शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

भिखारी भी कलाकार भी और हलवाई भी


इस व्यक्ति से मुलाक़ात बेतिया के पास ट्रेन में हुई। यह गीत गा रहा था। आवाज बहूत अच्छी नहीं थी लेकिन फ़िर भी एक खिचाव थी उस आवाज में.
नाम बताया अशोक साहू। मुजफ्फरपुर सब्जी मंडी में मिठाई की दूकान है. उसने बताया सप्ताह में सिर्फ़ एक दिन वह ट्रेन में गीत गाकर पैसे इकठ्ठा करता है, अच्छा है.
ऐसे बसों ट्रेनों और सडकों पर बिखरी प्रतिभा की पहचान क्या नहीं होनी चाहिए? ऐसे लोगों का गुनाह सिर्फ़ इतना है कि ये सुविधासम्पन्न परिवारों में पैदा हुए लोग नहीं है। वरना इनके माँ- बाप भी अच्छे गुरुओं की देख रेख में इन्हें संगीत दीक्षित कराते.


9 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

गा कर, धन प्राप्त करने को भीख कहना उचित नहीं लगा।

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

दोस्त आपकी भावना की कद्र करता हूँ लेकिन वह भीख ही है. वैसे इसके विकल्प आप कोई शब्द सुझाएँ तो आभार होगा ...

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

दिनेश जी,
आपकी भावना की कद्र करता हूँ लेकिन वह भीख ही है. क्योंकि यहाँ भी गीत गाने के बाद गाने वाला हाथ फैला कर लोगों से पैसे मांगता है. उसके गीत के लिए कोई निर्धारित रकम तय नहीं है. जो चाहे दे - जो चाहे ना दे.
वैसे इसके विकल्प में आप कोई शब्द सुझाएँ तो आभार होगा ...

डा. अमर कुमार ने कहा…

.

मेरे विचार में यह भिक्षा ही है
गाकर लोगों का ध्यान आकर्षित करना इसका उपक्रम
एवं जीवनवृति के लिये उपार्जित धन ही मुख्य प्रयोजन

mahashakti ने कहा…

नजरियें अपने अपने है, सोच अपनी अपनी, पैसे के लिये तो हाथ सोनू निगम भी फैलाते होगे,

राज भाटिय़ा ने कहा…

जी नही यह भीख नही हो सकती,मे दिनेश जी की बात से सहमत हु,अगर यह भीख हे तो जो मदारी लोग सडको पर तमाशा दिखाते हे,कला कारी दिखाते हे, एक तरह से वो भी भीख हुयी, अगर वो भीख हुयी तो हमारे हीरो हीरोईन, ओर सारे गायक तो फ़िर बडे भिखारी हुये ना, जेसा की महाशाक्ति ने कहा कि सोनू निगम भी भिखारी ही हुया ना,अजी यह सब मेहनत से कमाते हे.किसी का नाम चढ गया कोई बेनाम रह गया.

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

राज जी मैं आपकी भावना की क़द्र करता हूँ लेकिन वह कलाकार जो अपनी कला का प्रदर्शन कर पैसा मांगता है या फ़िर मदारी हम दोनों को जो धन देते हैं, वह मेहनताना नहीं देते, भिक्षा ही देते हैं. इसके लिए एक अच्छा शब्द है बक्शीश.
खैर, जहाँ तक बात सोनू निगम या फिल्मी कलाकारों की है तो उनके काम करने से पहले उनके काम के बदले मिलने वाली राशि तय रहती है. इसलिए उन्हें जो दिया जाता है, वह पारिश्रमिक है. यदि यह कलाकार जो ट्रेन में अपने कला का प्रदर्शन कर रहा है - वह रेलवे की तरफ़ से नियुक्त किया गया होता तो शायद उसे भिखारी नहीं कहा जाता.

NILAMBUJ SINGH ने कहा…

चाहे जो हो लेकिन भीख मांगना कोई विकल्प नहीं है.
यह भीख हो या न हो इससे बडी बात है की वह जिस व्यवस्था मे है उसकी नियति यही क्यों है यह ज्यादा शोचनीय बात है.

Chiranjiv ने कहा…

भिखारी पर मत हसो बालक. वो समाज के मोह माया से उपर उठ चुका है. उसका मन संतुष्ट है लेकिन पेट नहीं जब कि आप जैसे कुलिन ब्राह्मण परिवार मे जनम लेने के बाद भी पेट तो संतुष्ट है परंतु मन नहीं.

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम