग हैं. मैं एक भूमिहार हूँ और मैं जानता हूँ आप जो लिख रहे हैं उ ठीक लिख रहे हैं.
आप जानते हैं भूमिहार भारत भर में बहूत पैसा वाला जात है. अच्छा पोस्ट पर है इस कास्ट का लोग. हमको लगता है, ई सब जो लिख रहा है सब इनका औफ़ीस में जो बाप दादा होगा, उ कोनो भूमिहारे होगा. बस अपने अब्बू को खूश करने के लिए साला सब आपको गड़िया रहा है. भैया आप चिन्ता मत कीजिए, तनिको पढा लिखा भूमिहार होगा त आपका फ़ीलिन्ग समझेगा. आप टेंशन बहूत लेते हैं. कोनो टेनशन लेने का जरूरत नहीं है.

आपका छोटा भाई
रणवीर सिंह,मुखर्जी नगर, दिल्ली

Pankaj ने कहा…

कुमार आलोक उर्फ़ बेनामी जी, जहा तक आपने शिखंडी और बाप दादा की बात करी तो आपको पता होना चाहिए की आपके बाप दादा शिखंडी थे जो मवोवादियो के डर से उनके छतरी के निचे चले गए ! वो गरीब परन्तु बहादुर भूमिहार थे जिन्होंने अपने आदर्श और सिधांत के लिए लड़कर मरना उचित समझा ! ज्यादा क्या बोलू, आप खुद जानते हो !

Pankaj ने कहा…

कुमार आलोक उर्फ़ बेनामी जी, जहा तक आपने शिखंडी और बाप दादा की बात करी तो आपको पता होना चाहिए की आपके बाप दादा शिखंडी थे जो मवोवादियो के डर से उनके छतरी के निचे चले गए ! वो गरीब परन्तु बहादुर भूमिहार थे जिन्होंने अपने आदर्श और सिधांत के लिए लड़कर मरना उचित समझा ! ज्यादा क्या बोलू, आप खुद जानते हो !

Chiranjiv ने कहा…

ashish post kyon delete kar diye?

आशीष,
सबसे पहले तो आपको मुझे धन्यवाद देना चाहिये कि मैने आपकी सबसे बडी भुल कि ओर ध्यान दिलाया. आप ओर्कुट मे मैथिल ब्राह्मिण कमुनिटी के मेम्बर होकर जातीवाद के खिलाफ़ झंडा उठा लिये थे. आप तुरंत भूल को सुधार किये और फटाफट अपना प्रोफाईल उस कमुनिटी से हटा लिये. आप ब्लोग लिखते हैं अपना ब्लोग को हिट कराने के लिये. आप ब्लोग का हेडलाइन और शुरु के लाइन ऐसा लिखते हैं कि लोग टुट पडे. अब देखिये आपने कहा कि हम जवाब दिये http://ashishanshu.blogspot.com/2008/06/blog-post_29.html यहां पर. लेकिन ये तो आपका सफाइ है जवाब नहीं. उस ब्लोग का शुरुआत आप्ने विश्फोट और उसके लेखक के नाम से किया ताकि ब्लोगवानी का प्रिभिव से लोग यहां आयें. लोग नहीं आये. मायुस होकर आप इसका हेडलाइन फिर से ऐसा दिया कि लोग आये. लोग आये तो सही लेकिन लिखावट देख कर चुप चाप खिसक लिये. इस ब्लोग का हेडलाइन का आपके कंटेंट से कोइ लेना देना नहीं है.
अब आप कह रहे हैं कि चिरंजिव एक बेनामी है, क्योंकि वो मुझे फोन नहीं किये. भाई आप ब्लोग पर नक्सालाइट का ग्रुप जोइन कर रखे हैं. मिथिलांचल मे मुझे रहना है कि नहीं जो आपको अपना फोन नंबर दें. मैं आज भी आपको कह रहा हुं कि जो भी आप दुसरी जाती के लिये लिखे हैं वो दुसंगतियां हमारी और आपकी जाती मैथिल ब्राह्मिण मे भी है. तो क्यों ना हम ये झंडा अपने घर से निकालें. सचमुच ही तो कहा गया है कि "charity begins at home".
yaa
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोई।
जो दिल ढुंढा आपनो, मुझ सा बुरा ना कोई॥

मुझे किसी जाती या किसी के सोच से कोई परेशानी नहीं है. ऐसा अक्सर होता है कि जो पक्ष मे लिखता है वो वास्तविक और जो विपक्ष मे लिखता है वो काल्पनिक (बेनामी) लगने लगता है.

aurdusara wo bhi thaa:

हमे वही दिखाई देता है जो हम देखना चाहतें हैं. अब आप को जाती के अंदर कि दुसंगतियां अरवल मे दिखाई दि लेकिन वो अपने बेतिया, चंपारण मे या अपनी खुद कि जाती मैथिल ब्राह्मिण मे नहीं दिखाई दी. ऐसा इसलिये कि हम देखना नहीं चाहते हैं.

आलोक तुम्हारी ही कमी खल रही थी. तुम्हारे रगों मे भी वही खुन दौड रहा है. तुम अपनी बुनियाद को बदल नहीं सकते हो.

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

पोस्ट इसलिए ड़ीलीट करना पड़ा क्योंकि आप लोग मुझे सिर्फ़ हंगामा खड़ा करने वाले किसी लॉबी के सदस्य लगते हैं, जिसकी कोई पहचान नहीं है. आपकी बात में वजन नजर आया इसिलिए उसे मैने पोस्ट के तौर पर प्रकशित किया लेकिन उसमे भी आपको मेरी नाम कमाने लालसा नजर आई. दोस्त गाँधी जी ने कहा है, अपने दिमाग को हर तरह के विचारों के लिए खूला रखो. लेकिन इन सब बातों का कोई फ़ायदा नहीं क्योंकि आप लोग गाली देने में यकिन रखने वाले लोग हैं. आपकी अपनी कोई पचान नहीं है.

पूराने पोस्ट पर मेरा जवाब, जो ड़ीलीट कर दिया.
दोस्त,
आपको मैने बेनामी कहा क्योंकि मैं आपके प्रोफ़ाईल तक नहीं पहूँच पा रहा हूँ. दूसरी बात यदि आप कमी की ओर ध्यान दिलाएँगे तो सुधारनॅ में मुझे कोई गूरेज नहीं है. लेकिन जब तक मैं आपसे बात ना करूँ या आप मुझसे ना मिले हम दोनों एक-दूसरे के लिए सिर्फ़ अनुमान लगा सकते हैं. दूसरी बात दोस्त नाम कमाने का शौक होता तो कुछ और काम करते, ब्लॉग लिखने का मतलब कमाई एक आना नहीं और खर्चा रुपया. फ़िर जब कोई बात मन को बैचैन करती है तो ब्लॉग लिखता हूँ और यहाँ वही लिखता हूँ जिसे कोई छापने को तैयार नहीं.
मेरे ब्लॉग में आपको नक्सालाइट का ग्रुप तो दिखता है लेकिन सलवा जूड़ूम आप नहीं देख पाते, मेरे और्कूट में आपको मैथिल तो दिखता है लेकिन उत्तराखंड़ की कम्युनिटी नहीं देखती. मेरे और्कूट में 478 दोस्तों में आपको एक भी दलित नहीं दिखता.
इन सब बातों को देखते हुए आपको फ़र्जी ना कहूं तो क्या कहूँ. और भी कुछ आपने और आपकी मित्र मंड़ली ने किया है जिसका जिक्र करना यहाँ मैं मुनासीब नहीं समझता.
दोस्त बेवजह किसी तोहमत लगाने से बचो. फ़िर कहता हूँ आपमें सच्चाई है तो मिलो.


दूसरा जवाब
जो मुझे दिख नहीं रहा वह मुझे दिखाने के लिए आप स्वतन्त्र हैं चिरंजीव.
यदि आप कोई काल्पनिक नाम नहीं हैं.

और यह जो लोग फ़र्जी पहचान के साथ गाली लिख रहे हैं उनके लिए चेतावनी
मैं अब पुलिस की मदद लेने जा रहा हूँ.
(यदि आपकी दी हुई गालियाँ मैं स्वीकार ना करूँ तो ... इसका मतलब तो आप समझते ही होंगे, इसलिए बेवजह गाली मत दीजिए किसी को.)

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

4 जुलाई को रात 9 बजकर 34 मीनट पर पंकज भाई का मेल आया-

Are aisa mat kaho dost...... Aakhada nahi bana hai. itna to chalte rahta hai...maaf karna aage se mai iska khyal rakhunga.
Aur haa mai aapse jarur milunga....most probably next week Delhi aane ka program ban raha hai...to aapke haatho se hi patrik lunga. Khusi hogi aapse milkar
Good Luck

E-Mail:-
Pankaj Rai:- pankaj.kits@gmail.com

यदि पंकज भाई आकर मिले तो मुझे भी बहूत खूशी होगी उनसे मिलकर.
सच्ची-मुच्ची.

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम