गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

माओवादी दुनिया की पड़ताल .....


वर्ष 2008-09 की बात है, जब नेपाल में कुसहा बांध टूटने की वजह से बिहार में भयावह बाढ़ आई थी। बाढ़ के लगभग छह महीने बाद दिल्ली से पत्रकारों का एक समूह  बिहार-नेपाल के बाढ़ प्रभावित रहे क्षेत्र का दौरा करने के लिए गया था। उन में इन पंक्तियों का लेखक भी शामिल था। बिहार में सीतामढ़ी-सुपौल-सहरसा होते हुए नेपाल पहुंचे।
इसी यात्रा के दौरान एक माओवादी नेता से मुलाकात हुई। नेपाल में भारत की तरह माओवादी संगठन प्रतिबंधित नहीं हैं। इसलिए मिलने वाले सज्जन ने सार्वजनिक सभा में जब अपना परिचय माओवादी के रूप में दिया तो चौंकना लाजमी था। वैसे उस दौरान नेपाल में माओवादी शासन में थे।
वह व्यक्ति फिर यात्रा में हमारे साथ था।
शुभ्राशु चौधरी की किताब ''उसका नाम वासु नहीं'' पढ़ते हुए, उस यात्रा की याद आई। उस बातचीत को कहीं लिख नहीं पाया था। लेकिन शुभ्रांशु को पढ़ते हुए उस माओवादी नेता से हुई बातचीत की यादें ताजा हो गईं।
‘भारत में माओवाद से सहानुभूति रखने वाले जितने चेहरों को आप जानते हैं, उससे कई गुणा अधिक चेहरे छुपे हुए हैं। वे उस वक्त सामने आएंगे, जब भारत पर माओवाद का राज होगा।’
उस माओवादी नेता का यह अति आत्मविश्वास थोड़ा चौंकाने वाला था। मैंने धीरे से ही कहा- यह कभी संभव नहीं होगा।
जिस गाड़ी पर हम कुसहा के लिए जा रहे थे, उसमें वही हमारा मार्गदर्शक था। नेपाल में माओवादी सरकार थी। हम दूसरे देश में थे, इन सारी स्थितियों को समझते हुए, मेरे साथ बैठे एक पत्रकार ने आंखों के इशारे से कहा, बातचीत बंद कर दो। उस माओवादी नेता ने बिना असहज हुए कहा- आप निसंकोच कुछ भी पूछिए और आप सब पत्रकार हैं, मुझे हुई हर एक बात को ऑन द रिकॉर्ड समझिए। जहां चाहें इसे लिखें। फिर वे मेरी तरफ मुखितिब हुए- आपकी उम्र 24-25 साल की होगी, यकिन जानिए आप अपनी जिन्दगी में भारत में माओ का शासन देखंेगे। फिर बहुत से चेहरे बेनकाब होंगे।
उन्होंने पटना का एक किस्सा सुनाया, जब वे प्रचंड के साथ पटना हनुमान मंदिर में थे। पटना में प्रचंड की तलाश हो रही थी। इंटेलीजेन्स के पास खबर थी कि प्रचंड पटना में हैं। पटना हाई अलर्ट पर था। हर तरफ पुलिस थी और प्रचंड आसानी से उन सबके बीच से आम आदमी की तरह निकल गए, किसी ने पहचाना नहीं।
उन सज्जन ने बताया था, माओवादी अपनी टीम तीन श्रेणियों में बनाते हैं। एक वे लोग जो जंगल में रहते हैं और हथियार बंद रहते हैं। एक वे जो जंगल और बाहरी दुनिया के बीच समन्वय का काम करते हैं। आन्दोलन के लिए पैसा जुटाने का काम इनका ही होता है। वे सज्जन नेपाल माओवादी आन्दोलन में इसी भूमिका में थे और तीसरे वे लोग, जो समाज में पत्रकार, एनजीओ, अभिनेता, नेता, उद्योगपति या दूसरी भूमिका में होते हैं लेकिन उनकी सहानुभूति इस आन्दोलन के साथ होती है। आन्दोलन के लिए पैसा इन्ही लोगों के पास से आता है। उन सज्जन ने बताया कि नेपाल में माओवादी आन्दोलन की सफलता के लिए सबसे अधिक आर्थिक मदद भारत से मिलती है, इसलिए उन्हें अक्सर भारत आना पड़ता है। भारत में भी दिल्ली में सबसे अधिक मदद करने वाले हैं।
उन्होंने हथियार के संबंध में बताया था- माओवादी आन्दोलन में अधिकतर सस्ते हथियार इस्तेमाल होते हैं। उन्होंने कुकर बम का उदाहरण दिया। जिसमें पुराने कुकर को बम की तरह इस्तेमाल करते थे। एक समय तो इस वजह से भारत से कुकर का आयात भी नेपाल ने बंद कर दिया था। इसी तरह तीन बार झूठा बम रखकर, जब नेपाल पुलिस बम को लेकर लापरवाह हो जाते थे तो जिन्दा बम रखने की जानकारी उन्होंने दी। यह सब घटना नेपाल में माओवादी शासन आनंे के पहले की है।
चीन के हथियार नेपाल में माओवादियों के पास कैसंे आते हैं, क्या चीन उन्हें मदद कर रहा है? इस सवाल पर उन माओवादी नेता ने यही बताया था कि चीन उनका चोरी-छीपे जाना-आना रहा है। वहां के कई हथियार के सौदागरों से उनका परिचय है लेकिन वे आन्दोलन के लिए सारे हथियार खरीद कर लाते हैं, चीन कोई भी हथियार खैरात में नहीं देता। इसके लिए उन्हें पैसा भारतीय मददगारों से चंदा के तौर पर मिलता है।
यदि मैं सही-सही याद कर पा रहा हूं तो उस दौरान उन सज्जन के छोटे भाई की पत्नी प्रचंड सरकार में किसी महत्वपूर्ण भूमिका में थी। छोटे भाई भी सक्रिय राजनीति में थे।
आज शुभ्रांशु चौधरी की किताब पढ़ते हुए लगा, वासु के तौर पर वही नेपाली माओवादी मेरे सामने आ खड़ा हुआ हो।


बुधवार, 28 नवंबर 2012

शेर का राज माने जंगल राज!

तुम कहते हो वह शेर था,
फिर पिंजरे में क्यों रहता था?
इतनी सुरक्षा में क्यों चलता था
और वह शेर था
तो तुम्हे मानना चाहिए, तुम्हारे राज्य में जंगल-राज है.

कमाल है तुम यह भी मानने को तैयार नहीं
और बात-बात पर
गिरफ्तार कराने को उतावले रहते हो!

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

दो नहीं साढे चार हजार ....



प्रतिभा पाटिल और जोस मुजीका में वैसे तुलना जैसी कोई बात नहीं है, लेकिन पिछले दिनों भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने जब पूणे में बन रहे दो हजार वर्ग फीट के बंगले को अपने लिए छोटा बताया और जब उन्होंने खुद अपनेे लिए साढे चार हजार वर्ग फीट के बंगले की मांग की तो भारतीय शाशन को समझने वालों के लिए यह बात बिल्कुुल असहज करने वाली नहीं थी। लेकिन एक सवाल जरूर एक बार पूर्व राष्ट्रपति से देश जानना चाहेगा कि क्या वे इस देश की गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण से परिचित हैं? राष्ट्रपति का अपना किरदार इतना ऊंचा होना चाहिए कि आम आदमी उससे प्रेरणा हासिल करे लेकिन यदि राष्ट्रपति जैसे ऊंचे पद पर बैठे लोग दो हजार वर्ग फीट की जमीन को अपने लिए अपर्याप्त बताएंगे तो इससे देश के आम आदमी के बीच क्या संदेश जाएगा?



वैसे यहां नेता निजी सुरक्षा के नाम पर जब करोडो रूपए लूटा सकते हैं तो फिर एक पूर्व राष्ट्रपति की इस छोटी सी मांग पर सवाल उठाने का सीधा सा अर्थ है, सवाल पूछने वाले की मंशा ठीक नहीं है। इसलिए अन्ना और केजरीवाल ने भी इस मसले को व्यक्तिगत समझकर कुछ भी बोलना ठीक नहीं समझा। ना मीडिया को यह जरूरी विषय लगता हैै। लेकिन जिस काम में देश का पैसा लगाया जाने वाला हो, वह व्यक्तिगत कैसे हो सकता है?
यहां प्रतिभा पाटिल के साथ जोस मुजीका को याद करना महज संयोग नहीं है। जोस जैसा व्यक्तित्व होता ही इसीलिए है कि दूसरों को प्रेरित कर सके। अपनी पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से भी देश की यही अपेक्षा है कि उनका जीवन दूसरों को प्रेरित करे। खैर, जोस की कहानी से पहले, खबर लिखे जाने तक प्रतिभा पाटिल के साढे चार हजार वर्ग फीट के बंगले की मांग गृह मंत्रालय ने मान ली है और शहरी विकास मंत्रालय से इस दिशा में कदम उठाने की अनुशंसा भी कर दी गई है।
भारत भूमि, जिसको त्याग और बलिदान की भूमि कहा जाता है लेकिन समय के साथ अब इस धरती का किरदार भी बदल रहा है।


जोस मुजीका और प्रतिभा पाटिल में तुलना वाली कोई बात तो नहीं हैं लेकिन, कह सकते हैं कि जोस उरूग्वे के वर्तमान राष्टपति हैं और प्रतिभा पाटिल भारत की पूर्व राष्ट्रपति हैं। यह भी जोर सकते हैं कि प्रतिभा पाटिल जिस देश से आती हैं, वह खुद को त्याग और बलिदान का देश कहता हैं, वहां कुपोषण से प्रत्येक साल हजारों बच्चे असमय मौत के मुंह में चले जाते हैं। वहां की तय गरीबी रेखा इतनी कम है कि तय करने वालों को भी बाद में मुंह छुपाना पड़ा और खास बात यह कि वहां की राष्ट्रपति के छह लोगों का परिवार दो हजार वर्ग फीट के बंगले मंे जीवन-यापन  नहीं कर पाएगा,  ऐसा राष्ट्रपति खुद मानती हैं।
उरूग्वे जो एक बहुत ही छोटा देश है, वहां राष्ट्रपति का पद सफेद हाथी की तरह नहीं होता, वहां राष्ट्रपति, राष्टप्रमुख होता है। जोस मुजीका का जिक्र इसलिए यहां प्रासंगिक है क्योंकि क्यूबा क्रांति से निकले छोटे से देश उरूग्वे के इस राष्ट्रपति ने अपने देश में राष्ट्रपति को मिलने वाली सारी सुविधाएं त्याग दीं। वे सरकारी आलीशान बंगले को छोडकर पत्नी के साथ छोटे से फार्म हाउस मंे रहने चले गए। यह फार्म हाउस उरूग्वे की राजधानी मोनतेविडियो के पास है। उनका वेतन 14 हजार डॉलर के आस-पास है, जिसका नब्बे फीसदी हिस्सा वे दान कर देते हैं। इस दान की बडी रकम वे जरूरतमंद छोटे कारोबारियों को देते हैं। वे सुरक्षा के नाम पर बड़ा तामझाम नहीं रखते और ना ही काफीला लेकर चलना पसंद करते हैं। निजी सुरक्षा के नाम पर उन्होंने सिर्फ दो निजी गार्ड रखा हुआ है। भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल कोे एक बार जोस मुजीका से मिलना चाहिए। हो सकता है, मिलकर पूर्व राष्ट्रपति कुछ सीखंे और इस देश के लिए भी वे एक आदर्श साबित हों।

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

अस्मिता से जुड़ते भाषा के सवाल


 धूमिल की एक कविता है, ‘जो असली कसाई है, उसकी निगाह में तुम्हारा यह तमिल दुख, मेरी भोजपुरी पीड़ा का भाई है। भाषा उस तिकड़मी दरिन्दे का कौर है, जो सड़क पर और है, संसद में और है।’
भाषा को लेकर होने वाली बहस सामाजिक भी है और राजनीतिक भी। इस बात में अब विमर्श की गुंजाइश नजर नहीं आती लेकिन भाषा का प्रश्न महत्वपूर्ण है, इसके महत्व को हमें स्वीकारना होगा। यूनेस्को की माने तो दुनिया भर में बोली जाने वाली 6900 भाषाओं में पचास फीसदी भाषाएं खतरे में हैं, और एक अनुमान के अनुसार प्रत्येक दो सप्ताह में एक भाषा औसतन खत्म हो रही है। मात्र अस्सी भाषाएं हैं, जैसे अंग्रेजी, हिन्दी, मंडेरिन, रसियन जिसे विश्व भर के अस्सी प्रतिशत लोग बोल रहे हैं। दुनिया भर में 96 प्रतिशत भाषाआंे को सिर्फ चार फीसदी लोग बोल रहे हैं और 90 प्रतिशत भाषाओं का प्रतिनिधित्व इंटरनेट पर मौजूद नहीं है।
आज से लगभग अस्सी साल पहले भारत मंे एक भाषायी सर्वेक्षण सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने किया था। आज भी भाषायी सर्वेक्षण पर जब बात आती है तो लोग संदर्भ के तौर पर ग्रियर्सन को ही उद्धृत करते हैं। ग्रियर्सन के बाद देश में भाषा को लेकर उस तरह का कोई दूसरा सर्वेक्षण नजर नहीं आता।
अब पिछले ढाई-तीन सालों से बिना किसी सरकारी मदद के और बिना किसी विदेशी मदद के देश भर में भारतीय जन भाषा सर्वेक्षण का काम नागरिक समाज की तरफ से हो रहा है। इसी जन भाषा सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट बताती है कि देश मंे तीन सौ से अधिक भाषाएं लापता हैं। इन्हें बोलने वाले कहां हैं, इसकी जानकारी सर्वेक्षण टीम को नहीं मिल पाई है। भाषा सर्वेक्षण का काम जारी है, आने वाले समय में हो सकता है, इस सर्वेक्षण से और भी चौकाने वाले तथ्य सामने आएं।
21-22-23 सितम्बर को दिल्ली में जनभाषा सर्वेक्षण के नेशनल कलेक्टिव में जैसे-जैसे सवाल एक के बाद एक विमर्श के लिए सामने आए, भाषा को लेकर समाज की संवेदना और लगाव की बात भी स्पष्ट होती गई। यह ‘जन भाषा सर्वेक्षण’ का अंतिम ‘नेशनल एडिटोरियल कलेक्टिव’ था। देश भर के अलग-अलग राज्यों से भाषा सर्वेक्षण के संयोजक इस आयोजन में शामिल होने के लिए दिल्ली आए थे।  अंतिम चरण की तरफ बढ़ रहे भाषा सर्वेक्षण की एक रूप रेखा उम्मीद है कि अगले साल अंतरराष्ट्रीय भाषा दिवस के अवसर पर 21 फरवरी तक सामने आ जाएगी।
भारतीय जन भाषा सर्वेक्षण की तरफ से डा. जी एन देवी ने विश्वास दिलाया, ‘21 फरवरी को हम यह घोषणा कर देंगे कि बच्चे का जन्म हो गया है। भारतीय जन भाषा सर्वेक्षण की एक रूप रेखा हमारे सामने उस वक्त तक आ जाएगी।’
भारतीय जन भाषा सर्वेक्षण पिछले ढाई-तीन सालों में लगे 3500 लोगों के श्रम का नाम है, जिन्होंने 68 वर्कशॉप से 631 भाषा/बोली पर काम पूरा किया। इन भाषाओं पर अब तक लगभग 9500 पृष्ठ लिखा गया है और अभी देश भर के भाषा प्रतिनिधि अपने-अपने राज्य के सर्वेक्षण को पूरा करने में और लिखने का काम पूरा करने में लगे हुए हैं।
631 प्रविष्टियों में एक प्रविष्टि को जन भाषा सर्वेक्षण ने अब मंजूरी दी है, यह भाषा उन पचास लाख लोगों की भाषा है, जो खुद को बोलकर अभिव्यक्त नहीं करते। वे संकेत के माध्यम से खुद को अभिव्यक्त करते है। उनके लिए अभिव्यक्ति माध्यम संकेत है। इस भाषा का इस्तेमाल देश भर के बोल और सुन ना पाने वाले करते हैं।


तीन दिन की बातचीत में एक-एक करके कई मुद्दों पर चर्चा हुई। बंगाल से आए मित्रों ने बेदिया समाज की भाषा की बात की, जिन्होंने अपनी भाषा को गुप्त भाषा के तौर पर इस्तेमाल किया और आज भी बेदिया समाज के लोग अपनी भाषा के संबंध में अधिक बात नहीं करना चाहते, इसलिए उनके समाज के बाहर के लोगों को इस भाषा के संबंध में अधिक जानकारी नहीं है। बंगाल की बेदिया समाज की भाषा अकेली ऐसी भाषा नहीं है, इस देश में दर्जनों ऐसी भाषाएं हैं, जिनकी लिपी और साहित्य के संबंध में कोेई जानकारी नहीं मिलती। अंग्रेजों ने कई जातियों को अपराधी जाति घोषित किया था, अंग्रेजों से बचने के लिए कई अपराधी कही जाने वाली जातियों ने अपनी गुप्त बोली ईजाद की, अंग्रेज चले गए लेकिन वे बोलियां आज भी समाज के बाहर के लोगों के लिए गुप्त ही हैं।
भाषा और बोली का मामला बेहद संवेदनशील है, कोंकणी को लेकर लिपी की लड़ाई है। कुछ इसे रोमन में लिखना चाहते हैं और कुछ देवनागरी के तरफदार हैं। इसी प्रकार कई बोलियों को मिलाकर इस्तेमाल की जा रही राजस्थानी बोली को लेकर राजस्थान में कुछ लोग संघर्ष कर रहे हैं।
दूसरी तरफ दस हजार से कम बोली जाने वाली बोलियों का कोई रिकॉर्ड सरकारी फाइलों में भी दर्ज नहीं होता। बड़ी संख्या में भाषाएं खत्म हुई और किसी को कानों कान खबर भी नहीं हुई।
ऐसे समय में जन भाषा सर्वेक्षण की यह पहल, भाषाओं और बोलियों को पहचानने और उनकी पहचान को और पुख्ता करने का ही काम कर रही है।




सोमवार, 11 जून 2012

हिन्दी अकादमी: क्यों इतना सन्नाटा है भाई


इस बात को अब कुछ साल हो गए जब कवि अशोक चक्रधर को हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया गया था। उस वक्त उनके नाम को लेकर काफी शोर शराबा हुआ था। साहित्यकारों का एक समूह उन्हें हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष के पद पर नहीं देखना चाहता था। अब अशोक चक्रधर हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष नहीं हैं। हिन्दी अकादमी की यह नई जिम्मेवारी भाषाविद विमलेश कांति वर्मा के पास है। वैसे हिन्दी अकादमी जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में जब उपाध्यक्ष का चयन किया जाता है, उस वक्त संस्थान को यह बातें जरूर सार्वजनिक करनी चाहिए कि उपाध्यक्ष के नाम के लिए किन किन बुद्धिजीवियों के नाम पर विचार किया गया। उपाध्यक्ष के नाम के चयन के लिए चयन समिति में कौन-कौन शामिल थे? सबसे महत्वपूर्ण पिछले उपाध्यक्ष की अपने कार्यकाल में उपलब्ध्यिां क्या-क्या रहीं? सार्वजनिक करते हुए यह बातें भी जोड़ी जा सकती हैं कि पिछले उपाध्यक्ष ने अकादमी के खर्चे से कितनी विदेश यात्राएं की और उन यात्राओं की उपलब्धि क्या-क्या रहीं? अर्थात उनकी यात्रा से अकादमी को और हिन्दी को क्या लाभ मिला? यह सारी जानकारी दिल्ली सरकार अपनी वेवसाइट पर डाल सकती है या फिर अकादमियां अपनी? बीते महीने नए उपाध्यक्ष का चुनाव हिन्दी अकादमी में हो गया और संचालन समिति भी कम महत्वपूर्ण नामों से भर दिया गया। कमाल की बात यह रही कि इस बार आकदमी की नई बहाली को लेकर कहीं से एक शब्द सुनने को नहीं मिला। इस बार अकादमी के संचालन समिति में एच बालासुब्रमण्यम, विभास चंद्र वर्मा, भानु भारती, गोरखनाथ, सुरजीत सिंह जोबन, बीएल गौड़, उमा मिश्रा, रंजना अग्रवाल, रीता सिन्हा, अरुण कुमार श्रीवास्तव, ममता सिंगला, दुर्गा प्रसाद गुप्त, सुषमा भटनागर, नारायण सिंह समीर, सत्यप्रिय पांडेय आदि आदि हैं। ना जाने इस समिति में हिन्दी साहित्य का कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति क्यांे नहीं रखा गया? संचालन समिति के एक सदस्य डा हरनेक सिंह गिल कहते हैं- महत्वपूर्ण व्यक्तियों को विदेश घूमने, सेमिनारों में जाने से फूर्सत कहां है कि वे हिन्दी अकादमी के लिए समय निकालेंगे। श्री गिल के अनुसार यह सच्चाई है कि अशोकजी के समय कोई मीटिंग नहीं हो पाई लेकिन अब यह समय पर हुआ करेंगी। हिन्दी अकादमी के वर्तमान उपाध्यक्ष इस समय विदेश दौरे पर हैं, उनके लौटते ही पहली मीटिंग तय की जाएगी। यह जानकारी भी डा गिल से मिली। इस वक्त हिन्दी का बुद्धिजीवी वर्ग बिल्कुल शांत है। इसकी वजह हिन्दी जगत में अकादमियों और हिन्दी संस्थानों को छाया गहरा निराशा का भाव है। या फिर साहित्यकारों को लगता है कि उनके लिखने-पढ़ने से कुछ होने वाला नहीं है। अच्छा है कि अच्छे से सबसे निभाई जाए। चूंकि एक समय लेखकों के एक बड़े वर्ग ने अशोक चक्रधर का जमकर विरोध किया था और आज जब उनके काम काज से असंतुष्ट होकर अकादमी से उनकी विदाई हुई है, ऐसे में वे सभी साहित्यकार चुप हैं, जो कल तक अशोकजी को लेकर मुखर थे तो यह बात अचरज में जरूर डालती है। बताया यही जा रहा है कि अकादमी से उनकी विदाई उनके काम काज से असंतुष्ट होकर की गई है। यह भी कहा जा रहा है कि अशोकजी ने अकादमी के संचालन समिति को बिल्कुल निष्क्रिय बनाकर रखा। अपने कार्यकाल के दौरान संचालन समिति की एक भी बैठक अशोकजी ने नहीं कराई। जबकि अकादमी के सूत्रों के अनुसार कायदे से अकादमी का सारा खर्च और आने वाले समय की सारी योजनाएं समिति की सहमति की मुहर के बाद ही पास होनी चाहिए। लेकिन पिछले तीन सालों में जो कुछ अकादमी में हुआ है, उसमें संचालन समिति के अनुमोदन जैसा कुछ भी नहीं है। मई में जब विभिन्न अकादमियों के संचालन समिति के पुनर्गठन को लेकर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने बैठक ली थी। बताया जाता है कि उसमें अशोकजी शामिल नहीं हो पाए थे। वहां पंजाबी अकादमी और उर्दू अकादमी से मुख्यमंत्री दीक्षित संतुष्ट नजर आईं लेकिन हिन्दी अकादमी के काम काज की शैली से वे निराश थीं। वैसे अब हिन्दी अकादमी को नया उपाध्यक्ष मिल गया। बेदाग छवि वाला। साथ-साथ संचालन समिति का पुनर्गठन भी हो गया है। फिर भी सवाल बनता ही है कि इसके बाद साहित्य जगत में क्यों इतनी शान्ति शान्ति है। क्या डा गिल सही कहते हैं- वरिष्ठों को विदेश यात्राओं और सेमिनारों से फूर्सत नहीं है, जो इन मसलों पर विचार करें?

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

उंगलबाज का पहला प्रकाशीत लेख, स्वागत करें

उंगलबाज.कॉम


मुझे नहीं पता, आपने उंगलबाज का नाम पहले कभी सुना है या नहीं सुना। यह भारतीय मीडिया उद्योग का सबसे अविश्वनीय नाम है। इंडिया टीवी से भी अधिक अविश्वनीय। पंजाब केसरी से भी अधिक अविश्वनीय। डर्टी पिक्चर की सिल्क की तरह, जिसका नाम बदनाम होकर हुआ।



हमारी विश्वसनीयता इतनी संदिग्ध है कि हमने दुनिया के एक मुल्क में उनके प्रधान की मौत की जानकारी उनके जीते जी छाप दी। हमारी वेवसाइट पर हिट्स एकदम से बढ़ गया। खबर आते ही पूरे देश में मारपीट, आगजनी शुरू हो गई। मानों वे सभी लोग इस खबर के वेवसाइट पर लगने के इंतजार में ही थे। कोई भी हमारा तो कुछ ना बिगाड़ पाया लेकिन अपने देश के करोड़ों रुपए की संपति की ऐसी कम तैसी जरूर कर दी। यहां बताता चलूं कि हमारा डॉट कॉम इतना अधिक अविश्वसनीय है कि हम आज तक पता नहीं लगा पाए कि यह खबर वेवसाइट के लिए भेजी किसने थी? और वेवसाइट पर लगाई किसने? इसके बावजूद हमें गर्व है कि पूरे मीडिया जगत में हम अविश्वसनीयता का काम पूरी विश्वसनीयता के साथ करते हैं। हम किसी ईमानदारी का दावा नहीं करते और आपको आगे रखने का वादा नहीं करते।



वैसे जिस मुल्क के प्रमुख की बात मैं कर रहा था, वहां से हमारी विदाई हो चुकी है। हमें बाहर निकाल दिया गया है। अब सीआईए और केजीबी मिलकर उन सूत्रों को तलाशने की केाशिश में लगी है, जिसके इशारे पर ऐसा किए जाने का उन्हें अनुमान है।
वैसे सच कहूं तो भारत हमारे लिए एक मुफीद ठीकाना साबित हुआ है। यहां उंगलबाजी की पर्याप्त गुंजाइश नजर आ रही है क्योंकि यहां किसी के मरने की परवाह किसी को नहीं है। यहां के लोग की याद्दाश्त बेहद कमजोर है। मुझे नहीं लगता कि कोलकाता में कुछ होता है तो हावड़ा के लोग उसकी परवाह करते हैं। बड़ोदरा की चिन्ता अहमदाबाद वालों को रहती होगी। इसी तरह भोपाल के हक के लिए सिहोर सामने नहीं आता। बेतिया की चिन्ता मोतिहारी को नहीं है। बिलासपुर वाले दुर्ग की घटनाओं से नावाकिफ हैं। गुमला वालों को गाड़ी लोहरदगा मेल की जानकारी नहीं है। दिल्ली, मुम्बई और कोलकाता मे एमएनसी की नौकरी करने वाले वेदान्ता और पॉस्को में अपने लिए रोजगार के अच्छे अवसर ही देख पाते हैं। इससे अधिक जानने की उन्हें जरूरत नहीं है। अधिकांश अखबार और चैनलों को अपने लिए पत्रकार कम दलाल चाहिए जो वसूली एजेन्ट के तौर पर काम कर सके। उसके बाद भी दावा यह कि सच को रखे आगे और अंदर सच का सामना करने की कुव्वत नहीं। सच कहें तो पड़ोस की चिन्ता नहीं है लेकिन सारा भारत एक है।
यदि इस देश की जनता एक होती। इस देश के लोगों को कुव्वत होता तो क्या भोपाल गैस कांड हो जाता, नन्दीग्राम करने का कोई साहस करता, गुजरात के दंगे इतनी सहजता से ऑपरेट हो पाते। यह सब शर्मनाक था, जो उसके बाद हुआ, वह उससे भी अधिक शर्मनाक। इतना कुछ हो गया, और हम आज तक उसके लिए जिम्मेवारी तय नहीं कर पाए। सभी हत्यारे खुलेआम घुम रहे। हत्या में शामिल लोगों को हम चुन-चुन कर अपना नेतृत्व सौप रहें हैं। लाखों की संख्या में इकट्ठे होकर उनको सुनने जा रहे हैं। उन एक-एक चेहरों की हमारी अदालतें ठीक-ठीक अब तक पहचान भी नहीं कर पाई है, जिनके गुनाहों की कोई माफी नहीं है। यह स्वीकार करने में क्या परेशानी है कि इस देश में लोकशाही नहीं अफसरशाही मान्य है और लोकतंत्र नहीं नेतृत्व तंत्र चलता है। ऐसा हो भी क्यों नहीं, जब नन्दीग्राम पर विदर्भ चुप है, विदर्भ के मसले पर बुंदेलखंड बोलने को राजी नहीं। बस्तर का दर्द सिर्फ बस्तर वालों का है। इसका सीधा सा अर्थ है कि हमारी एकता सिर्फ किताबी है।



गोधरा में जब रेलगाड़ी मंे हिन्दू सन्यासियों को जलाया गया, किसी मुस्लिम नेता ने इसका विरोध नहीं किया। किया भी हो तो मीडिया ने इसे दिखाने की जरूरत नहीं समझी। इससे भी ज्यादा तकलीफ की बात यह है कि विभिन्न राजनीतिक दल जो बयानबाजी से अधिक जो कुछ कर सकते थे, उन्होंने नहीं किया। बात-बात पर हजारों की संख्या में भीड़ इकट्ठी करने वाली राजनीतिक पार्टियां, टीवी पर आकर अपने दल के कार्यकर्ताओं से अपील कर सकती थीं कि वे आस-पास की मुस्लिम बस्तियों पर पहरा दें। अपने पड़ोसियों की रक्षा करें। गुजरात के पड़ोस के राज्यों से कार्यकर्ता अपने मुस्लिम भाइयों की मदद के लिए आ सकते थे। लेकिन भावनगर का दर्द सूरत का नहीं है, सूरत की चिन्ता दाहोद को नहीं, दाहोद में क्या हो रहा है बड़ोदरा वालों को पता नहीं, और अहमदाबाद से तो पहले ही बड़ी आबादी का विश्वास उठ गया था। गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगों के लिए उन सभी लोगों को जिम्मेवारी लेनी चाहिए, जो गुजरात में थे और जो गुजरात में नहीं थे। क्या किया उस दौर में आपने भाषणबाजी से अधिक। क्या गुजरात के सारे हिन्दू दंगों में शामिल थे, जिनके हाथ दंगों में नहीं थे, वे हाथ अपने पड़ोसी को बचाने के लिए क्योें नहीं उठे? हर तरफ सिर्फ बयानबाजी। रैलियों मंे तो लाखों की भीड़ जुटा लेते हैं, नेता। क्या एक नेता ने अपने समर्थकों से अपील की कि वे मुस्लिम बस्तियों की सुरक्षा के लिए स्वयं पहरे पर बैठेंगे और समर्थक भी अपने आस-पास के मुस्लिम बस्तियों की पहरेदारी करें। दूसरे राज्यों से कितने नेता गुजरात गए, उनकी सुरक्षा की चिन्ता लेकर। इस देश में रैलियों के लिए लोग निकलते है, राम मन्दिर बनाने और बाबरी मस्जिद ध्वंस के लिए निकलते हैं, नक्सलियों द्वारा किए गए हत्या के समर्थन में निकलते हैं और कश्मीर को भारत से अलग करने का मंसूबा पाले आतंकवादियों के समर्थन में निकलते हैं। उसके बाद भी आप जोर दे-देकर यह मुझे विश्वास दिलाना चाहते हैं कि बचाने वाले के हाथ, मारने वाले से अधिक बड़े होते हैं। इतना कुछ हो जाने के बाद भी अपने दिल पर हाथ रखकर कहिए, क्या आप सच में इन बातों पर यकिन करते हैं?



इस देश की एक अरब जनता, चंद हजार नेताओं, चंद हजार अफसरशाह और चंद लाख बाबूओं को गाली देते हुए उठती है और गाली देते हुए सो जाती है। इन एक अरब लोगों को किसी सरकारी अस्पताल में इस बात की जांच अवश्य करानी चाहिए कि इनकी रीढ़ की हड्डी अब तक सही सलामत बची भी है या नहीं? मेरी चिन्ता इतनी भर है कि कब तक इस मुल्क के लोग खुद को झूठे दिलासे देते रहेंगे, एक अरब की संख्या में होकर रोते, गिड़गिड़ाते और रीरियाते रहेंगे। कब तक यह झूठ चलता रहेगा कि देश एक है और इस मुल्क की मालिक यहां की जनता है। जबकि सच्चाई यह है कि जनता बाबूराज में अफसरशाही के जूते की नोक पर है और नेताओं के ठेंगे पर है। यदि उंगलबाज की बातों से सहमत हैं तो इस भाषण के अंत में अपने ठेंगे का निशान लगाएं क्यांेकि उंगलबाज जानता है कि आपके बस की इससे अधिक कुछ नहीं है।

(उंगलबाज.कॉम, हमारी विश्वसनीयता संदिग्ध है)

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

पेड न्यूज, पेड न्यूज, पेड न्यूज, पेड न्यूज, पेड न्यूज ....''सोचिए जरा!''

देश में सबसे तेजी से बढ़ने वाले अखबार का दावा करने वाले उत्तर प्रदेश में अच्छी प्रसार संख्या वाला एक अखबार अपने पाठकों के साथ किस कदर छलावा, धोखा कर रहा है उसे उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की कवरेज में देखा जा सकता है। विधानसभा चुनाव के पहले इस अखबार ने आओ राजनीति करें नाम से एक बड़े कैम्पेन की शुरूआत की। अखबार ने पहले पेज पर एक संकल्प छापा कि वह चुनाव को निष्पक्ष तरिके से कवरेज और पेड न्यूज से दूर रखेेगा लेकिन इस संकल्प की कैसे ऐसी-तैसी हो रही है पाठकों को तो जानना ही चाहिए, प्रेस काउन्सिल और चुनाव आयोग को भी इसका संज्ञान लेना चाहिए।



अखबार में एक तरफ यह संकल्प छापा गया तो दूसरी तरफ विज्ञापन विभाग ने उम्मीदवारों से विज्ञापन का पैसा वसूलने की नई तरकीब निकाली। उसने सवा लाख, सवा दो लाख, पांच लाख और छह लाख का एक पैकेज तैयार किया। इसके अनुसार जो उम्मीदवार यह पैकेज स्वीकार कर लेगा उसके विज्ञापन तो क्रमशः छपेंगे ही, नामांकन, जनसम्पर्क आदि में उसकी खबरों को वरीयता दी जाएगी। साथ ही उसका इंटरव्यू छपेगा और अखबार में इन्सर्ट कर उसके पक्ष में पांच हजार पर्चे बांटे जाएंगे। प्रत्याशियों पर इस पैकेज को स्वीकार करने के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से प्रत्याशियों और उनकी खबरें सेंसर की जाने लगीं। जनसम्पर्क, नुक्कड़ सभाएं आदि की खबरें पूरी तरह सेंसर कर दी गई या इस तरह दी जाने लगीं कि उसका कोई मतलब ही न हो। केवल बड़े नेताओं की कवरेज की गई। प्रत्याशियों को विज्ञापन देने पर यह सुविधा भी दी गई कि उनसे भले 90 रुपए प्रति सेंटीमीटर कालम का दर लिया जाएगा लेकिन उसकी रसीद दस रूपया प्रति सेंटीमीटर कालम दिया जाएगा ताकि वह चुनावी खर्च में कम धन का खर्च होना दिखा सकें। इसके अलावा स्ट्रिंगरों को यह लालच दिया गया कि प्रत्याशियों से पैकेज दिलाने में सफल होने पर उन्हें तयशुदा 15 प्रतिशत कमीशन के अलावा अतिरिक्त कमीशन तुरन्त प्रदान किया जाएगा।



इतनी कोशिश के बावजूद प्रत्याशियों ने बहुत कम विज्ञापन उस अखबार को दिए। पैकेज तो इक्का-दुक्का लोगों ने ही स्वीकार किए। इसके पीछे कारण यह था कि प्रत्याशी चुनाव आयोग के डंडे से बहुत डरे हुए हैं। एक दूसरा कारण यह भी है कि उन्हें अखबार में विज्ञापन छपने से कुछ ज्यादा फायदा न होने की बात ठीक से मालूम हैं। उन्होंने पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में देखा है कि लाखों रूपए खर्च कर रोज विज्ञापन देने वाले प्रत्याशियों को भी बहुत कम वोट मिले और जिनके बारे में अखबारों खबर छपी, न विज्ञापन वे बहुत वोट पाए और कई तो चुनाव भी जीत गए। चुनाव में करोड़ों की वसूली का सपना देखने वाले उस अखबार का मंसूबा जब पूरी तरह ध्वस्त हो गया तो उसने एक हैरतअंगेज काम कर डाला। चार फरवरी के अंक में पहले पन्ने पर उसने एक खबर प्रमुखता से प्रकाशित की। यह खबर कथित सर्वे के आधार पर थी। इसमें कहा गया था कि 35 फीसदी मतदाता अपने प्रत्याशियों को नहीं जानते। यह पूरी तरह अखबार द्वारा प्रायोजित खबर थी। एक जिले में 200 लोगों को फोन कर यह सर्वे कर लिया गया। अब आप ही अंदाजा लगाइए कि अमूमन एक विधानसभा क्षेत्र में तीन लाख से अधिक वोटर होते हैं। ऐसे में कथित रूप से 200 लोगों से फोन पर बात कर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि वोटर अपने प्रत्याशियों को नहीं जानते कितना उचित है। लेकिन इस अखबार ने उत्तर प्रदेश में ऐसा किया। इसके पीछे उसका मकसद प्रत्याशियों में यह संदेश देना था कि उनके बारे में मतदाताओं को पता नहीं है, इसलिए उन्हें खूब विज्ञापन देना चाहिए।



लगता नहीं कि इस अखबार की इस गंदी हरकत के प्रभाव में कोई प्रत्याशी आने वाला है। पूरे चुनाव में इसने ऐसी कई प्रायोजित खबरें छापीं जिनका मकसद प्रत्याशियों को विज्ञापन और पेड न्यूज के लिए उकसाना था। बसपा और मायावती के दो पेज के दो बड़े खबर नुमा विज्ञापन छापना एक तरह का पेड न्यूज ही तो था। इस दो पेज के कथित विज्ञापन में कहीं नहीं लिखा था कि यह किसके द्वारा जारी किया गया है। इसके पर दाहिने कोने पर मीडिया मार्केटिंग इनिशिएटिव लिखा गया था। इस अखबार के संपादक और उनकी मंडली को बताना चाहिए कि क्या हिन्दी अखबार का पाठक इतना सचेत और जागरूक हैे जो उनके इस खबरनुमा विज्ञापन को विज्ञापन ही समझेगा ?
एक सवाल और- पूरे चुनावी कवरेज में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की सभाओं की फोटो एक खास एंगिल से क्यों खींची गई और इसे ही क्यों छापा गया जिससे दोनों की सभाओं में अपार भीड़ दिखाई देती है । कोई भी पाठक इस अखबार के किसी भी एडिशन के अंक में यह कलाबाजी देख सकता है। क्या यह पेड न्यूज नहीं है ? सवाल और भी हैं। सोचिए जरा!

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम