सोमवार, 30 मई 2011

हर सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है : डॉ विनायक सेन

जब विनायक सेन से बातचीत हुई थी, वे पीयूसीएल के एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए दिल्ली आये थे। उस वक्त तक योजना आयोग के स्वास्थ संबंधी समिति में उनके सदस्य बनने की घोषणा नहीं हुई थी। इसलिए उस मुद्दे पर कोई सवाल यहां शामिल नहीं है। उनसे चितरंजन पार्क स्थित एक घर में लंबी बातचीत हुई। बातचीत के कुछ अंश:-



विनायक सेन को लेकर मीडिया और समाज में दो तरह की छवि है। एक विनायक सेन, जिन्हें हमेशा देश के दुश्मन के तौर पर पेश किया जाता है, दूसरे विनायक सेन वे जो आदिवासियों के शुभचिंतक हैं और गरीब समाज के मसीहा हैं। दोनों विचार अतिवादी हैं। इस तरह एक आम भारतीय असमंजस की स्थिति में है कि वह इन दोनों में से किसे सच माने और किसे झूठ! यदि हम मीडिया की नजर से इस मसले को न समझें और आपसे जानना चाहें कि कौन है ‘विनायक सेन’, तो आपका जवाब क्या होगा?
इस तरह के सवालों को मैं वाजिब नहीं मानता। मेरे लिए कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा कि कौन मेरे लिए क्या सोचता है? लोग मुझे लेकर क्या बात करते हैं? मैं हमेशा इस बात को महत्व देता हूं कि मैं क्या करता हूं। हो सकता है कि यही वजह हो कि मैं अपने लिए कही गयी किसी बात को अधिक महत्व नहीं देता।

वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई की। आप वहां गोल्ड मेडलिस्ट रहे। एक शिशु रोग विशेषज्ञ के नाते आप देश में देश के बाहर वह जिंदगी चुन सकते थे, जहां पांच सितारा अस्पताल के वातानुकूलित कमरे होते और बड़ी-बड़ी गाड़ियों से आने वाले मरीज। आपने तीस साल छत्तीसगढ़ में क्यों लगाया? कोई खास वजह?
छत्तीसगढ़ 1981 में आ गया था। उसी साल मैंने छत्तीसगढ़ माइन्स श्रमिक संगठन के साथ काम करना शुरू किया। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश एक ही हुआ करते थे। उससे पहले कुछ दिनों मैं होशंगाबाद भी रहा था। मैने हमेशा एक डॉक्टर और एक पीयूसीएल के कार्यकर्ता की हैसियत से ही काम किया है। शंकर गुहा नियोगी से प्रभावित था, उनसे प्रभावित होकर ही होशंगाबाद से रायपुर का रुख किया था। अपने तीस साल के सामाजिक जीवन में मैं महसूस कर रहा हूं, देश में एक तरफ तरक्की की बात की जा रही है और दूसरी तरफ देश के एक बड़े हिस्से में स्थायी अकाल की परिस्थितियां व्याप्त है, जिसे किसी भी सभ्य समाज के लिए अभिशाप समझा जा सकता है।


आपने अपने एक वक्तव्य में अंग्रेजी के एक शब्द जीनोसाइड (जन संहार) को एक नये अर्थ में परिभाषित किया, जिसमें आप मानते हैं कि भूख से हो रही लगातार मौतों को भी उसी श्रेणी में रखना चाहिए। क्या देश भर में कुपोषण से हो रही लगातार मौतें भी एक प्रकार का जन संहार है?
शरीर के वजन और लंबाई के आधार पर व्यक्ति का बॉडी मास इंडेक्स तय होता है। जिन व्यक्तियों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम है, इसे वयस्‍क व्यक्ति में स्थायी कुपोषण का स्वरूप माना जाएगा। हैदराबाद स्थित नेशनल न्यूट्रिशन मॉनिटरिंग ब्यूरो के अनुसार देश के 37 प्रतिशत व्यक्तियों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम है। 05 साल से कम उम्र के 45 प्रतिशत से अधिक बच्चे अपनी उम्र और वजन के हिसाब से कुपोषण के शिकार हैं। कुपोषित बच्चों की हमारे देश में संख्या, दुनिया भर के कुपोषित बच्चों की आधी बैठती है। हमारे देश में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत पर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय की एक वरिष्ठ प्रोफेसर उत्सा पटनायक का अध्ययन है। उन्होंने अपने 2005 तक के अध्ययन के आधार पर कहा कि पिछले दस सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत अपने देश में कम हुई है। दस साल पहले पांच लोगों का एक परिवार जो 880 किलोग्राम औसत अनाज साल भर में खर्च करता था। उस परिवार में वर्ष 2005 आते-आते यह खपत घटकर 770 किलोग्राम पर आ गयी है। यह गिरावट 110 किलोग्राम की है। पूरे देश में 37 प्रतिशत लोगों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम है। यदि सिर्फ सीड्यूल ट्राइव्स की बात की जाए, तो यह आंकड़ा 50 फीसदी से भी अधिक है। 18.5 से कम बॉडी मास इंडेक्स वाले लोगों की संख्या सीड्यूल कास्ट में 60 फीसदी से भी अधिक है। सच्चर समिति की रिपोर्ट कुछ इसी तरह की तस्वीर अल्पसंख्यकों की भी बताती है। विश्व स्वास्थ संगठन कहता है कि किसी समुदाय में 40 फीसदी से अधिक लोगों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम हो तो उस पूरे समुदाय को अकालग्रस्त माना जाना चाहिए। यदि हम विश्व स्वास्थ संगठन द्वारा तय मानकों को अपने आंकड़े में लागू करें, तो यह देखने को मिलेगा कि कई समुदाय ऐसे हैं जो अकाल की स्थिति में जी रहे हैं। साल दर साल इतिहास का रास्ता तय कर रहे हैं और अकाल उनके जीवन का साथी है।

देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार आम आदमी के हितों का वादा करके सत्ता में आती है। जितनी भी सरकारी योजनाएं बनती हैं, वह सभी आम आदमी के हित में बनती है। फिर यह कहना कितना ठीक होगा कि सरकार आम आदमी विरोधी है?
सरकार का मुद्दा बेहद अहम है। आज सरकार उन्हीं सब चीजों को अपने निशाने पर ले रही है, जिन पर कई समुदाय जी रहे हैं। इनकी पहुंच में जो सामुदायिक संपदा है, उनसे इन्हें महरूम किया जा रहा है। पानी, जंगल, जमीन जिनके आधार पर ये जी रहे हैं, उन्हें योजना के साथ इनसे अलग किया जा रहा है। उन वंचित समुदायों को बताया जा रहा है कि जिस जमीन पर तुम रहते हो, जिस नदी का पानी पीते हो, जिस जंगल से जीवन यापन करते हो – वह सब तुम्हारा नहीं, सरकार का है। सरकार गरीब लोगों से सारे संसाधन छीन कर निजी कंपनियों को सौंप रही है। 1991 के बाद शासन के जो भी कार्यक्रम चल रहे हैं, वे सभी प्राइवेट कॉरपोरेट हित में ही हैं। गरीब से छीन कर जमीन बड़ी-बड़ी निजी कंपनियों को देना अपने देश की तरक्की के लिए है। अत्याचार पहले भी गरीबों पर हुए हैं। लेकिन पहले उस अत्याचार के साथ एक शर्म होती थी। लोग अत्याचार को अत्याचार स्वीकार करते थे। लेकिन अब इन सभी अत्याचारों को तरक्की की तरकीब के रूप में देखा जा रहा है।

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यदि यह स्थिति बनी है कि सरकारें जन विरोधी काम कर रहीं हैं, तो आदिवासी समाज के लोग सरकार के खिलाफ अपना विरोध कैसे दर्ज करें?
उत्तरी अमेरिका में, ऑस्ट्रेलिया में आदिवासी समाज को खत्म किया गया। दुनिया भर में इस बात के उदाहरण हैं कि किस प्रकार पूंजीपति वर्ग ने आदिवासियों का शोषण किया है। इस देश की सरकार और पूंजीपतियों का गठजोड़ आदिवासियों से उनका हक छीनना चाहता है। सरकार और पूंजीपतियों के इस दोस्ती को पहले पहचानना जरूरी है, उसके बाद हम इस सरकारी रणनीति के खिलाफ रणनीति ईजाद कर सकते हैं।

एक तरफ हमारे पास नंदीग्राम और सिंगुर का उदाहरण है, जहां लड़कर किसानों ने अपन हक वापस लिया और दूसरी तरफ अहिंसा के साथ पिछले 25 सालों से चल रहा नर्मदा बचाओ आंदोलन का उदाहरण है, फिर क्या अपना अधिकार पाने के लिए समाज को सिंगुर वाला मॉडल ही अपनाना होगा?
एक मानवाधिकार संगठन के साथ काम करने के नाते कभी अपनी तरफ से मैं हिंसा की पैरवी नहीं कर सकता। चाहे वह किसी की भी हिंसा हो, सरकार की या किसी और की। इस वक्त देश भर में जो संपदा की लूट चल रही है, उसके खिलाफ खड़े हुए आंदोलनों को हिंसा के तौर पर निरूपति किया जा रहा है। जब तक प्राकृतिक संपदा की इस खुली लूट को सरकार समाप्त नहीं करेगी, देश में शांति का माहौल तैयार होना संभव नहीं है। एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के नाते हम चाहते हैं कि देश में बराबरी का माहौल बने, सबके लिए न्याय हो और शांति हो।

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यदि इन तमाम शांति प्रक्रियाओं के बाद भी एक आदिवासी को उसका हक न मिले और उलटे उसे उसकी ही जमीन से बेदखल कर दिया जाए, तो क्या उसके बाद भी भूख से मर जाने तक उसे सत्याग्रह का दामन नहीं छोड़ना चाहिए?
देखिए हम भी एक प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। हमारे पास भी हर सवाल का जवाब नहीं है। हमें इस सवाल का जवाब तलाशना होगा, मैं उस खोज का साथी हूं। मैं मानता हूं सवाल महत्वपूर्ण है, रास्ता नहीं है। हम एक लोकतांत्रिक संरचना वाले देश में जी रहे हैं। इसके लिए कोई राह समाज को ही निकालना होगा। हमारे देश का सर्वोच्च न्यायालय कहता है, देश में गैर बराबरी बहुत अधिक है। एक ही देश में दो तरह के लोग स्वीकार्य नहीं हैं। पीयूसीएल की तरफ से जो हमारी बैठक थी, उसमें हमने तय किया है, राजद्रोह जैसे कानून को रद्द करने की मांग रखेंगे। पीयूसीएल और अन्य मानवाधिकार से जुड़े संगठन देश भर से दस लाख लोगों के हस्ताक्षर इस कानून के खिलाफ इकट्ठा करेंगे।

कल को यदि सर्वोच्च न्यायालय में आप पर लगे सारे आरोप गलत साबित होते हैं, तो आपके जो साल जेल के अंदर-बाहर होते बीते हैं, उसकी वापसी की कोई राह न्यायालय से निकलेगी?>
इन सालों में मेरा बहुत नुकसान हुआ। मेरे बहुत सारे काम अधूरे रह गये। अब तो खुद को व्यवस्थित कर पाना ही मेरे लिए बड़ी चुनौती है। वैसे सच्चाई तो यह है कि हर सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है।

गुरुवार, 19 मई 2011

अरविन्द गौड़ को गुस्सा क्यों आता है?

कोलकाता के एक दोस्त ने उस मीठाई वाले की कहानी सुनाई थी। जो अपनी मीठाई की जरा सी शिकायत सुनकर गुस्से से भर जाता था। उस दूकान वाले को जानने वाले यह भली प्रकार से जानते थे, बोली में थोड़ा कड़कपन है लेकिन मीठाई में मिलावट नहीं करता। मिलावाट के अलावा उसकी मीठाई में दूसरे तरह की कमियां हो सकती थी, मसलन चीनी अधिक होना, खट्टापन आना। ईमानदारी से काम करने की वजह से उसकी मीठाई की कीमत स्वाभाविक है, दूसरे दुकानदारों से अधिक थी। उस दुकानदार ने जिस तरह अपनी ईमानदारी के साथ कभी समझौता नहीं किया और बाजार में मिलावटखोरों का दबाव होने के बावजूद वह ईमानदारी से बाजार में जमा रहा, यदि इस ईमानदारी के साथ उसने गुणवत्ता से भी समझौता नहीं किया होता तो शक नहीं कि फिर उसके काम की पूरे शहर में धाक होती।
15 तारिख की शाम श्रीराम सेन्टर में बगदाद के टीवी पत्रकार मुंतजिर अल जैदी की पुस्तक ‘द लास्ट सेल्यूट फॉर प्रसिडेन्ट बुश’ पर आधारित नाटक ‘द लास्ट सेल्यूट’ का प्रदर्शन था, मंडी हाउस में नाटक खत्म होने के बाद एक महिला के सवाल पर जिस तरह निर्देशक अरविन्द गौड़ ने प्रतिक्रिया की, उसे देखने के बाद कोलकाता के मीठाई वाले की कहानी याद हो आई। जो मीठाई वाला शुद्धता का पोषक, नेकनियत और ईमानदार था। गौड़ साहब के थिएटर के प्रति प्रतिबद्धता को कौन सेल्यूट नहीं करेगा? इस तरह उनसे दर्शकों की अपेक्षा का बढ़ जाना, अनायास नहीं था। अब आप ही कहिए, आप अरविन्द गौड़ द्वारा निर्देशित नाटक देखने जाएं और पूरी तैयारी में पटकथा से लेकर ध्वनि संयोजन तक में कई खामियां नजर आए तो हम जैसे आम दर्शक को भी लगता है कि यह और बेहतर हो सकता था। गौड़ साहब के प्रश्न आमंत्रित करने पर जब यही बात दर्शक दिर्घा से आई तो गौड़ साहब चुप कराने के अंदाज में थिएटर के लिए अपने समर्पण और त्याग की कहानी सुनाने लगे। जबकि जिन महिला ने सवाल पूछा था, वह लंबे समय से थिएटर से जुड़ी रहीं हैं। उनका थिएटर के प्रति समर्पण अरविन्द गौड़ से कम तो नहीं माना जा सकता।

जवाब में गौड़ साहब ने जो कहा, उनके कहने का कुल जमा लब्बोलुआब यही था कि उन्होंने बिना किसी सरकारी मदद के थिएटर को जिन्दा रखा है। चूंकि वे प्रतिबद्धता के साथ थिएटर के साथ जुड़े हैं, इसलिए किसी व्यक्ति का अधिकार नहीं बनता कि उनके काम की आलोचना करे! क्या दर्शकों से सवाल पूछने का आग्रह मात्र इसलिए था, कि लोग एक एक करके उठे और वाह गौड़ साहब वाह बोलकर बैठ जाएं।
द लास्ट सैल्यूट के एक दृश्य में मुंतजिर की प्रेमिका उनसे खुद को भूला देने की बात करती हैं। चूंकि उसकी शादी उसके चचेरे भाई से होने वाली है। क्या इस बिछड़ने की वजह सीया-सुन्नी वाला मसला है या फिर निर्देशक इशारों-इशारों में जूता फेंकने वाले प्रसंग को दिल टूटने से जोड़कर यह बताना चाहते हैं कि जूता प्रकरण की वजह अमेरिका द्वारा बरपाई गई तबाही से मुंतजीर के अंदर उपजी बुश के लिए बेपनाह नफरत मात्र नहीं थी। कुछ और भी था। द लास्ट सैल्यूट में बहूत शोर के बीच में मुंतजीर की कहानी की आत्मा कहीं खो गई थी।
यह बात भी समझना सबके बस की बात नहीं है कि जिस मुंतजिर की तुलना गौड़ साहब भगत सिंह से करते नहीं थक रहे थे, उस मुंतजिर ने अपना आदर्श महात्मा गांधी को बताया।
बहरहाल काम के प्रति अरविन्द गौड़ की प्रतिबद्धता को सलाम लेकिन महीनों लगकर संयम के साथ पारलेजी की बिस्किट और राव साहब के चाय के साथ गौड़ साहब रिहर्सल करते हैं। थोड़ा संयम रखकर यदि वे आलोचनाओं को भी सुन लें तो महेश भट्ट के शब्दों में ‘आलोचना के लिए उठे हाथ तराशने के भी काम आएंगे।’

सोमवार, 2 मई 2011

जंतर मंतर पर मजदूर मांग पत्रक आंदोलन



मजदूर मांग पत्रक आंदोलन के बैनर तले छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, पंजाब और दिल्ली से मजदूरों का एक बड़ा वर्ग दिल्ली के जंतर मंतर पर अपनी मांगों के साथ इकट्ठा हुआ। मजदूर दिवस के 125 वंे वर्ष पर इस आंदोलन का आगाज हुआ,





जिसकी खास बात यह है कि इसमें किसी खास राजनीतिक या गैर राजनीतिक दल/व्यक्ति के पास इसका नेतृत्व नहीं है।




इस जुटान के संयोजकों का कहना है कि इस आंदोलन में कई धारा के लोगों की भागीदारी है लेकिन वे इसे देश भर के मजदूरों के सांझा और एकजुट लड़ाई के तौर पर इसे आगे बढ़ाना चाहते हैं।



आंदोलन की प्रमुख मांगेः-



- काम के घंटे आठ करो
- जबरन ओवर टाइम बंद करो
- न्यूतम मजदूरी ग्यारह हजरा रुपए करो
- ठेका प्रथा खत्म करो




- कारखाना में सुरक्षा के पूरे हों इन्तजाम
- किसी भी प्रकार के दुर्घटना की स्थिति में मुआब्जे की रकम पूरी मिले



- स्त्री मजदूरों के साथ भेदभाव ना बरतों
- बाहर से आए प्रवासी मजदूरों का शोषण बंद करो



- सभी घरेलू और स्वतंत्र मजदूरों का पंजीकरण हो
- मालिकों की अंधेरगर्दी रोको



- श्रम विभाग के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाओ
- सभी श्रम कानून सख्ती से लागे हों

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

बस्तर में पोस्टर, अरुंधति-अग्निवेश से रिश्ता???

बस्तर में इन दिनों यह पोस्टर जगह जगह दिख रहा है। यह जानकारी मेल से मिली। इस पोस्टर में अरुंधति राय, स्वामी अग्निवेश और अरुणा राय की तस्वीर है। पोस्टर देख कर यही लगता है कि बयान इनकी तरफ से जारी हुआ है।



लेकिन इसमें प्रकाशित सामग्री को लेकर थोड़ी भ्रम की स्थिति है। क्या आपमें से कोई इस भ्रम को दूर कर सकता है?

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

वास्तविक सफलता संदिग्ध होगी!

यदि अण्णा का आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ है
तो खबर का सौदा करने वाले अखबार
और चैनल दोनों को
कायदे से अण्णा के खिलाफ होना चाहिए।
यदि वास्तव में यह आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ है
तो देश के उद्योगपतियों और धनबलियों को
इस आंदोलन के खिलाफ होना चाहिए,
यदि वास्तव में यह आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ है
तो जिन एनजीओ के खुद के अकाउंट
दुरुस्त ना हों,
जिन एनजीओ में हिसाब किताब को लेकर
पारदर्शिता ना बरती जाती हो,
उन सबको इस आंदोलन से डरना चाहिए,

यदि आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ है
तो विकास के पैसों के कमिशन से
अपना धन जोड़ने वाले नेताओं को
इससे दूर रहना चाहिए।
क्या ऐसा हो रहा है
यदि नहीं तो आंदोलन कागजी सफलता पा ले
लेकिन उसकी वास्तविक सफलता संदिग्ध होगी।

मंगलवार, 29 मार्च 2011

दिल्ली के कामकाजी बच्चो के बीच फीफ्टीन-फीफ्टीन








जब भारतीय टीम का मैच दूसरे देशों की क्रिकेट टीमों के साथ होता है, तो स्टेडियम में तिरंगें के तीन रंगों में रंगे हुए चेहरे, भारतीय क्रिकेटरों के समान नीली जर्सी पहने हुए लोगों और छक्कों तथा चौकों के नारे लगाते हुए देश प्रेम की भावना से भरी भीड़ का नजारा देखते ही बनता है। क्योंकि क्रिकेट सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला और दुनिया भर में लोकप्रिय खेल है। हर व्यक्ति इन मैचों को देखना पसंद करता है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि इन दिनों वर्ल्ड कप 2011 का बुखार पूरी तरह से लोगों के सिर चढ़ चुका है और दिलचस्प बात यह है कि भारतीय टीम भी सेमीफाइनल में अपनी जगह बनाने के योग्य बन चुकी है। लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण और दिलचस्प खबर यह है कि इस वर्ल्ड कप के दौरान बुधवार को भारत और पाकिस्तान के बीच खेला जाने वाला यह पहला मैच होगा, जो कि अपने आप में ही एक बड़ी खबर है। अब तो दांव पर दांव भी लगाए जा रहे हैं कि कौन वर्ल्ड कप जीतेगा। क्रिकेट के दीवाने लोग भारतीय टीम की विजय के लिए उपवास, हवन, प्रार्थना आदि कर रहे हैं। इनकी इस फेहरिस्त में सड़क व कामकाजी बच्चों की भी एक अच्छी खासी संख्या है, जो क्रिकेट के अत्यधिक प्रेमी हैं।

भारतीय टीम का हौसला अफजाई करने लिए सड़क एवं कामकाजी बच्चों ने भीे अपनी कठिन और व्यस्ततम दिनचर्या के बावजूद ‘‘सड़क की गुगली’’ नाम का एक क्रिकेट मैच खेला। यह मैच सड़क एवं कामकाजी बच्चों के साथ कार्यरत संगठन चेतना द्वारा प्लान इंडिया के सहयोग से आयोजित किया गया। इस टूर्नामेंट के मैच विभिन्न सीरीजों में भारत के अलग-अलग शहरों जैसे- झांसी, ग्वालियर और आगरा में खेले गए। टूर्नामेंट का फाइनल मैच 29 मार्च, 2011 को इंद्रप्रस्थ पार्क (सराय काले खां के समीप) में सुबह 10ः30 बजे आयोजित किया गया। यह मैच दो टीमों निजामुद्दीन टीम और वेस्ट दिल्ली टीम के बीच खेला गया। प्रत्येक टीम में 11 खिलाड़ी थे और यह ट्वेन्टी-ट्वेन्टी की तर्ज पर फीफ्टीन-फीफ्टीन मैच था। अर्थात दोनों टीमों ने पन्द्रह-पन्द्रह ओवर की गेन्दबाजी की। टूर्नामेंट को जीतने के लिए 37 रनों का लक्ष्य रखा गया। आखिरकार, निजामुद्दीन टीम ने धुआंधार बल्लेबाजी करते हुए चार विकेटों से टूर्नामेंट का यह फाइनल मैच जीत लिया। मैच का समापन टीम इंडिया के विजय घोष के नारों व खुशियों से भरे माहौल के साथ हुआ। विजेता टीम के कप्तान ने कहा कि यह जीत हमारे लिए उतनी मायने नहीं रखती, जितनी कि टीम इंडिया का वर्ल्ड कप जीतना हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हम भारतीय टीम को विश्व की सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट टीम मानते हैं।

वास्तव में जिस प्रकार से क्रिकेट में गुगली का अर्थ एक ऐसे खेल से है, जो फेंके जाने के बाद अपनी दिशा बदल लेती है। ठीक उसी प्रकार सड़क व कामकाजी बच्चे भी होते हैं, जो उचित मार्गदर्शन मिलने पर गुगली के समान अपने जीवन की दिशा बदल सकते हैं। हमें उम्मीद है और हम चाहते हैं कि इन नन्हें खिलाड़ियों के पसीने व्यर्थ न जाएं, क्योंकि यह केवल एक क्रिकेट मैच नहीं है बल्कि यंग इंडिया के लिए जयकार और मुस्कान का एक कारण भी है।

मंगलवार, 22 मार्च 2011

सीहोर एक्सप्रेसः रफ्तार पर गरीबी की लगाम

मध्य प्रदेश जहां की आवाम ने हमेशा अच्छे खिलाड़ियों को आंखों पर बिठाकर रखा है। जहां की सरकार भी गांव और छोटे कस्बों से खेल के क्षेत्र में बेहतर करने की संभावना वाले कम उम्र की प्रतिभाओं को तलाशने के लिए प्रयत्नशील है। जिससे इन खिलाड़ियों की प्रतिभा को योग्य कोच की देखरेख में बेहतर प्रशिक्षण देकर निखारा जा सके। आज विश्व कप के रोमांच में जब पूरा देश डूबा है तो कुछ बातें आप सब के साथ सांझा करने को दिल करता है। चूंकि यह मौका माकूल है, कभी और ये कहानी आपके सामने आई तो हो सकता है, असामयिक कहकर उसे आप खारिज कर दें।



मुद्दे की बात पर आता हूं, मैं आप सबके साथ ‘सीहोर एक्सप्रेस’ मुनीस अंसारी की कहानी सांझा करना चाहता हूं। जिस पर ना जाने कैसे मध्य प्रदेश में चल रहे तमाम सरकारी गैर सरकारी प्रयासों की नजर ना अब तक नहीं पड़ी। जबकि इस खिलाड़ी के तेज रफ्तार गेन्द की सनसनाहट को सिर्फ भोपाल ने नहीं बल्कि ऑल इंडिया स्कॉर्पियो स्पीड स्टार कांटेस्ट के माध्यम से देश भर ने महसूस किया। वह राज्य की राजधानी भोपाल से महज 25-30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटे से कस्बे सीहोर से ताल्लुक रखता है। उसने भी सीहोर की गलियों में बल्ले और गेन्द के साथ उसी तरह खेलना शुरु किया था जैसे उसके बहुत से साथियों ने किया था। लेकिन वह अपने साथियों की तरह यह खेल सिर्फ टाईम पास के लिए नहीं खेल रहा था। क्रिकेट देखते ही देखते उसके लिए जुनून बन गया।
सीहोर की गलियों में क्रिकेट खेलने वाला मुनीस कभी सीहोर एक्सप्रेस नहीं बनता, यदि उसे स्पीड स्टार कांटेस्ट की जानकारी नहीं मिलती। सीहोर की गलियों के इस तेज गेन्दबाज के गेन्द का सामना करने के लिए मुम्बई के एक बड़े से मैदान में स्पीड स्टार मुकाबले के फाइनल में हरभजन सिंह उतरे। सिहोर एक्सप्रेस की पहली गेन्द को हरभजन समझ नहीं पाए और उनके तीनों विकेट हवा में बिखर गए। दूसरी गेन्द में हरभजन के हाथ का बल्ला दो टूकड़ों में बंट गया और तीसरी गेन्द पर हरभजन के हाथ का बल्ला छीटक कर दूर जा गिरा। मुनिस उस दिन 134 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से गेन्द फेंक रहे थे। उनके गेन्द की अधिकतम रफ्तार 145 किलोमीटर प्रतिघंटा थी। जिसे खेल पाना किसी भी बल्लेबाज के लिए मुश्किल की बात होगी। उसकी गेन्दबाजी की प्रतिभा को देखकर मैदान में मौजूद उस समय भारतीय टीम के कोच ग्रेग चैपल, कप्तान राहुल द्रविड़, वसीम अकरम, जोन्टी रोट्स, और किरण मोरे खासे प्रभावित हुए। दक्षिण अफ्रिका के खिलाड़ी जोंटी रोट्स ने तो मुनीस के खेल को देखकर क्षेत्र रक्षण (फिल्डिंग) के लिए दस में से नौ अंक दिए। बावजूद इसके मध्य प्रदेश की सरकार ने उसे आज तक रणजी खेलने के लायक भी नहीं समझा।



मुनीस के अनुसार उसका चयन अब तक राष्ट्रीय टीम में हो चुका होता, यदि उसका भी कोई गॉड फादर होता। उसका जन्म एक गरीब परिवार में हुआ। उसके पिता मुस्तकीन अंसारी एक दिहाड़ी मजदूर हैं। परिवार की हालत अच्छी नहीं होने की वजह से वर्ष 2000 में मुनीस ने क्रिकेट खेलना छोड़ दिया था। चार साल उसने एक कंपनी में बतौर सीक्यूरिटी गार्ड काम किया। यह मुनीस की जिन्दगी के वे चार साल थे जब ‘दीवान बाग क्रिकेट क्लब’ और क्रिकेट कही पिछे छूट गया और मुनीस रोटी के लिए मशक्कत में लग गया था। उसका क्रिकेट के साथ रिश्ता खत्म ही हो जाता यदि इसी बीच एक टेलीविजन चैनल पर तेज गेन्दबाजों की तलाश के संबंध में विज्ञापन नही आया होता। इस विज्ञापन को देखने के बाद बड़े भाई युनूस अंसारी ने मुनीस को क्रिकेट में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। ग्वालियर में चार हजार गेन्दबाजों के बीच पूरे मध्य प्रदेश से इकलौते मुनीस का चयन इस प्रतियोगिता में हुआ।



ऑल इंडिया स्कॉर्पियो स्पीडस्टार कांटेस्ट’ रियालिटी शो का प्रसारण चैनल सेवन (अब आईबीएन सेवन) ने किया। यह कार्यक्रम क्रिकेट प्रेमियो के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ था। पांच साल पहले हुए इस कांटेस्ट के बाद मुनीस का नाम मध्य प्रदेश के क्रिकेट प्रेमियो की जुबान पर छा गया। सिर्फ इस नाम को प्रदेश रणजी ट्राफी की चयन समिति नहीं सुन पाई। वरना बात आश्वासनों तक दब कर नहीं रह जाती। मुनीस का चयन भी होता।
खेलने की उम्र निश्चित होती है। ऐसे में मुनीस जैसे अच्छे खिलाड़ियों को मौका ना देकर हम अपनी टीम को कमजोर बना रहे हैं। बीच में यह चर्चा तेज थी कि उसे राजस्थान रॉयल की टीम में स्थान मिलने वाला है, लेकिन यह हो नहीं सका। इसके लिए भी उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि ही जिम्मेवार होगी। या फिर अब तक क्रिकेट की दुनिया में अपने लिए कोई खुदा-पापा (गॉड फादर) ना बना पाने की गलती की वह सजा भूगत रहा है।
बहरहाल भारत में मौका तो नहीं मिला, तो वह इन दिनों ओमान की राष्ट्रीय टीम के लिए क्रिकेट खेल रहा है।

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम