तुम
कहते हो वह शेर था, फिर पिंजरे में क्यों रहता था? इतनी सुरक्षा में क्यों
चलता था और वह शेर था तो तुम्हे मानना चाहिए, तुम्हारे राज्य में जंगल-राज
है.
कमाल है तुम यह भी मानने को तैयार नहीं और बात-बात पर गिरफ्तार कराने
को उतावले रहते हो!
अपनी ही कहते रहोगे या मेरी भी सुनोगे सरकार....!!! हम हैं दिल की आवाज़... न किसी का ज़ात जानते हैं, न किसी की औक़ात जानते हैं.... जो सही लगे, बिन्दास बोलते हैं ....
1 टिप्पणी:
बहुत अच्छी कविता है। बेहद अच्छी। शाबास।
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