क्या तीर मारा भाई। जाने अनजाने में मोदी का भला ही हो गया। पुन्य प्रसून वाजपेयी का साक्षात्कार नए वाले चॅनल समय पर देखा, कितने अच्छे सवाल पूछे उन्होने, वाह-वाह। गुजरात की सच्ची तस्वीर समाज के सामने आई। दूसरी तरफ वह तेजपाल जी, गडे ही मुर्दे उखारने में लगे है। कल ही बस में एक भाई को बोलते ही सूना, इनसे मोदी का कुछ नहीं उखरेगा, सिर्फ ये गडे मुर्दे ही उखार सकते हैं।
नाम से भी फर्क आ जाता है, तरुण भाई ने जो काम किया, उसमे उनकी तरुनाई नजर आती है, अती उत्साह में आकर उन्होने एक ऐसी सीडी बनाई जिससे देश में एक बार फिर से सांप्रदायिक दंगे भड़क सकते थे, (खैर, लोग समझदार हो गए हैं, इसलिय 'आज तक' की बातों में नहीं आय।) पुण्य का काम किया पुण्य प्रसून वाजपयी ने जो अपने नए चॅनल की शुरूआत ही एक नेक साक्षात्कार से किया।
भाई बाबू बजरंगी ने चॅनल पर अपने वीरता के किस्से सुने, हद कर दी उन्होने बेशर्मी की। ऐसे ना जाने कितने लोग है। बताया जा रहा है तरुण जी के कैमरे के जाल में फंसे ज्यादा नेता वे थे जो गुजरात में भाजपा की सरकार आने के बाद मलाई खाना चाहते थे, मगर मोदी के नेतृत्व में यह मौका उन्हें नसीब नहीं हुआ, मेरी बात सुन कर मेरे कई मित्र परेशान होंगे, यह एक नरभक्षी की वकालत क्यों कर रहा है? मगर मोदी की यह तस्वीर मीडिया ने गढी है। मैं गुजरात होकर आया हूँ, मुसलमानों से बात की है मैंने। वह खुश है मोदी के राज में। क्या कोई छापेगा इसे। हाँ जहाँ तक नैतिकता की बात है मोदी को मुख्यमंत्री के नाते सांप्रदायिक दंगों की जिम्मेवारी लेनी चाहिय, लेकिन भाई तरुण जी को यह सब चुनाव के समय क्यों याद आ रहा है। वह नहीं जानते जाने-अनजाने में वे मोदी की मदद ही कर रहे हैं।
-कुछ दिनों पहले ही मैंने तहलका के संघर्ष की कहानी अपने ब्लोग पर प्रस्तुत किया था, इस घटना के बाद मुझे इस बात का अफ़सोस है, मैंने ऐसा लेख क्यों दिया।
बुधवार, 31 अक्टूबर 2007
सोमवार, 29 अक्टूबर 2007
बिना वेबसाइट का है, इंटरनेट वाला गाँव - भाग २
वेबसाइट वाले गाँव का पता - http://www.smartvillages.org/hansdehar/index.htm
ज़रा क्लीक करके नजारा कर लो -
आज बात करते हैं, गाँव तक पहुचाने की। हरियाणा के नरवाना कसबे तक जाय। उसके बाद ज़रा सी परेशानी उठा कर दतासिन्ह्वाला पहुचे। उसके बाद के २-३ किलोमीटर के लिय हो सकता है आपको कोई सवारी ना मिले। कोई गाँव वाला आपकी हालत पर तरस खा कर आपको लिफ्ट दे-दे तो यह एक अलग बात होगी।
बताया जा रहा है, हंसदेहर मॉडल पर देश के ६ लाख ४० हजार गाँव को जोड़े की योजना है। लेकिन जबतक गाँव वाले इंटरनेट की तकनीक नहीं समझेगे, यह नहीं समझेगे कि यह इंटरनेट है क्या? वह इसका लाभ कैसे उठा पायेगे?
एक किस्सा और इस वेबसाइट गाँव से। संतो देवी गाँव की सरपंच है। लेकिन सरपंच के तौर पर उसके पति हीं गाँव में जाने जाते हैं। बकौल संतो गाँव में ऐसा हीं होता है।
बात यहाँ सरपंच की नहीं है। बात है जागरूकता की कमी की। इंटरनेट और वेबसाइट जैसे शब्द जिस गाँव के साथ जुड़ जाय। उस गाँव से लोगों की इतनी अपेक्षा तो स्वाभाविक है कि उस गाँव के लोग शिक्षित हों। अधिकारों के प्रति जागरूक हों। शायद अशिक्षा और जागरूकता की कमी की वजह से हीं यह गाँव पिछड़ा रह गया।
ज़रा क्लीक करके नजारा कर लो -
आज बात करते हैं, गाँव तक पहुचाने की। हरियाणा के नरवाना कसबे तक जाय। उसके बाद ज़रा सी परेशानी उठा कर दतासिन्ह्वाला पहुचे। उसके बाद के २-३ किलोमीटर के लिय हो सकता है आपको कोई सवारी ना मिले। कोई गाँव वाला आपकी हालत पर तरस खा कर आपको लिफ्ट दे-दे तो यह एक अलग बात होगी।
बताया जा रहा है, हंसदेहर मॉडल पर देश के ६ लाख ४० हजार गाँव को जोड़े की योजना है। लेकिन जबतक गाँव वाले इंटरनेट की तकनीक नहीं समझेगे, यह नहीं समझेगे कि यह इंटरनेट है क्या? वह इसका लाभ कैसे उठा पायेगे?
एक किस्सा और इस वेबसाइट गाँव से। संतो देवी गाँव की सरपंच है। लेकिन सरपंच के तौर पर उसके पति हीं गाँव में जाने जाते हैं। बकौल संतो गाँव में ऐसा हीं होता है।
बात यहाँ सरपंच की नहीं है। बात है जागरूकता की कमी की। इंटरनेट और वेबसाइट जैसे शब्द जिस गाँव के साथ जुड़ जाय। उस गाँव से लोगों की इतनी अपेक्षा तो स्वाभाविक है कि उस गाँव के लोग शिक्षित हों। अधिकारों के प्रति जागरूक हों। शायद अशिक्षा और जागरूकता की कमी की वजह से हीं यह गाँव पिछड़ा रह गया।
बिना इंटरनेट का वेबसाइट वाला गाँव
अपना यह लेख मैंने ग्रामीण विकास की पत्रिका 'सोपान स्टेप' से साभार लिया है-
हरियाणा के हंसदेहर (जिला - जींद) गाँव को जिले भर में लोग इंटरनेट वाले गाँव के नाम से जानते हैं। यह पुरा गाँव अपनी वेबसाइट http://www.smartvillage.org पर ऑनलाइन है। इस तरह हंसदेहर देश का पहला मॉडल इंटरनेट विलेज बन गया है। इस गाँव का नाम जिले तक ही नहीं, गाँव के बाहर भी लोग जानने लगे हैं। अपनी इस उपलब्धी की वजह से गाँव को २००६ का i4d अवार्ड मिला। जिसे गाँव वालों की तरफ से हंसदेहर स्मार्ट विलेज प्रोजेक्ट के सूत्रधार कँवल सिंह ने भारत सरकार के पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यार्ण के हाथों से लिया। आप इस वेबसाइट को हंसदेहर गाँव का encyclopedia कह सकते हैं। गाँव के समबन्ध में हर छोटी बड़ी जानकारी यहाँ उपलब्ध है। मसलन गाँव का इतिहास, गाँव के संबंध में संक्षिप्त जानकारी, गाँव के १,०१७ नागरिकों के संबंध में तमाम जानकारी मसलन वह क्या रोजगार करते हैं, उनकी शिक्षा कहाँ तक हुई है।
लेकिन इतना कुछ वेबसाइट पर होने के बाद कमाल की बात यह है कि आपको पूरे गाँव में एक भी इंटरनेट कनेक्शन नहीं मिलेगा। गाँव वाले इंटरनेट और वेबसाइट जैसे शब्द से ठीक तरीके से परिचित नहीं हैं। इस गाँव के १२वी कक्षा के एक छात्र से जब इंटरनेट का मतलब पूछा गया तो उसने कहा, वह नहीं जनता। शब्द उसके लिय जरूर जाना पहचाना था। उसने बताया कि वेबसाइट पर गाँव के संबंध में जानकारी दी जाती है और इस पर गाँव इस पर गाँव वालों की फोटो लगाई जाती है। उसने यह भी बताया कि यह रोजगार दिलवाने में भी मददगार है। उसे इस बात कि जानकारी थी कि उसका गाँव कंप्यूटर स्क्रीन पर पर नजर आता है।
गाँव की वेबसाइट बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले कँवल सिंह की माँ चाँद कौर कहती हैं, ''समन्वय डॉट कॉम सोसायटी" की देखरेख में गाँव को इंटरनेट से जोड़ने का प्रयास किया गया था। जो असफल रहा। चाँद कौर के अनुसार समन्वय ने कुछ दिनों तक गाँव में कंप्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र चलाया। यहाँ कंप्यूटर सीखने अच्छी संख्या में बच्चे आयें। पर गाँव वालों में इस विषय में जागरूकता में कमी की वजह से यह चल नहीं सका।
शेष कथा अगले पोस्ट में-
हरियाणा के हंसदेहर (जिला - जींद) गाँव को जिले भर में लोग इंटरनेट वाले गाँव के नाम से जानते हैं। यह पुरा गाँव अपनी वेबसाइट http://www.smartvillage.org पर ऑनलाइन है। इस तरह हंसदेहर देश का पहला मॉडल इंटरनेट विलेज बन गया है। इस गाँव का नाम जिले तक ही नहीं, गाँव के बाहर भी लोग जानने लगे हैं। अपनी इस उपलब्धी की वजह से गाँव को २००६ का i4d अवार्ड मिला। जिसे गाँव वालों की तरफ से हंसदेहर स्मार्ट विलेज प्रोजेक्ट के सूत्रधार कँवल सिंह ने भारत सरकार के पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यार्ण के हाथों से लिया। आप इस वेबसाइट को हंसदेहर गाँव का encyclopedia कह सकते हैं। गाँव के समबन्ध में हर छोटी बड़ी जानकारी यहाँ उपलब्ध है। मसलन गाँव का इतिहास, गाँव के संबंध में संक्षिप्त जानकारी, गाँव के १,०१७ नागरिकों के संबंध में तमाम जानकारी मसलन वह क्या रोजगार करते हैं, उनकी शिक्षा कहाँ तक हुई है।
लेकिन इतना कुछ वेबसाइट पर होने के बाद कमाल की बात यह है कि आपको पूरे गाँव में एक भी इंटरनेट कनेक्शन नहीं मिलेगा। गाँव वाले इंटरनेट और वेबसाइट जैसे शब्द से ठीक तरीके से परिचित नहीं हैं। इस गाँव के १२वी कक्षा के एक छात्र से जब इंटरनेट का मतलब पूछा गया तो उसने कहा, वह नहीं जनता। शब्द उसके लिय जरूर जाना पहचाना था। उसने बताया कि वेबसाइट पर गाँव के संबंध में जानकारी दी जाती है और इस पर गाँव इस पर गाँव वालों की फोटो लगाई जाती है। उसने यह भी बताया कि यह रोजगार दिलवाने में भी मददगार है। उसे इस बात कि जानकारी थी कि उसका गाँव कंप्यूटर स्क्रीन पर पर नजर आता है।
गाँव की वेबसाइट बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले कँवल सिंह की माँ चाँद कौर कहती हैं, ''समन्वय डॉट कॉम सोसायटी" की देखरेख में गाँव को इंटरनेट से जोड़ने का प्रयास किया गया था। जो असफल रहा। चाँद कौर के अनुसार समन्वय ने कुछ दिनों तक गाँव में कंप्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र चलाया। यहाँ कंप्यूटर सीखने अच्छी संख्या में बच्चे आयें। पर गाँव वालों में इस विषय में जागरूकता में कमी की वजह से यह चल नहीं सका।
शेष कथा अगले पोस्ट में-
शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2007
चाहे अंगरेजी में सर्व करों, पर हिन्दी पर गर्व- अशोक चक्रधर
तमाम घर को बयाबाँ बना के रखता था,
पता नहीं वो दीए क्यूँ बुझा के रखता था।
बुरे दिनों के लिए तुमने गुल्लक्कें भर लीं,
मै दोस्तों की दुआएँ बचा के रखता था।
वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारों-
इसी बहाने गुलों को डरा के रखता था।
न जाने कौन चला आए वक़्त का मारा,
कि मैं किवाड़ से सांकल हटा के रखता था।
हमेशा बात वो करता था घर बनाने की,
मगर मचान का नक़्शा छुपा के रखता था।
मेरे फिसलने का कारण भी है यही शायद,
कि हर कदम मैं बहुत आज़मा के रखता था।
पता नहीं वो दीए क्यूँ बुझा के रखता था।
बुरे दिनों के लिए तुमने गुल्लक्कें भर लीं,
मै दोस्तों की दुआएँ बचा के रखता था।
वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारों-
इसी बहाने गुलों को डरा के रखता था।
न जाने कौन चला आए वक़्त का मारा,
कि मैं किवाड़ से सांकल हटा के रखता था।
हमेशा बात वो करता था घर बनाने की,
मगर मचान का नक़्शा छुपा के रखता था।
मेरे फिसलने का कारण भी है यही शायद,
कि हर कदम मैं बहुत आज़मा के रखता था।
गुरुवार, 25 अक्टूबर 2007
चार पन्नों की एक जीवंत विचार अखबार “मीडिया स्कैन”
दिल्ली के पत्रकारिता के कुछ छात्रों ने मिलकर इस चार पेज को शुरू किया है। उन छात्रों में मेरी भी कुछ भूमिका तय है। अब इस चार पेज ने अपने पांच महीने पूरे कर लिय। इसकी शुरुआत करते वक़्त एक डर था कि कहीं साथियों का यह जोश अपनी दैनिक कार्यक्रमों की वजह से बाद में मंद ना पर जाय। आपको बताते हुय हर्ष हो रहा है कि अब तक ऐसी स्थिति नहीं आई है। साथियों का उत्साह देख कर लगता है। ऐसी स्थिति आने वाली नहीं है। बाकि भविष्य को किसने देखा है। खैर यहाँ हम दे रहे है, मीडिया स्कैन के पहले अंक के साथ ब्लोगेर गिरीन्द्र के टिप्पणी को। सुधि पाठको की प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा। - आशीष कुमार 'अंशु'
15 जून, शाम 6 बजे, कुछ युवा छात्रों, पत्रकारों को सेन्ट्रल पार्क (सी।पी -दिल्ली) में जमा होना था। मौसम सुहाना था, रिम-झिम बारिस बंद हो चुकी थी। इस कारण युवा छात्रों, पत्रकारों की संख्या बढ़ गयी। तकरीबन 35-40 की संख्या हो गयी। इन सभी में उत्साह की कमी नहीं थी, अपितु कुछ करने का जज्बा इन लोगों में साफ झलक रहा था। कह सकते हैं कि सभी की जुबान तो नरम थी लेकिन तासिर एकदम गरम॥। अब बात पते की हो जाए, दरअसल सभी के इकट्ठा होने का खास मकसद था। चार पन्नों की एक जीवंत विचार अखबार का लोकार्पण होना था।अखबार को सबके सामने पेश किया गया। “मीडिया स्कैन” नाम का यह अखबार खासतौर पर इन्हीं लोगों का है। पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने वाले इन नौजवानों की कलम मीडिया स्कैन के पहले अंक में जलवा बिखेरती नजर आयी। “मीडिया स्कैन” के अंतिम पृष्ट पर दो लेख किसी का भी ध्यान अपनी ओर खिंच सकते हैं। “पत्रकारिता के छात्र की डायरी” और “शोषण वाया बेगार गाथा....” एक अलग दुनिया से पढ़ने वालों को रु-ब-रु करा सकता है। आनंद कुमार और रुद्रेश नारायण की यह प्रस्तुति सचमुच लाजबाब है।दिल्ली जैसे महानगर में जिसे मीडिया का मक्का कहा जाता है, वहां मीडिया का स्कैन करना आखिर क्या कहता है.... ? दरअसल इस क्षेत्र में पांव पसारने के लिए कैसे-कैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं...(वाकिफ तो होंगे हीं॥)। वहां आए एक पत्रकारिता के छात्र ने बेबाक लहजे में बताया- “दिल्ली ऊंचा सुनती है ........।” यह पहला अंक है, अभी इसे काफी आगे बढ़ना है। कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन इन नौजवानों के आंखों में उमड़ते सपने साफ तौर पर इशारा कर रही थी कि मीडिया स्कैन काफी दूर तक अपना जलवा बिखेरेगी।अंत में-“गज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते वो सब के सब परीशां है,वहां पर क्या हुआ होगायहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैंखुदा जाने यहां पर किस तरह का जलसा हुआ होगा॥”-दुष्यंत कुमार-
यदि आप इच्छुक हैं-
मीडिया स्कैन की निशुल्क प्रति के लिए, आप संपर्क कर सकते हैं-
हिमांशु शेखर (संपादक- मीडिया स्कैन ) - 09891323387
अथवा
चिराग जैन (कला संपादक- मीडिया स्कैन) - ०९८६८५७३६१२
(यह चार पेज दिल्ली के पत्रकारिता के छात्रों द्वारा निकाला जा रहा है। )
15 जून, शाम 6 बजे, कुछ युवा छात्रों, पत्रकारों को सेन्ट्रल पार्क (सी।पी -दिल्ली) में जमा होना था। मौसम सुहाना था, रिम-झिम बारिस बंद हो चुकी थी। इस कारण युवा छात्रों, पत्रकारों की संख्या बढ़ गयी। तकरीबन 35-40 की संख्या हो गयी। इन सभी में उत्साह की कमी नहीं थी, अपितु कुछ करने का जज्बा इन लोगों में साफ झलक रहा था। कह सकते हैं कि सभी की जुबान तो नरम थी लेकिन तासिर एकदम गरम॥। अब बात पते की हो जाए, दरअसल सभी के इकट्ठा होने का खास मकसद था। चार पन्नों की एक जीवंत विचार अखबार का लोकार्पण होना था।अखबार को सबके सामने पेश किया गया। “मीडिया स्कैन” नाम का यह अखबार खासतौर पर इन्हीं लोगों का है। पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने वाले इन नौजवानों की कलम मीडिया स्कैन के पहले अंक में जलवा बिखेरती नजर आयी। “मीडिया स्कैन” के अंतिम पृष्ट पर दो लेख किसी का भी ध्यान अपनी ओर खिंच सकते हैं। “पत्रकारिता के छात्र की डायरी” और “शोषण वाया बेगार गाथा....” एक अलग दुनिया से पढ़ने वालों को रु-ब-रु करा सकता है। आनंद कुमार और रुद्रेश नारायण की यह प्रस्तुति सचमुच लाजबाब है।दिल्ली जैसे महानगर में जिसे मीडिया का मक्का कहा जाता है, वहां मीडिया का स्कैन करना आखिर क्या कहता है.... ? दरअसल इस क्षेत्र में पांव पसारने के लिए कैसे-कैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं...(वाकिफ तो होंगे हीं॥)। वहां आए एक पत्रकारिता के छात्र ने बेबाक लहजे में बताया- “दिल्ली ऊंचा सुनती है ........।” यह पहला अंक है, अभी इसे काफी आगे बढ़ना है। कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन इन नौजवानों के आंखों में उमड़ते सपने साफ तौर पर इशारा कर रही थी कि मीडिया स्कैन काफी दूर तक अपना जलवा बिखेरेगी।अंत में-“गज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते वो सब के सब परीशां है,वहां पर क्या हुआ होगायहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैंखुदा जाने यहां पर किस तरह का जलसा हुआ होगा॥”-दुष्यंत कुमार-
यदि आप इच्छुक हैं-
मीडिया स्कैन की निशुल्क प्रति के लिए, आप संपर्क कर सकते हैं-
हिमांशु शेखर (संपादक- मीडिया स्कैन ) - 09891323387
अथवा
चिराग जैन (कला संपादक- मीडिया स्कैन) - ०९८६८५७३६१२
(यह चार पेज दिल्ली के पत्रकारिता के छात्रों द्वारा निकाला जा रहा है। )
बुधवार, 24 अक्टूबर 2007
अंग्रेजी से विभाजित होता समाज :
मुझे लेख एक मित्र ने ई-मेल के माध्यम से भेजा था। लगा बात आगे पहुचनी चाहिय। इसी गरज से बरखा दत्त जी का लेख साभार दे रहा हूँ। पर कहाँ से इसकी जानकारी खाकसार के पास नहीं है। दोस्त का आभार जिसने मेल भेजा।
- आशीष कुमार 'अंशु'
[९८६८४१९४५३]
लगभग सोलह वर्ष की एक लड़की उस दिन एक टीवी चैनल पर इंटरव्यू दे रही थी। 97 प्रतिशत अंक मिले भी उसे परीक्षा में, पर राजधानी के एक ऊंचे स्कूल में प्रवेश नहीं मिला। लेकिन उस लड़की की बातों ने विख्यात टीवी एंकर बरखा दत्त को ठहर कर सोचने के लिए विवश कर दिया। बरखा दत्त ने जो सोचा है , वह यह है
पत्रकारिता की एक कष्टदायक लेकिन जरूरी विशेषता यह है कि कभी-कभी आपका काम ही आपको अपनी जिंदगी के सामने आईना लेकर खड़ा कर देता है। एक शांत लेकिन दृढ़ निश्चयी 16 वर्षीया युवती ने अचानक मेरी शिक्षा को ऐसा ही आईना दिखा दिया था। मेरा यह मानना है कि मेरे स्कूल व कॉलेज के वर्ष मेरे व्यक्तित्व के प्रारंभिक निर्माता थे , हर मध्यमवर्गीय भारतीय की तरह मैंने जहां पढ़ाई की और जो मुझे पढ़ाया गया उस पर गर्व किया है, तथापि इस युवा लड़की के विनम्र आदर्शवाद ने मुझे ठहरकर सोचने को विवश कर दिया है - क्या मेरी पब्लिक स्कूल की शिक्षा शर्मनाक रूप से अभिजातवर्गीय थी ?
पहली नजर में बात सीधी-सादी थी , 97.6 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाली सीबीएसई की टॉपर गरिमा गोदारा ने अपने गांव के सबसे नजदीक दिल्ली स्थित द्वारका दिल्ली पब्लिक स्कूल के लिए प्रवेश परीक्षा दी। 6 हजार रुपए प्रतिमाह से भी कम पाने वाले पुलिस के सिपाही, उसके पिता के लिए इस स्कूल की फीस बड़ी समस्या रही होगी। लेकिन परिवार अविचलित था। छात्रवृत्ति या ऋण की आस थी। निश्चय ही स्कूल भी ऐसी छात्रा को प्रवेश देना ही चाहेगा जिसने राष्ट्रीय राजधानी की योग्यता सूची में शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। गरिमा के पिता ने अपने बुजुर्गों की संस्थापित पितृसत्तात्मकता और इन तांकू-झांकू पड़ोसियों से जूझने में महीनों खपाए थे जो यह बकवास करते थे कि लड़की रसोई में काम क्यों नहीं करती। अपनी बेटी को उसे प्राप्तांकों के अनुरूप शिक्षा दिलाने का उनका इरादा और भी मजबूत होता गया था। यह नए भारत और इसके मध्यम वर्ग का एक व्याख्यान हो सकता था। सपने देखने का दुस्साहस करने वाले देश का मील का पत्थर हो सकता था। लेकिन इसकी बजाय हुआ यह कि दिल्ली पब्लिक स्कूल ने उसे मना कर दिया। ठीक है। परिणाम अच्छा है लेकिन स्कूल के प्रिंसीपल ने कहा , अंक ही तो सब कुछ नहीं होते। फिर इसकी तो अंग्रेजी भी अच्छी नहीं है। बाद में गरिमा को सुनते हुए क्रुध्द या विचलित न होना मुश्किल था। जाहिर अन्याय के कारण क्रुध्द। वह अपने परिणाम के अनुरूप ही मेधावी थी और जैसी अंग्रेजी वह बोल रही थी उससे स्पष्ट था कि वह पाठयक्रम को समझने पूरी तरह सक्षम थी। हां , उसके उच्चारण में जरूर क्षेत्रीय स्पर्श था। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि वह न केवल जटिल विमर्श को समझ सकती थी, उसका बोला हुआ किसी भी अंग्रेजी वक्ता की समझ में भी आ सकता था।
उसका शांत भाव परेशान करने वाला था। एक मौन साहस था जो उसकी किशोरावस्था के कतई अनुरूप नहीं था। ऐसा लग रहा था मानो उसकी तुलना में हम ही अधिक अपमानित और क्रुध्द थे। कार्यक्रम के बीच देहरादून के एक सुपरिचित स्कूल के प्रिंसीपल ने फोन कर उसे छात्रवृत्ति सहित प्रवेश देने की पेशकश की तो अन्य ने डीपीएस का निर्णय बदलवाने के वादे किए। लेकिन आहत होने का किंचित भी आभास दिए बगैर उसने दृढ़ता से कहा कि अब तो उसका लक्ष्य दिल्ली पब्लिक स्कूल को यह बताना मात्र है कि वह अपने किसी भी विद्यार्थी से बेहतर हो सकती है। उसने एक अन्य स्कूल में प्रवेश ले लिया और दिल्ली पब्लिक स्कूल अब उसे भूल जाए। जब वह टीवी पर बोल रही थी , दर्शक भी स्पष्टत: मेरी ही तरह क्रुध्द थे। तात्कालिक ऑनलाइन जनमत संग्रह के अनुसार 90 प्रतिशत दर्शकों का खयाल था कि अंग्रेजी भाषा हमारी शिक्षा व्यवस्था पर एक असंतुलित प्रभाव डाल रही है। लेकिन क्या हम सबका बरताव पाखंडी और बेईमानों जैसा नहीं है? इस बार डीपीएस सामने आ गया, लेकिन क्या हममें से कोई भी उससे भिन्न है? कल्पना कीजिए, वह स्कूल में भी बहुत उम्दा प्रदर्शन करती है। अगला मुकाम है कॉलेज, मैं कल्पना करती हूं कि वह मेरे पुराने कॉलेज , दिल्ली के सेंट स्टीफेंस में दाखिले के लिए इंटरव्यू दे रही है। क्या उसे ले लिया जाएगा? क्या वे उसकी अकादमिक प्रखरता की सराहना करेंगे? या वे उसके उच्चारण का मजाक उड़ाएंगे और वह जब भी कोई व्याकरणिक गलती करेगी, उसका उपहास करेंगे और फिर उसे अपने दोस्त खोजते रहने के लिए अकेला छोड़ जाएंगे ?
गरिमा का यह उदाहरण भविष्य के साथ भारत के विकृत साक्षात्कार का एक रूपक है। कार्यक्रम खत्म होने के बाद मुझे पता चला और यह महत्वपूर्ण है कि यह बात उसने या उसके मां-बाप ने नहीं बताई कि वह अन्य पिछड़ा वर्ग से है। पिछले कुछ अर्से से आरक्षण पर बहस गर्म है। इसके विरोधियों ने बार-बार वही बात दुहराई है कि हमें योग्यता की कद्र करने वाला समाज बनाना चाहिए। निश्चय ही यह एक वजनदार तर्क है और मैं भी इसी के पक्ष में रही हूं।
लेकिन गलियों में आरक्षण विरोध की लड़ाई लड़ने वाले अब क्या कहेंगे ? यहां है वह लड़की जिसने मुख्यधारा में प्रतिस्पर्धा की है। उसका अपना दिल्ली पब्लिक स्कूल भी चमचमाते, अमीर , बड़े नामों के सामने टिका रहा है। लेकिन उसकी योग्यता तो उच्च वर्ग के धूर्तों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा एक धोखे भरा शब्द मात्र है। यह किस्सा भारत के वर्ग भेद पर भी एक कटु टिप्पणी है। तेजी से बढ़ रहे मध्यमवर्ग की बात करना बाजारबाजों और अर्थशास्त्रियों के लिए फैशन में शुमार हो चला है। भारतीय बाजार और नए मध्यमवर्ग के आकार को दर्शाने वाला कोई न कोई आंकड़ा रोज उछाला जाता है। हम इन आंकड़ों को गले लगाते हैं क्योंकि हमें भी यह विचार लुभाता है कि भारत नई शताब्दी का लोकप्रिय आर्थिक मुकाम बन रहा है। जब 'टाइम' पत्रिका अपने मुख पृष्ठ पर हमारे देश को सजाती है तो हम गर्वित होते हैं और खास तौर पर विदेशियों के सामने, धड़ल्ले से सामाजिक गतिशीलता और अमीर-गरीब के बीच संकुचित होती जा रही खाई की बात करने लगते हैं। हम कहते हैं कि भारत के भविष्य का निर्माण इसका उद्यमी और साहसी मध्यमवर्ग कर रहा है और महसूस करते हैं कि मानों अभी इसी वक्त वह भविष्य हमारे सामने साकार हो रहा है। लेकिन एक सच हम कभी स्वीकार नहीं करते। पिछले दशक की सामाजिक गतिशीलता का अर्थ है कि नया मध्यमवर्ग हम जैसों से निर्मित नहीं है। इसकी बजाय , यह गरिमा जैसे लोगों से बना है, जिन्हें अलग रखने के बहाने अभी भी हमारे पास है। हम पाश्चात्य सॉफिस्टिकेशन के उनके अभाव पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं, उनके उच्चारण का मजाक उड़ाते हैं और यह सुनिश्चित करने की भरसक कोशिश करते हैं कि हमारे बच्चे उनके बच्चों से अलग रहें , अलग दिखें।
और अंत में , गरिमा का आख्यान अंग्रेजी भाषा से भारत के रिश्ते की विडम्बना को भी उजागर करता है। पूरी दुनिया में कहीं भी हमारे जैसी अंग्रेजी नहीं बोली जाती। हमारा अपना मुहावरा है, अपनी शब्दावली और अपना उच्चारण। हम अपनी शैली की अंग्रेजी से प्यार का ढोंग करते हैं और इस बात की डींग हांकते हैं कि इसी कारण भारत ने विश्व के आउट सोर्सिंग बाजार में अपनी धाक जमा रखी है। लेकिन निश्चय ही अंतरमन में हम जानते हैं कि वाकई पश्चिम जिसे चाहता है वैसी अंग्रेजी हमारी नहीं है। और इसीलिए , जब भी हम किसी ब्रिटिश या अमेरिकी से बात करते हैं, अपनी शैली और उच्चारण के उतार-चढ़ाव में फेरबदल कर लेते हैं। जब हम अपने कॉल सेंटर स्थापित करते हैं तो हमारे अपने समाज के वाणी व्यवहार को पूरी तरह तिलांजलि दे देते हैं और भाषाई रूप से मध्य अमेरिका में प्रव्रजन कर ऐसे लोगों का छद्म-प्रतिरूप बन जाते हैं , जिनसे कभी हमारी मुलाकात तक नहीं होगी।
लेकिन भारत में हम अपनी अंग्रेजी को ही सामाजिक नियंता मानते हैं। हम क्षेत्रीय उच्चारणों पर हंसते हैं , व्याकरण की गलतियां करने वालों का मजाक उड़ाते हैं और उनके साथ सहज अनुभव करते हैं तो हमारी तरह से बोलते हैं। शेष सभी तो अंग्रेजी की इस विभाजक रेखा के उस पार हैं। स्वाभाविक ही है कि जो दूसरी तरफ हैं , उनकी जाति भी भिन्न है, वर्ग भी। शायद इस लघु समुदाय से हमारे मजबूती से चिपकने के मूल में हमारी असुरक्षा है। हमारे छोटे-से बुलबुले के बाहर भारत बदल रहा है। ताजा समय में हर बड़ा संस्थान चाहे वह संसद हो , नौकरशाही हो, सेना हो, स्कूल-कॉलेज हो, अपने नियमों का पुनर्लेखन करने को बाध्य हैं। भारतीयों की एक नई नस्ल जो अपनी स्वीकृति के लिए पश्चिम की मुखापेक्षी नहीं है , अपनी उपस्थिति महसूस कर रही है। हम इसे गुणवत्ता की कमी कहते हैं। लेकिन असल में तो यह शेष भारत के अंदर आने की कोशिश है। हम कब तक दरवाजे बंद रखेंगे?
- आशीष कुमार 'अंशु'
[९८६८४१९४५३]
लगभग सोलह वर्ष की एक लड़की उस दिन एक टीवी चैनल पर इंटरव्यू दे रही थी। 97 प्रतिशत अंक मिले भी उसे परीक्षा में, पर राजधानी के एक ऊंचे स्कूल में प्रवेश नहीं मिला। लेकिन उस लड़की की बातों ने विख्यात टीवी एंकर बरखा दत्त को ठहर कर सोचने के लिए विवश कर दिया। बरखा दत्त ने जो सोचा है , वह यह है
पत्रकारिता की एक कष्टदायक लेकिन जरूरी विशेषता यह है कि कभी-कभी आपका काम ही आपको अपनी जिंदगी के सामने आईना लेकर खड़ा कर देता है। एक शांत लेकिन दृढ़ निश्चयी 16 वर्षीया युवती ने अचानक मेरी शिक्षा को ऐसा ही आईना दिखा दिया था। मेरा यह मानना है कि मेरे स्कूल व कॉलेज के वर्ष मेरे व्यक्तित्व के प्रारंभिक निर्माता थे , हर मध्यमवर्गीय भारतीय की तरह मैंने जहां पढ़ाई की और जो मुझे पढ़ाया गया उस पर गर्व किया है, तथापि इस युवा लड़की के विनम्र आदर्शवाद ने मुझे ठहरकर सोचने को विवश कर दिया है - क्या मेरी पब्लिक स्कूल की शिक्षा शर्मनाक रूप से अभिजातवर्गीय थी ?
पहली नजर में बात सीधी-सादी थी , 97.6 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाली सीबीएसई की टॉपर गरिमा गोदारा ने अपने गांव के सबसे नजदीक दिल्ली स्थित द्वारका दिल्ली पब्लिक स्कूल के लिए प्रवेश परीक्षा दी। 6 हजार रुपए प्रतिमाह से भी कम पाने वाले पुलिस के सिपाही, उसके पिता के लिए इस स्कूल की फीस बड़ी समस्या रही होगी। लेकिन परिवार अविचलित था। छात्रवृत्ति या ऋण की आस थी। निश्चय ही स्कूल भी ऐसी छात्रा को प्रवेश देना ही चाहेगा जिसने राष्ट्रीय राजधानी की योग्यता सूची में शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। गरिमा के पिता ने अपने बुजुर्गों की संस्थापित पितृसत्तात्मकता और इन तांकू-झांकू पड़ोसियों से जूझने में महीनों खपाए थे जो यह बकवास करते थे कि लड़की रसोई में काम क्यों नहीं करती। अपनी बेटी को उसे प्राप्तांकों के अनुरूप शिक्षा दिलाने का उनका इरादा और भी मजबूत होता गया था। यह नए भारत और इसके मध्यम वर्ग का एक व्याख्यान हो सकता था। सपने देखने का दुस्साहस करने वाले देश का मील का पत्थर हो सकता था। लेकिन इसकी बजाय हुआ यह कि दिल्ली पब्लिक स्कूल ने उसे मना कर दिया। ठीक है। परिणाम अच्छा है लेकिन स्कूल के प्रिंसीपल ने कहा , अंक ही तो सब कुछ नहीं होते। फिर इसकी तो अंग्रेजी भी अच्छी नहीं है। बाद में गरिमा को सुनते हुए क्रुध्द या विचलित न होना मुश्किल था। जाहिर अन्याय के कारण क्रुध्द। वह अपने परिणाम के अनुरूप ही मेधावी थी और जैसी अंग्रेजी वह बोल रही थी उससे स्पष्ट था कि वह पाठयक्रम को समझने पूरी तरह सक्षम थी। हां , उसके उच्चारण में जरूर क्षेत्रीय स्पर्श था। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि वह न केवल जटिल विमर्श को समझ सकती थी, उसका बोला हुआ किसी भी अंग्रेजी वक्ता की समझ में भी आ सकता था।
उसका शांत भाव परेशान करने वाला था। एक मौन साहस था जो उसकी किशोरावस्था के कतई अनुरूप नहीं था। ऐसा लग रहा था मानो उसकी तुलना में हम ही अधिक अपमानित और क्रुध्द थे। कार्यक्रम के बीच देहरादून के एक सुपरिचित स्कूल के प्रिंसीपल ने फोन कर उसे छात्रवृत्ति सहित प्रवेश देने की पेशकश की तो अन्य ने डीपीएस का निर्णय बदलवाने के वादे किए। लेकिन आहत होने का किंचित भी आभास दिए बगैर उसने दृढ़ता से कहा कि अब तो उसका लक्ष्य दिल्ली पब्लिक स्कूल को यह बताना मात्र है कि वह अपने किसी भी विद्यार्थी से बेहतर हो सकती है। उसने एक अन्य स्कूल में प्रवेश ले लिया और दिल्ली पब्लिक स्कूल अब उसे भूल जाए। जब वह टीवी पर बोल रही थी , दर्शक भी स्पष्टत: मेरी ही तरह क्रुध्द थे। तात्कालिक ऑनलाइन जनमत संग्रह के अनुसार 90 प्रतिशत दर्शकों का खयाल था कि अंग्रेजी भाषा हमारी शिक्षा व्यवस्था पर एक असंतुलित प्रभाव डाल रही है। लेकिन क्या हम सबका बरताव पाखंडी और बेईमानों जैसा नहीं है? इस बार डीपीएस सामने आ गया, लेकिन क्या हममें से कोई भी उससे भिन्न है? कल्पना कीजिए, वह स्कूल में भी बहुत उम्दा प्रदर्शन करती है। अगला मुकाम है कॉलेज, मैं कल्पना करती हूं कि वह मेरे पुराने कॉलेज , दिल्ली के सेंट स्टीफेंस में दाखिले के लिए इंटरव्यू दे रही है। क्या उसे ले लिया जाएगा? क्या वे उसकी अकादमिक प्रखरता की सराहना करेंगे? या वे उसके उच्चारण का मजाक उड़ाएंगे और वह जब भी कोई व्याकरणिक गलती करेगी, उसका उपहास करेंगे और फिर उसे अपने दोस्त खोजते रहने के लिए अकेला छोड़ जाएंगे ?
गरिमा का यह उदाहरण भविष्य के साथ भारत के विकृत साक्षात्कार का एक रूपक है। कार्यक्रम खत्म होने के बाद मुझे पता चला और यह महत्वपूर्ण है कि यह बात उसने या उसके मां-बाप ने नहीं बताई कि वह अन्य पिछड़ा वर्ग से है। पिछले कुछ अर्से से आरक्षण पर बहस गर्म है। इसके विरोधियों ने बार-बार वही बात दुहराई है कि हमें योग्यता की कद्र करने वाला समाज बनाना चाहिए। निश्चय ही यह एक वजनदार तर्क है और मैं भी इसी के पक्ष में रही हूं।
लेकिन गलियों में आरक्षण विरोध की लड़ाई लड़ने वाले अब क्या कहेंगे ? यहां है वह लड़की जिसने मुख्यधारा में प्रतिस्पर्धा की है। उसका अपना दिल्ली पब्लिक स्कूल भी चमचमाते, अमीर , बड़े नामों के सामने टिका रहा है। लेकिन उसकी योग्यता तो उच्च वर्ग के धूर्तों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा एक धोखे भरा शब्द मात्र है। यह किस्सा भारत के वर्ग भेद पर भी एक कटु टिप्पणी है। तेजी से बढ़ रहे मध्यमवर्ग की बात करना बाजारबाजों और अर्थशास्त्रियों के लिए फैशन में शुमार हो चला है। भारतीय बाजार और नए मध्यमवर्ग के आकार को दर्शाने वाला कोई न कोई आंकड़ा रोज उछाला जाता है। हम इन आंकड़ों को गले लगाते हैं क्योंकि हमें भी यह विचार लुभाता है कि भारत नई शताब्दी का लोकप्रिय आर्थिक मुकाम बन रहा है। जब 'टाइम' पत्रिका अपने मुख पृष्ठ पर हमारे देश को सजाती है तो हम गर्वित होते हैं और खास तौर पर विदेशियों के सामने, धड़ल्ले से सामाजिक गतिशीलता और अमीर-गरीब के बीच संकुचित होती जा रही खाई की बात करने लगते हैं। हम कहते हैं कि भारत के भविष्य का निर्माण इसका उद्यमी और साहसी मध्यमवर्ग कर रहा है और महसूस करते हैं कि मानों अभी इसी वक्त वह भविष्य हमारे सामने साकार हो रहा है। लेकिन एक सच हम कभी स्वीकार नहीं करते। पिछले दशक की सामाजिक गतिशीलता का अर्थ है कि नया मध्यमवर्ग हम जैसों से निर्मित नहीं है। इसकी बजाय , यह गरिमा जैसे लोगों से बना है, जिन्हें अलग रखने के बहाने अभी भी हमारे पास है। हम पाश्चात्य सॉफिस्टिकेशन के उनके अभाव पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं, उनके उच्चारण का मजाक उड़ाते हैं और यह सुनिश्चित करने की भरसक कोशिश करते हैं कि हमारे बच्चे उनके बच्चों से अलग रहें , अलग दिखें।
और अंत में , गरिमा का आख्यान अंग्रेजी भाषा से भारत के रिश्ते की विडम्बना को भी उजागर करता है। पूरी दुनिया में कहीं भी हमारे जैसी अंग्रेजी नहीं बोली जाती। हमारा अपना मुहावरा है, अपनी शब्दावली और अपना उच्चारण। हम अपनी शैली की अंग्रेजी से प्यार का ढोंग करते हैं और इस बात की डींग हांकते हैं कि इसी कारण भारत ने विश्व के आउट सोर्सिंग बाजार में अपनी धाक जमा रखी है। लेकिन निश्चय ही अंतरमन में हम जानते हैं कि वाकई पश्चिम जिसे चाहता है वैसी अंग्रेजी हमारी नहीं है। और इसीलिए , जब भी हम किसी ब्रिटिश या अमेरिकी से बात करते हैं, अपनी शैली और उच्चारण के उतार-चढ़ाव में फेरबदल कर लेते हैं। जब हम अपने कॉल सेंटर स्थापित करते हैं तो हमारे अपने समाज के वाणी व्यवहार को पूरी तरह तिलांजलि दे देते हैं और भाषाई रूप से मध्य अमेरिका में प्रव्रजन कर ऐसे लोगों का छद्म-प्रतिरूप बन जाते हैं , जिनसे कभी हमारी मुलाकात तक नहीं होगी।
लेकिन भारत में हम अपनी अंग्रेजी को ही सामाजिक नियंता मानते हैं। हम क्षेत्रीय उच्चारणों पर हंसते हैं , व्याकरण की गलतियां करने वालों का मजाक उड़ाते हैं और उनके साथ सहज अनुभव करते हैं तो हमारी तरह से बोलते हैं। शेष सभी तो अंग्रेजी की इस विभाजक रेखा के उस पार हैं। स्वाभाविक ही है कि जो दूसरी तरफ हैं , उनकी जाति भी भिन्न है, वर्ग भी। शायद इस लघु समुदाय से हमारे मजबूती से चिपकने के मूल में हमारी असुरक्षा है। हमारे छोटे-से बुलबुले के बाहर भारत बदल रहा है। ताजा समय में हर बड़ा संस्थान चाहे वह संसद हो , नौकरशाही हो, सेना हो, स्कूल-कॉलेज हो, अपने नियमों का पुनर्लेखन करने को बाध्य हैं। भारतीयों की एक नई नस्ल जो अपनी स्वीकृति के लिए पश्चिम की मुखापेक्षी नहीं है , अपनी उपस्थिति महसूस कर रही है। हम इसे गुणवत्ता की कमी कहते हैं। लेकिन असल में तो यह शेष भारत के अंदर आने की कोशिश है। हम कब तक दरवाजे बंद रखेंगे?
शनिवार, 20 अक्टूबर 2007
मेरे बारे में कोई राय ना कायम करना
- राज नाथ सिंह सूर्य
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बयासी साल का हो गया है। संस्थापक डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार के समय का अब शायद ही कोई स्वयंसेवक शेष हो, लेकिन उनसे प्रेरणा लेकर आज भी संघ के पास स्वयंसेवकों की बड़ी फौज है। संघ कार्य का विस्तार देश की सीमाओं को लांघ चुका है और विश्व का शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां हिंदुओं की पर्याप्त संख्या में आबादी हो और वह संघ कार्य से अछूती रह गई हो। डाक्टर हेडगेवार ने जिस संघ को शाखा के रूप में मूर्तमान किया था, अब उसके बहुविधि स्वरूप हो गए हैं। जीवन का शायद ही कोई ऐसा पहलू हो जिसको स्पर्श करने के लिए संघ के स्वयंसेवक कार्यरत न हों। डॉ। हेडगेवार ने संघ का गठन हिंदुओं को संगठित करने के लिए किया था, लेकिन अब गैर हिंदू यानी ईसाइयों और मुसलमानों के बीच भी संघ का विस्तार हो चुका है। संघ संस्कारों के फलस्वरूप राष्ट्रीय चेतना के लिए इतने संगठन क्रियाशील हैं, जिनकी गणना के लिए संघ को एक अलग विभाग सृजित करना पड़ सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संसार का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन तो है ही, उसके स्वयंसेवकों द्वारा संचालित भारतीय शिक्षा परिषद दुनिया की सबसे बड़ा शिक्षण संस्थान बन चुकी है। वनवासी कल्याण आश्रम, विवेकानंद केंद्र आदि के माध्यम से उसने उपेक्षित क्षेत्रों में अपेक्षित राष्ट्रीय चेतना का संचार किया है। शिक्षा के साथ-साथ कृषि, व्यापार, उद्योग आदि क्षेत्रों में उसके स्वयंसेवक महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं। धर्म जागरण मंच कर्मकांड के वास्तविक महत्व को समझाने में लगा हुआ है, वहीं संस्कृत भारती अत्यंत सरलतापूर्वक संस्कृत के पठन-पाठन और उसमें अभिव्यक्ति के लिए क्रियाशील है। इतना अधिक विस्तारित होने के कारण कभी-कभी उसकी शाखाओं को ही मूल संगठन समझने का भ्रम हो जाता है और कुछ लोग यह मानकर चलते भी हैं कि संघ स्वयं में मूल संगठन न होकर विश्व हिंदू परिषद या भारतीय जनता पार्टी का सहायक संगठन है। इसका मुख्य कारण यह हो सकता है कि जहां संघ प्रेरित शेष संस्थाएं सेवा और संस्कार के कार्यो में लगी रहने के कारण संवाद और विवाद से परे रहने से चर्चा का विषय नहीं बनतीं वहीं राजनीति में रहने के कारण भाजपा और आंदोलित रहने के कारण विश्व हिंदू परिषद के बारे में निरंतर संवाद और विवाद का क्रम बना रहता है। संघ कभी इन विवादों का समाधान करने के लिए चर्चित होता है तो कभी उनकी क्षमता बढ़ाने में योगदान देने के लिए। इन दोनों ही चर्चाओं में संघ का मूल्यांकन सीमित हो जाने के कारण डाक्टर हेडगेवार ने जिस सामाजिक चेतना के लिए संघ की स्थापना की थी वह गौण हो जाती है। संघ की कार्यपद्धति संस्कार की है। इसलिए संघ एक संगठनात्मक आधार की संस्था है, आंदोलनात्मक आधार की नहीं। संघ संगठन में आज भी जितनी संख्या में स्वयंसेवक निस्वार्थ भाव से योगदान कर रहे हैं, वैसे निष्ठा से काम करने वाले दुर्लभ हैं। संघ के द्वितीय सरसंघ चालक श्री गुरुजी ने ऐसे कार्यकर्ताओं को देव दुर्लभ की संज्ञा प्रदान की थी। जिस संस्था के पास ऐसे कार्यकर्ताओं की निरंतरता बनी हुई हो, उसका प्रभाव घटने लगे तो यह आश्चर्य की बात है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सक्रिय लोगों को भले ही प्रभाव कम होने का आभास न होता हो लेकिन जो आम धारणा है, उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। विस्तार के अनुरूप संघ का प्रभाव न होने के कारणों में जाना चाहिए। संघ को यह भी समझना होगा कि उसके संस्थापक ने क्यों राजनीति से परे ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस की। संभवत: यह घटना साठ के दशक की है। कानपुर के संघ शिक्षा वर्ग में द्वितीय सरसंघ चालक गुरुजी ने तमाम वरिष्ठ प्रचारकों और पंडित दीनदयाल उपाध्याय सहित तमाम जनसंघ नेताओं की उपस्थिति में एक सवाल किया था। उन्होंने अपने भाषण के दौरान जानना चाहा कि संघ हिंदुओं का संगठित करने में लगा है तो क्या हिंदू सिर्फ जनसंघ में हैं? आज जब संघ गैर हिंदुओं में भी कार्य कर रहा है तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या हिंदू सिर्फ भारतीय जनता पार्टी में ही हैं? संघ शक्ति का जितना अपव्यय भाजपा को संवारने और विश्व हिंदू परिषद को संभालने में हो रहा है उतना ही उसका प्रभाव सीमित होता जा रहा है। श्री गुरुजी के जन्मशताब्दी वर्ष में इतने व्यापक और विशाल समरसता आयोजन उसी प्रकार विफल हो गए, जैसे दूध से भरे पात्र में नींबू की एक बूंद निचोड़ दी जाए। क्या कारण है कि संघ के सभी आयोजनों का आकलन भाजपा के साथ जोड़कर देखा जाना आम बात हो गई है। संघ की जिन बैठकों में भाजपा के पदाधिकारियों की उपस्थिति नहीं होती उनका भी आकलन भाजपा को केंद्र बिंदु मानकर किया जाता है। इसके लिए मीडिया में सनसनी की भावना को दोष देना स्थिति के सही आकलन से मुंह मोड़ना होगा। एक अन्य संगठन विश्व हिंदू परिषद के क्रियाकलाप को संघ का क्रियाकलाप मानकर चलाया जा रहा है। यह ठीक है कि संघ के संस्थापक हेडगेवार ने 1930 के असहयोग आंदोलन में भाग लिया और जेल भी गए, लेकिन उन्होंने संघ को सदैव आंदोलन से अलग रखा। यही नहीं, सत्याग्रह में जाने पर सरसंघ चालक का दायित्व भी छोड़ दिया था। उसके पीछे उनका उद्देश्य था, संघ कार्य की दिशा को ठीक रखना। आज संघ विश्व हिंदू परिषद के प्रत्येक आंदोलन में भाग लेने लगा है। जब कोई संगठन आंदोलनों की श्रृंखला में उलझ जाता है, उसका संगठनात्मक ढांचा ध्वस्त हो जाता है। महात्मा गांधी ने 1920 के बाद 1930 में और फिर 1942 में ही व्यापक जन आंदोलन का आह्वान किया था। विश्व हिंदू परिषद को आकार देने वाले श्री गुरुजी ने तो 1948 में संघ स्वयंसेवकों पर अत्याचार करने वालों को भी दांत के बीच जीभ आ जाने, पर कोई दांत नहीं तोड़ डालता कहकर संयमित आचरण के लिए प्रेरित किया था लेकिन उनके प्रति आस्थावान जब किसी के लिए अशालीन भाषा का प्रयोग करें या सिर काट लाने पर संतों द्वारा सोने की भाषा बोलने लगें तो यह विचार उठना स्वाभाविक है कि मूल संगठन की दिशा और दृष्टि उसके पदाधिकारियों व स्वयंसेवकों की भी है या नहीं? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भले ही बयासी वर्ष का संगठन हो गया हो, लेकिन वह बूढ़ा नहीं हुआ। इसमें नूतनता का क्रम बना हुआ है, लेकिन जैसे पावर हाउस में उत्पादन ठप हो जाने के कारण विस्तारित लाइन में बिजली के संचार में कमी आ जाती है, संघ भी वैसी स्थिति में पहुंच रहा है। उसके विस्तार के प्रभाव पर राजनीतिक छाया गहराने के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहा है। संघ के प्रथम और द्वितीय सरसंघ चालक ने संघ के दैनंदिन कार्य को ही सर्वोपरि समझा था। संघ आर्यसमाज के समान संस्थाओं पर अधिकार के झमेले में फंसकर अपनी पहचान न खो दे, इसके लिए आवश्यक है कि दो प्रथम सरसंघ चालकों द्वारा निर्धारित दिशा और दृष्टि उसके संगठन का आधार बनी रहे। संघ की स्थापना न तो किसी तात्कालिक समस्या के समाधान के लिए हुई थी और न ही किसी व्यक्ति की महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए। संघ समाज का ही दूसरा स्वरूप है उससे पृथक कुछ भी नहीं। इस सोच के साथ राष्ट्रीय चैतन्यता के लिए संघ की स्थापना का उद्देश्य आज भी उतना ही सार्थक है, जितना उसकी स्थापना के समय था। (लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम

