गुरुवार, 5 नवंबर 2015

किताब वापसी अभियानः ‘विरोध’ के स्वर को कौन दबा रहा है

देश में इस तरह का माहौल बनाने की कोशिश की गई मानो इस वक्त देश में कानून का शासन ना रह गया हो। असहिष्णुता जैसा एक शब्द उन लोगों द्वारा चुन कर लाया गया जो सरकार पर दबाव बनाना चाहते थे। ये सभी वह लोग हैं जो नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही यह घोषणा कर चुके थे कि यदि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो देश की सहिष्णुता खतरे में पड़ जाएगी। उनके इस विरोध को जनता ने अधिक तवज्जो नहीं दिया।
 इस वक्त मीडिया में इन मुट्ठी भर लोगों ने ऐसा माहौल बना दिया है, मानों पूरा देश वास्तव में किसी असहिष्णुता शिकार है। यहां हम उन लेखकों और बुद्धिजीवियों के नाम आपके साथ साझा कर रहे हैं, जो इस बात से सहमत नहीं हैं कि देश में साम्प्रदायिक सद्भाव कम हुआ है। समाज में किसी तरह की दूरी है। आप मित्रो से अपील है कि समाज को तोड़ने वालों के साथ नहीं बल्कि उन लोगों के साथ जुड़िए जो समाज को जोड़ना चाहते हैं। (यहां दिए गए नाम वरियता के क्रम में नहीं हैं) -

01. अनुपम खेर
02. गोपाल दास नीरज,
03. विवेकी राय
04. मनु शर्मा
05. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
06. डॉ नामवर सिंह
06. नरेन्द्र कोहली
07. गोविन्द मिश्र
08. विनोद शुक्ल
09. चित्रा मुद्गल
10. नरेन्द्र कोहली
11.कमल किशोर गोयनका
12. मृदुला गर्ग
13. तेजेन्द्र शर्मा
14. गिरीश पंकज
15. अशोक चक्रधर
16. सुधीश पचौरी
17. तेजेन्द्र शर्मा
18. आशीष कुमार ‘अंशु’
19. वेद प्रताप वैदिक
20. तवलीन सिंह
21. मनमोहन शर्मा
22. राजीव रंजन प्रसाद
23. डा दिलीप अग्निहोत्री
24. मृत्युंजय दीक्षित
25. डॉ मयंक चतुर्वेदी
26. संदीप देव
27. सुरेश चिपलूनकर
28. डा. अरूण भगत
29. सुधांशु त्रिवेदी
30. संजीव सिन्हा
31.तरुण विजय
32. हितेश शंकर
33. बलबीर पूंज
34. अरुण जेटली
35. अनिल पांडेय
36. चेतन भगत
37. हर्षवर्द्धन त्रिपाठी
38. प्रसून जोशी
39. व्यालोक पाठक
40. शिवानंद द्विवेदी सहर
41. डॉ सौरभ मालवीय
42. हरीश चंद्र वर्णवाल
42. हरगोविंद विश्वकर्मा
43. शिवशक्ति बख्शी
44. आभा खन्ना
45. पवन श्रीवास्तव
46. स्वामी आदित्य चैतन्य
47. अनुज अग्रवाल
48. डॉ प्रवीण तिवारी
49. कुलदीपचंद अग्निहोत्री
50. पश्यंति शुक्ला
51. राजीव सचान
52. प्रभु जोशी
53. डॉ जयकृष्ण गौड़
54. प्रमोद भार्गव
55. संजय द्विवेदी
56. अवधेश कुमार
57. अकांक्षा पारे
58. दिनेश मिश्र
59. संजय बेंगानी
60. आदर्श तिवारी
61. समन्वय नंद
62. पंकज झा
63. अकांक्षा अनन्या
64. अरुण कुमार जैमिनी
65. सुबोध के श्रीवास्तव
66. विक्की सैनी
67. संजीव कुमार
68. सुभाष चंद्र
69. निशांत नवीन
70. सुभाष शुक्ला
71. मनुकांत दीक्षित
72. मदन मोहन समर
73. आलोक राज
74. रामजी बाली
75. डॉ अविनाश सिंह
76. तारिक अनवर
77. नरेश कुमार चतुर्वेदी
78. वीनू कुमार वर्मा
79. प्रदीप अरोड़ा
80. दीपक झा
81. धीरज कुमार झा
82. अभय कुमार गुप्ता
83. कुणाल श्रीवास्तव
84. श्वेतांक रतनाम्बर
85. नागेन्द्र कौशिक
86. विवेक श्रीवास्तव
87. अशोक एस उपध्याय
88. गोपाल कुमार झा
89. विशाल भटनागर
90. सविता राज हिरेमठ
91. पंडित हरी प्रसाद चौरसिया
92. मधुर भंडारकर
93. विवेक अग्निहोत्री
94. विद्या बालन
95. एस एल भयरप्पा
96. श्याम बेनेगल
94 कमल हसन
95. अनूप जलोटा
96. मनिष मुन्द्रा
97. पंडित चेतन जोशी
98. दया प्रकाश सिन्हा
99. नरेश शांडिल्य
100. अमिष त्रिपाठी
101. चिदानंद मूर्ति
102. पाटिल पूतप्पा
103. पी वलसारा
104. यूए खादर
105. पी नारायण कुरुप
106. रवीना टंडन
107. विकास सिन्हा
108. सुदर्शन पटनायक
109. जी माधव नायर
110. हरीश चन्द्र वर्मा
111. प्रियदर्शन
112. अक्कीतम
113. एस रमेशन नायर
114. जी श्रीदत नायर
115. पी परमेश्वरन
116. थुरावूर विश्वम्बरन
117. प्रो मेलाथू चन्द्रशेखरन
118. के बी श्रीदेवी
119. सुरेशगोपी
120. मेजर रवि
121. अलप्पा रंगनाथ
122. जया विजया
123. विशेष गुप्ता
124. फिरोज बख्त अहमद
125. सुधांशु रंजन
126. उमेश चतुर्वेदी
127. भवदीप कांग
128. अनंत विजय
129. शोबरी गांगूली
130. हरीश कुमार
131. चन्द्रकांत प्रसाद सिंह
132. अशोक ज्योति







शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

कोई यह खत रवीश कुमार तक पहुंचा दे





रवीशजी कुमार,
आपको यह पत्र लिखने का आयडिया आपके पत्रों को पढ़कर आया। यह सोचकर लिख रहा हूं कि पत्र लिखने वाले को पत्र की कद्र होगी। आपको अपने लिखे किसी खत का जवाब नहीं मिला, लेकिन आप इस खत का जवाब देंगे। ऐसा मैं सोच रहा हूं।
मुझे याद है कि रवीश की रिपोर्ट का किस तरह एक समय इंतजार रहता था। रवीश की रिपोर्ट के साथ बड़े हो रहे पत्रकारिता के छात्रों के समूह में एक विद्यार्थी मैं भी था। आपकी रिपोर्ट की वजह से उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे और दलितों/ वंचितों के पक्ष में हमेशा खड़े रहे रिंकू राही से मिला और महाराष्ट्र में डिक्की वाले मिलिन्द काम्बले से। आपकी रिपोर्ट ने मुझे इनसे मिलने के लिए प्रेरित किया।
अचानक एक दिन एनडीटीवी का एक होर्डिंग नजर आया। यह होर्डिंग दिल्ली में चिड़िया घर और लोदी रोड़ के आस-पास कहीं लगा था, जिसका दावा यह था कि रवीश कुमार हिन्दी के नम्बर वन पत्रकार हैं। जबकि इस तरह का दावा यह होर्डिंग किस आधार पर कर रही थी, इसका उल्लेख पूरे होर्डिंग में कहीं नहीं था। जबकि मेरी जानकारी में रवीश की रिपोर्ट की टीआरपी भी अच्छी नहीं थी। जिसका रोना गाहे बगाहे आप भी रोते ही रहे हैं। 
हमे नम्बर से इतना प्रेम क्यों हैं रवीशजी? मैने जब आपको गांव और दलितों की कहानी करते देखा था तो सोचा था कि आपको नम्बर से प्रेम नहीं है। आप नम्बर के खेल से बाहर हैं। इसलिए आप प्रिय रहे हैं लेकिन आप भी नम्बर से प्रेम करने लगे। मेरा अपना अनुभव इस नम्बर गेम को लेकर अच्छा नहीं है। रवीश अगर एक ब्रांड है, जिसे एनडीटीवी बेच रहा है अच्छे पैकेजिंग के साथ तो यह उसकी मार्केटिंग पॉलिसी है, लेकिन रवीश कुमार इस सबके बावजूद अपने अंदर के रवीश कुमार को बचाए रखें, यह तो रवीश की जरूरत थी। लेकिन महानता के इस खेल के शिकार होते हुए आप प्राइम टाइम एंकर की नई भूमिका में नजर आए। जहां आप एंकर कम अपने पैनल के ‘पापा’ की भूमिका में अधिक थे। 
रवीशजी जबसे आपको मैने टीवी चैनल पर देखा है, आप सिर्फ सवाल पूछते हुए नजर आए हैं। कभी यह नहीं सोचा जो आपको देख रहे हैं, उनके अंदर भी बहुत से सवाल हैं। यही लोग जब आपसे सवाल पूछते हैं, आप झट से उन्हें गुंडा कह देते हैं। जब आप कहते हैं कि आपको मां बहन के नाम पर अपशब्द लिखा जा रहा है और यह हिन्दूवादी ताकतें या नरेन्द्र मोदी के पेड एजेन्ट कर रहे हैं तो एक पत्रकार होने के नाते आपको इस बात का प्रमाण भी देना चाहिए था। ना कि अन्ना हजारे के अभियान की तरह अभियान पर सवाल उठाने वाले हर एक शख्स को भ्रष्टाचारियों के पाले में डाल देना चाहिए। आप फेसबुक पर रहें या ना रहें लेकिन बुश की तरह यह घोषणा तो करते हुए विदा ना हों कि जो हमारे खिलाफ है वह आतंकवाद के साथ है। 
इंदिरा गांधी के समय भारत के लोग कहते थे कि इंदिरा नहीं रहेंगी तो यह देश कैसे चलेगा? आप भी कहीं इसी तरह के किसी भ्रम के साथ फेसबुक और ट्यूटर पर मौजूद तो नहीं थे?
एक साहित्यकार ने यह किस्सा मुझे सुनाया था कि जब उसकी जान खतरे में थी, उसने आपको फोन किया था। यह वह समय था, जब दिल्ली निर्भया मामले की वजह महिला सुरक्षा के अलग-अलग सवालों से जुझ रही थी, ऐसे समय में एक पत्रकार के नाते और इंसान के नाते जब आपको उसकी मदद करनी चाहिए थी, आपने कहा कि आप इस तरह की खबरों का लोड नहीं लेते। रवीशजी कुमार यही बात फोन पर एक पीड़िता को विजयजी गोयल, विजयजी जॉली या विजयकुमरजी मल्होत्रा ने कही होती तो आप उनसे किस किस्म के सवाल पूछते? एक बार उन्हीं संभावित सवालों के जवाब आप देना पसंद करेंगे? या -जवाब देने की सारी जिम्मेवारी राजनेताओं की है और पत्रकार सिर्फ सवाल पूछने के लिए पैदा होते हैं- इस तरह की राय में आप यकिन रखते हैं। 
रवीश बंगाल में एक चर्च में एक बुजूर्ग महिला के साथ बलात्कार की खबर आई थी। आपके मित्र और जनसत्ता के पूर्व संपादक ओमजी थानवी ने खुर्शीद अनवर कथित बलात्कार मामले में कहा था कि जब तक बलात्कारी के नाम की पुष्टी ना हो, आप मामले में कथित लगाइए। जबकि रवीशजी कुमार बंगाल चर्च की उन बुजूर्ग महिला के मेडिकल रिपोर्ट को पढ़े बिना आपने मामले को बलात्कार का मामला बताया। दूसरी बात आपने उस मामले के लिए दोषी हिन्दूवादी संगठनों को बताया। बाद में बंगाल में हुई उस घटना में कुछ मुस्लिम युवक गिरफ्तार हुए और आपकी माफी आज तक नहीं आई। 
प्राइम टाइम में दिखने वाला आपका अहंकार ही है जो आपकी आलोचना करने वाले हर एक व्यक्ति को आपकी नजर में ‘गुंडा’ बना देता है। इसी वजह से इन दिनों आपकी रिपोर्ट में वह धार भी नजर नहीं आती जो पुराने रिपोर्ट में हुआ करती थी। मुझपे यकिन ना कीजिए, अपनी ही रिपोर्ट की पुरानी फूटेज देखिए। 
जब एक राजनीतिक दल में हुई किसी घटना के लिए पूरी पार्टी जिम्मेवार होती है, ठीक इसी प्रकार एनडीटीवी पर उठ रहे सवालों से आप यह कहकर नहीं बच सकते कि आप वहां नौकरी करते हैं। चाहे वह कोका कोला के साथ मिलकर चलाया जा रहा कार्यक्रम हो या फिर बरखा दत्त से जुड़े सवाल। या फिर वेदांता से चैनला की मित्रता या फिर आपके द्वारा खुद को इस तरह पेश किया जाना मानों पूरी पत्रकारिता को आपने ही बचा कर रखा हो। इन सवालों के जवाब सार्वजनिक मंच पर आकर देने से आप क्यों बच रहे हैं? मीडिया स्कैन के मंच पर मैं आपको न्योता देता हूं। आइए। यकिन दिलाता हूं, पूरी बातचीत में कोई आपके लिए अपशब्द का इस्तेमाल नहीं करेंगा। वर्ना रोज रोज सवाल पूछते पूछते कहीं आपके साथ ऐसा ना हो कि आप जवाब देना ही भूल जाएं। 
बहरहाल रवीशजी, हिन्दी की पत्रकारिता की आप चिन्ता ना कीजिए। आप नहंी होंगे, कोई और होगा। आपके ही चैनल में रवीश रंजन ने बुंदेलखंड से और हृदयेश जोशी ने असम से बेहतरीन रिपोर्ट की। आपने भी देखी ही होगी। उनके मुकाबले पिछले दिनों आई आपकी रिपोर्ट कमजोर थी। बिना होमवर्क किए एक मोहल्ले में एक व्यक्ति को साथ लेकर जाना। वहां से फूटेज इकट्ठा करके आधा घंटे का प्रोग्राम बना देना। पिछले दिनों अपने रिपोर्ट में यही आपने किया। शायद आपको लगता है कि आप सेलिब्रिटी एंकर हैं और आप जो भी पड़ोस देंगे देखने वाले उसे वाह वाह करके देख लेंगे। रवीशजी आप गलत सोचते हैं, देखने वाले आपको पहले इसलिए पसंद करते थे क्योंकि पहले आप अपनी रिपोर्ट पर होमवर्क करते थे। 
अंत में फेसबुक और ट्वीटर से जाना किसी समस्या का समाधान नहीं है। इसलिए लौट आइए और सवाल पूछते हैं तो जवाब देने का भी हौसला रखिए। बाकि जो है सो हइए है...

 आपके रवीश की रिपोर्ट का नियमित दर्शक
आशीष कुमार ‘अंशु’



रविवार, 21 जून 2015

नई सरकार में क्यों हैं पावरफूल ‘गर्भस्थ स्वयंसवेक’?

नई सरकार बनने के बाद कई सारी कहानियां भी एक के बाद एक करके बन रहीं हैं। खबर तो अखबार और पत्रिकाओं में छप जाती है लेकिन कहानियां, इसे तो कोई भी नहीं छापता और यह कहानियां ना छपती हैं और ना दर्ज हो पाती हैं। वैसे इन कहानियांे को भी दर्ज होना चाहिए, जिसके बाद आने वाले समय में विचारधारा के साथ खड़े होने वाले नए रंगरुटों को उस धूर्तता का भी पता चले जो उसके पूर्ववर्ती करके गए हैं।
यूं तो यह कहानी नई सरकार और एक व्यक्ति के पुरानी वैचारिक प्रतिबद्धता के प्रति बरते जाने वाली धूर्तता की है। लेकिन सच तो यह है कि यह व्यक्ति की नहीं, प्रवृति की कहानी है। 
नरेन्द्र कई दिनों से नए वाले गृहमंत्री के घर और दफ्तर के चक्कर लगा रहे हैं। सुनने वाले बता रहे थे कि नई सरकार में उनकी कोई बात पक्की होनी है। नरेन्द्र की कहानी से पहले उनका थोड़ा सा परिचय। नरेन्द्र आईसा के साथ कॉलेज राजनीति में सक्रिय थे। बाद के दिनों में प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रमों में भी देखे जाते रहे हैं। स्वभाव से कवि हैं। बाबरी मस्जिद के गिरने को वे यूपीए की सरकार में विश्व इतिहास का सबसे काला दिन मानते थे। एनडीए सरकार के आन के बाद वह बाबरी मस्जिद को राम जन्मभूमि कहना पसंद करते हैं, चूंकि अब तक इस बयान का दस्तावेजीकरण नहीं हुआ है, इसलिए प्रमाण के अभाव में उस संज्ञा के जिक्र को प्रामाणिक ना माना जाए। देश में किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक तनाव के पीछे यूपीए काल में वे आरएसएस का हाथ देखते थे। एनडीए सरकार में उनका नजरिया बदल चुका है, जिसका जिक्र यहां नहीं किया जा रहा, कारण- ऊपर बताया गया है। उनकी एक कविता है, 
‘कौव्वा उड़ा मंदिर से और जा कर बैठा मस्जिद पर, ब्राम्हणवादी ताकतों ने कह कर धर्मान्तरण,
पूरे शहर में करा दिया दंगा। 
नीक्कर पहन के आ गए दंगाई, पुलिस वाला भी ना ले सका जिनसे पंगा।’
नरेन्द्र के परिचय के साथ अंिभ का परिचय कराना भी जरूरी है। जिनका इन्काउंटर गृहमंत्री के घर पर नरेन्द्र से हुआ और यह पूरी कहानी बनी। अंिभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हैं। दिल्ली में रहकर विद्यार्थी परिषद की राजनीति की। विश्व हिन्दू परिषद का दायित्व दो साल पहले तक उनके पास था। नई सरकार में ‘जायजा मंत्रालय’ उनके पास है। वे एक के बाद एक मंत्रालय का जायजा लेते रहते हैं। इस महती जिम्मेवारी को उठाने का संकल्प उन्होंने खुद अपने ऊपर ले रखा है। दिल्ली के हर एक मंत्रालय की छोटी बड़ी खबर आप उनसे पा सकते हैं। अंिभ को एक बार खबर मिल जाए इसका सीधा सा अर्थ है कि वह खबर आठ पहर में वायरल होने वाली है। 
गृहमंत्री के घर पर कॉमरेड नरेन्द्र ने जैसे ही स्वयंसेवक अंिभ को देखा, उससे नजरे चुराने लगे लेकिन कब तक? पकड़े गए। अंिभ जानते थे कि कॉमरेड नरेन्द्र कई दिनों से सरकार की एक सलाहकार समिति में जगह बनाने के लिए मंत्रीजी के घर और दफ्तर के चक्कर काट रहे हैं।
जब स्वयंसेवक अंिभ से नजर मिल गई तो कॉमरेड नरेन्द्र मुस्कुराते हुए उनसे मिले और उनके दोनों हाथों को अपने हाथ में लेकर झुलाने लगे। 
‘जानते हैं अंिभजी हमरा परिवार तो बाल्यकाल से ही स्वयंसेवक रहा है। मेरे चाचाजी, मेरे पिताजी सभी स्वयंसेवक हैं। मैं भी बचपन में शाखा जाता था। बाल्यकाल से स्वयंसेवक हूं। इस देश का ऐसा कौन सा हिन्दू बालक होगा जो बचपन में शाखा ना जाता हो?’
कॉमरेड नरेन्द्र की यह भाषा स्वयंसेवक अंिभ के लिए चौंकाने वाली थी। अंिभ मसखरी के मूड में थे, अंिभ ने कहा-
आप बाल्यकाल स्वयंसेवक हैं, यह अच्छी बात है लेकिन संघ में गर्भस्थ स्वयंसेवक की बात अधिक सुनी जाती है। यदि आप गर्भस्थ स्वयंसेवक होते तो यहां आने की जरूरत ही नहीं पड़ती। प्रचारक ही एक चिट्ठी लिख देते और घर बैठे-बैठे आपका काम हो जाता।’
कॉमरेड नरेन्द्र ने पहली बार गर्भस्थ स्वयंसेवक का जिक्र सुना था। उनकी रूचि जगी कि यह गर्भस्थ स्वयंसेवक क्या होता है और एनडीए सरकार में यह इतना पावरफूल क्यों है?
स्वयंसेवक अंिभ ने समझाया -
गर्भस्थ स्वयंसेवक उन संतानों को कहते हैं, जिनके मां-बाप दोनों स्वयंसेवक परिवार से आते हों। मतलब दादा और नाना दोनों संघी हों। 
कॉमरेड नरेन्द्र समझ गए थे कि गर्भस्थ स्वयंसेवक होना नई सरकार में बहुत काम की चीज है। लेकिन वे समझ नहीं पा रहे थे, कि खुद को गर्भस्थ स्वयंसेवक साबित कैसे किया जाए?
रास्ता स्वयंसेवक अंिभ ने सुझाया- संघ के इतने संगठन देश भर में चलते हैं कि संघ वालों को ही पता नहीं है। आगे से बता दिया कीजिए कि मैं गर्भस्थ स्वयंसेवक हूं और मेरे नाना जी ‘प्रगतिशील हिन्दू महासभा’ के संयोजक थे उज्जैन में। किसे पता चलेगा?
स्वयंसेवक अभि ने गर्भस्थ स्वयंसेवकों का महिमागान करते हुए फूसफूसा के कहा, मानों कोई अति राज की बात कर रहे हों- आप जानते हैं, प्रधानमंत्री के पीछे छह गर्भस्थ स्वयंसेवकों को लगाया गया है। प्रधानमंत्री कब मुतने जाते हैं, यह बात चाहे एसपीजी को पता ना हो लेकिन गर्भस्थ स्वयंसेवकों को उन्हें यहां तक की जानकारी रिपोर्ट करनी पड़ती है। गर्भस्थ स्वयंसेवकों का इस राज में कोई काम नहीं रूक रहा।
कॉमरेड नरेन्द्र को यह बात जम गई लेकिन इस तरह की बात स्वयंसेवक अंिभ से करते हुए वे झंेप गए थे। अपनी झेंप मिटाने का प्रयास करते हुए उन्होंने कहा- ‘वैसे मैने संघ का फर्स्ट ईयर किया है?’
स्वयंसेवक अंिभ ने पूछ लिया- पास हुए थे कि फेल?
एक बार पुनः कॉमरेड नरेन्द्र फंस गए। उन्होंने पूछा- ‘मतलब?’
‘आपने फर्स्ट ईयर किया है संघ का तो बताइए, एक गांव में एक सौ मुस्लिम परिवार रहता है और आपका परिवार अकेला हिन्दू परिवार है। ऐसे में एक संघ फर्स्ट ईयर पास स्टूडेन्ट होने के नाते आपका कर्तव्य क्या है?’
कॉमरेड नरेन्द्र ने सोचा भी नहीं था कि फर्स्ट ईयर पास करने के लिए ये संघ वाले इतना कम्यूनल किस्म का सवाल पूछते हैं।
स्वयंसेवक अंिभ ने मुस्कुराते हुए कहा- इसका मतलब आप फेल हुए थे, फर्स्ट ईयर में। 
कॉमरेड नरेन्द्र ने सिर झुकाकर कहा, बहुत पुरानी बात है, अब याद नहीं।
स्वयंसेवक अंिभ ने कहा- यह बात कोई संघ वाला नहीं भूल सकता क्योंकि उन्हें बताया जाता है कि अपना नाम भूल जाना लेकिन यह लेसन नहीं भूलना।
कॉमरेड नरेन्द्र से कुछ कहते नहीं बन रहा था। अंिभ ने उन्हें समझाया- नरेन्द्रजी इस तरह जब आप संघ वाला होने का झूठा दावा करेंगे तो यूं ही पकड़े जाएंगे। अच्छा होगा कि आप संघ की शाखा जाइए, वहां देखिए और जो देखिए वह लिखिए। 
कॉमरेड नरेन्द्र समझ गए थे कि उनका झूठ पकड़ा गया है। वैसे आज एक सरकार है और कल एक नई सरकार आज जाएगी। सरकार आज है कल बदल जाएगी लेकिन आपका बोला हुआ झूठ नहीं बदलेगा और किसी भी तरह के समझौते के लिए बोला गया झूठ आपको हमेशा झूठा बनाए रखेगा। यदि वैचारिक प्रतिबद्धता को निभाने का दम नहीं है तो बेवजह के झूठे दावों से बचना ही बेहतर है।
(उंगलबाज.कॉम, हमारी विश्वसनीयता संदिग्ध)

गुरुवार, 19 जून 2014

सब हमारे चाहने वाले हैं, हमारा कोई नहीं

पीर सोना गाजी कभी एशिया के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया में बसते थे। बाद में उन्हीं के नाम से इस रेड लाइट एरिया का नाम सोनागाछी पड़ गया। इतिहासकार देबोजीत बंदोपाध्याय और रजत रे के अनुसार एक समय यह नृत्य और कला का केन्द्र हुआ करता था। अंग्रेजो के आने के बाद यह जगह शास्त्रीय संगीत के केन्द्र से यौनकर्मियों के अड्डा के तौर पर विकसित हुआ। समय के साथ बहुत कुछ बदला और निश्चित तौर पर यौनकर्म भी बदला। इसी का परिणाम है कि कोलकाता की यौनकर्मी आज सरकार पर इस बात के लिए दबाव बना रहीं हैं कि सरकार यौन कर्मियों को कानूनी अधिकार दे और दलाल-पुलिस के गिरोह से मुक्त करे। यदि सरकार ऐसा करने में सक्षम नही होती तो कोलकाता की यौनकर्मी इस बार लोकसभा चुनाव में नोटा का बटन दबाएंगी।
कोलकाता शहर में यौनकर्मियों के बीच लंबे समय संे काम कर रही भारती देव बताती हैं-
‘बीस सालों से हम विभिन्न राजनीतिक दलों का वादा सुन रहे हैं कि ‘हमारी सारी मांगे वे पूरी कर देंगे।’ राजनीतिक दल वाले ना सिर्फ वादा करके गए बल्कि हमारी मांग पत्रों पर उनका हस्ताक्षर भी मिल जाएगा लेकिन जब बात आती है, चुनाव से पहले इसे अपने घोषणा पत्र में शामिल करो, सभी राजनीतिक दल शुचितावादी बन जाते हैं। कब तक हमें इस तरह ये राजनीतिक पार्टियां ऊल्लू बनाती रहेंगी?’
 यह खबर लिखे जाने तक सोनागछी की ग्यारह हजार यौनकर्मी महिला मतदाताओ ने तय किया है कि इस बार वे मतदान नहीं करेगी। यदि लोकतंत्र के सम्मान में उन्हें मतदान केन्द्र तक जाना पड़ा तो इनमें से कोई नहीं (नोटा) का बटन दबाएंगी।
भारती देव कहती हैं- ‘जब लोकतंत्र में यौनकर्मियों के लिए अपने रोजगार के साथ जीने का अधिकार नहीं है फिर अपनी कमाई का एक दिन कतार में लगकर व्यर्थ करने जैसा ही होगा, इनके लिए।’
कोलकाता (नॉर्थ), जहां इस बार लोकसभा चुनाव में कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है, इन ग्यारह हजार मतों की सही कीमत वे प्रत्याशी बता सकते हैं, जो इस क्षेत्र में खड़े हैं। लेकिन यौनकर्मियों के जीवन की यही विडम्बना है, उनका साथ हर कोई चाहता है लेकिन उनके साथ दिखना कोई नहीं चाहता।
यहां तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय, कांग्रेस से सोमेन मित्रा और सीपीएम की रूपा बागची में कड़ा मुकाबला है। ये सभी प्रत्याशी यौनकर्मियों से व्यक्तिगत बातचीत में उनके साथ होने के तमाम वादे करते हैं लेकिन यौनर्मियों की मांग उनके घोषणापत्र में शामिल क्यों नहीं है, का ठीक-ठीक जवाब वे नहीं दे पाते।
कोलकाता के रेड लाइट एरिया में रहने वाली महिलाओं का नाम 1990 तक मतदाता सूचि में शामिल नहीं था। इस नाम के लिए उन्हें लंबा संघर्ष करना पड़ा। पहचान पत्र ना होने की वजह से उनका राशन कार्ड नहीं बन सकता था। उनका बैंक में खाता नहीं खुल सकता था। उनके बच्चों का स्कूल में नामांकन नहीं हो सकता था।
सोनागाछी की सेक्स वर्कर्स ने कुछ समाज सेवियों की मदद से उषा कॉपरेटिव बनायां। उषा कॉपरेटिव बैक अपनीे तरह का अनोखा बैंक है, जिसे यौनकर्मियों द्वारा यौनकर्मियों के लिए चलाया जाता हैै। उषा सहकारी समिति ने चुनाव आयोग को निवेदन भेजा कि उषा सहकारी बैंक में चल रहे बचत खाते को पहचान पत्र माना जाए।
चुनाव आयोग ने इस निवेदन को स्वीकार किया और इस तरह उनके अपने उषा कॉपरेटिव ने उन्हें अपनी पहचान दी। डॉ. स्मरजीत जेना लंबे समय से यौनकर्मियों के अधिकार के लिए लड़ रहे है। डा जेना बताते हैं कि उषा कॉपरेटिव के लिए जब यौनकर्मियों का दल आवेदनपत्र लेकर पहली बार गया था तो परिचय में यौनकर्मी देखकर वहां मौजूद अधिकारी ने सुझाव दिया कि यौनकर्मी की जगह गृहिणी लिखना सही होगा।
आवेदन लेकर गई महिलाओं के समूह में से जब एक महिला ने अधिकारी को कहा कि अभी तो मैं यौनकर्मी ही हूं, यदि आप मुझसे शादी कर लें तो गृहिणी हो जाऊंगी। क्या आप मुझसे शादी करेगे?  इसका जवाब अधिकारी नहीं दे पाए। इस तरह यौनकर्मियों का पहला अपना कॉपरेटिव बैक बना।
2004 में सीपीएम के उम्मीदवार सुधांशु यौनकर्मियों द्वारा यौनकर्म को कानूनी अधिकार दिए जाने के संबंध में  निकाली गई यात्रा में शामिल हुए थे। 2009 में तृणमूल के सुदीप बंदोपाध्याय ने यौनकर्मियों द्वारा काूननी अधिकर दिए जाने संबंधी विज्ञप्ती और पुलिस-दलाल  की मिली भगत से मुक्ति से जुड़ी विज्ञप्ती पर हस्ताक्षर भी किया था। लेकिन नेताओं के हस्ताक्षर और वादे चुनाव तक के लिए होते हैं, इस बात को कोलकाता के यौनकर्मी इस बार समझ गई हैं।
आमतौर पर सोनागाछी की एक यौनकर्मी को कमरे के किराए का महीने में दो से ढाई हजार रुपए देना पड़ता है। उन्हें एक घंटे के लिए डेढ़ सौ रुपए मिलते हैं। जिसमें पैंतीस से चालिस फीसदी हिस्सा पुलिस, दलाल और स्थानीय गंुडों का होता है। यौनकर्मियों की मांग है कि पुलिस जब खुद यह धंधा चलवा रही है फिर इस धंधे को कनूनी अधिकार देने में क्या अर्चन है? अर्चन सिर्फ इतनी है कि दलालों और पुलिस की आमदनी पर रोक लग जाएगी। वैसे सोनागाछी में ऐसी यौनकर्मी भी हैं जो एक घंटे के लिए दस से पन्द्रह हजार रुपए भी लेती हैं। हाल में इंकम टैक्स के छापे में सोना गाछी से दो करोड़ रुपए नकद बरामद हुए। यही वजह है कि कोलकाता पुलिस की जुबान में इसे सोने की खदान कहते हैं।
खबर लिखे जाने तक कोलकाता की यौनकर्मियों ने तय कर लिया है कि इस बार वे ‘इनमें से कोई नहीं’ विकल्प के साथ मतदान केन्द्र तक जाएंगी क्योकि वे जान गईं हैं कि नेता यौनकर्म को कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त नहीं होने देंगे। दुर्बार की महासिता मुखर्जी कहती हैं- हालात यही रहे तो संभव है कि अगले चुनाव में यौनकर्मियों की तरफ से उनका अपना कोई उम्मीदवार मैदान में हो।


आशीष कुमार ‘अंशु’
09868419453

शुक्रवार, 23 मई 2014

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का रिजर्वेशन काउंटर कब होगा दलाल मुक्त?

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन अक्सर जाना होता है। दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी पुरानी दिल्ली स्टेशन के बिल्कुल सामने है और अपनी यात्राओं के लिए टिकट बनाने पुरानी दिल्ली स्टेशन के रिजर्वेशन टिकट काउंटर पर भी जाता हूं। बार-बार पुरानी दिल्ली के रेलवे रिजर्वेशन काउंटर पर इस उम्मीद से जाता हूं कि इस बार दिल्ली का यह टिकट काउंटर दलाल मुक्त हो गया होगा। हर बार निराश होकर ही लौटा हूं। दिल्ली में सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त टिकट एजेन्ट भी उसी कतार में खड़े होकर टिकट लेते हैं, जिसमें आम लोगों को टिकट लेना होता है।
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के एक काउंटर पर खड़े एजेन्ट ने ही बताया कि लगभग बारह सौ से लेकर पन्द्रह सौ एजेन्ट पुरानी दिल्ली में टिकट बेचने के लिए सक्रिय हैं। यह एजेन्ट जब इंटरनेट पर बुकिंग बंद दिखला रहा हो, उस समय भी अंतिम समय में टिकट करा सकते हैं। पैसे आप उन्हें वह दीजिए, जो उनको चाहिए और टिकट वे आपको वह दिला देंगे, जो आपको चाहिए। कई बार आपको भ्रम हो सकता है, यह टिकट के दलाल हैं या फिर जादूगर।
इन टिकट दलालों की शक्ति देखनी हो तो आप कभी पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के रिजर्वेशन काउंटर पर चले जाइए और देखिए वहां टिकट दलालों ने क्या हाल बना रखा है? दुखद यह है कि काउंटर पर बैठे टिकट बनाने वाले सरकारी कर्मचारी भी मानों उन्हीं के लिए अंदर बैठे हैं। इन टिकट दलालों द्वारा पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर फैलाई जा रही अव्यवस्था हर किसी को नजर आता है लेकिन ना जाने क्यों जीआरपी, सीआरपीएफ या फिर रेलवे इंटेलिजेन्स को यह बस क्यों नजर नहीं आता?
नियम से एक व्यक्ति को रेलवे काउंटर पर एक बार में दो से अधिक टिकट नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मानों यह कानून तो आम आदमी के लिए है, टिकट एजेन्ट पर कोई नियम लागू नहीं होता। पैसों के इस लेन-देन का खुला खेल कोई भी आम आदमी समझ सकता है लेकिन रेलवे इंटेलीजेन्स की समझ में ना जाने यह सारी बात क्यों नही आती?
दो तीन दिन पहले जब मैं अपना रेलवे टिकट वापस करने गया था, इसी तरह एक टिकट काउंटर पर कतार में लगे लोगों की अनदेखी करके जब काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने एक टिकट दलाल के लिए दो-तीन-चार-पांच-छह टिकट बना लिया तो उसका विरोध करना लाजमी था। मैने विरोध में बोला। यह देखकर दो तीन लोगों ने, जो कतार में लगे थे, मेरा साथ दिया।
इस शोर शराबे से स्थिति थोड़ी संभली। लेकिन यह स्थिति संभली सिर्फ एक काउंटर पर, जिस पर यह शोर शराबा हुआ था। उस वक्त शायद ही पुरानी दिल्ली में ऐसी कोई कतार हो, जिसमें सात-आठ ऐसे लोग ना हो, जो टिकट की दलाली करते हैं।
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन नीयमित जाने की वजह से कई ऐसे चेहरे अब पहचानने लगा हूं, जो सुबह से देर रात तक पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ही रहते हैं। संभव है, ये सब रेलवे द्वारा अधिकृत एजेन्ट के प्रतिनिधि हों।
इसी रेलवे स्टेशन पर सुनने को मिला, ‘
‘ये जो लोग काउंटर पर दलालों के खिलाफ शोर मचा रहे हैं, ये सभी अरविन्द (केजरीवाल) के लोग हैं।’
 यह सुनकर एक रेलवे टिकट दलाल बोला- ‘अरविन्द तो गए। अमेठी से उसके कवि की जमानत जप्त हो गई। अब अच्छें दिन आए हैं।’ 
इसका मतलब क्या, दिल्ली में बेईमानी के खिलाफ बोलने वाला हर एक व्यक्ति आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता माना जाएगा। यह सवाल मेरे लिए महत्वपूर्ण था। आम आदमी पार्टी और अरविन्द से तमाम असहतियों के बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ उठने वाली हर एक आवाज की पहचान, आम आदमी पार्टी बन गई है। 
इस बात पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों को सोचना चाहिए।
आज यह सवाल मेरे लिए जरूर अहम है, देश की राजधानी दिल्ली जब इतने प्रयासों के बावजूद दलाल मुक्त नहीं हो पा रही तो देश के दूसरे हिस्सों का मालिक अल्लाह ही होगा!

मंगलवार, 20 मई 2014

उंगलबाज.कॉम, हम उंगली करते नहीं मौजू सवालों पर उंगली रखते हैं...

उंगलबाज.कॉम की बात होती है तो अधिकांश मित्र समझते हैं कि यह किसी वेवसाइट का नाम है। लेकिन वे नहीं जानते कि उंगलबाज.कॉम वर्चूअल स्पेस में वर्चूअल वेवसाइट है। यह कपिल शर्मा के लाफ्टर शो में लिए जाने वाले उस इंटरव्यू की तरह है, जो इटरव्यू लिया तो एक पत्रिका के लिए जाता है लेकिन वह पत्रिका कभी छपती नहीं है।
उंगलबाज शब्द से कुछ लोगों को आपत्ति है। वे कहते हैं कि यह ठीक नहीं है, क्योंकि वे समझते नहीं कि उंगल का अर्थ उंगलबाज के लिए उंगली करना नहीं है बल्कि यह उन मसलों पर उंगली रखने के अर्थ में, जिस पर आम तौर पर लोग बात करते नहीं या फिर उन मसलों पर बात करना नहीं चाहते।
उंगलबाज.कॉम की तरफ से इस तरह के मसलों पर लगातर वीडियो अपलोड किया जा रहा है। आते-जाते रहिए।

कुछ महत्वपूर्ण वीडियों के लिंक यहां आपके साथ शेयर कर रहा हूं.....




शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

लाल किला गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन 2014

गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन श्रोताओं के लिए संभव है पांच-आठ घंटे चलने वाला एक सांस्कृतिक कार्यक्रम हो लेकिन मंचिय कवियों के लिए इस बात का प्रमाण पत्र है कि अब वे भी मंचिय कविता के लाल किला क्लब में शामिल हो गए हैं। एक बार लाल किला क्लब में जो कवि शामिल हो जाए। वह मंचिय कविता का श्रेष्ठ कवि मान लिया जाता है। यह गौरव देश के किसी भी दूसरे मंचिय कवि सम्मेलन को प्राप्त नहीं है। जब ऐसे कवि सम्मेलन में पैरवी से आए कवि सुनने को मिलते हेैं तो तकलीफ स्वाभाविक है।
वर्ष 2014 का लाल किला कवि सम्मेलन सुरेन्द्र शर्मा के संचालन में सम्पन्न हुआ। इस संचालन में वे थके हुए से नजर आए, कई बार वे मंच पर होकर भी लगा मंच पर नहीं हैं। यूं कहिए कि हिन्दी अकादमी ने कोई जिम्मेवारी दी है तो उन्हें ना कहते नहीं बना, सो चले आए जैसी स्थिति थी। ‘ओरिजनल’ सुरेन्द्र शर्मा मंच पर नजर नहीं आए। यूं भी तीस कवियों को संचालित करना आसान काम तो नहीं होता। जब सुरेन्द्र अपने अंदाज में श्रोताओं से अनुरोध कर रहे थें कि वे अपना मोबाइल सायलेन्ट मोड पर डालकर जेब में रख लें, उस दौरान और आगे कविता के बीच में तमाम कवि मंच पर मोबाइल में उलझे नजर आए। बिना इस बात की परवाह किए कि यदि कवि स्वयं अनुशासित नहीं होंगे, फिर वे श्रोताओं से अनुशासन की अपेक्षा किस मुंह से रखेंगे? मंच पर कई कवियों ने लाल किले के कवि सम्मेलन का बखान किया लेकिन कवि सम्मेलन खत्म होने तक आधे से भी कम कवि मंच पर बैठे थे। जिस कवि सम्मेलन को अंतिम तक सुनने के लिए कवि स्वयं अंतिम तक बैठने को तैयार नहीं हैं, उस कवि सम्मेलन के लिए कैसे वे उम्मीद रखते हैं कि सोनिया गांधी उनके मंच तक आएंगी और अंतिम कवि तक बैठ कर सुनेगी। कवियों ने इस मंच की गरीमा को इतना कम किया है कि कभी अंतिम कवि तक जिस कवि सम्मेलन को नेहरू सुनते थे, उस कवि सम्मेलन को अब दिल्ली सरकार की मंत्री भी अंतिम कवि तक सुनना पसंद नहीं करती। दिल्ली के मुख्यमंत्री मुशायरे में जाना मंजूर करते हैं लेकिन भूलकर भी कवि सम्मेलन का रास्ता नहीं पकड़ते। इस मंच पर एक कवित्री ऐसी भी थी, जो कवि सम्मेलन में मौजूद होकर भी मौजूद नहीं थी।
कुछ भर्ती के कवियों को छोड़ दिया जाए- जिनमें कुछ अपने अधिकारी होने का लाभ लेकर कवि सम्मेलन में घुस आए होंगे- तो इस बार मंच ने श्रोताओं का पूरा प्यार बटोरा। जब कवि सम्मेलन प्रारंभ हुआ था, आम आदमी की टोपी दर्जनों सिरों पर पड़ी थी। कवि सम्मेलन में आम आदमी पार्टी कई कवियों के निशाने पर रही, शायद इसी का परिणाम था कि सम्मेलन खत्म होते-होते चंद सिरों पर यह टोपी रह गई थी।
इस कवि सम्मेलन की उपलब्धि रहे, पदम्श्री बेकल उत्साही। इस कवि सम्मेलन के साथ इस बुजूर्ग कवि ने ऐसी याद जोड़ दी है कि आने वाले समय में इस कवि सम्मेलन को इसलिए भी याद किया जाएगा क्योंकि इसमें बेकल उत्साही ने काव्य पाठ किया था। पूनम वर्मा और बलराम श्रीवास्तव पहली बार लाल किला कवि सम्मेलन में आए थे और पहली ही बार में उन्होंने खुद को साबित किया और खूब जमंे।
सुरेश नीरव मंच पर आए तो इस दावे के साथ थे कि वे अपने पाठ के दौरान श्रोताओं से ताली डिमांड नहीं करेंगे और मंच से बार-बार ‘आशीर्वाद’मांगते पाए गए। सुरेश नीरव साहब को अपनी अच्छी रचना के साथ बोरिंग भूमिका से बचना चाहिए क्योंकि जो लोग कविता सुनने आए हैं, उनकी समझदारी पर अधिक संदेह करना कविजी अच्छी बात नहीं होती। भारत भूषण आर्य पूरे कवि सम्मेलन के अकेले ऐसे कवि रहे, जिन्हें श्रोताओं ने सबसे अधिक बे आबरू किया और वे हिट विकेट होकर पवेलियन लौटे।
आलोक श्रीवास्तव के साथ मंच संचालक सुरेन्द्र शर्मा ने अच्छा नहीं किया। मंच की कविता की थोड़ी समझदारी रखने वाला व्यक्ति समझ सकता है कि विनीत चौहान और मदन मोहन समर नाम के दो मजबूत चक्कियों के बीच आए आलोक श्रीवास्तव का क्या हुआ होगा? प्रवीण शुक्ल मंचिय कविता के पुराने शार्प शूटर हैं, उसके बावजूद मदन मोहन समर की कविता का जादू जो भूत की तरह श्रोताओं पर चढ़ गया था, उसे उतारने के लिए प्रवीण को काफी मशक्कत करनी पड़ी। प्रवीण ने अपंने अंदाज में तब तक समर के गीत ‘थाम तीरंगा करो घोषण हिंन्दुस्तान जवान है... कि पैरोडी की, जब तक दर्शकों ने अपने हाथ खड़े नहीं कर लिए।
‘तुमने दस-दस लाख दिए हैं, सैनिक की विधवाओं को
सोचा कीमत लौटा दी है, वीर प्रसूता माओं को,
मैं बीस लाख देता हूं, तुम किस्मत के हेटों को
हिम्मत हैं तो मंत्री भेजे लड़ने अपने बेटों को।
विनीत चौहान की इन चार पंक्तियों पर देर तक पंडाल में तालियों की गूंज सुनाई देती रही।
इस कवि सम्मेलन में दिनेश रघुवंशी का नाम ना लिया जाए तो, कवि सम्मेलन के लिए की गई पूरी बात अधूरी रह जाएगी। मेरी राय में वर्ष 2014 गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन में रघुवंशी सर्वश्रेष्ठ कवि रहे । कश्मीर जनमत संग्रह पर रघुवंशी की चार पंक्तियों खूब सराही गईं-

‘अगर गैरत है तो शरहद के रखवालों से भी पूछो
वतन जिनके लिए सबकुछ है मतवालों से भी पूछो,
अगर कश्मीर में जनमत कराना चाहते हो तो
वहां कुर्बान हर सैनिक के घरवालों से भी पूछो।’

कुंवर बेचैन, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, सर्वेश अस्थानाा और सरिता शर्मा की उपस्थिति से मंच की गरिमा बढ़ी।

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम