सोमवार, 1 सितंबर 2008

बाढ़ के लिए एक और अभियान

अभियान इसलिए, क्योंकि उत्तर-पूर्वी बिहार के पांच जिलों में आयी यह तबाही महज साधारण बाढ़ नहीं, बल्कि एक नदी के रास्ता बदल लेने की भीषण आपदा है। इस तबाही के कारण 24 लाख से अधिक लोग बेघर हो गये हैं। ऐसे में पूरे देश के हर जिले से जब तक राहत सामग्री न भेजी जाए विस्थपितों की इतनी बडी संख्या को राहत पहुंचाना मुमकिन नहीं। देश में इस आपदा को लेकर अब तक वैसे अभियान नहीं चलाये जा रहे जैसे पिछ्ली त्रासदियों के दौरान चलाये गये थे। संभवतः केंद्र की 1000 करोड़ रुपए की सहायता को पर्याप्त मान लिया गया है। जबकि केंद्र सरकार का यह पैकेज 24 लाख विस्थापितों के लिए ऊंट के मुंह में जीरा से भी कम है। क्योंकि इन्हीं पैसों से टूटे बांधों की मरम्मत और बचाव अभियान भी चलाये जाने हैं। ऐसे में इन विस्थापितों की राहत और पुनर्वास के लिए दो हजार रुपये प्रति व्यक्ति से भी कम बचता है, और इसलिए भी कि यह एक ऐसी जिम्मेदारी है जिससे मुंह मोड़ना कायरता से भी बुरी बात होगी।मदद करेंअगर आप इन विस्थापितों की मदद करना चाहते हैं तो अपने शहर और आसपास के इलाकों से राहत सामग्री हमें भेज सकते हैं या खुद आकर प्रभावित इलाकों में बांट सकते हैं। अगर आप खुद बांटना चाहेंगे तो हम आपको स्थानीय स्तर पर मदद कर सकते हैं।आवश्यक राहत सामग्री
टेंट, कपड़ा - पहनने-ओढ़ने और बिछाने के लिए, दवाइयां, क्लोरीन की गोलियां, भोजन सामग्री, अनाज, नमक, स्टोव, टार्च व बैटरी, प्लस्टिक शीट, लालटेन, मोमबत्ती व माचिसहमारा सम्पर्क : विनय तरुण 092347702353, पुष्यमित्र 09430862739 (भागलपुर), अजित सिंह 09893122102, आशेंद्र भदौरिया 09425782254 (भोपाल)
(मोहल्ला से - ये कोसी का नहीं, करप्‍शन का कहर है - साभार)

रेडियो पर बाल मजदूर


चेतना के माध्यम से पिछ्ले कई सालों से संजय गुप्ता झुग्गी-झोपडी के बच्चों और बाल मजदूरी करने वाले बच्चों के लिए काम कर रहे हैं. 'बात नन्हें दिलों की' उनका नया साहकार है. अब आप इन बाल मजदूरों की आवाज अपने रेडियो पर सून पाएँगे. १०२.६ मेगा हर्ट्ज़ पर. प्रत्येक शनिवार को शाम ५:१५ से ५:४५ तक. इस कार्यक्रम के लिए जो गीत तैयार हुआ है, उसे भी प. दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाले बच्चों ने ही लिखा है. इस कार्यक्रम में बाल मजदूरी करने वाले बच्चे अपने हक़ की बात खुद करेंगे.






















शनिवार, 30 अगस्त 2008

चमचागीरी का लक्ष्य महान

आज जब पुण्य प्रसून वाजपेई की तस्वीर को पोस्ट के तौर पर डाला तो एक बड़ी दिलचस्प सी टिप्पणी आई. पढ़कर मजा बहूत आया. दुःख सिर्फ़ इतना रहा भाई साहब ने बेनामी बनकर टिप्पणी की।
नाम के साथ आते तो उन्हें सलाम करता। उन्होंने यह कहने की हिम्मत तो की। आज मुझे लगता है, हम बोलना भूल गए हैं. शायद इसलिय किसी शायर को कहना पडा- बोल की लब आजाद है तेरे- बोल जूबा अब तक तेरी.

'चमचागीरी का लक्ष्य महान,
इससे सधते सारे काम ।'

अंत में सिर्फ़ इतनी बात यदि वाजपेई को इस तरह के छोटे दर्जे के चमचागिरी से फर्क पङता है तो इस देश में भाट-चारणों की परम्परा रही है. वैसे मुझसे अच्छे-अच्छे पड़े हैं. बहरहाल इतना कि अगली बार बिना किसी फिक्र के अपने नाम के साथ टिप्पणी करे. अच्छा होगा.

मेरे कैमरे में पुण्य प्रसून वाजपेई


गुरुवार, 28 अगस्त 2008

कितना सच: डूसू चुनाव का यह सार्थक प्रयास

आज ही यह मेल मेरे पास आया है, अगर इस बात में सच्चाई है तो एक सराहनीय कदम है। लेकिन यह सिर्फ़ एक मीडिया स्टंट है तो कुछ भी कहना ठीक नहीं है ...
'अब तक ग्लैमर की चकाचौंध से सराबोर रहने वाले डूसू छात्रसंघ चुनाव में प्रत्याशियों द्वारा रिक्शे पर सवार होकर प्रचार की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी. लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय का प्रांगण आज इस घटना का साक्षी उस समय बन गया जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के चारों प्रत्याशी रिक्शे पर सवार होकर प्रचार करने निकले. इस अनूठे प्रयोग को देखकर न केवल छात्र हतप्रभ रह गए बल्कि विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों ने जमकर सराहा. कई लोगों का कहना था कि विद्यार्थी परिषद की इस पहल से अन्य संगठनों को भी सबक लेने की जरुरत है.'

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

छुपे हुए कलाकार


इस गायक से मेरी मुलाक़ात वर्धमान (प. बंगाल) के पास ट्रेन में हुई. ये बांग्ला में एक गीत गा रहे थे, जिसका अर्थ था, प्रेम एक ऐसा रंग है जो एक बार लग जाए तो कभी छूटता नहीं. इनके गीत के साथ बाउल ( एक तरह का इकतारा) और घूँघरू की संगत के तो क्या कहने. इनका नाम असंधो दास है. ये वीरभूम स्थित जाहिरा गाँव के रहने वाले हैं. इन्हें सुनने की इच्छा मन जागृत हो गई हो तो चले जाहिरा.

सोमवार, 25 अगस्त 2008

विकास के रास्ते पर भारत की एक तस्वीर


मेरे दोस्तों की शिकायत है मुझसे कि मैं अपने ब्लॉग में इस तरह की तस्वीरें क्यों लगाता हूँ, मेरा मानना है, जब तक हमारे देश में एक भी व्यक्ति की हालत कुछ ऐसी है जिसे देखने भर से भी बहूत सारे लोगों को 'शर्म' (वैसे यह युग बेशर्मी का है) आए- तो समझिए हमारे देश की तरक्की के सारे दावे खोखले हैं. टाटा-बिरला-अम्बानी- प्रेम जी-मूर्ति- सब फरेब हैं. इस देश की आधी से अधिक आबादी एक वक़्त और दो वक़्त के खाने पर जीने को मजबूर है. उन्हें पता भी नहीं- यह ब्रेक फास्ट किस चिडिया का नाम है? बहूत सारे लोगों के लिए एक वक़्त का खाना मिलना भी मुसीबत है. (इस बच्चे की तस्वीर जमशेदपुर (टाटानगर) रेलवे स्टेशन से ली गई है)




































































आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम