गुरुवार, 31 जुलाई 2008

उजाड़ने और बसाने का खेल है


पूरण सिंह राणा टिहरी से विस्थापित हैं. वह विकास की परिभाषा इन शब्दों में देते हैं,जब अमीर लोग अपनी सुविधा के लिए किसी बड़ी परियोजना के नाम पर गरीबों की बस्तियों को उजाड़ते हैं तो इसे बस्ती का विकास होना कहते हैं. उन्हें टिहरी से उजाड़ कर हरिद्वार के पास ज्वालापुर में वन विभाग की जमीन पर बसाया गया है. कितनी समझदारी है इस उजाड़ने और बसाने के खेल में? उसे इस बात से समझा जा सकता है कि एक तरफ़ टिहरी विस्थापितों को बसाने के लिए वन विभाग ने ज्वालापुर में जंगल की कटाई की दूसरी तरफ़ यही सरकार देहरादून के पास हरकीदून (उत्तरकाशी) में गोविन्दविहार, गंगोत्री में गंगोत्री नॅशनल पार्क और जोशी मठ के पास नंदादेवी नॅशनल पार्क बनाने के नाम पर बड़ी संख्या में गाँव वालों को उजाड़

रही है।
अंत में एक बात यह कि पूरण ने ज्वालापुर वाले अपने घर को छाम गाँव का नाम दिया है। यह उनका पैतृक गाँव है, जिसे छोड़कर टिहरी से उन्हें यहाँ आना पडा था.

4 टिप्‍पणियां:

Taruna ने कहा…

Apna ghar chodene kaa dard koi aur nahni jaantaa aur is khel mein sab maare jaate hain.


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Namaste..

Taruna

शोभा ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति।

बाल किशन ने कहा…

विस्थापितों का दर्द बाखूबी बयां किया आपने,
और सही भी है इस देश में विकास इसी ढंग से हो रहा है जो असल में विकास तो कुछ का है और विनाश बहुतों का.

राज भाटिय़ा ने कहा…

विकास उसे केसे कहे, जो विनाश पर किया गया हो
धन्यवाद

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम