सोमवार, 28 जुलाई 2008

उतारांचल: पहाड़, नदियों और जंगल के साथ बलात्कार

आप कभी उत्तरांचल जाएँ तो वहाँ जगह-जगह चल रही मशीनी गतिविधियों को देखकर आप सोच सकते हैं कि राज्य का विकास हो रहा है. लेकिन यह विकास नहीं है. यह साफ़ तौर से उत्तराँचल के पहाड़, नदियों और जंगल के साथ बलात्कार है. जमकर यहाँ नदियों का दोहन किया गया, जंगल काटे गए. और पहाडो को खोद-खोदकर खनिज निकाला गया. यह नया दौर है नदियों को सुरंगों से पाटने का. उत्तराँचल में फैल रहे प्रदुषण की वजह से प्रशाशन ने गौमुख तक यात्रियों के जाने पर रोक लगा दी है. गोमुख सिकुरता जा रहा है। गौमुख नहीं होगा तो गंगा को बचाना मुश्किल होगा. अब जिनको गौमुख तक जाना है उनके लिए परमिट बनाना अनिवार्य कर दिया गया है.
आम लोगों को तो रोक दिया गया लेकिन जिन परियोजनाओं की वजह से पहाड़ की सबसे ज्यादा ऐसी-तैसी हुई है कोई उन परियोजनाओं पर प्रतिबन्ध लगाने की बात क्यों नहीं सोचता?

रविवार, 27 जुलाई 2008

अश्लील सी डी का खुला बाजार


दिल्ली के पालिका बाजार से अहमदाबाद तक हर जगह छुप-छूपा कर अश्लील सीडियों का बाजार फल-फूल रहा है। बीच में ऐसे बाजारों में छापे मारकर पुलिस हजार- दो हजार सीडियां जप्त कर समाज को अपनी उपस्थिति का अहसास भी दिलाती है. लेकिन कोलकाता पुलिस उदारता के मामले में देश भर की पुलिस से दो कदम आगे है. तभी तो दूकानदार बंधुओं को यहाँ इस तरह की सी डी छूपा कर नहीं बेचनी पड़ती. आप ग्राहक हैं और वे दूकानदार, अपने मतलब की चीज लीजिए और दाम दीजिए - चलते बनिए.
:-यह तस्वीरें कोलकाता के सीआलदह रेलवे स्टेशन परिसर की हैं.






































शुक्रवार, 25 जुलाई 2008

मुजफ्फरपुर में सरसों से लहराते बाल

मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन से छाता चौक वाया नया टोला जाते हुए रास्ते में यह अद्भूत विज्ञापन देखने को मिला. अदभूत इस मायने में की बालों में लगाने के लिए सरसों तेल का यह मेरी जानकारी में पहला विज्ञापन है। और एक बात यह कि इसमें किसी सरसों तेल कंपनी का उल्लेख नहीं है. इसलिए भाव समाजसेवा के लगते हैं. लेकिन जिसने भी इस विज्ञापन की कॉपी लिखी है, उसने थोडी सी असावधानी की जिस वजह से उसका संदेश सही - सही संप्रेषित नहीं हो पा रहा। 'सरसों से लहराते बाल बिना चिप चिप' के कई अर्थ हो सकते हैं.
वैसे मुजफ्फरपुर में इस संबंध में मैंने कई लोगों से बातचीत की। और उन्हें अर्थ समझने में कोई कठिनाई नहीं आई, अच्छी बात है। जिनके लिए विज्ञापन तैयार किया गया है वे इसे समझ पा रहे हैं.

गुरुवार, 24 जुलाई 2008

देश के प्रथम राष्ट्रपति की जन्मकुंडली


यह जन्मकुंडली देवप्रयाग स्थित चक्रधर जोशी जी के वेद्शाला से उपलब्ध हो पाई। चक्रधर जोशी जी देश के जाने - माने ज्योतिषियों में रहे हैं। आज भी उनके वेद्शाला में सैकडों दुर्लभ पुस्तकों की पांडुलिपियाँ प्रकाशक का इंतजार कर रही हैं।
चक्रधर जी के देहावसान के बाद पांडुलिपियों का साज-संभाल का काम उनके छोटे बेटे प्रभाकर जोशी देख रहे हैं। प्रभाकर जी पेशे से पत्रकार हैं।




















गुरुवार, 17 जुलाई 2008

नई टिहरी से एक शुभ समाचार

इस बार एक अच्छी ख़बर नई टिहरी से. उन तमाम बुरी खबरों के बीच जो १९७८ से वहाँ से आ रहीं हैं. यहाँ गौरतलब है कि टिहरी में पहला विस्थापन बाँध की वजह से १९७८ में हुआ था. (पुरानी टिहरी में विस्थापन के बाद ही नई टिहरी का निर्माण हुआ) उसके बाद से यह सिलसिला अब तक कायम है. यह हर युग की कहानी है, गरीबों की आवाज हर समाज, हर सरकार द्वारा दबाई गई है. खैर, बात अच्छी ख़बर की करते हैं. पूरे टिहरी शहर में पौलिथिन के इस्तेमाल पर पाबन्दी लगा दी गई है. उस शहर में आपको किसी चौराहे पर लिखा बोर्ड मिल सकता है. 'यहाँ पौलिथिन का इस्तेमाल दंडनीय अपराध है. इस तरह के प्रयास की सराहना होनी चाहिए. और इसे कोई अन्य शहर भी अपने यहाँ प्रयोग में लाए तो यह एक अच्छा प्रयोग होगा. यदि मेरी सुने तो मैं देशभर में इसके इस्तेमाल के पाबंदी के समर्थकों में हूँ.

सोमवार, 14 जुलाई 2008

मामला लो प्रोफाइल केस का ...

लगभग एक सप्ताह पहले कीर्ति नगर में एक दस वर्षीय बच्चे अफारान की मौत किसी चॅनल के लिए बड़ी ख़बर नहीं बनी. उस बच्चे के साथ दो लोगों ने अप्राकृतिक यौनाचार किया. पत्रकार योगेन्द्र ने यह जानकारी देते हुए बताया, जबरदस्ती किए जाने की वजह से बच्चे की नस भींच गई. जिससे घटनास्थल पर ही बच्चे की मौत हो गई. जिन दो लोगों ने बच्चे के साथ जबरदस्ती की, वे एक फक्ट्री में मजदूरी करते हैं. अफारान के अब्बू भी मजदूर हैं. योगेन्द्र के अनुसार- वह इस स्टोरी को अपने चैनल के लिए करके वापस लौटा. लेकिन स्टोरी नहीं चली. क्योंकि यह लो प्रोफाइल केस था. योगेन्द्र ने बताया, 'मेरे बॉस ने साफ़ शब्दों में कहा- 'इस ख़बर को किसके लिए चलावोगे. यह लो प्रोफाइल केस है. कौन देखेगा इसे. साथ में उन्होंने यह भी कहा, अगर बच्चे के साथ तुम्हारी बहूत सहानुभूति है तो टिकर चलवा दो. और इस संवाद के साथ उस ख़बर का भी अंत हुआ. अर्थात ख़बर रूक गई.

शुक्रवार, 11 जुलाई 2008

एक पूर्व नक्सली के बयान

समर दास पश्चीम बंगाल में नक्सल आन्दोलन के समर्थकों में गिने जाते रहे हैं। लेकिन अब उनका इस व्यवस्था से मोहभंग हो गया है। उनका मानना है, आन्दोलन अपने राह से भटक गया है. वे कहते हैं, अपनी जान बचाने के लिए आप किसी की जान लेते हैं तो इसे दुनिया का कोई न्याय शास्त्र ग़लत नहीं कहेगा. लेकिन आप सिर्फ़ अपना आतंक कायम करने के लिए इस तरह की गतिविधियों को अंजाम देते हैं तो इसे किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता. सिर्फ़ हाथ में हथियार उठा लेने से कोई नक्सली नहीं हो जाता. हथियार तो दुनिया भर के आतंकी संगठनों ने भी उठा रखा है. फ़िर नक्सल आन्दोलन उनसे अलग कैसे है? आज इसी सवाल का जवाब देना इस आन्दोलन के सामने सबसे बड़ी मुश्किल है. और चुनौती भी. वे आजकल विभिन्न सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर पश्चीम बंगाल में अलग-अलग मुद्दों पर जागरूकता अभियान चला रहे हैं. सिगूर का नैनों कार प्रोजेक्ट हो या नंदीग्राम का एस ई जेड या फ़िर आमार बंगाली और गोरखाओं के बीच चलने वाला शीत युद्ध. हर विषय पर उनका अपना पक्ष है. वे सेज क्षेत्र में जाने क्र लिए बनने वाले अनुमति पत्र को वीजा और पासपोर्ट की संज्ञा देते हैं. वे कहते हैं, जिन मजदूरों के हक की बात करके बंगाल की सरकार ने इतने दिनों तक शाशन किया, सरकार उन्हीं मजदूरों के हितों को भूल गई. एस ई जेड में किसी प्रकार का लेबर क़ानून नहीं होगा.
उन्होंने कहा - 'आशीष, एक समय बंगाल में मजदूर हड़ताल पर जाते थे, अब परंपरा बदल गई है। अब यहाँ मालिक लोग लॉक आउट करने लगे हैं.'
मैं समझ नहीं पाया यह कहते हुए वे रो रहे थे या हंस रहे थे.

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम