सोमवार, 10 नवंबर 2008

मीनाक्षी (दि.वि.) का आभार

हाल में मेरी प्रकाशित कहानी 'एक्स-वाई की कहानियाँ' के लिए दोस्तों के खूब सारे फ़ोन आए। यह कहानी कभी ना लिखी जाती यदि मीनाक्षी ना होती. उसके स्वभाव के दोहरेपन या कहें व्यवहार की वैविध्यता ने इस कहानी को मुकम्मल बनाया. मीनाक्षी का आभार.

एक्स -वाई की एक कहानी

एक्स के हर्ट रूम में ऐ, बी, सी, डी, ई, ऍफ़, जी ...... वाई जैसे ना जाने कितने स्विच थे. वह जब चाहती एक स्विच को ऑन करती और ऑन स्विच को जी भर कर दुलार करती. फ़िर उस स्विच को ऑफ कर दिया जाता. यह सिलसिला चलता हुआ वाई तक पहुंचा. उसे जी भर कर एक्स का दुलार मिला. जब बारी स्विच ऑफ की आई तो वह ऑफ होने को तैयार नहीं हुआ. वाई कोई विद्रोही किस्म का जीव जान पङता था. और एक्स को विद्रोह पसंद नहीं था. उसने फ़ौरन अपने हर्ट रूम के स्विच बोर्ड से वाई नामक स्विच को उखार फेंका. सुना है आजकल किसी 'क' नाम के स्विच ने वाई की जगह ले ली है. और 'ऑन' होने के लिए मचल रहा है.

8 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

yah X-Y kaun hai Bhai

Rajnish

abhishek kashyap ने कहा…

bahut aacha. kam sabdon me bahut kuch kahne ka hunar tum jan gai ho. apne kathakar ko khad-pani dete raho.meri hardik badhai!

शोभा ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर लिखा है।

Udan Tashtari ने कहा…

सही है.

चण्डीदत्त शुक्ल ने कहा…

अंशु
ये कहानी है या डायरी या संत्रास या गुस्सा...खुद करो फैसला पर कोशिश अच्छी है...

nitin ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर लिखा है।

बेनामी ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर लिखा है।

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

कहानियां छोटी हो और अर्थों को संजोए हो तो क्या कहने............

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम