शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

संवाद 'अच्छे लोगों' से...


डांडी (नवसारी) गुजरात से चम्पारण (बिहार)
यात्रा की दूरी : 1700 किमी
यात्रा का समय: 02 अक्टूबर 2017 से 15 अक्टूबर 2017 तक

वर्ष 2017 गांधी सत्याग्रह के 100 साल पूरे होने का साल है। यह सही समय होगा गांधी को थोड़ा ठहर कर याद करने का। प्रयासपूर्वक गांधी के अनुकरण का। गांधी के लिखे को पढ़ने का। गांधी की तरफ दो कदम लौटने का। सड़क से लेकर मीडिया तक हम जिस शोर से इन दिनों गुजर रहे हैं, हमें पता ही नहीं कि इस शोर से गुजरना एक 'हिंसा' से गुजरने की तरह है। बहरहाल हम बात वर्तमान पत्रकारिता की करें तो यही वजह है कि आज अखबार और टेलीविजन की पत्रकारिता के प्रति समाज में निराशा व्याप्त है। एक आम आदमी के लिए उम्मीद की किरण कहां है, सुबह—सुबह अंधेरे को चिरती धरती पर पसरती वह सूरज की रोशनी कहां है? पुलिस थाने की छवि आज लूट के अडडे की बन गर्इ् है, न्यायालयों की ईंट—ईंट मानों पीड़ितों के शोषण की गवाही दे रही हों, राजनीति से आम आदमी का विश्वास पहले ही हिला हुआ है। शिक्षकों की छवि देश भर में शिक्षा मित्रों ने अनपढ़ों की बना दी है। मानों इस समय पूरी सृष्टि ही मिलकर देश को निराशा में धकेलने के लिए कोई षडयंत्र कर रही हो।
ऐसे समय में लगा कि समाज को इस तपती धूप से बचाने वाला कोई गांधीजी जैसा वटवृक्ष ही हो सकता है और फिर गांधी मार्ग पर डांडी से चंपारण तक एक यात्रा की योजना ऐसे बनी। चम्पारण सत्याग्रह के 100 साल पर यह यात्रा होगी 100 'अच्छे लोग' की पहचान के लिए। अच्छे लोग से मेरा तात्पर्य सिर्फ इतना है कि जिस व्यक्ति के जिम्मे जो काम था, वह काम उसने पूरी शिददत से किया। दिल्ली के हिन्दू कॉलेज के प्राध्यापक डॉ रतन लाल दशरथ माझी के नाम पर एक पुरस्कार देते हैं। इस पुरस्कार को पाने वाले एक अच्छे लोग से मैं मिला। वे एक कॉलेज में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे लेकिन जब तक उन्होंने नौकरी की, एक दिन भी कॉलेज एक मिनट देरी से नहीं पहुंचे। उनका काम कॉलेज का दरवाजा खोलना था, उनके लिए एक शिकायत नहीं थी कि कोई प्राध्यापक या छात्र कॉलेज के दरवाजे पर आया हो और दरवाजा खुला ना मिला हो। मेरी यात्रा के अच्छे लोग वे हैं, जिन्होंने वकालत की तो इस पेशे का मान बढ़ाया, शिक्षक हुए तो छात्रों में पढ़ने के प्रति लगाव बढ़ा, पुलिस वाले हुए तो अपराधियों में खौफ की वजह बने और आम आदमी के मन में विधि व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ा। पत्रकार हुए तो समाज के अंतिम आदमी को लगा कि अब उसकी बात भी सुनी जाएगी। नेता हुए तो उसके दरवाजे पर जाते हुए जनता ने समय नहीं देखा। वे पहुंच गए और जनता की सेवा के लिए नेताजी ने भी कभी घड़ी की तरफ नहीं देखा।
डांडी से चंपारण की राह आप सबके साथ इस उददेश्य के साथ कर रहा हूं कि इस राह में आप किसी 'अच्छे लोग' को जानते हैं तो उनका परिचय हमसे जरूर कराएं। उनका परिचय और कॉन्टेक्ट नंबर हमें वाटसएप करें। या हमें फोन कीजिए। इन दो कामों के लिए एक ही नंबर है— 91 9971598416



जिस रास्ते पर चल कर होगी डांडी से चंपारण की यात्रा पूरी
नवसारी— सूरत — अंकलेश्वर — भरूच — बड़ोदरा— गोधरा — दाहोद — मेघनगर — रतलाम— नागदा — उज्जैन — शाजापुर — सारंगपुर — कुम्भराज— विजयपुर — गुना — अशोक नगर — मुगौली— बीना — ललितपुर — बबिना — झांसी — उरई — काल्पी — पोखरिया — कानपुर — उन्नाव — लखनऊ— बाराबंकी— रूदौली— फैजाबाद— अयोध्या — अकबरपुर— शाहगंज — सरायमिर — आजमगढ़ — मोहम्मदबाद— मऊ— इन्द्रा जंक्शन — बलिया — छपरा — सोनपुर — हाजीपुर — मुजफ्फरपुर — बापूधाम

आप इस यात्रा में कैसे जुड़ सकते हैं—
— इस यात्रा के संबंध में अपने सुझाव देकर
— सोशल मीडिया पर इस संबंध में जानकारी साझा करके
— यात्रा के मार्ग में कुछ अच्छे लोगों का परिचय साझा करके
— जिन व्यक्ति के संबंध में आप जानकारी साझा कर रहे हैं, आपसे अपेक्षा होगी कि आप उनका कॉन्टेक्ट नंबर और उनका संक्षिप्त परिचय साझा करेंगे
— यदि आप इस रास्ते में कहीं मिल सकते हैं, तो वास्तव में आपसे मिलकर प्रसन्नता होगी
— अच्छे लोग की पहचान यात्रा में करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। इस काम में आप हमारी मदद कर सकते हैं।
— इस यात्रा को पूरा करने के लिए धन की आवश्यकता भी होगी। आप ईजी पेय के माध्यम से यात्रा को आर्थिक सहयोग दे सकते हैंं।
— सहयोग की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए आर्थिक सहयोग करने वाले मित्रों की सूचि इस यात्रा के पश्चात प्रकाशित पुस्तिका में करेंगे। इसलिए सहयोग करने वाले मित्रों से निवेदन होगा कि सहयोग के पश्चात अपना नाम और सहयोग की राशि 91 9971598416 पर जरूर एसएमएस कीजिए।

रविवार, 21 अगस्त 2016

शौहर, बेगम और दूसरी पत्नी

'‘बांग्लादेशी भारत में घुस रहे हैं और आदिवासी महिलाओं से शादी कर रहे हैं। केन्द्र और राज्य दोनों के लिए यह चिन्ता का विषय है। खासकर बांग्लादेश से सटे झारखंड के पाकुर, साहबगंज आदि जिलों में ऐसा चलन बढ़ रहा है। पिछले कुछ समय से ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं। इसलिए राज्य सरकार और पुलिस को अपना खुफिया तंत्र अधिक मजबूत करना होगा। जिससे बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोक कर उनकी मंशा पर लगाम लगाया जा सके।’'
सुदर्शन भगत, केन्द्रिय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री, भारत सरकार

झारखंड की आदिवासी महिलाएं राज्य की ताकत हैं। उन्हें अधिकार प्राप्त है। उनका समाज में सम्मान भी है। इन लड़कियों को गैर आदिवासी समाज जो दूसरी और तीसरी पत्नी के तौर पर अपने पास रखता है, उनके हाथों इनका शोषण भी हुआ है। ये गैर आदिवासी वे हैं, जो बाहर से आकर झारखंड में बसना चाहते हैं। झारखंड की सम्पदा पर कब्जा चाहते हैं। एक खास धर्म के लोगों को इस देश में एक से अधिक बेगम रखने की इजाजत है। उन लोगों ने अपने धर्म की इस कमजोरी का लाभ उठाकर एक एक पुरुष ने कई-कई स्त्रियों से शादी की। इस शादी की आड़ लेकर उन्होंने झारखंड की संपत्ति और संपदा पर कब्जा किया। साथ में आदिवासी लड़कियों का शारीरिक और आर्थिक शोषण भी किया। रांची के माडर से लेकर लोहरदगा तक बांग्लादेशी घुसपैठियों ने बड़ी संख्या में इस तरह की शादी की है। इतना ही नहीं इन शादियों में क्रिश्चियन बनी आदिवासी लड़कियों ने दूसरी और तीसरी पत्नी बनकर गैर आदिवासी पुरुषों से अधिक संख्या में शादी की है लेकिन किसी फादर या कॉर्डिनल ने इस संबंध में छोटा सा बयान भी नहीं दिया। लेकिन अब आदिवासी समाज जग रहा है और बेगम जमात की चालाकियों को खूब समझ रहा है। वह इस बदमाशी को अधिक समय तक आने वाले दिनों में बर्दाश्त करने वाला नहीं है।
पद्मश्री अशोक भगत, विकास भारती

समाज किसी का हो, दो पत्नी रखना सही नहीं ठहराया जा सकता। क्या तीन पत्नी रखने वाले अपनी तीनों पत्नियों को दो-दो और पत्नी रखने की इजाजत देंगे?
अमिता मुंडा, आदिम जाति सेवा मंडल

झारखंड में दूसरी या तीसरी पत्नी बनकर गैर आदिवासियांे के परिवार में जो लड़कियां जा रहीं हैं, उनमें ध्यान देने वाली बात यह है कि उन लड़कियों में अधिकांश कामकाजी लड़कियां हैं। वह अपनी आमदनी से अपने पति को भी मदद करती हैं। इन कामकाजी लड़कियों में आदिवासी क्रिश्चियन लड़कियों की संख्या अधिक है। जो दूसरी या तीसरी पत्नी बनकर जा रहीं हैं।
दिवाकर मिंज, प्राध्यापक, रांची विवि

रांची राजमार्ग से तीन किलोमीटर अंदर की तरफ जाने पर इटकी प्रखंड आता है। मुख्य सड़क से अंदर जाने का रास्ता कच्चा-पक्का है। जब आप इटकी में दाखिल होते हैं, बायीं तरफ लड़कियों का एक मदरसा है। इस मदरसे को देखकर आप अनुमान करते हैं कि यह प्रखंड स्त्रियों के अधिकार को लेकर जागरूक प्रखंड होगा। इसी प्रखंड में एक घर है परवेज आलम (काल्पनिक नाम) का। परवेज शादी शुदा पुरुष हैं लेकिन शादी इन्होंने एक बार नहीं तीन बार की है। इनके घर में पत्नी के तौर पर तीन औरतें रहती हैं। पहली शकीना खातून (काल्पनिक नाम) और बाकि दो औरतें आदिवासी हैं। दूसरी रंजना टोप्पो (काल्पनिक नाम) और तीसरी मीनाक्षी लाकड़ा (काल्पनिक नाम)। इटकी के आस-पास के लोगों से बातचीत करते हुए यह अनुमान लगाना आसान था कि परवेज का मामला अकेला नहीं है, इटकी प्रखंड में। इस तरह के कई दर्जन मामले हैं, जिसमें एक से अधिक शादी हुई है और गैर आदिवासी समाज से आने वाले पुरुष ने एक से अधिक शादी में कम से कम एक पत्नी आदिवासी स्त्री को रखा है। अपने अध्ययन में यह बात साफ तौर पर नजर आई कि दूसरी और तीसरी आदिवासी पत्नी चुनते हुए गैर आदिवासी पुरुष ने इस बात को प्राथमिकता दी है कि आदिवासी लड़की कामकाजी होनी चाहिए। आदिवासी युवति नर्स या शिक्षिका हो तो वह वह गैर आदिवासी पुरुष की पहली पसंद होती है।
झारखंड की सामाजिक कार्यकर्ता वासवी कीरो जो लम्बे समय से आदिवासी मुद्दों पर काम कर रहीं हैं, बताती हैं कि इस तरह की कामकाजी आदिवासी लड़कियों के लिए गैर आदिवासी युवकों के बीच एक शब्द इस्तेमाल होता है, बियरर चेक। वास्तव में कामकाजी महिलाएं उनके लिए बियरर चेक ही तो होती है, जो दूसरी या तीसरी पत्नी बनकर सेक्स की भूख मिटाती हैं और साथ-साथ हर महीने पैसे देकर पेट की भी।
वासवी पन्द्रह साल पहले अपने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहती हैं- 15 साल पहले हम लोगों ने एक अध्ययन किया था लेकिन चीजें अब भी प्रासंगिक हैं। जिन परिवारों में आदिवासी लड़की थी, दूसरी, तीसरी पत्नी बनकर, हमने पाया कि उन परिवारों में आदिवासी लड़की को वह महत्व नहीं मिल पा रहा है, जो परिवार में मौजूद गैर आदिवासी पत्नी को हासिल था। वासवी के अनुसार सीमडेगा, लोहरदगा और गुमला में बड़ी संख्या में इस तरह के मामले उन्हें देखने को मिले।
इस तरह की घटनाओं को सुनकर कम से कम झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता नहीं चौंकते क्योंकि समाज के बीच में काम करते हुए उनका सामना प्रति दिन ऐसे मामलों से होता है, जिसमें एक से अधिक शादियां हों और गैर आदिवासी परिवार में एक से अधिक शादियों में कम से कम एक आदिवासी लड़की हो। आम तौर पर इन आदिवासी लड़कियों की स्थिति परिवार में दोयम दर्जे की ही होती है।
नफीस से मेरी मुलाकात इटकी प्रखंड में हुई थी। नफीस मानते हैं कि इटकी में इस तरह की शादियां बड़ी संख्या में हुई है। नफीस इस तरह की शादियों को सही नहीं ठहराते। नफीस के मित्र हैं, अभय पांडेय। पांडेय के अनुसार - गैर आदिवासी युवकों द्वारा आदिवासी लड़कियों को दूसरी अथवा तीसरी पत्नी बनाने की घटनाएं बड़ी संख्या में है। लेकिन यह बताना भी नहीं भूलते कि इस मामले में इटकी में कोई बात करने को तैयार नहीं होगा।
जब उनसे पूछा कि ऐसा क्यों है? कोई बात करने को क्यों तैयार नहीं होगा? तो पांडेय इशारों-इशारों में बताते हैं कि जहां हमारी बातचीत हो रही है, वह मुस्लिम मोहल्ला है। यहां इस तरह की संवेदनशील बातचीत से खतरा हो सकता है। पांडेय यह सलाह देना नहीं भूलते कि प्रखंड कार्यालय से दो किलोमीटर दूर एक पिछड़ी जाति से ताल्लूक रखने वाले व्यक्ति से मिलना सही होगा। जिन्होंने दो आदिवासी महिलाओं से शादी की है। पांडेय दो किलोमीटर दूर वाले परिवार से मिलवाने की जिम्मेवारी नफीस साहब को देकर किसी जरूरी मीटिंग का बहाना बनाकर निकल लेते हैं।
यदि एक पुरुष और एक स्त्री धर्म जाति की परवाह किए बिना आपस में प्रेम करते हैं और शादी का निर्णय लेते हैं तो समाज को उसे स्वीकार करना ही चाहिए। लेकिन यदि यही प्रेम एक से अधिक स्त्रियों के साथ हो और इन सभी स्त्रियों को कोई एक व्यक्ति पत्नी बनाने की ख्वाहिश रखे तो क्या इसे प्रेम माना जाएगा? यह हवश है या कोई बड़ा गोरखधंधा। बताया जाता है कि इस्लाम में एक से अधिक शादी की इजाजत है लेकिन इस इजाजत के साथ जिन शर्तों का जिक्र है, उस पर कभी समाज में चर्चा नहीं हो पाती। ना उस पर अमल एक से अधिक शादी करने वाला शौहर कभी करता है। अब सवाल यह है कि फिर इस तरह के कानून की समाज में जरूरत ही क्या है? एक-एक पुरुष को शादी के लिए एक से अधिक स्त्री क्यों चाहिए?
अमिता मुंडा आदिम जाति सेवा मंडल से जुड़ी हुई हैं। अमिता के अनुसार- समाज में कोई भी धर्म हो, दो पत्नी रखना उचित नहीं है। दो पत्नियों के साथ बराबर का रिश्ता नहीं रखा जा सकता। क्या तीन पत्नी रखने वालों की तीनो ंपत्नियां दो-दो पति और रखने की इजाजत मांगे तो क्या तीन पत्नी रखने वाला पति तैयार होगा?
अमिता रांची स्थित हिंद पीढ़ी का जिक्र करते हुए कहती हैं कि आप वहां चले जाइए, इस तरह का बहुत सा मामला आपको देखने को मिलेगा।
एक से अधिक विवाह के संबंध में अपने अध्ययन के दौरान इंडिया फाउंडेशन फॉर रूरल डेवलपमेन्ट स्टडिज ने पाया कि रांची के आसपास के जिलों को मिलाकर ऐसे एक हजार से अधिक मामले इस क्षेत्र में मौजूद हैं। इस स्टोरी पर काम करते हुए ऐसे रिश्तों की जानकारी मिली जिसमें आदिवासी लड़की को दूसरी या तीसरी पत्नी बनाकर घर में रखा गया है। परिवार में साथ रहने के बावजूद स्त्री को पत्नी का दर्जा हासिल नहीं है। समाज इन्हें पत्नी के तौर पर जानता है लेकिन उन्हें पत्नी का कानूनी अधिकार हासिल नहीं है। कई मामलों में उन्हें मां बनने से रोका गया। आदिवासी लड़की, गैर आदिवासी परिवार में सिर्फ सेक्स की गुड़िया की हैसियत से रह रही है। यदि एक पुरुष एक स्त्री के साथ बिना शादी किए एक घर में रहता है और उसके साथ शारीरिक संबंध भी बनाता है तो इसे आप लिव इन रिलेशन कह सकते हैं लेकिन दो शादियों के बाद घर में तीसरी औरत को रखना और उसे पत्नी का कानूनी अधिकार भी ना देने को आप क्या नाम देना चाहेंगे? इस रिश्ते का कोई तो नाम होगा?
झारखंड के आदिवासी समाज में अशोक भगत लंबे समय से काम कर रहे हैं। उनकी संस्था विकास भारती आदिवासियों के बीच एक जाना पहचाना नाम है। अशोक भगत शोषण की बात स्वीकार करते हुए कहते हैं- एक खास धर्म के लोगों को एक से अधिक बेगम रखने की इजाजत है। उन लोगों ने अपने धर्म की इस कमजोरी का लाभ उठाकर एक-एक पुरुष ने झारखंड में कई-कई शादियां की हैं। आम तौर पर ये लोग झारखंड के बाहर से आए हैं और आदिवासी लड़कियों को दूसरी, तीसरी पत्नी बनाने के पिछे इनका मकसद झारखंड के संसाधनों पर कब्जा और इनके माध्यम से झारखंड में राजनीतिक शक्ति हासिल करना भी है। पंचायत से लेकर जिला परिषद तक के चुनावों में आरक्षित सीटों पर इस तरह वे आदिवासी लड़कियों को आगे करके अपने मोहरे सेट करते हैं। वास्तव में आदिवासी समाज की लड़कियों का इस तरह शोषण आदिवासी समाज के खिलाफ अन्याय है। अशोक भगत बताते हैं- रांची के मांडर से लेकर लोहरदग्गा तक और बांग्लादेशी घुसपैठियों ने पाकुड़ और साहेब गंज में बड़ी संख्या में इस तरह की शादियां की हैं।
श्री भगत इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि जब इतनी बड़ी संख्या में क्रिश्चियन आदिवासी लड़कियां दूसरी और तीसरी पत्नी बनकर गैर आदिवासियों के पास गई हैं लेकिन कभी चर्च ने या फिर कॉर्डिनल ने इस तरह की नाजायज शादी के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला। श्री भगत उम्मीद जताते हुए कहते हैं- आदिवासी समाज बेगम-जमात की चालाकियों को समझ रहा है। मुझे यकिन है कि आदिवासी समाज इन मुद्दों पर जागेगा। आने वाले दिनों में विरोध का स्वर उनके बीच से ही मखर होगा।
गैर आदिवासी पति के नाम को छुपाने का मामला भी झारखंड में छुप नहीं सका है। ऐसी आदिवासी महिलाएं जिनका इस्तेमाल आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ाने में गैर आदिवासी करते हैं, अच्छी संख्या में हैं। इन महिलाओं से चुनाव का फॉर्म भरवाते समय इस बात का विशेष ख्याल रखा जाता है कि वह अपने पति का नाम फॉर्म में ना भरे। इस तरह आदिवासी पिता का नाम आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ने वाली यह आदिवासी महिलाएं लिखती हैं। पति का नाम फॉर्म में नहीं लिखा जाता है। ऐसा एक मामला इन दिनों रांची में चर्चा में है। जिसमें एक विधायक प्रत्याशी ने आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ा जबकि उसका पति मुस्लिम समाज से आता है।
आदिवासी विषय के अध्ययेता रांची विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दिवाकर मिंज मानते हैं कि दूसरी या तीसरी पत्नी बनकर शादी में जाने वाली आदिवासी लड़कियां आम तौर पर, पढ़ी-लिखी, कामकाजी और क्रिश्चियन होती हैं।
झारखंड में एक दर्जन से अधिक सामाजिक संगठनों ने माना कि इस तरह की घटनाएं झारखंड में हैं, जिसमें एक से अधिक शादियां हुई हैं और इस तरह की शादियों में शोषण आदिवासी लड़कियों का हुआ है। सभी सामाजिक संगठनों ने इस तरह की शादियों को सामाजिक बुराई बताया। एक से अधिक शादी को आप चाहे जो नाम दे दें लेकिन इस तरह की शादियों को आप प्रेम विवाह नहीं कह सकते। अब समय आ गया है जब इस तरह की शादियों पर पाबंदी की मांग समाज से उठे और एक से अधिक शादियों पर कानूनी तौर पर पूरी तरह प्रतिबंध लगे। धर्म, जाति और क्षेत्र की परवाह किए बिना। यह सही समय है, जब हम सब समाज से इस बुराई को खत्म करने के लिए आवाज बुलन्द करें।

रविवार, 8 नवंबर 2015

जीता महागठबंधन - क्यों ‘हारा’ बिहार

सीता की जन्मभूमि ये बिहार, गांधी की कर्मभूमि ये बिहार, 
सम्राट अशोक की शक्तिभूमि-धर्मभूमि ये बिहार-ये बिहार।
वाल्मिकी ने रची रामायण, लव कूश को जाने संसार
ये है मेरा बिहार हां ये मेरा बिहार

ई टीवी के दर्शक इस बिहार गीत से जरूर परिचित होंगे। यह गीत किसी भी बिहारी को गौरवान्वित करता है। लेकिन क्या 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के जो परिणाम आए हैं, उसके बाद ऐसा नहीं लग रहा है कि यह जीत महागठबंधन की है लेकिन बिहार हार गया।
लालू प्रसाद के जंगलराज की वजह से ही बिहार से पलायन बढ़ा। बिहारी संबोधन को गाली बना देना लालूराज की एक बड़ी देन है बिहार को। उसी जंगलराज के खिलाफ नीतीश कुमार को बिहार की जनता ने चुना। उनके काम काज की वजह से ही उन्हें पूरे देश ने सुशासन बाबू के तौर पर स्वीकार किया। लेकिन यह कॉकटेल किसकी समझ में आ सकता था कि सुशासन बाबू और जंगलराज के मुखिया सत्ता के लिए मिल सकते हैं। यह राजनीति है यहां ना कोई परमानेन्ट दुश्मन है और ना दोस्त। यदि कल को नीतीश और भारतीय जनता पार्टी फिर मिल जाएं तो आश्चर्य ना कीजिएगा। 
वास्तव में यह सब इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि बिहार में नई सरकार की जीत को सभी सेलीब्रेट कर रहे हैं। ऐसे समय में हमें बिहार की हुई हार को नहीं भूलना चाहिए। इस चुनाव के बाद बीजेपी गठबंधन की जीत भी होती तो भी बिहार की हार होती। 
यह पूरा चुनाव लड़ा किन मुद्दों पर गया है? गाय, अखलाक जैसे मुद्दे। शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा जैसे मुद्दों की मानों किसी को सुध ही नहीं थी। भारतीय जनता पार्टी को यह नहीं भूलना चाहिए कि साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण के मास्टर इस देश में धर्म निरपेक्षता के पैरोकार हैं। उन्होंने पिछले साठ से अधिक सालों में देश में हिन्दू विरोधी माहौल ही बनाया है। तस्लीमा भी कहती है कि भारत में धर्म निरपेक्षता का अर्थ मुस्लिम तुष्टीकरण है। देश में सरकार किसी भी पार्टी की बनती हो, ध्रूव दो ही हैं। एक भारतीय जनता पार्टी और दूसरी भारतीय जनता पार्टी विरोधी। यह स्थिति उस समय भी थी जब पार्टी के खाते में गिनती के सांसद होते थे। 
नरेन्द्र मोदी की जीत की बड़ी वजह 2014 में यही थी कि उन्होंने धर्म और जाति को चुनाव का मुद्दा नहीं बनने दिया। बिहार चुनाव में अखलाक की मौत और असहिष्णुता के नाम पर जो माहौल देश में बनाया गया और उससे जिस तरह महागठबंधन को फायदा मिला, उससे संदेह यही होता है कि कथित हिन्दू संगठन को पैसे देकर खड़ा तो नहीं किया गया था। पैसों के दम पर यह कर पाना बहुत मुश्किल काम नहीं है आज के समय में।
जगत झा ने सही लिखा है बिहार के चुनाव का विश्लेषण करते हुए कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेता नरेन्द्र मोदी के चुनावी सभाओं की तैयारी में लगे रहे। जमीनी कार्यकर्ताओं की बात नेतृत्व तक पहुंच ही नहीं पाई। वास्तव में केन्द्रिय नेतृत्व के भरोसे विधायकी का चुनाव नहीं जीता जाता। क्षेत्रीय नेतृत्व को उभरने नहीं दिया गया। 
कहा यह भी जा रहा है कि अमित शाह ने गुजरात के चुनाव की तरह बिहार के चुनाव को लड़ा। चुनाव की नीति में स्थानीय नेताओं से समन्वय पर अध्यक्षजी का प्रबंधन हावी रहा। वास्तव में यह चुनाव अपने रंग रूप से भारतीय जनता पार्टी गठबंधन के राष्ट्रीय नेता बनाम महागठबंधन के क्षेत्रीय नेता हो गया था। अमित शाह बिहार को और बिहार की राजनीति को सही प्रकार से नहीं समझते और लालू प्रसाद-नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के पुराने उस्ताद हैं। 
बिहार के स्थानीय नेताओं को हासिए पर डाल कर बिहार फतह कैसे किया जा सकता है? सिन्हा साहब और सिंह साहब की नाराजगी चुनाव प्रचार के दौरान ही मीडिया में आ गई थी। उसके बाद भी इसे गम्भीरता से नही लिया गया। 
बिहार चुनाव 2015 एक ऐसी हारी हुई बाजी बनती गई अन्तिम चरण के चुनाव तक, जिसमें जीत की कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी।
वैसे नीतीश-लालू गठबंधन के सामने चुनौतीयां कई है। आने वाले पांच साल आसान नहीं है। खबर यह भी आ रही है कि नीतीश और लालू मिलकर नई पार्टी बनाएंगे। आने वाले सालों में नीतीश केन्द्र की राजनीति के लिए तैयार किए जाएंगे और लालूजी के दोनों लाल बिहार पर राज करने की तैयारी करेंगे।

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

किताब वापसी अभियानः ‘विरोध’ के स्वर को कौन दबा रहा है

देश में इस तरह का माहौल बनाने की कोशिश की गई मानो इस वक्त देश में कानून का शासन ना रह गया हो। असहिष्णुता जैसा एक शब्द उन लोगों द्वारा चुन कर लाया गया जो सरकार पर दबाव बनाना चाहते थे। ये सभी वह लोग हैं जो नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही यह घोषणा कर चुके थे कि यदि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो देश की सहिष्णुता खतरे में पड़ जाएगी। उनके इस विरोध को जनता ने अधिक तवज्जो नहीं दिया।
 इस वक्त मीडिया में इन मुट्ठी भर लोगों ने ऐसा माहौल बना दिया है, मानों पूरा देश वास्तव में किसी असहिष्णुता शिकार है। यहां हम उन लेखकों और बुद्धिजीवियों के नाम आपके साथ साझा कर रहे हैं, जो इस बात से सहमत नहीं हैं कि देश में साम्प्रदायिक सद्भाव कम हुआ है। समाज में किसी तरह की दूरी है। आप मित्रो से अपील है कि समाज को तोड़ने वालों के साथ नहीं बल्कि उन लोगों के साथ जुड़िए जो समाज को जोड़ना चाहते हैं। (यहां दिए गए नाम वरियता के क्रम में नहीं हैं) -

01. अनुपम खेर
02. गोपाल दास नीरज,
03. विवेकी राय
04. मनु शर्मा
05. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
06. डॉ नामवर सिंह
06. नरेन्द्र कोहली
07. गोविन्द मिश्र
08. विनोद शुक्ल
09. चित्रा मुद्गल
10. नरेन्द्र कोहली
11.कमल किशोर गोयनका
12. मृदुला गर्ग
13. तेजेन्द्र शर्मा
14. गिरीश पंकज
15. अशोक चक्रधर
16. सुधीश पचौरी
17. तेजेन्द्र शर्मा
18. आशीष कुमार ‘अंशु’
19. वेद प्रताप वैदिक
20. तवलीन सिंह
21. मनमोहन शर्मा
22. राजीव रंजन प्रसाद
23. डा दिलीप अग्निहोत्री
24. मृत्युंजय दीक्षित
25. डॉ मयंक चतुर्वेदी
26. संदीप देव
27. सुरेश चिपलूनकर
28. डा. अरूण भगत
29. सुधांशु त्रिवेदी
30. संजीव सिन्हा
31.तरुण विजय
32. हितेश शंकर
33. बलबीर पूंज
34. अरुण जेटली
35. अनिल पांडेय
36. चेतन भगत
37. हर्षवर्द्धन त्रिपाठी
38. प्रसून जोशी
39. व्यालोक पाठक
40. शिवानंद द्विवेदी सहर
41. डॉ सौरभ मालवीय
42. हरीश चंद्र वर्णवाल
42. हरगोविंद विश्वकर्मा
43. शिवशक्ति बख्शी
44. आभा खन्ना
45. पवन श्रीवास्तव
46. स्वामी आदित्य चैतन्य
47. अनुज अग्रवाल
48. डॉ प्रवीण तिवारी
49. कुलदीपचंद अग्निहोत्री
50. पश्यंति शुक्ला
51. राजीव सचान
52. प्रभु जोशी
53. डॉ जयकृष्ण गौड़
54. प्रमोद भार्गव
55. संजय द्विवेदी
56. अवधेश कुमार
57. अकांक्षा पारे
58. दिनेश मिश्र
59. संजय बेंगानी
60. आदर्श तिवारी
61. समन्वय नंद
62. पंकज झा
63. अकांक्षा अनन्या
64. अरुण कुमार जैमिनी
65. सुबोध के श्रीवास्तव
66. विक्की सैनी
67. संजीव कुमार
68. सुभाष चंद्र
69. निशांत नवीन
70. सुभाष शुक्ला
71. मनुकांत दीक्षित
72. मदन मोहन समर
73. आलोक राज
74. रामजी बाली
75. डॉ अविनाश सिंह
76. तारिक अनवर
77. नरेश कुमार चतुर्वेदी
78. वीनू कुमार वर्मा
79. प्रदीप अरोड़ा
80. दीपक झा
81. धीरज कुमार झा
82. अभय कुमार गुप्ता
83. कुणाल श्रीवास्तव
84. श्वेतांक रतनाम्बर
85. नागेन्द्र कौशिक
86. विवेक श्रीवास्तव
87. अशोक एस उपध्याय
88. गोपाल कुमार झा
89. विशाल भटनागर
90. सविता राज हिरेमठ
91. पंडित हरी प्रसाद चौरसिया
92. मधुर भंडारकर
93. विवेक अग्निहोत्री
94. विद्या बालन
95. एस एल भयरप्पा
96. श्याम बेनेगल
94 कमल हसन
95. अनूप जलोटा
96. मनिष मुन्द्रा
97. पंडित चेतन जोशी
98. दया प्रकाश सिन्हा
99. नरेश शांडिल्य
100. अमिष त्रिपाठी
101. चिदानंद मूर्ति
102. पाटिल पूतप्पा
103. पी वलसारा
104. यूए खादर
105. पी नारायण कुरुप
106. रवीना टंडन
107. विकास सिन्हा
108. सुदर्शन पटनायक
109. जी माधव नायर
110. हरीश चन्द्र वर्मा
111. प्रियदर्शन
112. अक्कीतम
113. एस रमेशन नायर
114. जी श्रीदत नायर
115. पी परमेश्वरन
116. थुरावूर विश्वम्बरन
117. प्रो मेलाथू चन्द्रशेखरन
118. के बी श्रीदेवी
119. सुरेशगोपी
120. मेजर रवि
121. अलप्पा रंगनाथ
122. जया विजया
123. विशेष गुप्ता
124. फिरोज बख्त अहमद
125. सुधांशु रंजन
126. उमेश चतुर्वेदी
127. भवदीप कांग
128. अनंत विजय
129. शोबरी गांगूली
130. हरीश कुमार
131. चन्द्रकांत प्रसाद सिंह
132. अशोक ज्योति







शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

कोई यह खत रवीश कुमार तक पहुंचा दे





रवीशजी कुमार,
आपको यह पत्र लिखने का आयडिया आपके पत्रों को पढ़कर आया। यह सोचकर लिख रहा हूं कि पत्र लिखने वाले को पत्र की कद्र होगी। आपको अपने लिखे किसी खत का जवाब नहीं मिला, लेकिन आप इस खत का जवाब देंगे। ऐसा मैं सोच रहा हूं।
मुझे याद है कि रवीश की रिपोर्ट का किस तरह एक समय इंतजार रहता था। रवीश की रिपोर्ट के साथ बड़े हो रहे पत्रकारिता के छात्रों के समूह में एक विद्यार्थी मैं भी था। आपकी रिपोर्ट की वजह से उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे और दलितों/ वंचितों के पक्ष में हमेशा खड़े रहे रिंकू राही से मिला और महाराष्ट्र में डिक्की वाले मिलिन्द काम्बले से। आपकी रिपोर्ट ने मुझे इनसे मिलने के लिए प्रेरित किया।
अचानक एक दिन एनडीटीवी का एक होर्डिंग नजर आया। यह होर्डिंग दिल्ली में चिड़िया घर और लोदी रोड़ के आस-पास कहीं लगा था, जिसका दावा यह था कि रवीश कुमार हिन्दी के नम्बर वन पत्रकार हैं। जबकि इस तरह का दावा यह होर्डिंग किस आधार पर कर रही थी, इसका उल्लेख पूरे होर्डिंग में कहीं नहीं था। जबकि मेरी जानकारी में रवीश की रिपोर्ट की टीआरपी भी अच्छी नहीं थी। जिसका रोना गाहे बगाहे आप भी रोते ही रहे हैं। 
हमे नम्बर से इतना प्रेम क्यों हैं रवीशजी? मैने जब आपको गांव और दलितों की कहानी करते देखा था तो सोचा था कि आपको नम्बर से प्रेम नहीं है। आप नम्बर के खेल से बाहर हैं। इसलिए आप प्रिय रहे हैं लेकिन आप भी नम्बर से प्रेम करने लगे। मेरा अपना अनुभव इस नम्बर गेम को लेकर अच्छा नहीं है। रवीश अगर एक ब्रांड है, जिसे एनडीटीवी बेच रहा है अच्छे पैकेजिंग के साथ तो यह उसकी मार्केटिंग पॉलिसी है, लेकिन रवीश कुमार इस सबके बावजूद अपने अंदर के रवीश कुमार को बचाए रखें, यह तो रवीश की जरूरत थी। लेकिन महानता के इस खेल के शिकार होते हुए आप प्राइम टाइम एंकर की नई भूमिका में नजर आए। जहां आप एंकर कम अपने पैनल के ‘पापा’ की भूमिका में अधिक थे। 
रवीशजी जबसे आपको मैने टीवी चैनल पर देखा है, आप सिर्फ सवाल पूछते हुए नजर आए हैं। कभी यह नहीं सोचा जो आपको देख रहे हैं, उनके अंदर भी बहुत से सवाल हैं। यही लोग जब आपसे सवाल पूछते हैं, आप झट से उन्हें गुंडा कह देते हैं। जब आप कहते हैं कि आपको मां बहन के नाम पर अपशब्द लिखा जा रहा है और यह हिन्दूवादी ताकतें या नरेन्द्र मोदी के पेड एजेन्ट कर रहे हैं तो एक पत्रकार होने के नाते आपको इस बात का प्रमाण भी देना चाहिए था। ना कि अन्ना हजारे के अभियान की तरह अभियान पर सवाल उठाने वाले हर एक शख्स को भ्रष्टाचारियों के पाले में डाल देना चाहिए। आप फेसबुक पर रहें या ना रहें लेकिन बुश की तरह यह घोषणा तो करते हुए विदा ना हों कि जो हमारे खिलाफ है वह आतंकवाद के साथ है। 
इंदिरा गांधी के समय भारत के लोग कहते थे कि इंदिरा नहीं रहेंगी तो यह देश कैसे चलेगा? आप भी कहीं इसी तरह के किसी भ्रम के साथ फेसबुक और ट्यूटर पर मौजूद तो नहीं थे?
एक साहित्यकार ने यह किस्सा मुझे सुनाया था कि जब उसकी जान खतरे में थी, उसने आपको फोन किया था। यह वह समय था, जब दिल्ली निर्भया मामले की वजह महिला सुरक्षा के अलग-अलग सवालों से जुझ रही थी, ऐसे समय में एक पत्रकार के नाते और इंसान के नाते जब आपको उसकी मदद करनी चाहिए थी, आपने कहा कि आप इस तरह की खबरों का लोड नहीं लेते। रवीशजी कुमार यही बात फोन पर एक पीड़िता को विजयजी गोयल, विजयजी जॉली या विजयकुमरजी मल्होत्रा ने कही होती तो आप उनसे किस किस्म के सवाल पूछते? एक बार उन्हीं संभावित सवालों के जवाब आप देना पसंद करेंगे? या -जवाब देने की सारी जिम्मेवारी राजनेताओं की है और पत्रकार सिर्फ सवाल पूछने के लिए पैदा होते हैं- इस तरह की राय में आप यकिन रखते हैं। 
रवीश बंगाल में एक चर्च में एक बुजूर्ग महिला के साथ बलात्कार की खबर आई थी। आपके मित्र और जनसत्ता के पूर्व संपादक ओमजी थानवी ने खुर्शीद अनवर कथित बलात्कार मामले में कहा था कि जब तक बलात्कारी के नाम की पुष्टी ना हो, आप मामले में कथित लगाइए। जबकि रवीशजी कुमार बंगाल चर्च की उन बुजूर्ग महिला के मेडिकल रिपोर्ट को पढ़े बिना आपने मामले को बलात्कार का मामला बताया। दूसरी बात आपने उस मामले के लिए दोषी हिन्दूवादी संगठनों को बताया। बाद में बंगाल में हुई उस घटना में कुछ मुस्लिम युवक गिरफ्तार हुए और आपकी माफी आज तक नहीं आई। 
प्राइम टाइम में दिखने वाला आपका अहंकार ही है जो आपकी आलोचना करने वाले हर एक व्यक्ति को आपकी नजर में ‘गुंडा’ बना देता है। इसी वजह से इन दिनों आपकी रिपोर्ट में वह धार भी नजर नहीं आती जो पुराने रिपोर्ट में हुआ करती थी। मुझपे यकिन ना कीजिए, अपनी ही रिपोर्ट की पुरानी फूटेज देखिए। 
जब एक राजनीतिक दल में हुई किसी घटना के लिए पूरी पार्टी जिम्मेवार होती है, ठीक इसी प्रकार एनडीटीवी पर उठ रहे सवालों से आप यह कहकर नहीं बच सकते कि आप वहां नौकरी करते हैं। चाहे वह कोका कोला के साथ मिलकर चलाया जा रहा कार्यक्रम हो या फिर बरखा दत्त से जुड़े सवाल। या फिर वेदांता से चैनला की मित्रता या फिर आपके द्वारा खुद को इस तरह पेश किया जाना मानों पूरी पत्रकारिता को आपने ही बचा कर रखा हो। इन सवालों के जवाब सार्वजनिक मंच पर आकर देने से आप क्यों बच रहे हैं? मीडिया स्कैन के मंच पर मैं आपको न्योता देता हूं। आइए। यकिन दिलाता हूं, पूरी बातचीत में कोई आपके लिए अपशब्द का इस्तेमाल नहीं करेंगा। वर्ना रोज रोज सवाल पूछते पूछते कहीं आपके साथ ऐसा ना हो कि आप जवाब देना ही भूल जाएं। 
बहरहाल रवीशजी, हिन्दी की पत्रकारिता की आप चिन्ता ना कीजिए। आप नहंी होंगे, कोई और होगा। आपके ही चैनल में रवीश रंजन ने बुंदेलखंड से और हृदयेश जोशी ने असम से बेहतरीन रिपोर्ट की। आपने भी देखी ही होगी। उनके मुकाबले पिछले दिनों आई आपकी रिपोर्ट कमजोर थी। बिना होमवर्क किए एक मोहल्ले में एक व्यक्ति को साथ लेकर जाना। वहां से फूटेज इकट्ठा करके आधा घंटे का प्रोग्राम बना देना। पिछले दिनों अपने रिपोर्ट में यही आपने किया। शायद आपको लगता है कि आप सेलिब्रिटी एंकर हैं और आप जो भी पड़ोस देंगे देखने वाले उसे वाह वाह करके देख लेंगे। रवीशजी आप गलत सोचते हैं, देखने वाले आपको पहले इसलिए पसंद करते थे क्योंकि पहले आप अपनी रिपोर्ट पर होमवर्क करते थे। 
अंत में फेसबुक और ट्वीटर से जाना किसी समस्या का समाधान नहीं है। इसलिए लौट आइए और सवाल पूछते हैं तो जवाब देने का भी हौसला रखिए। बाकि जो है सो हइए है...

 आपके रवीश की रिपोर्ट का नियमित दर्शक
आशीष कुमार ‘अंशु’



रविवार, 21 जून 2015

नई सरकार में क्यों हैं पावरफूल ‘गर्भस्थ स्वयंसवेक’?

नई सरकार बनने के बाद कई सारी कहानियां भी एक के बाद एक करके बन रहीं हैं। खबर तो अखबार और पत्रिकाओं में छप जाती है लेकिन कहानियां, इसे तो कोई भी नहीं छापता और यह कहानियां ना छपती हैं और ना दर्ज हो पाती हैं। वैसे इन कहानियांे को भी दर्ज होना चाहिए, जिसके बाद आने वाले समय में विचारधारा के साथ खड़े होने वाले नए रंगरुटों को उस धूर्तता का भी पता चले जो उसके पूर्ववर्ती करके गए हैं।
यूं तो यह कहानी नई सरकार और एक व्यक्ति के पुरानी वैचारिक प्रतिबद्धता के प्रति बरते जाने वाली धूर्तता की है। लेकिन सच तो यह है कि यह व्यक्ति की नहीं, प्रवृति की कहानी है। 
नरेन्द्र कई दिनों से नए वाले गृहमंत्री के घर और दफ्तर के चक्कर लगा रहे हैं। सुनने वाले बता रहे थे कि नई सरकार में उनकी कोई बात पक्की होनी है। नरेन्द्र की कहानी से पहले उनका थोड़ा सा परिचय। नरेन्द्र आईसा के साथ कॉलेज राजनीति में सक्रिय थे। बाद के दिनों में प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रमों में भी देखे जाते रहे हैं। स्वभाव से कवि हैं। बाबरी मस्जिद के गिरने को वे यूपीए की सरकार में विश्व इतिहास का सबसे काला दिन मानते थे। एनडीए सरकार के आन के बाद वह बाबरी मस्जिद को राम जन्मभूमि कहना पसंद करते हैं, चूंकि अब तक इस बयान का दस्तावेजीकरण नहीं हुआ है, इसलिए प्रमाण के अभाव में उस संज्ञा के जिक्र को प्रामाणिक ना माना जाए। देश में किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक तनाव के पीछे यूपीए काल में वे आरएसएस का हाथ देखते थे। एनडीए सरकार में उनका नजरिया बदल चुका है, जिसका जिक्र यहां नहीं किया जा रहा, कारण- ऊपर बताया गया है। उनकी एक कविता है, 
‘कौव्वा उड़ा मंदिर से और जा कर बैठा मस्जिद पर, ब्राम्हणवादी ताकतों ने कह कर धर्मान्तरण,
पूरे शहर में करा दिया दंगा। 
नीक्कर पहन के आ गए दंगाई, पुलिस वाला भी ना ले सका जिनसे पंगा।’
नरेन्द्र के परिचय के साथ अंिभ का परिचय कराना भी जरूरी है। जिनका इन्काउंटर गृहमंत्री के घर पर नरेन्द्र से हुआ और यह पूरी कहानी बनी। अंिभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हैं। दिल्ली में रहकर विद्यार्थी परिषद की राजनीति की। विश्व हिन्दू परिषद का दायित्व दो साल पहले तक उनके पास था। नई सरकार में ‘जायजा मंत्रालय’ उनके पास है। वे एक के बाद एक मंत्रालय का जायजा लेते रहते हैं। इस महती जिम्मेवारी को उठाने का संकल्प उन्होंने खुद अपने ऊपर ले रखा है। दिल्ली के हर एक मंत्रालय की छोटी बड़ी खबर आप उनसे पा सकते हैं। अंिभ को एक बार खबर मिल जाए इसका सीधा सा अर्थ है कि वह खबर आठ पहर में वायरल होने वाली है। 
गृहमंत्री के घर पर कॉमरेड नरेन्द्र ने जैसे ही स्वयंसेवक अंिभ को देखा, उससे नजरे चुराने लगे लेकिन कब तक? पकड़े गए। अंिभ जानते थे कि कॉमरेड नरेन्द्र कई दिनों से सरकार की एक सलाहकार समिति में जगह बनाने के लिए मंत्रीजी के घर और दफ्तर के चक्कर काट रहे हैं।
जब स्वयंसेवक अंिभ से नजर मिल गई तो कॉमरेड नरेन्द्र मुस्कुराते हुए उनसे मिले और उनके दोनों हाथों को अपने हाथ में लेकर झुलाने लगे। 
‘जानते हैं अंिभजी हमरा परिवार तो बाल्यकाल से ही स्वयंसेवक रहा है। मेरे चाचाजी, मेरे पिताजी सभी स्वयंसेवक हैं। मैं भी बचपन में शाखा जाता था। बाल्यकाल से स्वयंसेवक हूं। इस देश का ऐसा कौन सा हिन्दू बालक होगा जो बचपन में शाखा ना जाता हो?’
कॉमरेड नरेन्द्र की यह भाषा स्वयंसेवक अंिभ के लिए चौंकाने वाली थी। अंिभ मसखरी के मूड में थे, अंिभ ने कहा-
आप बाल्यकाल स्वयंसेवक हैं, यह अच्छी बात है लेकिन संघ में गर्भस्थ स्वयंसेवक की बात अधिक सुनी जाती है। यदि आप गर्भस्थ स्वयंसेवक होते तो यहां आने की जरूरत ही नहीं पड़ती। प्रचारक ही एक चिट्ठी लिख देते और घर बैठे-बैठे आपका काम हो जाता।’
कॉमरेड नरेन्द्र ने पहली बार गर्भस्थ स्वयंसेवक का जिक्र सुना था। उनकी रूचि जगी कि यह गर्भस्थ स्वयंसेवक क्या होता है और एनडीए सरकार में यह इतना पावरफूल क्यों है?
स्वयंसेवक अंिभ ने समझाया -
गर्भस्थ स्वयंसेवक उन संतानों को कहते हैं, जिनके मां-बाप दोनों स्वयंसेवक परिवार से आते हों। मतलब दादा और नाना दोनों संघी हों। 
कॉमरेड नरेन्द्र समझ गए थे कि गर्भस्थ स्वयंसेवक होना नई सरकार में बहुत काम की चीज है। लेकिन वे समझ नहीं पा रहे थे, कि खुद को गर्भस्थ स्वयंसेवक साबित कैसे किया जाए?
रास्ता स्वयंसेवक अंिभ ने सुझाया- संघ के इतने संगठन देश भर में चलते हैं कि संघ वालों को ही पता नहीं है। आगे से बता दिया कीजिए कि मैं गर्भस्थ स्वयंसेवक हूं और मेरे नाना जी ‘प्रगतिशील हिन्दू महासभा’ के संयोजक थे उज्जैन में। किसे पता चलेगा?
स्वयंसेवक अभि ने गर्भस्थ स्वयंसेवकों का महिमागान करते हुए फूसफूसा के कहा, मानों कोई अति राज की बात कर रहे हों- आप जानते हैं, प्रधानमंत्री के पीछे छह गर्भस्थ स्वयंसेवकों को लगाया गया है। प्रधानमंत्री कब मुतने जाते हैं, यह बात चाहे एसपीजी को पता ना हो लेकिन गर्भस्थ स्वयंसेवकों को उन्हें यहां तक की जानकारी रिपोर्ट करनी पड़ती है। गर्भस्थ स्वयंसेवकों का इस राज में कोई काम नहीं रूक रहा।
कॉमरेड नरेन्द्र को यह बात जम गई लेकिन इस तरह की बात स्वयंसेवक अंिभ से करते हुए वे झंेप गए थे। अपनी झेंप मिटाने का प्रयास करते हुए उन्होंने कहा- ‘वैसे मैने संघ का फर्स्ट ईयर किया है?’
स्वयंसेवक अंिभ ने पूछ लिया- पास हुए थे कि फेल?
एक बार पुनः कॉमरेड नरेन्द्र फंस गए। उन्होंने पूछा- ‘मतलब?’
‘आपने फर्स्ट ईयर किया है संघ का तो बताइए, एक गांव में एक सौ मुस्लिम परिवार रहता है और आपका परिवार अकेला हिन्दू परिवार है। ऐसे में एक संघ फर्स्ट ईयर पास स्टूडेन्ट होने के नाते आपका कर्तव्य क्या है?’
कॉमरेड नरेन्द्र ने सोचा भी नहीं था कि फर्स्ट ईयर पास करने के लिए ये संघ वाले इतना कम्यूनल किस्म का सवाल पूछते हैं।
स्वयंसेवक अंिभ ने मुस्कुराते हुए कहा- इसका मतलब आप फेल हुए थे, फर्स्ट ईयर में। 
कॉमरेड नरेन्द्र ने सिर झुकाकर कहा, बहुत पुरानी बात है, अब याद नहीं।
स्वयंसेवक अंिभ ने कहा- यह बात कोई संघ वाला नहीं भूल सकता क्योंकि उन्हें बताया जाता है कि अपना नाम भूल जाना लेकिन यह लेसन नहीं भूलना।
कॉमरेड नरेन्द्र से कुछ कहते नहीं बन रहा था। अंिभ ने उन्हें समझाया- नरेन्द्रजी इस तरह जब आप संघ वाला होने का झूठा दावा करेंगे तो यूं ही पकड़े जाएंगे। अच्छा होगा कि आप संघ की शाखा जाइए, वहां देखिए और जो देखिए वह लिखिए। 
कॉमरेड नरेन्द्र समझ गए थे कि उनका झूठ पकड़ा गया है। वैसे आज एक सरकार है और कल एक नई सरकार आज जाएगी। सरकार आज है कल बदल जाएगी लेकिन आपका बोला हुआ झूठ नहीं बदलेगा और किसी भी तरह के समझौते के लिए बोला गया झूठ आपको हमेशा झूठा बनाए रखेगा। यदि वैचारिक प्रतिबद्धता को निभाने का दम नहीं है तो बेवजह के झूठे दावों से बचना ही बेहतर है।
(उंगलबाज.कॉम, हमारी विश्वसनीयता संदिग्ध)

गुरुवार, 19 जून 2014

सब हमारे चाहने वाले हैं, हमारा कोई नहीं

पीर सोना गाजी कभी एशिया के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया में बसते थे। बाद में उन्हीं के नाम से इस रेड लाइट एरिया का नाम सोनागाछी पड़ गया। इतिहासकार देबोजीत बंदोपाध्याय और रजत रे के अनुसार एक समय यह नृत्य और कला का केन्द्र हुआ करता था। अंग्रेजो के आने के बाद यह जगह शास्त्रीय संगीत के केन्द्र से यौनकर्मियों के अड्डा के तौर पर विकसित हुआ। समय के साथ बहुत कुछ बदला और निश्चित तौर पर यौनकर्म भी बदला। इसी का परिणाम है कि कोलकाता की यौनकर्मी आज सरकार पर इस बात के लिए दबाव बना रहीं हैं कि सरकार यौन कर्मियों को कानूनी अधिकार दे और दलाल-पुलिस के गिरोह से मुक्त करे। यदि सरकार ऐसा करने में सक्षम नही होती तो कोलकाता की यौनकर्मी इस बार लोकसभा चुनाव में नोटा का बटन दबाएंगी।
कोलकाता शहर में यौनकर्मियों के बीच लंबे समय संे काम कर रही भारती देव बताती हैं-
‘बीस सालों से हम विभिन्न राजनीतिक दलों का वादा सुन रहे हैं कि ‘हमारी सारी मांगे वे पूरी कर देंगे।’ राजनीतिक दल वाले ना सिर्फ वादा करके गए बल्कि हमारी मांग पत्रों पर उनका हस्ताक्षर भी मिल जाएगा लेकिन जब बात आती है, चुनाव से पहले इसे अपने घोषणा पत्र में शामिल करो, सभी राजनीतिक दल शुचितावादी बन जाते हैं। कब तक हमें इस तरह ये राजनीतिक पार्टियां ऊल्लू बनाती रहेंगी?’
 यह खबर लिखे जाने तक सोनागछी की ग्यारह हजार यौनकर्मी महिला मतदाताओ ने तय किया है कि इस बार वे मतदान नहीं करेगी। यदि लोकतंत्र के सम्मान में उन्हें मतदान केन्द्र तक जाना पड़ा तो इनमें से कोई नहीं (नोटा) का बटन दबाएंगी।
भारती देव कहती हैं- ‘जब लोकतंत्र में यौनकर्मियों के लिए अपने रोजगार के साथ जीने का अधिकार नहीं है फिर अपनी कमाई का एक दिन कतार में लगकर व्यर्थ करने जैसा ही होगा, इनके लिए।’
कोलकाता (नॉर्थ), जहां इस बार लोकसभा चुनाव में कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है, इन ग्यारह हजार मतों की सही कीमत वे प्रत्याशी बता सकते हैं, जो इस क्षेत्र में खड़े हैं। लेकिन यौनकर्मियों के जीवन की यही विडम्बना है, उनका साथ हर कोई चाहता है लेकिन उनके साथ दिखना कोई नहीं चाहता।
यहां तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय, कांग्रेस से सोमेन मित्रा और सीपीएम की रूपा बागची में कड़ा मुकाबला है। ये सभी प्रत्याशी यौनकर्मियों से व्यक्तिगत बातचीत में उनके साथ होने के तमाम वादे करते हैं लेकिन यौनर्मियों की मांग उनके घोषणापत्र में शामिल क्यों नहीं है, का ठीक-ठीक जवाब वे नहीं दे पाते।
कोलकाता के रेड लाइट एरिया में रहने वाली महिलाओं का नाम 1990 तक मतदाता सूचि में शामिल नहीं था। इस नाम के लिए उन्हें लंबा संघर्ष करना पड़ा। पहचान पत्र ना होने की वजह से उनका राशन कार्ड नहीं बन सकता था। उनका बैंक में खाता नहीं खुल सकता था। उनके बच्चों का स्कूल में नामांकन नहीं हो सकता था।
सोनागाछी की सेक्स वर्कर्स ने कुछ समाज सेवियों की मदद से उषा कॉपरेटिव बनायां। उषा कॉपरेटिव बैक अपनीे तरह का अनोखा बैंक है, जिसे यौनकर्मियों द्वारा यौनकर्मियों के लिए चलाया जाता हैै। उषा सहकारी समिति ने चुनाव आयोग को निवेदन भेजा कि उषा सहकारी बैंक में चल रहे बचत खाते को पहचान पत्र माना जाए।
चुनाव आयोग ने इस निवेदन को स्वीकार किया और इस तरह उनके अपने उषा कॉपरेटिव ने उन्हें अपनी पहचान दी। डॉ. स्मरजीत जेना लंबे समय से यौनकर्मियों के अधिकार के लिए लड़ रहे है। डा जेना बताते हैं कि उषा कॉपरेटिव के लिए जब यौनकर्मियों का दल आवेदनपत्र लेकर पहली बार गया था तो परिचय में यौनकर्मी देखकर वहां मौजूद अधिकारी ने सुझाव दिया कि यौनकर्मी की जगह गृहिणी लिखना सही होगा।
आवेदन लेकर गई महिलाओं के समूह में से जब एक महिला ने अधिकारी को कहा कि अभी तो मैं यौनकर्मी ही हूं, यदि आप मुझसे शादी कर लें तो गृहिणी हो जाऊंगी। क्या आप मुझसे शादी करेगे?  इसका जवाब अधिकारी नहीं दे पाए। इस तरह यौनकर्मियों का पहला अपना कॉपरेटिव बैक बना।
2004 में सीपीएम के उम्मीदवार सुधांशु यौनकर्मियों द्वारा यौनकर्म को कानूनी अधिकार दिए जाने के संबंध में  निकाली गई यात्रा में शामिल हुए थे। 2009 में तृणमूल के सुदीप बंदोपाध्याय ने यौनकर्मियों द्वारा काूननी अधिकर दिए जाने संबंधी विज्ञप्ती और पुलिस-दलाल  की मिली भगत से मुक्ति से जुड़ी विज्ञप्ती पर हस्ताक्षर भी किया था। लेकिन नेताओं के हस्ताक्षर और वादे चुनाव तक के लिए होते हैं, इस बात को कोलकाता के यौनकर्मी इस बार समझ गई हैं।
आमतौर पर सोनागाछी की एक यौनकर्मी को कमरे के किराए का महीने में दो से ढाई हजार रुपए देना पड़ता है। उन्हें एक घंटे के लिए डेढ़ सौ रुपए मिलते हैं। जिसमें पैंतीस से चालिस फीसदी हिस्सा पुलिस, दलाल और स्थानीय गंुडों का होता है। यौनकर्मियों की मांग है कि पुलिस जब खुद यह धंधा चलवा रही है फिर इस धंधे को कनूनी अधिकार देने में क्या अर्चन है? अर्चन सिर्फ इतनी है कि दलालों और पुलिस की आमदनी पर रोक लग जाएगी। वैसे सोनागाछी में ऐसी यौनकर्मी भी हैं जो एक घंटे के लिए दस से पन्द्रह हजार रुपए भी लेती हैं। हाल में इंकम टैक्स के छापे में सोना गाछी से दो करोड़ रुपए नकद बरामद हुए। यही वजह है कि कोलकाता पुलिस की जुबान में इसे सोने की खदान कहते हैं।
खबर लिखे जाने तक कोलकाता की यौनकर्मियों ने तय कर लिया है कि इस बार वे ‘इनमें से कोई नहीं’ विकल्प के साथ मतदान केन्द्र तक जाएंगी क्योकि वे जान गईं हैं कि नेता यौनकर्म को कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त नहीं होने देंगे। दुर्बार की महासिता मुखर्जी कहती हैं- हालात यही रहे तो संभव है कि अगले चुनाव में यौनकर्मियों की तरफ से उनका अपना कोई उम्मीदवार मैदान में हो।


आशीष कुमार ‘अंशु’
09868419453

शुक्रवार, 23 मई 2014

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का रिजर्वेशन काउंटर कब होगा दलाल मुक्त?

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन अक्सर जाना होता है। दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी पुरानी दिल्ली स्टेशन के बिल्कुल सामने है और अपनी यात्राओं के लिए टिकट बनाने पुरानी दिल्ली स्टेशन के रिजर्वेशन टिकट काउंटर पर भी जाता हूं। बार-बार पुरानी दिल्ली के रेलवे रिजर्वेशन काउंटर पर इस उम्मीद से जाता हूं कि इस बार दिल्ली का यह टिकट काउंटर दलाल मुक्त हो गया होगा। हर बार निराश होकर ही लौटा हूं। दिल्ली में सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त टिकट एजेन्ट भी उसी कतार में खड़े होकर टिकट लेते हैं, जिसमें आम लोगों को टिकट लेना होता है।
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के एक काउंटर पर खड़े एजेन्ट ने ही बताया कि लगभग बारह सौ से लेकर पन्द्रह सौ एजेन्ट पुरानी दिल्ली में टिकट बेचने के लिए सक्रिय हैं। यह एजेन्ट जब इंटरनेट पर बुकिंग बंद दिखला रहा हो, उस समय भी अंतिम समय में टिकट करा सकते हैं। पैसे आप उन्हें वह दीजिए, जो उनको चाहिए और टिकट वे आपको वह दिला देंगे, जो आपको चाहिए। कई बार आपको भ्रम हो सकता है, यह टिकट के दलाल हैं या फिर जादूगर।
इन टिकट दलालों की शक्ति देखनी हो तो आप कभी पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के रिजर्वेशन काउंटर पर चले जाइए और देखिए वहां टिकट दलालों ने क्या हाल बना रखा है? दुखद यह है कि काउंटर पर बैठे टिकट बनाने वाले सरकारी कर्मचारी भी मानों उन्हीं के लिए अंदर बैठे हैं। इन टिकट दलालों द्वारा पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर फैलाई जा रही अव्यवस्था हर किसी को नजर आता है लेकिन ना जाने क्यों जीआरपी, सीआरपीएफ या फिर रेलवे इंटेलिजेन्स को यह बस क्यों नजर नहीं आता?
नियम से एक व्यक्ति को रेलवे काउंटर पर एक बार में दो से अधिक टिकट नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मानों यह कानून तो आम आदमी के लिए है, टिकट एजेन्ट पर कोई नियम लागू नहीं होता। पैसों के इस लेन-देन का खुला खेल कोई भी आम आदमी समझ सकता है लेकिन रेलवे इंटेलीजेन्स की समझ में ना जाने यह सारी बात क्यों नही आती?
दो तीन दिन पहले जब मैं अपना रेलवे टिकट वापस करने गया था, इसी तरह एक टिकट काउंटर पर कतार में लगे लोगों की अनदेखी करके जब काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने एक टिकट दलाल के लिए दो-तीन-चार-पांच-छह टिकट बना लिया तो उसका विरोध करना लाजमी था। मैने विरोध में बोला। यह देखकर दो तीन लोगों ने, जो कतार में लगे थे, मेरा साथ दिया।
इस शोर शराबे से स्थिति थोड़ी संभली। लेकिन यह स्थिति संभली सिर्फ एक काउंटर पर, जिस पर यह शोर शराबा हुआ था। उस वक्त शायद ही पुरानी दिल्ली में ऐसी कोई कतार हो, जिसमें सात-आठ ऐसे लोग ना हो, जो टिकट की दलाली करते हैं।
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन नीयमित जाने की वजह से कई ऐसे चेहरे अब पहचानने लगा हूं, जो सुबह से देर रात तक पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ही रहते हैं। संभव है, ये सब रेलवे द्वारा अधिकृत एजेन्ट के प्रतिनिधि हों।
इसी रेलवे स्टेशन पर सुनने को मिला, ‘
‘ये जो लोग काउंटर पर दलालों के खिलाफ शोर मचा रहे हैं, ये सभी अरविन्द (केजरीवाल) के लोग हैं।’
 यह सुनकर एक रेलवे टिकट दलाल बोला- ‘अरविन्द तो गए। अमेठी से उसके कवि की जमानत जप्त हो गई। अब अच्छें दिन आए हैं।’ 
इसका मतलब क्या, दिल्ली में बेईमानी के खिलाफ बोलने वाला हर एक व्यक्ति आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता माना जाएगा। यह सवाल मेरे लिए महत्वपूर्ण था। आम आदमी पार्टी और अरविन्द से तमाम असहतियों के बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ उठने वाली हर एक आवाज की पहचान, आम आदमी पार्टी बन गई है। 
इस बात पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों को सोचना चाहिए।
आज यह सवाल मेरे लिए जरूर अहम है, देश की राजधानी दिल्ली जब इतने प्रयासों के बावजूद दलाल मुक्त नहीं हो पा रही तो देश के दूसरे हिस्सों का मालिक अल्लाह ही होगा!

मंगलवार, 20 मई 2014

उंगलबाज.कॉम, हम उंगली करते नहीं मौजू सवालों पर उंगली रखते हैं...

उंगलबाज.कॉम की बात होती है तो अधिकांश मित्र समझते हैं कि यह किसी वेवसाइट का नाम है। लेकिन वे नहीं जानते कि उंगलबाज.कॉम वर्चूअल स्पेस में वर्चूअल वेवसाइट है। यह कपिल शर्मा के लाफ्टर शो में लिए जाने वाले उस इंटरव्यू की तरह है, जो इटरव्यू लिया तो एक पत्रिका के लिए जाता है लेकिन वह पत्रिका कभी छपती नहीं है।
उंगलबाज शब्द से कुछ लोगों को आपत्ति है। वे कहते हैं कि यह ठीक नहीं है, क्योंकि वे समझते नहीं कि उंगल का अर्थ उंगलबाज के लिए उंगली करना नहीं है बल्कि यह उन मसलों पर उंगली रखने के अर्थ में, जिस पर आम तौर पर लोग बात करते नहीं या फिर उन मसलों पर बात करना नहीं चाहते।
उंगलबाज.कॉम की तरफ से इस तरह के मसलों पर लगातर वीडियो अपलोड किया जा रहा है। आते-जाते रहिए।

कुछ महत्वपूर्ण वीडियों के लिंक यहां आपके साथ शेयर कर रहा हूं.....




शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

लाल किला गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन 2014

गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन श्रोताओं के लिए संभव है पांच-आठ घंटे चलने वाला एक सांस्कृतिक कार्यक्रम हो लेकिन मंचिय कवियों के लिए इस बात का प्रमाण पत्र है कि अब वे भी मंचिय कविता के लाल किला क्लब में शामिल हो गए हैं। एक बार लाल किला क्लब में जो कवि शामिल हो जाए। वह मंचिय कविता का श्रेष्ठ कवि मान लिया जाता है। यह गौरव देश के किसी भी दूसरे मंचिय कवि सम्मेलन को प्राप्त नहीं है। जब ऐसे कवि सम्मेलन में पैरवी से आए कवि सुनने को मिलते हेैं तो तकलीफ स्वाभाविक है।
वर्ष 2014 का लाल किला कवि सम्मेलन सुरेन्द्र शर्मा के संचालन में सम्पन्न हुआ। इस संचालन में वे थके हुए से नजर आए, कई बार वे मंच पर होकर भी लगा मंच पर नहीं हैं। यूं कहिए कि हिन्दी अकादमी ने कोई जिम्मेवारी दी है तो उन्हें ना कहते नहीं बना, सो चले आए जैसी स्थिति थी। ‘ओरिजनल’ सुरेन्द्र शर्मा मंच पर नजर नहीं आए। यूं भी तीस कवियों को संचालित करना आसान काम तो नहीं होता। जब सुरेन्द्र अपने अंदाज में श्रोताओं से अनुरोध कर रहे थें कि वे अपना मोबाइल सायलेन्ट मोड पर डालकर जेब में रख लें, उस दौरान और आगे कविता के बीच में तमाम कवि मंच पर मोबाइल में उलझे नजर आए। बिना इस बात की परवाह किए कि यदि कवि स्वयं अनुशासित नहीं होंगे, फिर वे श्रोताओं से अनुशासन की अपेक्षा किस मुंह से रखेंगे? मंच पर कई कवियों ने लाल किले के कवि सम्मेलन का बखान किया लेकिन कवि सम्मेलन खत्म होने तक आधे से भी कम कवि मंच पर बैठे थे। जिस कवि सम्मेलन को अंतिम तक सुनने के लिए कवि स्वयं अंतिम तक बैठने को तैयार नहीं हैं, उस कवि सम्मेलन के लिए कैसे वे उम्मीद रखते हैं कि सोनिया गांधी उनके मंच तक आएंगी और अंतिम कवि तक बैठ कर सुनेगी। कवियों ने इस मंच की गरीमा को इतना कम किया है कि कभी अंतिम कवि तक जिस कवि सम्मेलन को नेहरू सुनते थे, उस कवि सम्मेलन को अब दिल्ली सरकार की मंत्री भी अंतिम कवि तक सुनना पसंद नहीं करती। दिल्ली के मुख्यमंत्री मुशायरे में जाना मंजूर करते हैं लेकिन भूलकर भी कवि सम्मेलन का रास्ता नहीं पकड़ते। इस मंच पर एक कवित्री ऐसी भी थी, जो कवि सम्मेलन में मौजूद होकर भी मौजूद नहीं थी।
कुछ भर्ती के कवियों को छोड़ दिया जाए- जिनमें कुछ अपने अधिकारी होने का लाभ लेकर कवि सम्मेलन में घुस आए होंगे- तो इस बार मंच ने श्रोताओं का पूरा प्यार बटोरा। जब कवि सम्मेलन प्रारंभ हुआ था, आम आदमी की टोपी दर्जनों सिरों पर पड़ी थी। कवि सम्मेलन में आम आदमी पार्टी कई कवियों के निशाने पर रही, शायद इसी का परिणाम था कि सम्मेलन खत्म होते-होते चंद सिरों पर यह टोपी रह गई थी।
इस कवि सम्मेलन की उपलब्धि रहे, पदम्श्री बेकल उत्साही। इस कवि सम्मेलन के साथ इस बुजूर्ग कवि ने ऐसी याद जोड़ दी है कि आने वाले समय में इस कवि सम्मेलन को इसलिए भी याद किया जाएगा क्योंकि इसमें बेकल उत्साही ने काव्य पाठ किया था। पूनम वर्मा और बलराम श्रीवास्तव पहली बार लाल किला कवि सम्मेलन में आए थे और पहली ही बार में उन्होंने खुद को साबित किया और खूब जमंे।
सुरेश नीरव मंच पर आए तो इस दावे के साथ थे कि वे अपने पाठ के दौरान श्रोताओं से ताली डिमांड नहीं करेंगे और मंच से बार-बार ‘आशीर्वाद’मांगते पाए गए। सुरेश नीरव साहब को अपनी अच्छी रचना के साथ बोरिंग भूमिका से बचना चाहिए क्योंकि जो लोग कविता सुनने आए हैं, उनकी समझदारी पर अधिक संदेह करना कविजी अच्छी बात नहीं होती। भारत भूषण आर्य पूरे कवि सम्मेलन के अकेले ऐसे कवि रहे, जिन्हें श्रोताओं ने सबसे अधिक बे आबरू किया और वे हिट विकेट होकर पवेलियन लौटे।
आलोक श्रीवास्तव के साथ मंच संचालक सुरेन्द्र शर्मा ने अच्छा नहीं किया। मंच की कविता की थोड़ी समझदारी रखने वाला व्यक्ति समझ सकता है कि विनीत चौहान और मदन मोहन समर नाम के दो मजबूत चक्कियों के बीच आए आलोक श्रीवास्तव का क्या हुआ होगा? प्रवीण शुक्ल मंचिय कविता के पुराने शार्प शूटर हैं, उसके बावजूद मदन मोहन समर की कविता का जादू जो भूत की तरह श्रोताओं पर चढ़ गया था, उसे उतारने के लिए प्रवीण को काफी मशक्कत करनी पड़ी। प्रवीण ने अपंने अंदाज में तब तक समर के गीत ‘थाम तीरंगा करो घोषण हिंन्दुस्तान जवान है... कि पैरोडी की, जब तक दर्शकों ने अपने हाथ खड़े नहीं कर लिए।
‘तुमने दस-दस लाख दिए हैं, सैनिक की विधवाओं को
सोचा कीमत लौटा दी है, वीर प्रसूता माओं को,
मैं बीस लाख देता हूं, तुम किस्मत के हेटों को
हिम्मत हैं तो मंत्री भेजे लड़ने अपने बेटों को।
विनीत चौहान की इन चार पंक्तियों पर देर तक पंडाल में तालियों की गूंज सुनाई देती रही।
इस कवि सम्मेलन में दिनेश रघुवंशी का नाम ना लिया जाए तो, कवि सम्मेलन के लिए की गई पूरी बात अधूरी रह जाएगी। मेरी राय में वर्ष 2014 गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन में रघुवंशी सर्वश्रेष्ठ कवि रहे । कश्मीर जनमत संग्रह पर रघुवंशी की चार पंक्तियों खूब सराही गईं-

‘अगर गैरत है तो शरहद के रखवालों से भी पूछो
वतन जिनके लिए सबकुछ है मतवालों से भी पूछो,
अगर कश्मीर में जनमत कराना चाहते हो तो
वहां कुर्बान हर सैनिक के घरवालों से भी पूछो।’

कुंवर बेचैन, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, सर्वेश अस्थानाा और सरिता शर्मा की उपस्थिति से मंच की गरिमा बढ़ी।

सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

Open letter to asian human right commission, Hong Kong (China)

my formal complaint against Mr Avinash Pandey alias Samar Anarya

This may be considered as my formal complaint against Mr Avinash Pandey alias Samar Anarya  who works for  Asian Human Rights Commission Hong Kong (China) and is involved in various frivolous activities on social media, notably on the Facebook. I understand that AHRC is an international organization, renowned for its work for human dignity and freedom. However, contrary to prestige and the popular image of AHRC, your staff, Mr Avinash Pandey alias Samar Anarya  has been carrying out, for long, an unseemly and vindictive campaign against me in a manner which is highly unbecoming of the staff of an organization like AHRC. Such conduct not only gives a bad impression of the individual but also tarnishes the reputation built over years by your organization. The foul language used by him, to further his views, is mostly laced with expletives, which speaks volume about him and his conduct in public space. Such an act, which is highly undignified, provides a rather dim view of a reputed organization like AHRC. I surely believe that AHRC does not subscribe to his views and use of foul language, especially in public and social media. I appreciate that an organization like AHRC works in difficult and challenging situations and inappropriate conduct by one of your staff could hamper your work to improve the cause of human rights in different parts of the world. I thought it to bring to your attention the activities of your staff so that you may take suitable steps to protect the reputation of your organization. Thanking you.

Yours sincerely,
Ashish Kr. Anshu
New Delhi (India)

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

राजेन्द्र यादव की स्वीकारोक्ति और स्त्रीवादी प्रतिबद्धता के सवाल ! संजीव चन्दन

राजेन्द्र यादव को हिन्दी साहित्य अपनी स्पष्ट बयानी के लिए ही जानता है। वे अपने समग्र चिन्तन में ‘हिप्पोक्रेट’ नहीं दिखे। इसलिए श्री यादव के फेसबुक पर साया हुए इस बयान को हमें गंभीरता से लेना चाहिए- ‘बहुत ही अफ़सोस है मुझे कि वेब की दुनिया में मेरे और ज्योति कुमारी के संबंध को लेकर एक से एक कयास लगाये जा रहे है. मैंने हमेशा ज्योति कुमारी को अपनी बेटी की तरह माना है। इस सम्बन्ध में कुछ लोग गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी कर रहे है। मै उनकी भर्त्सना करता हूँ। लोगों को सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने के लिये ऐसी वैसी बात करने से परहेज़ करना चाहिये।’’ अब तक के जीवन में श्री यादव अपनी बेबाकी के लिए ही जाने जाते हैं। इसलिए यदि ज्योति और राजेन्द्र यादव के रिश्ते के संबंध जो बाते कही जा रहीं है, वह सच होती तो निश्चित तौर पर राजेन्द्र यादव उसे स्वीकार करते। वैसे ज्योति के मामले में उनकी अब तक की चुप्पी जरूर उन के लिए गंभीर सवाल खड़े करती है। उम्मीद है कि नवम्बर, हंस के संपादकीय में यह चुप्पी टूटेगी। फिलहाल जैसाकि संजीव चंदन के आलेख से जानकारी मिलती है कि कुछ लोग इस मामले में पैसों की बात कर रहे हैं। उन्हें याद रखना चाहिए, पैसों की बात करके वे ना ज्योति का भला कर रहे हैं और ना राजेन्द्र यादव का क्योंकि ज्योति इस मामले में पीड़िता के साथ-साथ एक गवाह भी है। गवाह को पैसे देने की बात करना भारतीय कानून में अपराध माना जाता है। इसलिए इस तरह की बात जो कर रहे हैं, उन्हें बात करनी चाहिए लेकिन बात करने से पहले इस संबंध में पुख्ता जानकारी जरूर जुटा लेनी चाहिए। माने थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए।  यहां प्रस्तुत है संजीव चंदन का आलेखः मॉडरेटर 

ज्योति कुमारी के प्रकरण पर मेरा मत , जो है सो है , और वह फेसबुक पर मैं जाहिर भी कर चुका हूँ . राजेंद्र जी को माफी मांग लेनी चाहिए थी , चुप्पी तोड़नी चाहिए थी , और यदि दोषी उनकी नज़रों में ज्योति हैं , तो प्रमोद के साथ उन्हें खड़ा होना चाहिए . आख़िरकार घटना स्थल राजेन्द्र जी का घर है . लेकिन ज्योति आपको भी सावधान रहना चाहिए . आपके साथ जो लोग दिख रहे हैं , वे क्या चाहते हैं , इस प्रकरण में , उनकी भूम
िका कितनी स्त्रीवादी है ! किसी शख्स का मुझे इस प्रकरण में बार –बार फोन आ रहा था , मैंने उनसे कहा कि राजेंद्र जी अपने सम्पादकीय में ज्योति से माफी मांगने वाले हैं तो उन्होंने , जो आपकी चिंता में दुहरे हुए जा रहे थे , कहा कि ‘पैसों की लें –देन हुई है , इस ,माफीनामें में .’ मुझे खीझ हुई और मैंने कहा कि फिर हम जैसे लोगों को एक शब्द भी क्यों जाया करना चाहिए इस प्रकरण में .

राजेन्द्र जी आपके न बोलने से आपका जो होगा सो होगा , लेकिन ज्यादा नुकसान आपके द्वारा किये गए साहित्यिक –सामाजिक –सांस्कृतिक हस्तक्षेप को है , जो वंचितों के पक्ष में था . फिलहाल मैं मन्नू जी के प्रसंग से लिखे गए अपने एक आलेख को यहाँ लगा रहा हूँ , मित्रों के लिए , प्रभात वार्ता में छपा था यह .
इसी आलेख से ..........
एक लेखिका –अभिनेत्री ने , जो साहित्य जगत की लम्पटता से परेशान रही हैं , मुझ से कभी कहा था कि हिंदी साहित्य के जिन लोगों से वह मिली उनमें से उसे दो ही पुरुष 'कुंठा रहित ' दिखे , राजेन्द्र यादव और उदय प्रकाश. वहीँ पत्नी के साथ अपने निजी व्यवहार में 'घोर पुरुष' के रूप में रहा है, ऐसा हिंदी का हर पाठक मन्नू जी के आत्मकथ्यों से जानता समझता रहा है.सामजिक तौर पर राजेंद्र जी 'मन्नू भंडारी ' को भाजपाई मानसिकता का घोषित करते हुए अपने सरोकारों का एक बरख्स भी खड़ा करते हैं, और मन्नू जी हर बार लगभग ख़ामोशी से 'नीलकंठ ' हो जाती हैं. राजेंद्र जी के व्यक्तित्व में यही 'द्वैध' है और इसी कि स्वीकारोक्ति है कि वे ‘मन्नू’ को संबंधों में अपने जैसे प्रयोगों के लिए माफ़ नहीं करते.



राजेन्द्र यादव युवा पीढ़ी के हम जैसे लोगों को इसी लिए आकर्षित करते हैं कि वे अपनी बात बड़े बेबाकी से कहते हैं, कहे पर बने भी रहते हैं, अपनी आलोचनाएं सुनते हैं.वे हिंदी साहित्य के उन बहुत कम व्यक्तित्वों में से हैं, जो अपनी सरोकारी और वैचारिक प्रतिबद्धता बनाये रखते हैं, राजेंद्र जी को तो इसके लिए कई लानते -मलानते भी झेलनी पडी हैं. राजेन्द्र यादव से आपकी कई असहमतियां हो सकती हैं, असहमतियों के लिए वे स्पेस भी देते हैं, कई बार तो वे विवादों को छेड़ते हैं, असहमत होने के अवसर पैदा करते हैं, और आप यदि उनके हंस के दफ्तर में जाकर उनसे असहमतियां दर्ज कराते हैं, उनकी आलोचना करते हैं तो वे बड़ी संजीदगी से सुनते हैं, जरूरत पड़ने पर ठहाकों से उन असहमतियों पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करा देते हैं, आप उन ठहाकों पर चिढ सकते हैं.
बहरहाल उनसे मिलने जाने के पहले साहित्य के नवागंतुकों को दिल से मजबूत होना पड़ेगा. पहली बार मैं उनसे मिलने 1998-1999 में कभी उनके दरियागंज स्थित कार्यालय गया था. यह जानकार कि मैं गया से आया हूँ, उन्होंने मुझसे पूछा कि संजय सहाय भी तो गया से ही हैं न , उनसे मिलते हैं? फिर कहा कि नीलिमा सिन्हा भी तो गया से ही है. पता नहीं क्यों फिर उन्होंने पूछा कि ' क्या यह सही है कि संजय सहाय की कहानियां शैवाल लिखते हैं ?' मुझे याद नहीं कि मैंने तब क्या जवाब दिया होगा लेकिन 'साहित्यिक अंडरवर्ल्ड' के नव शिखुओं के लिए यह मारक सवाल था . वह भी साहित्य के घोषित डान के द्वारा. संजय जी और राजेन्द्र जी के सम्बन्ध जगजाहिर थे तब तक. खैर इस सवाल के साथ उनका ठहाका !संजय जी की कहानियां मैंने बाद में पढ़ी, और संजय जी को जाना भी, शैवाल को तब तक पढ़ चुका था. आज मैं दावे के साथ दोनों रचनाकार की रचनाओं की शैली और कथ्य के अंतर बता सकता हूँ, लेकिन कसबे से आने वाले 21-22 साल के युवक से यह जानलेवा सवाल राजेंद्र जी ही कर सकते थे. खैर चाय पीकर , कुछ बातें कर मै विदा हुआ.
उसके बाद पिछले 14 सालों में मैं उनसे 7-8 बार जरूर मिला हूँ, लेकिन कभी पहचान नहीं बन पाई . अभी हाल की मुलाकात हंस कार्यालय में रामजी यादव के साथ हुई , इस बार भी मुझे परिचय देना पड़ा. हालांकि 2011 के पहले 2008 में मैं राजेंद्र जी को अर्जुन सिंह के यहाँ एक डेलिगेशन में ले जाने के लिए हंस कार्यालय गया था और इन्साफ के द्वारा मुहैय्या कराइ गई अपनी गाडी में लेकर मैं अर्जुन सिंह के घर उन्हें ले गया, जहाँ रामशरण जोशी, मनेजर पांडे, और जे .एन यू के कुछ प्राध्यापक वहां पहले से पहुँच चुके थे. यह डेलिगेशन मेरे अनुरोध पर हिंदी विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में मंत्री से मुलाकात करने पहुंचा था. राजेंद्र जी जोशी जी के बुलावे पर आये थे.
इन 14 सालों में मैं दो बार अपनी कहानी लेकर उनसे मिला , हर रचनाकार की तरह कहानी लिखने के बाद उसे पहले हंस में छपवाने की मेरी भी आकांक्षा थी, कभी हंस में कहानी नहीं छपी, वे दोनों कहानियां क्रमशः कथादेश और संवेद में छपी .एक बार मैं जब हंस कार्यालय पहुंचा तब वहां गिरिराज किशोर बैठे थे . मैं संभवतः 'स्त्रीकाल ' की प्रति लेकर गया था, उसमें राजेन्द्र जी का असीमा भट्ट के द्वारा लिया गया साक्षात्कार छपा था. गिरिराज किशोर, राजेन्द्र जी को 'आवरण से बाहर आने की नसीहत दे रहे थे. राजेंद्र जी इत्मीनान से अपनी आलोचना सुन रहे थे.विषय था ' विष्णुकांत शास्त्री का निधन और राजेंद्र जी जैसे उनके मित्रों का शास्त्री जी से न मिलने जाना और राजेन्द्र जी मृत्यु स्वाभाविक है के भाव में थे , हालांकि मुझे लगा था कि मृत्यु के प्रति राजेंद्र जी संजीदा हो रहे थे, ऐसा न भी हो सकता है, मैं ऐसा समझ रहा होऊंगा और राजेंद्र जी यथावत खिलंदर अंदाज में होंगे. हालांकि गिरिराज किशोर की आलोचना वे बड़ी तन्मयता से सुन रहे थे, बीच -बीच में शिरकत करते हुए. इसके बाद मैं कुछ और दफा हंस कार्यालय गया और हर बार कोई आलोचक उन पर हर्वे -हथियार के साथ पिला हुआ मिलता और राजेन्द्र जी आलोचना में मग्न होते, निर्लिप्त भी..कभी अर्चना वर्मा तो कभी मदन कश्यप, कभी कोइ और .....
समाज और हिंदी साहित्य में असहिष्णुता के परिवेश में राजेंद्र जी का यह व्यकतित्व उन्हें अलहदा बनाता है और अपने इस अल्हदापन को बनाये रखने के लिए वे अपनी ओर से प्रयास भी करते रहते हैं, विवाद पैदा कर, विवादों को हवा देकर . व्यक्तिव के इन्हीं द्वैधों के बीच राजेन्द्र यादव का व्यक्तित्व बनता है. जहाँ हंस के प्लेटफोर्म पर वे जिद्द की हद तक अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता बनाये रखते हैं, और इसी निरंतरता के साथ हिंदी साहित्य में स्त्री और दलित विमर्श को स्थापित करते हैं. वहीँ मन्नू भंडारी के मामले में वे निपट अहमन्य पुरुष हो जाते हैं और मैत्रयी के साथ अपनी मित्रता को दावं पर लगाकर भी लेखिकाओं को गाली देने वाले शख्स को ' क्या उसकी रोजी रोटी छिनोगी ' के ओछे तर्क के साथ अपनी भूमिका तय करते हैं. राजेन्द्र जी का यह द्वैध स्त्रीवादियों के लिए एक पाठ भी है- पितृसत्ता की गहरी पैठ का पाठ.

अपने हालिया साक्षात्कार में राजेंद्र जी ने कहा कि यदि उनकी ही तरह मन्नू जी ने भी संबंधों के मामले में स्वच्छंद जीवन जिया होता तो उन्होंने मन्नू को माफ़ नहीं किया होता. स्त्री-दलित मुद्दों के प्रति प्रतिबद्धता के साथ स्त्री और दलित विमर्श को हिंदी साहित्य के केंद्र में लेने वाले राजेंद्र जी की यह स्वीकारोक्ति उनके कई प्रशंसकों को चोट पहुंचा सकती है, या उनके आलोचक उन पर हमलावार हो सकते हैं. 'पर्सनल इज पोलिटिकल' के आधार से स्त्रीवादी चिन्तक राजेन्द्र जी को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं. इस सब से बेफिक्र राजेन्द्र जी ने यह बयांन किया है.
राजेन्द्र जी की यही खासियत है. वे चाहते तो एक हिप्पोक्रेट की तरह यह भी कह सकते थे कि 'उन्हें अपनी पत्नी के ऐसे रिश्तों से बहुत फर्क नहीं पड़ता क्योंकि संबंधो के मामले में जैसा पुरुष और स्त्री दोनों के आचरणों के अलग-अलग मानदंड नहीं हो सकते ,' आखिर राजेंद्र जी अपने समग्र चिंतन में स्त्री की 'दैहिक स्वतंत्रता' की ही तो बात करते हैं, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें मन्नू जी के विवाहेत्तर रिश्तों से ऐतराज होता और वे उन्हें कभी माफ़ नहीं कर पाते. राजेंद्र जी का यह वक्तव्य 'पितृसत्तात्मक समाज ' में अनुकूलित पुरुष का वक्तव्य है, जो स्त्रीवादी होने की प्रक्रिया में तो है लेकिन अपनी संरचना से मुक्त नहीं हो पाया है . यह एक मानसिक द्वैध की स्वीकारोक्ति है- दरअसल यह स्त्रीवाद के लिए एक पाठ भी है, खासकर उस व्यक्ति, साहित्यकार और सम्पादक की स्वीकारोक्ति होने के परिपेक्ष्य मे, जिसने सिद्दत के साथ और बड़ी इमानदारी से अपनी स्त्री और दलित प्रतिबद्धताएं, बनाये रखी है.
एक लेखिका –अभिनेत्री ने , जो साहित्य जगत की लम्पटता से परेशान रही हैं , मुझ से कभी कहा था कि हिंदी साहित्य के जिन लोगों से वह मिली उनमें से उसे दो ही पुरुष 'कुंठा रहित ' दिखे , राजेन्द्र यादव और उदय प्रकाश. वहीँ पत्नी के साथ अपने निजी व्यवहार में 'घोर पुरुष' के रूप में रहा है, ऐसा हिंदी का हर पाठक मन्नू जी के आत्मकथ्यों से जानता समझता रहा है.सामजिक तौर पर राजेंद्र जी 'मन्नू भंडारी ' को भाजपाई मानसिकता का घोषित करते हुए अपने सरोकारों का एक बरख्स भी खड़ा करते हैं, और मन्नू जी हर बार लगभग ख़ामोशी से 'नीलकंठ ' हो जाती हैं. राजेंद्र जी के व्यक्तित्व में यही 'द्वैध' है और इसी कि स्वीकारोक्ति है कि वे ‘मन्नू’ को संबंधों में अपने जैसे प्रयोगों के लिए माफ़ नहीं करते.

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

‘मूकदर्शक बने रहे राजेन्द्र यादव’: ज्योति कुमारी (भागः दो)


जैसा कि इस श्रृंखला के पहले अंक में लिखा गया था कि यह कहानी अधूरी है, जब तक राजेन्द्र यादव का पक्ष इसके साथ नहीं जुड़ जाता। इस संबंध में बतकही की तरफ से राजेन्द्र यादव से उनका पक्ष को जानने के उद्देश्य से फोन किया गया था, श्री यादव के अनुसार- इस संबध में उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है। राजेन्द्रजी का पक्ष अभी भी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। यदि उनका पक्ष नहीं आता तो ज्योति के बयान पर उनका यह मौन, ‘सहमति’ माने जाने का भ्रम उत्पन्न करेगा। वैसे राजेन्द्र यादव के शुभचिन्तक कह रहे हैं कि राजेन्द्र यादव ब्लॉग को गंभीर माध्यम नहीं मानते, यदि उन्हें जवाब देना होगा तो हंस के नवम्बर अंक में अपने संपादकीय के माध्यम से दंेगे। वास्तव में हमारे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उनका पक्ष कहां आता है, किसके माध्यम से हम सबके बीच आता है। महत्वपूर्ण यह है कि उनका पक्ष सबके सामने आए। बहरहाल आशीष कुमार ‘अंशु’ से ज्योति कुमारी की बातचीत का दूसरा भाग यहां प्रकाशित कर रहे हैं। इस बातचीत को साक्षात्कार या रिपोर्ट कहने से अच्छा होगा कि हम बयान कहें। चूंकि पूरी बातचीत एक पक्षीय और घटना केन्द्रित है। यहां गौरतलब है कि दूसरा पक्ष जो राजेन्द्र यादव का है, उन्होंने इस विषय पर बातचीत से इंकार कर दिया है। फिर भी उनका पक्ष उनकी सहमति  से कोई रखना चाहे  तो स्वागत है। यदि राजेन्द्र यादव स्वयं अपनी बात रखें तो इससे बेहतर क्या होगा? :

इन सारी घटनाओं के दौरान जब मैं थाने में बैठी थी। मेरे मित्र मज्कूर आलम के पास फोन किया जा रहा था। मज्कूर आलम उस दिन अपने घर बक्सर (बिहार) में थे। उन्हें फोन पर बताया जा रहा था- ‘ज्योति थाने में है। यह अच्छा नहीं है। उसे वापस बुला लीजिए।’
मैने सुना थाने में  कई लोगों से कह कर फोन कराया गया। दबाव बनाने के लिए। यदि यह बात सच है तो दिल्ली पुलिस की सराहना की जानी चाहिए कि वे किसी के दबाव में नहीं आए।
 मैं अकेली रात एक बजे तक थाने में बैठी रही। इस बीच मेरा एमएलसी (मेडिकल लीगल केस) कराया गया। मैं वहां देर रात तक इसलिए बैठी रही क्योंकि मैंने तय कर लिया था, जब तक मेरा एफआईआर (फर्स्ट इन्फॉरमेशन रिपोर्ट) नहीं हो जाता, मैं वहां से हिलूंगी नहीं। मेरे एमएलसी में आ गया कि चोट है। ईएनटी में दिखलाया, वहां कान के चोट की भी पुष्टी हो गई। एक बजे रात में एक लेडी कांस्टेबल मुझे घर तक छोड़ कर गई।
मुझे जानकारी मिली कि मेरे घर आने के थोड़ी देर बाद ही प्रमोद को छोड़ दिया गया। उसके बाद दो महीने तक केाई कार्यवायी नहीं हुई। मै अपने कान के दर्द से परेशान थी। मुझे चोट लगी थी। दो महीने तक पुलिस की तरफ से कोई कार्यवायी नहीं हुई। पुलिस की जांच पड़ताल चल रही होगी, यह अलग बात है। उन्होंने दो महीने तक एक जुलाई की घटना के लिए सीआरपीसी की धारा 164 में मेरा बयान भी  नहीं कराया।
घटना के अगले दिन दो जुलाई को राजेन्द्र यादव का फोन आया मेरे पास। उन्होंने कहा -‘क्या मिल गया, पुलिस में बयान दर्ज कराके। लड़का छुट गया। लड़का घर आ गया।’
मैने जवाब दिया- ‘क्या हो गया यदि प्रमोद छुट कर आ गया। मैंने वही किया जो मुझे करना चाहिए।’
फिर राजेन्द्र यादव ने कहा- ‘अच्छा ऐसा कर शाम छह बजे मेरे घर आ जा।’
मैंने जवाब में कहा- ‘अब मैं आपके घर कभी नहीं आने वाली।’
राजेन्द्र यादव- ‘कभी नहीं आना, आज आ जा।’
ज्योतिः ‘क्यों आज ऐसा क्या खास है कि मुझे इतना कुछ हो जाने के बाद भी आपके घर आ जाना चाहिए।’
राजेन्द्र यादवः ‘मैने पुलिस वाले को कह दिया है, वकील को भी बुला लिया है। तू भी आ जा। प्रमोद भी रहेगा। वह तुझे सॉरी बोल देगा। बात खत्म हो जाएगी।’
ज्योतिः ‘उसे पब्लिकली सॉरी बोलना होगा। उसने इतनी बूरी हरकत की है मेरे साथ। तब मैं माफ करूंगी। मुझे लगता है कि जिसे वास्तव में महसूस होगा कि उसने गलती की है, वह सार्वजनिक तौर पर माफी मांगेगा। जब कोई महसूस करता है, अपनी गलती तो उसे सार्वजनिक तौर पर गलती की माफी मांगनी चाहिए। यदि वह सार्वजनिक तौर पर माफी मांगेगा तो उसे सुधरने और अच्छा बनने का एक मौका दिया जा सकता है। उस माफी के बाद भी उसकी हरकतें नहीं बदलती तो उस पर फिर कार्यवायी होनी चाहिए लेकिन प्रमोद को एक मौका मिलना चाहिए, इस बात के मैं हक में हूं।’
राजेन्द्र यादवः ‘फिर ऐसा कर, सोनिया गांधी को बुला ले, मनमोहन सिंह को बुला ले, ओबामा को बुला ले। रामलीला मैदान में माफी मांगने का सार्वजनिक कायक्रम रख लेते हैं।’
ज्योतिः ‘आपको जो भी लगे लेकिन जब तक वह सार्वजनिक तौर पर माफी नहीं मांग लेता, मैं माफ नहीं करूंगी।’
जब मेरी और राजेन्द्र यादव की फोन पर यह बात हो रही थी, मीडिया और साहित्य में बहुत से लोगों को इस घटना की जानकारी हो चुकी थी। बहुत से लोगों के फोन आने लगे थे।
एक दिन पहले यानि एक जुलाई को जिस दिन दुर्घटना हुईं, जब मैं पुलिस के आने का इंतजार कर रही थी, उसी वक्त साहित्यिक पत्रिका पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज राजेन्द्र यादव के घर आए थे। प्रेम भारद्वाज जब भी पाखी का नया अंक आता है, उसे देने के लिए वे स्वयं हर महीने राजेन्द्र यादव के घर आते हैं। उस दिन भी वे पाखी देने ही आए थे। जब प्रेम भारद्वाज वहां पहुंचे तो उन्होंने मेरी हालत देखी। राजेन्द्र यादव ने प्रेम भारद्वाज के हाथ से पाखी लेकर बोला- ‘ठीक है, ठीक है। अब जाओ।’
मैने कहा- ‘प्रेम भारद्वाज जाएं क्यों, उन्हें भी पता चलना चाहिए, आपके घर में क्या हुआ है?
प्रेम भारद्वाज ने पूछा - ‘क्या हुआ?’
राजेन्द्र यादव का जवाब था- ‘कुछ नहीं हुआ, तुम जाओ यहां से।’
प्रेम भारद्वाज के जाने के बाद पुलिस आई। पुलिस के आने का जिक्र मैं पहले कर चुकी हूं। राजेन्द्र यादव द्वारा दिया गया, शराब पीने का ऑफर जब दिल्ली पुलिस ने ठुकरा दिया और इस बात पर भी सहमत नहीं हुए कि किसी स्त्री पर हमला छोटी बात होती है तो राजेन्द्र यादव को लगा कि यह बात उनसे अब नहीं संभलेगी। उन्होंने किशन को कहा- ‘भारत भारद्वाज को फोन मिलाओ।’
जब तक भारत भारद्वाज आए, पुलिस दरवाजे तक आ चुकी थी। भारत भारद्वाज ने आते ही कहा- ‘मैं डीआईजी हूं आईबी डिपार्टमेन्ट में। आप पहले मुझसे बात कीजिए, उसके बाद प्रमोद को लेकर जाइएगा। ’
मैने वहीं पर कहा- ‘ये रिटायर हो चुके हैं।’
मैने देखा, प्रेम भारद्वाज गए नहीं थे। वे भारत भारद्वाज के साथ लौट आए थे। हो सकता है कि वे भारत भारद्वाज के पास पत्रिका देने गए हों और राजेन्द्र यादव का फोन आ गया हो।
भारत भारद्वाज ने फिर पूछा- ‘क्या हुआ?’
मैने पूरी कहानी उन्हें बताई, यह भी बताया कि घटना के बाद  मैने शिकायत की है और मेरी शिकायत पर पुलिस आई है।
भारत भारद्वाज फिर राजेन्द्र यादव के लिए, सलाह देने में व्यस्त हो गए। अनंत विजय को बुला लो, उसके एक भाई सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं। पुलिस ने भारत भारद्वाज से कहा- ‘सर आपको जो भी बात करनी है, थाने में आकर करिए।’
जब एक महिला के साथ बलात्कार होता है या फिर बलात्कार की कोशिश होती है। लड़की की इससे सिर्फ शरीर की क्षति नहीं होती। उसका मन भी टूटता है। हमले का मानसिक असर भी गहरा होता है। मेरे साथ जो हुआ, मैं उससे अभी तक बाहर निकल नहीं पाई हूं। यह अलग बात है कि मैं लड़ रही हूं। मैने हिम्मत नहीं हारी है। कानूनी रूप से जो कर सकती थी, कर रही हूं। लेकिन इस घटना का मेरे अंदर जो असर हुआ है, उसे सिर्फ मैं समझ सकती हूं। इस तरह के अपराध के लिए समझौता कभी नहीं हो सकता है। कोई ऐसे मामले में समझौता शब्द का इस्तेमाल करता है, इसका मतलब है कि वह लड़की के साथ अन्याय करता है। मैने इस अन्याय को भोगा है। इस तरह के मामले में समझौते की बात कहीं आनी नहीं चाहिए। मैं ना समझौते के लिए कभी तैयार थी, ना हूं और ना इस मामले में आने वाले समय में समझौता करूंगी। यह संभव है कि कोई गलती करता है और अंदर से इस बात को महसूस करता है और माफी मांगता है तो उसे माफ करके एक मौका दिया जा सकता है। समझौता और माफी देने में अंतर होता है। यदि मैं प्रमोद को माफ करने पर विचार कर रही हूं तो इसे समझौता बिल्कुल ना कहा जाए। यह शब्द एक पीड़ित लड़की के लिए अपमानजनक है। एक तो लड़की के साथ गलत हुआ है। लड़की ने उसे भुगता। उस पीड़ा के शारीरिक मानसिक असर से लड़की गुजरी। अब उस पीड़ा से जुझ रही लड़की से अपराधी को माफ करने के लिए कहा जा रहा है और उसे समझौता नाम दिया जा रहा है। यह ऐसा ही है जैसे किसी ने पीड़ा से गुजर रही लड़की को दो थप्पड़ और मार दिया हो। वही सारी घटनाएं फिर एक बार मेरे साथ दुहराई जा रही हों। इसलिए समझौता नहीं, प्रमोद के लिए माफी शब्द का इस्तेमाल होना चाहिए। यदि उसे अपनी गलती का एहसास है तो जरूर उसे एक मौका मिलना चाहिए।
अकेला प्रमोद इस गुनाह में शामिल है या फिर कुछ और लोग भी प्रमोद के पीछे इस गुनाह में शामिल हैं। इसका सही-सही जवाब राजेन्द्र यादव दे सकते हैं। मान लीजिए प्रमोद ने किसी के बहकाने पर यह सब किया। पैसा लेकर किया। लेकिन सच यह है कि मेरे साथ अपराध प्रमोद ने किया। मेरा अपराधी प्रमोद है। उसने ऐसा कदम क्यों उठाया? इसका जवाब प्रमोद दे सकता है।
सच्चाई है कि राजेन्द्र यादव ने मेरा वीडियो नहीं बनाया, मुझ पर शारीरिक हमला भी नहीं किया। फिर भी मैने हंस का बहिष्कार किया। इसके पीछे वजह यही है कि राजेन्द्र यादव स्त्री सम्मान की बात करते हैं लेकिन जब उनके सामने स्त्री सम्मान पर हमला हुआ तो वे चुप थे। प्रमोद को पहले दिन थाने से निकलवाने में राजेन्द्र यादव की अहम भूमिका रही। प्रमोद के खिलाफ एफआईआर ना हो, इसमें राजेन्द्र यादव की पूरी  भूमिका रही। वह नहीं रूकवा पाए, यह अलग बात है, लेकिन उन्होंने जोर पूरा लगा लिया था। पहले दिन जब प्रमोद थाने से छुट कर आया तो उनके घर में ही था। उनके घर में वह काम करता रहा। उसकी दूसरी बार दो महीने बाद  गिरफ्तारी उनके घर से ही हुई। यदि कोई लड़का आपके यहां काम करता हो तो यह बात समझ में आती है कि वह आपके नियंत्रण में ना हो और उसका अपराध आपकी जानकारी में ना हो। लेकिन जब राजेन्द्र यादव एक जुलाई की घटना के चश्मदीद हैं, सबकुछ उनकी आंखों के सामने घटा है, वे कम से कम प्रमोद से अपना रिश्ता खत्म कर सकते थे। प्रमोद उनके घर में रहा और काम करता रहा। इतना ही नहीं, उलट राजेन्द्र यादव मुझपर ही दबाव बनाते रहे कि समझौता कर लो। केस वापस ले लो। उनकी तरफ से कई लोगों के फोन आ रहे थे- ‘तुम्हारा साहित्यिक कॅरियर चौपट हो जाएगा। तुम साहित्य से बाहर हो जाओगी।’
मैं नहीं मानी।
राजेन्द्र यादव ने तरह-तरह के एसएमएस भी मेरे पास भेजे। वे साहित्यिक व्यक्ति हैं, इसलिए उनकी धमकी भी साहित्यिक भाषा में थी।
‘तुम जो कर रही हो, समझो इसमें सबसे अधिक नुक्सान किसका है?’
‘मूर्ख उसी डाल को काटता है, जिस पर बैठा होता है।’
‘तुम्हें आना तो मेरे पास ही पड़ेगा।’
यह सारे एसएमएस मेरे पास सुरक्षित हैं। 27 जुलाई को राजेन्द्र यादव का फोन आया- ‘प्रमोद माफी मांगने को तैयार है। लेकिन सार्वजनिक माफी से पहले, वहां कौन-कौन से लोग होंगे, यह तय करने के लिए हम लोग मिले। मिलकर बात करते हैं। वह मिलकर भी तुमसे माफी मांग लेगा और सार्वजनिक तौर पर भी माफी मांग लेगा। मिलने की जगह नोएडा (उत्तर प्रदेश), सेक्टर सोलह का मैक डोनाल्ड तय हुआ।
बात हुई थी माफी मांगने की लेकिन प्रमोद वहां भी मुझे धमकाने लगा। अपना केस वापस ले लो वर्ना मार के फेंक देंगे। लाश का भी पता नहीं चलेगा। किशन भी साथ दे रहा था। उस दिन मज्कूर आलम मेरे साथ थे। राजेन्द्र यादव उनके द्वारा सार्वजनिक माफी के लिए सुझाए जा रहे सारे नामों को एक-एक करके खारिज कर रहे थे। मानों घर से राजेन्द्र यादव प्रमोद के साथ सार्वजनिक माफी की बात सोचकर निकले हों और यहां आकर बदल गए हों। नामों को लेकर राजेन्द्र यादव की आपत्ति कायम थी। नहीं यह नहीं होगा। इसे क्यों बुलाएंगे। ऐसा करो कि वकील को बुला लेते हैं। बात खत्म करो।
उनका यह रूख देखकर मुझे हस्तक्षेप करना पड़ा।
‘जब मैने स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक माफी से कम पर बात नहीं होगी और आपको यह स्वीकार्य नहीं है तो मिलने के लिए क्यों बुलाया?’
राजेन्द्र यादव का वहां बयान था- ‘अब मैं और तुम आमने-सामने हैं। अब प्रमोद से तुम्हारी लड़ाई नहीं है। यदि तुमने मेरी बात नहीं मानी तो अब तुम्हारी लड़ाई मुझसे है।’
इस घटना से पहले मैं राजेन्द्र यादव को ई मेल पर हंस और राजेन्द्र यादव के बहिष्कार की सूचना दे दी थी। उन्होंने हंस के अंक में मेरी कहानी की घोषणा की थी। मैने कहानी देने से मना कर दिया। मैं ऐसी पत्रिका को कहानी नहीं दे सकती, जिसका दोहरा चरित्र हो। मेरे ई मेल भेजे जाने के बाद भी उन्होंने मेरी समीक्षा छाप दी। (यह बातचीत हंस, अक्टूबर 2013 अंक आने से पहले हो चुकी थी, उस वक्त हंस में ‘समीक्षा’ के लिए राजेन्द्र यादव की माफी नहीं छपी थी) मैने जो ई मेल राजेन्द्र यादव को भेजा था, उसमें साफ शब्दों में लिख दिया था कि मेरा निर्णय समीक्षा पर भी लागू होता है। इसके बावजूद उन्होंने समीक्षा छाप दी। समीक्षा छापने के बाद उन्होंने मुझे सूचना भी नहीं दी। मेरी लेखकीय प्रति अब तक मेरे पास नहीं आई।
मेरे पास एक परिचित का फोन आया, तुमने हंस का बहिष्कार किया है और तुम्हारी समीक्षा हंस में छपी है। यह फोन आने के बाद  मैने राजेन्द्र यादव को फोन किया। उनकी पत्रिका 20-21 से पहले कभी प्रेस में नहीं जाती है लेकिन राजेन्द्र यादव ने कहा- इस बार पत्रिका 18 को ही प्रेस में चली गई। इसलिए समीक्षा रोक नहीं पाए। मैने कहा- आप अगले अंक में छाप दीजिएगा कि समीक्षा कैसे छप गई? जिससे पाठकों में भ्रम ना रहे। राजेन्द्र यादव ने उस वक्त कहा कि ठीक है। तीन दिनों बाद राजेन्द्र यादव का फोन आया- ‘समीक्षा छापने का निर्णय संजय सहाय का था, इसलिए वही बताएंगे कि क्या जाएगा?’
मैने राजेन्द्र यादव से कहा- ‘आप संजय सहाय से बात करके खबर करवा दीजिएगा।
उनकी तरफ से कोई फोन नहीं आया। मैंने फिर उन्हें ई मेल किया। आपने स्पष्टीकरण की बात कही थी, आप इस बार हंस में क्या छाप रहे हैं, आपका जवाब नहीं आया। इस ई मेल का जवाब नहीं आया तो मैने एक और ई मेल उन्हें लिखा। लेकिन उसका जवाब भी नहीं आया।
जब हंस का सितम्बर अंक हाथ में आया, उसमें राजेन्द्र यादव ने मेरे लिए अपमानजनक बातें लिखी थी। जो उन्हें लिखना था, ज्योति ने हंस का बहिष्कार किया है। वह कहीं नहीं लिखा। उन्होंने मना करने के बावजूद समीक्षा छापने की बात भी कहीं नहीं लिखी। जब तक मैं उनके पास काम कर रही थी, तब तक बहुत अच्छी थी। जब मैने उनके घर में हुए गलत हरकत का विरोध किया तो उन्होंने मेरा साथ नहीं दिया। जब मैने उनका और उनकी पत्रिका का बहिष्कार किया तब उनको याद आया कि मेरा काम दस हजार के लायक भी नहीं था। यदि मेरा काम अच्छा नहीं था तो मुझे हंस में अपने पास रखा क्यों था? निकाला क्यों नहीं? मैंने तो कभी उनसे चंदा नहीं मांगा। क्या राजेन्द्र यादव जबर्दस्ती चंदा बांटते हैं। यदि राजेन्द्र यादव जबर्दस्ती चंदा बांटते है तो फिर यह चंदा सिर्फ ज्योति को क्यों? यदि चंदा ही दे रहे थे तो फिर बदले में इतना काम क्यों लेते थे?

(यह ज्योति के बयान अंतिम भाग नहीं है......कहानी अभी बाकि है साथियो)

सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

‘मूकदर्शक बने रहे राजेन्द्र यादव’: ज्योति कुमारी (भाग एक)


जुलाई 2013 में एक खबर आई थी कि राजेन्द्र यादव की प्रिय लेखिका ज्योति कुमारी ने ‘हंस’ का बहिष्कार किया है। सितम्बर के संपादकीय में ज्योति को लेकर श्री यादव का अनर्गल प्रलाप छपा। अक्टूबर संपादकीय में उन्होंने अपनी गलती के लिए युवा लेखिका से क्षमा मांग ली। राजेन्द्र यादव और हंस के बहिष्कार को लेकर आशीष कुमार ‘अंशु’ ने ज्योति कुमारी से लंबी बातचीत की। ज्योति ने विस्तार से पूरी कहानी बयान की। इस कहानी में यदि आने वाले समय में राजेन्द्र यादव का पक्ष शामिल होता है तो यह कहानी पूरी मानी जाएगी। यहां प्रस्तुत है, ज्योति का बयान, जैसा उन्होंने आशीष को बताया।  

‘हंस’ का बहिष्कार करना किसी भी नई लेखिका के लिए आसान फैसला नहीं होता। खास तौर पर जब मेरे लेखन की अभी शुरूआत है। इस बात से कोई इंकार नहीं है कि हंस में जब कहानी छपती है तो अच्छा रिस्पांस मिलता है। मेरी कहानियां ‘हंस’, ‘पाखी’, ‘परिकथा’, ‘नया ज्ञानोदय’ और अभी बहुवचन में छपी है लेकिन हंस में प्रकाशित किसी भी कहानी के लिए सबसे अधिक फोन, एसएमएस और चिट्ठियां मिली हैं। किसी भी लेखक को यह अच्छा लगता है। 
मैं पिछले दो सालों से राजेन्द्र यादव और हंस के लिए काम कर रहीं थी। मेरा वहां काम यादवजी जो बोले, उसे लिखने का था, हंस में अशुद्धियों को दुरुस्त करना और उसके संपादन से जुड़े काम को भी मैं देखती थी। जब ‘स्वस्थ्य आदमी के बीमार विचार’ पर काम शुरू किया, उसके थोड़ा पहले से मैं उनके पास जा रही थी। लगभग दो साल से मैं उनके पास जा रही हूं। इस काम के लिए वे मुझे दस हजार रूपए प्रत्येक महीने दे रहे थे। मैं मुफ्त में उनके लिए काम नहीं कर रही थी। सबकुछ ठीक था। यादवजी का स्नेह भी मिल रहा था। उस स्नेह में कहीं फेवर नहीं था। अपनी कहानियों के लिए कभी मैंने उन्हें नहीं कहा। मैं उन्हें लिखने के बाद कहानी दिखलाती थी और कहती थी कि यह यदि हंस में छपने लायक हो तो छापिए। मेरी पांच-छह कहानियां हंस में छपी। 
यदि किसी लेखिका की पहली कहानी छपना उसे किसी साहित्यिक पत्रिका का प्रोडक्ट बनाता है तो मुझे ‘परिकथा’ का प्रोडक्ट कहा जाना चाहिए। मेरी पहली कहानी ‘परिकथा’ में छपी है। मैं हंस की प्रोडक्ट नहीं हूं। यह सच है कि कथा संसार में मेरी पहचान हंस से बनी। ‘हंस’ मेरे लिए स्त्री विमर्श की पत्रिका रही है। ‘हंस’ से मैने स्त्री अधिकार और स्त्री सम्मान को जाना है। राजेन्द्र यादव जो अपने संपादकीय में लिखते रहे हैं और जो विभिन्न आयोजनों में बोलते रहे हैं। इन सबसे उनकी छवि मेरी नजर स्त्री विमर्श के पुरोधा की बनी। 
एक जुलाई 2013 को उनके घर में जो दुर्घटना हुई, उससे पहले उनसे मेरी कोई शिकायत नहीं थी। सबकुछ उससे पहले अच्छा चल रहा था। मैं उन्हें अपने अभिभावक के तौर पर पितातुल्य मानती रहीं हूं। मेरा उनसे इसके अलावा कोई दूसरा रिश्ता नहीं रहा। इसके अलावा केाई दूसरी बात करता है तो गलत बात कर रहा है। राजेन्द्र यादव मुझसे कहते थे- ‘तुझे देखकर मेेरे अंदर इतना वातशल्य उमरता है, जितना बेटी रचना के लिए भी नहीं उमरा। कभी मैं उन्हें कहती थी कि मुझे हंस छोड़ना है तो वे मुझे बिटिया रानी, गुड़िया रानी बोलकर, हंस ना छोड़ने के लिए मनाते थे। राजेन्द्र यादव हमेशा मेरे साथ पिता की तरह ही व्यवहार करते थे। 
जब से मैं उनके पास काम कर रहीं हूं, प्रत्येक सुबह 8ः00 बजे- 8ः30 बजे उनके फोन से ही मेरी निन्द खुलती थी। फोन उठाते ही वे कहते- अब उठ जा बिटिया रानी। मैं उनके घर 10ः30 बजे सुबह पहुंचती थी। वे रविवार को भी बुलाते थे। रविवार को उनके घर शाम तीन-साढे तीन बजे पहुंचती थी। 
राजेन्द्र यादव का मानना था कि वे हंस कार्यालय में एकाग्र नहीं हो पाते हैं। इसलिए वे संपादकीय लिखवाने के लिए घर ही बुलाते थे। जब मैंने राजेन्द्र यादव के साथ काम करना शुरू किया, उन दिनों राजेन्द्र यादव दफ्तर नहीं जाते थे। वे बीमार थे। तीन-चार महीने तक वे बिस्तर पर ही पड़े रहे। ‘स्वस्थ्य आदमी ......’ वाली किताब उन्होंने घर पर ही लिखवाई। उस दौरान वे हंस नहीं जा रहे थे। जब उन्होंने हंस जाना प्रारंभ किया, उसके बाद भी वे रचनात्मक लेखन घर पर ही करते थे। दफ्तर में वे चिट्ठियां लिखवाते थे। मेरी नौकरी उनके घर से शुरू हुई थी, इस तरह मेरा एक दफ्तर उनका घर भी था। 
30 जून 2013 की रात 10ः00-10ः15 बजे के आस-पास मेरे मोबाइल पर नए नंबर से फोन आया। नए नंबर के फोन इतनी रात को मैं उठाती नहीं। लेकिन एक नंबर से दो-तीन बार फोन आ जाए तो उठा लेती हूं।  जब दूसरी बार में मैंने नए नंबर वाला फोन उठाया तो दूसरी तरफ से आवाज आई- ‘मैं प्रमोद बोल रहा हूं।’ जब मैने पूछा -‘कौन प्रमोद?’ तो उसने राजेन्द्र यादव का नाम लिया। प्रमोद, राजेन्द्र यादव का अटेन्डेन्ट था। ‘हंस’ में मेरी राजेन्द्र यादव और संगम पांडेय से बात होती थी और किसी से कुछ खास बात नहीं होती थी। मैं बातचीत में थोड़ी संकोची हूं, यदि सामने वाला पहल ना करे तो मैं बात शुरू नहीं कर पाती। प्रमोद से मेरी बातचीत सिर्फ इतनी थी कि वह दफ्तर पहुंचने पर राजेन्द्र यादव के लिए और मेरे लिए एक गिलास पानी लाकर रखता था और पूछता था- ‘मैडम आप कैसी हैं?’ इससे अधिक मेरी प्रमोद से कोई बात हुई हो, मुझे याद नहीं।
उसका फोन आना मेरे लिए आश्चर्य की बात थी। उसने फोन पर कहा- ‘मुझसे आकर मिलो। मैंने तुम्हारा वीडियो बना लिया है। उसे मैं इंटरनेट पर डालने जा रहा हूं।’
यह फोन मेरे लिए झटका था। कोई यदि वीडियो बनाने की बात कर रहा है तो निश्चित तौर पर यह किसी आम वीडियो की धमकी नहीं होगी। वह नेकेड वीडियो की बात कर रहा होगा। मैंने राजेन्द्र यादव को उसी वक्त फोन मिलाया। जब राजेन्द्र यादव से मेरी बात हो रही थी, उस दौरान भी प्रमोद का फोन वेटिंग पर आ रहा था। राजेन्द्र यादव को मैने फोन पर कहा- ‘प्रमोद नेकेड वीडियो की बात कर रहा है, आप देखिए क्या मामला है?’
राजेन्द्र यादव ने कहा- अब मेरे सोने का वक्त हो रहा है। सुबह बात करूंगा। उनसे बात खत्म हुई प्रमोद का फोन जो वेटिंग पर बार-बार आ ही रहा था। फिर आ गया- उसने फिर मुझे धमकाया। 
राजेन्द्र यादव जो दो साल से प्रतिदिन मुझे फोन करके उठाते थे। उस दिन उनका फोन नहीं आया। जब मैंने फोन किया तो उन्होंने कहा- ‘मैं आंख दिखलाने एम्स जा रहा हूं। तुमसे दोपहर में बात करता हूं। फिर राजेन्द्र यादव का फोन नहीं आया। फिर मैंने ही फोन किया, राजेन्द्र यादव ने फोन पर मुझे कहा- प्रमोद कह रहा है, वीडियो सुमित्रा के पास है और सुमित्रा कह रही है वीडियो प्रमोद के पास है। पता नहीं चल पा रहा कि वीडियो किसके पास है। ऐसा करो, इस मसले को अभी रहने दो। इस पर बात 31 जुलाई वाले कार्यक्रम के बीत जाने के बाद बात करेंगे। मुझे यह बात बुरी लगी। मैंने कहा- ‘आज एक जुलाई है। 31 जुलाई में अभी तीस दिन है। इस बीच प्रमोद ने कुछ अपलोड कर दिया तो फिर मेरी बदनामी होगी। आप भारतीय समाज को जानते हैं। मैं कहीं की नहीं रहूंगी। मैंने कई बार राजेन्द्र यादव को फोन किया और एक बार प्रमोद को भी फोन किया- ‘आप सच बोल रहे हैं या कोई मजाक कर रहे हैं। क्या है उस वीडियो में?’
उसने ढंग से बात नहीं की। उसका जवाब था- ‘जब दुनिया देखेगी, तुम भी देख लेना।’ 
जब कई बार फोन करने के बाद भी राजेन्द्र यादव ने मेरी बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया फिर मैंने उन्हें फोन करके कहा कि मैं शाम में आपके घर आ रही हूं। यह छोटी बात नहीं है। आप प्रमोद से बात करिए। 
मेरे साथ जो दुर्घटना हुई, उसके बाद मैने लोगों से बातचीत बंद कर दी थी। अब जब फिर से बातचीत हो रही है तो यह सुनने में आ रहा है कि कुछ लोग कह रहे हैं- ज्योति अगर राजेन्द्र यादव के घर में कुछ गलत काम नहीं कर रही थी, राजेन्द्र यादव के साथ उसके नाजायज संबंध नहीं थे फिर वह वीडियो की बात से डरी क्यों? यहां स्पष्ट कर दूं कि यह वीडियो मेरा और राजेन्द्र यादव का होता तो मैं बिल्कुल नहीं डरती। ना मैं घबरातीं, वजह यह कि प्रमोद राजेन्द्र यादव के पास काम करता था, फिर क्या वह अपने मालिक का वीडियो अपलोड करता? अपलोड करता तो क्या सिर्फ ज्योति की बदनामी होती? क्या राजेन्द्र यादव की नहीं होती। राजेन्द्र यादव का कद बड़ा है। उनकी बदनामी भी बड़ी होती। यदि वे सेफ होते तो मैं भी सेफ होती लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था। वे मुझे बेटी तुल्य मानते रहे थे। मेरे लिए वे पितातुल्य थे। इसका मतलब था कि यदि प्रमोद ने कोई वीडियो वास्तव में बनाया था तो वह मेरे अकेले की वीडियो होगी। मैं राजेन्द्र यादव के यहां काम करती थी तो उनका बाथरूम भी इस्तेमाल करती थी। राजेन्द्र यादव से मेरी घनिष्ठता हो ही गई थी। कई बार जब मेरे घर पानी नहीं आया होता तो राजेन्द्र यादव कहते थे- मेरे घर आ जाओ। डिक्टेशन ले लो और यहीें पर नहा लेना। उनके बाथरूम का कई बार मैने इस्तेमाल नहाने के लिए किया है। मेरा डर यही था, बाथरूम में नहाते हुए कैमरा छुपाकर मेरा नेकेड वीडियो प्रमोद, राजेन्द्र यादव के घर में बना सकता है। एक अकेली लड़की का नेकेड वीडियो जब इंटरनेट पर डाला जाता है तो बिल्कुल नहीं देखा जाता कि वह अकेली है या फिर किसी के साथ है। यदि लड़की वीडियों में नेकेड है तो उसकी बदनामी होनी है, उसकी परेशानी होनी है। इस बात से मैं डरी थी। यदि राजेन्द्र यादव के साथ कोई वीडियो होता फिर डर की कोई बात नहीं थी। यदि राजेन्द्र यादव सेफ हैं तो उनके साथ वाला भी सेफ है। 
वीडियो वाली बात से मैं काफी परेशान थी। परेशान होकर मैं राजेन्द्र यादव के घर पहुंची। एक जुलाई को 6ः30-6ः45 बजे शाम में। मैंने राजेन्द्र यादव से कहा- ‘सर आप मेरे सामने प्रमोद से बात करें कि वह क्या वीडियो है? वह दिखलाए।’
मैं राजेन्द्र यादव को सर ही कहती हूं। उनका जवाब था- ‘मैं प्रमोद को कुछ नहीं कहूंगा। उसे बुला देता हूं, तुम खुद ही उससे बात कर लो।’
यह बातचीत राजेन्द्र यादव के कमरे में हुई। वे उस वक्त शराब पी रहे थे। उनके सामने ही प्रमोद ने अपशब्दों का प्रयोग किया। यह मामला अभी न्यायालय में है। प्रमोद यह आलेख लिखे जाने तक जेल में है। इस पूरी घटना में दुखद पहलू यह है कि यह सब एक ऐसे आदमी की नजरों के सामने हुुआ जिसकी छवि देश में स्त्रियों के हक में खड़े व्यक्ति के तौर पर है। वह मुकदर्शक बनकर अपने कर्मचारी द्वारा एक स्त्री के लिए प्रयोग किए जा रहे अशालीन भाषा को सुनता रहा। वे उस वक्त भी शराब पीने में मशगूल थे, जब उनका कर्मचारी स्त्री के साथ अमर्यादित व्यवहार कर रहा था। इस पूरी घटना के दौरान राजेन्द्र यादव बीच में सिर्फ एक वाक्य प्रमोद को बोले- ‘यार कुछ है तो दिखा दे ना...’
मानों छुपन-छुपाई के खेल में चॉकलेट का डब्बा गुम हो गया हो। जबकि प्रमोद कई बार राजेन्द्र यादव के सामने धमका चुका था- वीडियो इंटरनेट पर अपलोड कर दूंगा। फिर भी वे चुप थे। मैं भी चुप हो जाती। कोई कदम नहीं उठाती लेकिन उसके बाद जो प्रमोद ने किया वह किसी भी स्त्री के लिए अपमानजनक था। मामला न्यायालय में है इसलिए उस संबंध में यहां नहीं बता रहीं हूं। मेरे साथ जो हुआ, उसके बाद मैं समझ गई थी कि मेरा अब यहां से बच कर निकलना नामूमकिन है। मैंने राजेन्द्र यादव के कमरे में रखे टेलीफोन से सौ नंबर मिलाया। उस वक्त राजेन्द्र यादव बोले- ‘यह क्या कर रही हो? फोन रख।’ तब तक दूसरी तरफ फोन उठ चुका था। मैंने फोन पर सारी बात बता दी। मेरे साथ क्या हुआ और मुझे मदद की जरूरत है। 
फोन रखने के बाद अब तक शांत पड़े राजेन्द्र यादव फिर बोले- ‘यह सब क्या कर रही हो? पुलिस के आने से क्या हो जाएगा? बेवजह बात ना बढ़ा।’
पुलिस को फोन मिलाने के बाद प्रमोद शांत हो गया था। राजेन्द्र यादव ने अब प्रमोद से कहा- ‘तू जा यहां से।’ उनकी आज्ञा मिलते ही प्रमोद आज्ञाकारी बच्चे की तरह चला गया। अब राजेन्द्र यादव ने मुझसे कहा- पुलिस को कुछ नहीं बताना है। मैंने कहा- ‘यह नहीं होगा सर। आपके सामने, आपके घर में इतनी बुरी हरकत हुई है मेरे साथ। आपसे मैं बार-बार फोन पर कहती रही कि आप प्रमोद से बात कीजिए लेकिन आपने वह भी नहीं किया। अब मैं पुलिस को सारी बात बताऊंगी।’
यदि मेरे मन में कोई चोर होता तो मैं वहां डर जाती। मेरे मन में कोई चोर नहीं था, इसलिए मैं डरी नहीं। मेरे अंदर सिर्फ इतनी बात थी कि मेरे साथ जो हुआ है, वह गलत हुआ है। इसलिए मैं पुलिस में शिकायत करूंगी। 
राजेन्द्र यादव लगातार मुझे समझाते रहे कि पुलिस में शिकायत करने से कुछ नहीं होगा। सौ नंबर पर उन्होंने रिडायल किया, शायद यह कन्फर्म करने के लिए कि उनके घर से पुलिस के पास फोन गया था या नहीं? जब उधर से कहा गया कि फोन आया था तो यादवजी ने कहा- ‘अब पुलिस को भेजने की जरूरत नहीं है। आपसी मारपीट थी। अब सुलझ गया सबकुछ।’ 
मैं वहीं बैठी थी। मैने दुबारा फोन मिलाया कि पुलिस अभी तक नहीं आई? दूसरी तरफ से मुझसे सवाल पूछा गया- ‘मैडम आप इतनी सुरक्षित तो हैं ना, जितनी देर में पुलिस आप तक पहुंच सके?’
मैंने कहा- सुरक्षित हूं। प्रमोद बाहर बैठा है और राजेन्द्र यादव फोन पर किसी से बात कर रहे हैं। 
पुलिस आई। उन्होंने प्रमोद को थाने ले जाने के लिए पकड़ा। साथ में मुझे भी बयान के लिए ले जा रहे थे। राजेन्द्र यादव ने पुलिस वाले से कहा- ‘क्या इतनी छोटी सी बात के लिए ले जा रहे हो? बैठो यहां। स्कॉच लोगे या व्हीस्की? मेरे पास 21 साल पुरानी शराब है। एक से एक अच्छी शराब है। कहो क्या लोगे?’
लेकिन पुलिस वाले ने कहा- ‘सर लड़की के साथ ऐसा हुआ है। यह छोटी बात नहीं है।’
मेरा कुर्ता खींच-तान में फट गया था। मेरे पास ऐसी खबर आ रही है कि कुछ लोग कह रहे हैं कि ज्योति ने खुद ही अपने कपड़े फाड़ लिए। कोई भी लड़की पहली बात इतनी बेशरम नहीं होती कि अपने कपड़े खुद फाड़ ले। यदि फाड़ेगी तो उसका उद्देश्य क्या होगा? सामने वाले पर इल्जाम लगाना। मैने इसके लिए प्रमोद पर आरोप नहीं लगाया है। मैंने कहा है कि यह खींच-तान में फटा है। 
प्रमोद राजेन्द्र यादव के पास अप्रैल में आया है। वह राजेन्द्र यादव के घर में रहता है। उनके कमरे में सोता है। उसकी गिरफ्तारी भी राजेन्द्र यादव के घर से हुई थी।


आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम