
यह कविता मुझे अपने एक दोस्त से प्राप्त हुई है। कविता अदभूत है लेकिन इसे लिखा किसने है, इसकी जानकारी नहीं है. इस बार आप ब्लॉग बंधुओं के लिए यह कविता 'मिट्टी' . यदि किसी ब्लॉग बंधू को कवि का नाम-पता मालूम हो तो बताएं.
मन भर मिट्टी के नीचे
दबा है मेरा शरीर
...केवल
हाथ बाहर है. ...
वे भी हिल-डूल कर
कुछ समझा रहे हैं
पर कोई नहीं समझता
... आस्थाएं बिखर गईं हैं,
घोषणा हो चुकी है
... कि
प्रतीक कूच कर गए हैं
इस श्रृष्टि से!
मेरे हाथ
क्या कहना चाह रहे हैं
तमाम चिन्तक वर्ग
लगा है इस मनन में ...
यद्यपि
वे कैद कर रहे हैं
प्रतिक्षण परिवर्तन को
डिजिटल कैमरे में।
उनके लिए
हो सकता है
यह दृश्य
मूर्तिशिल्प का विषय
या बड़े कैनवाश का
कोई आधुनिक मॉडल।
कोई नहीं जानना चाहता
कि इन हाथों की
शिराओ में
दौड़ते रक्त को
संचरित करने वाला शरीर
दबा है
मन भर मिट्टी के नीचे ...
और छाती में अभी
धड़कन है बाकि।
'यद्यपि सांसों का रहना
या ना रहना
जीवित होने का
कोई संकेत नहीं।'
मगर इन हाथों के
संकेतों में
समय के बदलाव पर
प्रश्न खड़े करने की क्षमता है.
और
प्रश्न पर प्रश्न दागने का
कौशल भी.
मगर विचार
इसलिए भी पैदा नहीं रहा...
क्योंकि उसके अंत की भी
हो चुकी है
घोषणा .... .
कोई नहीं चाहता
कि सोचे ...
क्या कहना चाह रहा है
यह हाथ!
सभी चलताऊ-उपजाऊ
विचार के फैशन से त्रस्त हैं.
क्योंकि
'आउट ऑफ माइंड' से भयंकर है ...
'आउट ऑफ फैशन' होना.
तब डर रहता है
'आउट डेटिड' होने का!
इसलिए देखो
और हो सके
तो विकसित कर दो
इसके आस-पास कोई सुंदर उद्यान
तुम्हारे समय काटने का
यह यह अच्छा तरीका हो सकता है.
... कभी तो कोई विदेशी
समझेगा इसे ...
तब कैसे छूडा पाओगे पिंड इससे
... इसका पिंडदान तो करना ही होगा.
इसकी चिंता ना करो
चिंता करो अपने चिंतन की
यह जीवित रहेगा
क्योंकि इसके पास
पोषण है मिट्टी का......
और मिट्टी जिसको पोषित करती है
उसको बना देती है
पृथ्वी का हिस्सा ...!