गुरुवार, 22 जनवरी 2009

गाहे-बगाहे यह क्या लिख दिया विनीत भाई


कल ही गुवाहाटी से लौटा हूँ, आते ही विनीत भाई के ब्लॉग पर सद्य प्रकाशित पोस्ट 'वो कैंची गिरीन्द्र की नहीं थी' पढने को मिली. पढ़ने के बाद तकलीफ हुई चूकि यह सब जिसने लिखा है, वह विनीत कुमार हैं. जिनकी बातों को कम से कम मैं कभी हल्के में नहीं लेता. वह कैसे इस तरह की हल्की बात लिख सकते हैं. वे 'मीडिया स्कैन' की पूरी टीम को जानते हैं. बहरहाल उन्होंने जो लिखा है वह सार्वजनिक है. आज उनका फोन (09811853307) ना मिलने की वजह से एक मेल उन्हें भेजा है. मेल की एक कॉपी आप ब्लॉग पाठकों के लिय - हमारा पक्ष भी तो पूछा होता - विनीत भाई, आप उन सब लोगों से परिचित हैं जो मीडिया स्कैन टीम के साथ जुड़े हुए हैं। उसके बाद भी आप इस तरह का कोई लेख कैसे लिख सकते हैं? लिखने से पहले कम से कम एक बार बात तो करते। संपादन के मामले में उलट हुआ। यहाँ जो संपादन है वह पूरी तरह से गिरीन्द्र की देखरेख में हुआ है। वह क़यामत की रात (जिस रात को 'मीडिया स्कैन' ने अन्तिम रूप प्राप्त किया ) , अंक के साथ थे. लेख जुटाने में उनके कहने पर जो मदद बन पाई हमने की. लेकिन वह लेख भी लाकर गिरीन्द्र के झोले में ही डाला गया. ( आपने लिखा है - अतिथि संपादक होने के नाते गिरीन्द्र ने अपनी तरफ से लोगों को लिखने के लिए कहा। लोगों ने उसके कहने पर लिखा भी। बाद में उसने एरेंज करके मीडिया स्कैन के लिए स्थायी रुप से काम करनेवालों को सौंप दिया।) अपने मन की लिखने से पहले विनीत भाई आप एक बार बतिया लेते - मुझसे बतियाने में हर्ज था तो तनिक गिरिन्द्र (09868086126) का नंबर ही मिला लेते तो अच्छा होता.

1 टिप्पणी:

संजीव कुमार सिन्हा ने कहा…

आशीषजी के विचार से पूर्णत: सहमत हूं। बहुत ही शालीनतापूर्वक उन्‍होंने अपनी बात रखी हैं। मुझे भी उन्‍होंने 'मीडिया स्‍कैन' के ब्‍लॉग विशेषांक के लिए कुछ लिखने हेतु कहा था और लेख छपने के बाद मैंने भी उन्‍हें उलाहना दिया था कि भाई, लेख के कुछ महत्‍वपूर्ण अंश संपादित हो गये हैं। उन्‍होंने वाजिब तर्क गिनाएं और मैं संतुष्‍ट हुआ।

दरअसल, आज पत्रकारिता का आधार हो गया हैं सनसनी। बिना बातों को समझे और उसे पुष्‍ट किए बिना प्रस्‍तुत कर देना। इसे सब कोई जानते होंगे कि प्रायोजिकता के दौर में अव्‍यावसायिक तौर पर मुद्रित सामग्री लोगों तक पहुंचाना, कितना कठिन काम हैं। कुछ नौजवानों द्वारा प्रकाशित 'मीडिया स्‍कैन' के पास महज चार पन्‍ने हैं और कोशिश की जाती है कि श्रेष्‍ठ सामग्री लोगों तक पहुंचे। फिर संपादक का तो विशेषाधिकार होता है संपादन करना।

मैंने जो 'मीडिया स्‍कैन' में अपने विचार प्रस्‍तुत किए थे उसकी अंतिम पंक्ति यहां प्रस्‍तुत करना समीचीन होगा- हिंदी चिट्ठाकारिता बेवजह की सनसनी से मुक्त होकर लोकतांत्रिक रवैया अपनाते हुए समाज में व्याप्त वैचारिक जड़ता को तोड़ने का प्रयास करे।

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम