शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

आपदाग्रस्त रिपोर्टिंग

16 जून 2013 की वह रात उत्तराखंड के इतिहास में एक मनहूस रात के तौर पर ही याद की जाएगी। जो लोग इस घटना के गवाह रहे हैं, वे शायद इस घटना से जुड़ी कुछ और बातों को भी कभी भूल नहीं पाएंगे। इन्हीं कुछ बातों में एक है, उत्तराखंड आपदा की कवरेज के लिए दिल्ली से उत्तराखंड पहुंचे पत्रकारों की भूमिका। यदि कथित राष्ट्रीय खबरिया चैनलों की रिपोर्टिंग को आप अब तक याद रख पाएं हों तो याद करने की कोशिश कीजिए, कि थ्रिल करने वाली उस डिजास्टर रिपोर्टिंग के दौरान आप उत्तराखंड के स्थानीय लोगों के दर्द के साथ कितना जुड़ पाए थे? क्या दिल्लीवाले रिपोर्टरों की रिपोर्टिंग से आप वहां की कठिन जिन्दगी और संघर्ष कर रहे लोगों की जिन्दगी को कितना समझ पाए थे?
दिल्ली से गई एक महिला पत्रकार को एक  स्थानीय बुजुर्ग ने नसीहत देते हुए कहा- बेटी तुम यहां से क्या लेकर जाओगी नहीं जानता, लेकिन वही दिखाना जो तुम्हें नजर आए।'' पत्रकारों से हम यही उम्मीद करते हैं कि वह सच ही दिखलाएंगे, यदि एक बुजुर्ग को इस तरह की बात एक पत्रकार से कहनी पड़ती है तो क्या पत्रकार वह नहीं दिखा रहे थे, जो खुद देख रहे थे? सामाजिक कार्यकर्ता और उत्तराखंड आपदा के समय वहां के लोगों की मदद के लिए तत्पर इन्द्रेश मैखुरी ने बताया कि ''दिल्ली की मीडिया के लिए स्थानीय लोगों में कितना गुस्सा है कि पीटूसी में कुछ गलत बयानी कर रहे एक पत्रकार की स्थानीय लोगों ने धुनाई भी कर दी थी।'' पत्रकारिता की असंवेदनशीलता उत्तराखंड आपदा रिपोर्टिंग में उस दिन भी नजर आई थी, जब एक पत्रकार, एक पीड़ित के कंधे पर चढ़ कर रिपोर्टिंग कर रहा था। उन पत्रकार के लिए पी साईनाथ का कहना है कि ''इस तरह की रिपोर्टिंग को यदि प्रतिकात्मक तौर पर देखें तो इसमें मीडिया के परजीवी की तरह व्यवहार करने के चिन्ह साफ नजर आते हैं।''
यह बात तो उत्तराखंड के पत्रकार भी जानना चाहते हैं कि उनमें क्या कमी थी जो दिल्ली से इलेक्ट्रानिक मीडिया के इतने सारे पत्रकार निर्यात किए गए? उन पत्रकारों को पहाड़ में क्यों धकेल दिया जिन्हें ना पहाड़ की स्थिति का अंदाजा था और ना ही पहाड़ी जीवन का। वैसे अंदाजा ना भी होता और वे होमवर्क करके आते तो भी सवाल नहीं था। उनके पास होमवर्क भी नहीं था। वर्ना श्रीनगर और रूद्रप्रयाग के रास्ते में पड़ने वाली सीडोबगड़ में खड़े होकर एक दिल्ली का पत्रकार उसे केदारनाथ की दरकती पहाड़िया नहीं बता रहा होता। ईटीवी के पत्रकार सुधीर भट्ट इलेक्ट्रानिक मीडिया का बचाव करते हुए कहते हैं, उनकी भी अपनी मजबूरी है। यहां के हालात दिल्ली में बैठे लोग जानते नहीं। उन्हें ‘खबर हर कीमत पर’ चाहिए। उन्हें इस बात की परवाह नहीं कि उनका रिपोर्टर किन परिस्थितियों में है। खबर है भी या नहीं? वह खबर देने की हालत में भी है या नहीं। पहाड़ में रिपोर्टिंग मैदानी इलाकेों जैसी नहीं होती। यहां के बीस किलोमीटर के फासले और दिल्ली के बीस किलोमीटर के फासले में जमीन-आसमान का अंतर है और जब जगह-जगह लैन्ड स्लाइड हुआ हो तो हालात और बिगड़ जाते हैं। भट्ट आगे कहते हैं- सुबह नौ बजे से ही रिपोटर्स के पास फोन आना शुरू हो जाता है। आज क्या भेज रहे हो? कितनी देर में भेज रहे हो? अभी तक नहीं भेजा। ऐसे कैसे चलेगा? खबर चाहिए ही, माने ‘खबर हर कीमत पर।’ जब ऊपर के लोग कुछ सुनने को तैयार नहीं होेगे और नीचे खबर तक पहुंच नहीं होगी तो रिपोर्टर कुछ गलत ही करेगा क्योंकि उसे भी पता है कि नौकरी बचानी है, हर कीमत पर।
बार-बार केदारनाथ की घटना को बादल फटने से जोड़ा गया। इस पर प्रकृति प्रेमी एवं पर्यावरणविद, चंडी प्रसाद भट्ट कहते हैं, ''जैसा कहा गया कि बादल फटा। बादल फटने के लिए एक सौ मिली लीटर बारिश एक घंटे तक एक जगह पर केन्द्रित होनी चाहिए। तो उसे बादल फटना कह सकते हैं। भारी बारीश कहना फिर भी ठीक है। लेकिन यदि पत्रकार और वैज्ञानिक दोनों बादल फटना शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं तो कैसे कह रहे हैं? आपको कैसे पता, कि कितनी बारिश हुई? इसका सीधा अर्थ है आप भय पैदा करना चाहते हैं। केदारनाथ और गंगोत्री में आपके पास आंकड़े नहीं हैं मौसम के फिर आप कैसे कह रहे हैं बादल फटा?'' वैसे कहा जा रहा है कि इस विपदा के समय यदि चैनल स्थानीय पत्रकारों पर भी थोड़ा विश्वास करते और बाहर के पत्रकार स्थानीय पत्रकारों के साथ समन्वय रखकर रिपोर्टिंग करते तो शायद अधिक बेहतर तरिके से पूरी कहानी सामने आ पाती। लेकिन दिल्ली से गए पत्रकारों की बात थोड़ी अलग होती है। कुछ पत्रकार तो अपनी तुलना भी क्षेत्रीय पत्रकारों से कराना पसंद नहीं करेंगे क्योंकि दिल्ली में होते ही पत्रकार राष्ट्रीय हो जाता है। वैसे यह टिप्पणी उन पत्रकारों के लिए नहीं है, जो अपना काम भोपाल हो या दिल्ली, पटना हो या कोलकाता, जहां भी हो ईमानदारी से करते हैं।
उत्तराखंड आपदा की कहानी में दिल्ली से देहरादून की धरती पर लैंड होने वाले कुछ पत्रकार वाया अपने चैनल के स्ट्रींगर और कुछ अपने पुराने रिश्ते निकाल कर अलग-अलग मंत्रियों से जा चिपके। (सभी नहीं)। मंत्रियों से चिपकने की दो खास वजह थी। पहली रिपेार्टिंग के नाम पर मुफ्त हवा खोरी। जिसके लिए पहले ही सूचना और प्रसारण मंत्री ने अलग संदर्भो में डिजास्टर टूरिज्म जैसे शब्द ईजाद किए हुए हैं। मेरी जानकारी में एक भी चैनल या अखबार नहीं है, जिसने इस खबर की महता को समझते हुए, अपने रिपोर्टर को निजी विमान किराए पर लेने की इजाजत दी हो। कई-कई हजार करोड़ का कारोबार करने वाले मीडिया घरानों के लिए यह करना मुश्किल नहीं था। दूसरी वजह, लगे हाथों, विज्ञापन की भी बात करनी थी। जैसाकि हम सब जानते हैं, टेलीविजन चैनल चलाना कितना महंगा सौदा है। ऐसे में चैनलों के चुप रहने की कुछ तो कीमत बनती है। आपदा के नाम पर सरकार ने दोनों हाथों से विज्ञापन बांटे। कुछ पत्रकारों के रहने, खाने-पीने और उड़ने का खर्चा भी चैनल की जगह उत्तराखंड उठा रहा था। दिल्ली की एक महिला पत्रकार पर देहरादून के एक मंत्री की अति कृपा की कहानी देहरादून में खुब चली।
यह सरकारी विज्ञापनों का ही असर रहा होगा कि भूख से मरते ग्रामीणों की कहानी, केदारनाथ में बिना अंतिम संस्कार के कंकाल में तब्दील सैकड़ों शवों की कहानी, राहत के लिए काम कर रही तमाम सरकारी और गैर सरकारी एजेन्सियों के बीच आपसी समन्वय के घोर अभाव की कहानी, राहत के नाम पर हैलीकॉपटर के दुरुपयोग की कहानी कहीं नजर नहीं आई। गोविन्द घाट निवासी उत्तम सिंह मेहता बताते हैं, देश भर का शायद ही ऐसा कोई चैनल होगा जो यहां नही आया हो लेकिन सबकी चिन्ता पर्यटक थे। पर्यटक तो सब वापस लौट जाएंगे, अपना सबकुछ तो यहां के स्थानीय लोगों ने गंवाया है। उनसे बात करने की किसी पत्रकार ने जरूरत नहीं समझी। सभी को पर्यटक प्रिय थे। किसी को यहां के लोगों से मतलब नहीं था। हम जी रहे हैं या मर रहे हैं। यह दिखलाने की फुर्सत किसी चैनले के पास नहीं थी।
आप सबको याद होगा, चैनलों ने स्थानीय लोगों के संबंध में बताते हुए यह जरूर रिपोर्ट किया कि यह लोग यात्रियों को लूट रहे हैं। पन्द्रह रूपए के पानी की बोतल सौ रूपए में बेंच रहे हैं। बिस्किट के लिए दो सौ रूपए मांग रहे हैं। इस तरह की रिपोर्ट दिखलाते हुए, चैनलों ने उन लोगों को दिखलाना जरूरी क्यों नहीं समझा जिन्होंने अपने घर से हजारों रूपए लगाकर पीड़ितों की मदद की, बिना किसी स्वार्थ के। उत्तराखंड में अलग-अलग जगहों पर मदद के लिए हाथ बढ़ाने वाले वे सैकड़ों लोग कैसे इन कैमरों से बच गए, जिन्होंने पीड़ितों की मदद के लिए अपने हाथ बिना किसी स्वार्थ के बढ़ाए थे। आपदा के दौरान राष्ट्रीय अखबारों के स्थानीय संस्करण और कुछ छत्तीसगढ़ के स्थानीय चैनलों ने बेहतरीन रिपोर्टिंग का उदाहरण प्रस्तुत किया लेकिन उत्तराखंड के लोग कथित राष्ट्रीय चैनलों से बहुत निराश हैं।

सोमवार, 22 जुलाई 2013

बदलते पत्रकारिता के सरोकार : पालागुमी साईनाथ

मेरी जानकारी में आपका यह कान्फ्रेन्स तीन दिनों का है। तीन दिनों में औसतन क्या-क्या होता है, अपने देश में? ग्रामीण भारत में तीन दिन के अंदर अगर एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के डाटा का औसत लेते हैं, तो तीन दिन के अंदर 147 किसान इस देश में आत्महत्या करते हैं। आधे घंटे में एक किसान अपनी जान देता है। जब आपका कान्फ्रेन्स खत्म होगा, उन तीन दिनों में एक सौ पचास किसान आत्महत्या कर चुके होंगे। लेकिन यह सब आपके मीडिया को देखकर नजर नहीं आता। वहां यह प्रदर्शित नहीं होता है। सबसे नया 2012 का डाटा भी आ चुका है। डाटा ऑन लाइन है। आप देख सकते हैं। छत्तीसगढ़ ने इस बार जीरो आत्महत्या  दिखलाया है, पश्चिम बंगाल ने डाटा जमा नहीं कराया है। उसके बावजूद आंकड़ा 14,000 तक आ गया है। तीन दिनों में तीन हजार बच्चे कुपोषण और भूख से जुड़ी बीमारियों से मौत के शिकार बनते हैं। इन्हीं तीन दिनों मे ंसरकार बड़े-बड़े कॉरपोरेट हाउस को और कंपनियों को 6800 करोड़ तक की आयकर में छुट देती है। सरकार के पास पैसा, किसान और बच्चों के लिए तो है नहीं। लेकिन आप पांच लाख करोड़ रुपए की सालाना छुट दे सकते हैं। यह पांच लाख करोड़ भी पूरी कहानी नहीं है। यह पांच लाख करोड़ रुपए केन्द्र की बजट से निकलते हैं। राज्य सरकारों और केन्द्र सरकारों द्वारा दूसरी कई तरह की रियायतें अलग से दी जाती हैं। पांच लाख करोड़ में वह सब जुड़ा नहीं है।
बजट में एक सेक्शन है, एनेक्स-टू, उसका शिर्षक है, ‘स्टेटमेन्ट ऑफ रेवेन्यू फॉरगॉन’। इसमें सारी जानकारी विस्तार से होती है। साल 2007 से यह जानकारी मिल रही है। अभी छह साल का डेटा अपने पास है। कितना पैसा कन्शेसन में गया। तीन तरह के कन्शेसन हैं, ग्रेट कन्फिलक्ट इन्कम टैक्स, कस्टम ड्यूटी वेवर और एक्साइज ड्यूटी वेवर। इन तीनों में इस साल पांच लाख करोड़ लगाए गए, इसमें सब्सिडी अलग है। यह सिर्फ केन्द्रिय बजट से दिया गया। हमारे पास यूनिवर्सल पीडीएस के लिए पैसा नहीं है, हमारे लिए स्वास्थ्य के लिए पैसा नहीं है, हमारे पास बच्चों के कुपोषण के लिए पैसा नहीं है। हमारे यहां मनरेगा 365 दिन नहीं 100 दिन का रोजगार है और पीडीएस सीमित है। इस देश में सिर्फ लूट मार ही यूनिवर्सल है। यह सब मीडिया में नजर नहीं आता।
मेरा सिर्फ इतना कहना है कि भारत में मीडिया राजनीतिक तौर पर आजाद है। लेकिन वह मुनाफे के प्रभाव में है। यह मार्शल लॉ नहीं है। कोई सेंसरशिप नहीं है। मीडिया राजनीतिक तौर पर आजाद है। लेकिन वह मुनाफे की कैद में है। यह स्थिति है मीडिया की।
एक शब्द बार-बार मीडिया में पिछले तीन सालों से आ रहा है। आप सबने सुना होगा, एंकर ने बताया होगा। क्रोनी कैपिटलिज्म। इसमें दो शब्द है, पहला कैपिटलिज्म। यह आप सब जानते हैं। दूसरा है, क्रोनी। यह क्रोनी हम हैं। मीडिया। क्रोनी कैपिटलिज्म में मीडिया क्रोनी है। यह स्थिति है मीडिया की। आप सबने पढ़ा था, अप्रैल में शारदा चिट फंड जब कॉलेप्स हो गई। उस वक्त एक खबर आई, बीच मंे फिर गायब हो गई। खबर था, सात सौ पत्रकार नौकरी से निकाले गए। मैं प्रभावित हुआ। यह खबर आ गई क्योंकि अक्टूबर 2005 से अब तक 5000 पत्रकारों की नौकरी गई है और कोई रिपोर्टिंग नहीं हुई। उस दिन एनडीटीवी ने एक इमोशनल स्टोरी किया। ये पत्रकार अब क्या करेंगे? इनका ईएमआई है। इनके बच्चे स्कूल जाते हैं। अब इनका घर कैसे चलेगा? यह सब उसी एनडीटीवी में चल रहा था, जिसने उसी महीने एनडीटीवी प्रोफीट से अस्सी लोगों को बाहर निकाला था और एनडीटीवी से 70 लोगों को बाहर निकाला था। डेढ़ से नौकरी गया एनडीटीवी के एक मुम्बई ऑफिस से। पूरे स्टेट में नहीं। एक ऑफिस में।
अक्टूूबर 2008 में जब फायनेन्सल कॉलेप्स हुआ। उस वक्त से बहुत सारी तब्दिलियां आई। मीडिया में भ्रष्टाचार तो पुरानी चीज है। कुछ नई चीज नहीं है। बुरी पत्रकारिता भी पुरानी चीज है।
कॉन्टेन्ट ऑफ जर्नालिज्म का एक उदाहरण कुछ दिन पहले देखने को मिला, जब एक बाढ़ पीड़ित के कंधे पर बैठकर एक पत्रकार रिपोर्ट कर रहा था। अगर पीड़ित पत्रकार के कंधे पर बैठता तो ठीक है। लेकिन उस रिपोर्ट में मीडिया के परजीवी होने का संकेत नजर आता है।
20 साल पहले जब हम मीडिया मोनोपॉली कहते थे तो साहूजी और जैन साहब का अखबार तीन-चार शहरों से निकलता था। भारत ऐसा देश है, जहां दो शहरों से आपका अखबार निकलता है तो आप नेशनल प्रेस बन जाते हैं। लेकिन मोनोपौली क्या था, इंडियन एक्सप्रेस के मालिक थे रामनाथ गोयनका। साहू और जैन मालिक रहे। यह मोनोपॉली अब खत्म हो गया। आज मीडिया मोनोपॉली का मतलब कॉरपोरेट मोनोपॉली के अंदर मीडिया एक छोटा डिपार्टमेन्ट बन कर रह गया है। आज सबसे बड़ा मीडिया मालिक कौन है? मुकेश अंबानी। जबकि मीडिया उसका मुख्य कारोबार नहीं है। यह उसके बड़े कारोबार का एक छोटा सा डिपार्टमेन्ट है। आप मुकेश भाई को देखिए, एक साल पहले नेटवर्क 18 को खरीदा। मैं सच बता रहा हूं, उनको नहीं पता कि उन्होंने क्या खरीदा? इसके अलावा 22 चैनल आया इनाडू से। तेलगू चैनल छोड़कर सब बिक गया। इनाडू मीडिया में अच्छा नाम है। लेकिन इनाडू का अब असली नाम है मुकेश अंबानी। ईनाडू का चैनल देखिए, वे कोल स्कैम, कैश स्कैम को कैसे कवर कर रहे हैं? ईनाडू का फुल बके मुकेश भाई का है। टीवी 18 का फुल बुके मुकेश भाई का है। उनको नहीं पता कि उन्होंने क्या खरीदा है? यह है उनका मीडिया मोनोपॉली। रामनाथ गोयनका के मोनोपॉली की तुलना आप मुकेश भाई के एक छोटे से दूकान से भी नहीं कर सकते।
आप देखिए कॉरपोरेट स्टाइल कॉस्ट सेविंग क्या है? आप टेलीविजन चैनल में देख सकते हैं, अब समाचार चैनल में समाचार खत्म हो गया है, टॉक शो बढ़ गए हैं। टॉक शो इसलिए अधिक हो गए क्योंकि बातचीत सस्ती है। बातचीत फ्री है। मुम्बई-दिल्ली से बुलाते हैं और महीने-दो महीने के बाद हजार-डेढ़ हजार रुपए का चेक भेजते हैं। यहां सात-आठ लोगों को बिठाकर दो दिन बात करते हैं। टाइम्स नाउ थोड़ा अलग है, वहां नौ लोग बैठकर अर्णव को सुनते हैं। टॉक टीवी शो का एक गंभीर वजह यही है कि यह सस्ता पड़ता है। रिपोर्टर को गांव में भेजने में, अकाल, बाढ़ में भेजने में पैसा डालना पड़ेगा। इससे अच्छा है, पांच लोगों को बिठा दो। मुझे लगता है, मनिष तिवारी और रविशंकर प्रसाद तो हमेशा टीवी स्टूडियो में ही रहते हैं। एक स्टूडियो से निकलते हैं और दूसरे में जाते हैं।

   ( विकास संवाद के सातवें मीडिया संवाद में जैसा पत्रकार पालागुमी साईनाथ ने कहा)



शुक्रवार, 22 मार्च 2013

टीवी पत्रकारों पर दुनियां का सबसे बड़ा उंगलबाज.कॉम का सर्वेक्षण: ---उंगलबाज.कॉम

 उंगलबाज.कॉम ने तीन महीने के अथक परिश्रम के बाद होली के अवसर पर उस सर्वेक्षण को आपके सबके बीच लाने का निर्णय ले ही लिया है, जिसका इंतजार ब्रेकिंग और सिर्फ इसी चैनल पर टाइप पत्रकार कर रहे थे। दो सौ शहरो में ढाई सौ लोगों से बात करने के बाद यह सर्वेक्षण सामने आया है। इस सर्वेक्षण के परिणाम इतने चौंकाने वाले हैं कि आप इस पर विश्वास नहीं कर पाएंगे। आप कह सकते हैं कि सबकुछ पहले से फिक्स है। लेकिन जरा सोचिएगा यह कहने से पहले कि जिस देश में क्रिकेट मैच तक फिक्स हो सकता है, वहां एक सर्वेक्षण का फिक्स होना कौन सा नामुमकिन है।
 वैसे आरोप तो आप इस सर्वेक्षण पर पेड होने का भी लगा सकते हैं लेकिन जब खबरे पैसे लेकर छप सकती हैं तो सर्वेक्षण के परिणाम पैसे लेकर क्यों नहीं बदले जा सकते।
उंगलबाज.कॉम का यह सर्वेक्षण उस वक्त आप सबके सामने आया है, जब सारे टीवी चैनल और अखबार रिसेशन से बाहर आने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि देश की सत्तर फीसदी आबादी को पता ही नहीं है कि एबीपी नाम से भी कोई चैनल है। यह सर्वेक्षण उंगलबाज.कॉम का, खबरिया चैनलों के ऊपर सबसे बड़ा सर्वेक्षण है। इस महा सर्वे के परिणाम वास्तव में बड़े चौंकाने वाले हैं। जिससे सहमत हो पाना बहुत मुश्किल है।

 इस सर्वेक्षण में हमें कई लोगों से मदद मिली। ब्रेकिंग प्राइवेट लिमिटेड और एक्सक्लूसिव फाउंडेशन ने खास तौर से आर्थिक मदद की। वे चाहते थे कि आने वाले दिनों में ऑन एयर होने वाले चैनल हाहाकार टीवी को अपने सर्वे में हम नंबर एक या नंबर दो की जगह दे दें। यह हमने किया भी है। हम उनमें नहीं हैं कि पैसे भी लें और काम भी ना करें। उंगलबाज.कॉम की विश्वनियता संदिग्ध है, लेकिन ईमानदारी पर कोई शक नहीं कर सकता। हमने जिससे पैसे लिए हैं, उनका काम करके दिया है। आप चाहें तो मार्केट में सर्वेक्षण करा सकते हैं, कहंी किसी तरह की शिकायत नहीं मिलेगी।
इस सर्वेक्षण में यह जानना चौंकाने वाला था कि सीएनबीसी आवाज को लोग आशुतोष और करण थापर से जोड़कर देख रहे है, इतना ही नहंीं इस सर्वेक्षण में हमें आजाद, एस वन, एमएच वन, प्रज्ञा, जैसे चैनल देखने वाले भी मिले।





इस सर्वेक्षण में हमने पाया कि देश की पचास फीसदी आबादी उन लोगों को पत्रकार मानने को तैयार नहीं, जिनका नाम राडिया कांड में नहीं था। एनडीटीवी में रविश और अभिज्ञान को इसीलिए बड़ा पत्रकार इस सर्वेक्षण में नहीं माना गया क्योंकि राडिया उनको नहीं जानतीे थी। इस सर्वेक्षण में बरखा दत्त, नीरा राडिया से अपनी जान पहचान की वजह से एनडीटीवी की सबसे बड़ी पत्रकार मानी गई। आज तक से प्रभू चावला के बलिदान को भी सर्वेक्षण ने बेकार नहीं जाने दिया। सर्वेक्षण में यह बात खुलकर सामने आई कि प्रभू को लाइफ टाइम अचिवमेन्ट अवार्ड देकर पत्रकारिता से सेवानिवृत हो जाना चाहिए।
सर्वेक्षण में सबसे आगे जी न्यूज रहा। सुधीर चौधरी जैसे होनहार पत्रकार की वजह से यह हो पाया। आम जनता की राय है कि सुधीर चौधरी ने साबित किया कि मीडिया को किसी नीरा राडिया की जरूरत नहीं है। जरूरत पड़ने पर मीडियाकर्मी आत्म निर्भर हो सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। जी न्यूज छोड़ने की वजह से इस सर्वेक्षण में पूण्य प्रसून वाजपेयी का ग्राफ गिरा। उन्होंने उस समय चैनल छोड़ दिया, जब उसे वाजपेयी की सबसे अधिक जरूरत थी।
स्टिंग ऑपरेशन के लिए अनिरूद्ध बहल को जहां सबसे अधिक वोट मिले, वहीं खोजी पत्रकार के तौर पर सबसे आगे अरविन्द केजरीवाल रहे। रॉबर्ट वाड्रा, नितिन गडकरी, रिलायंस जैसे बड़ी खोज अरविन्द के हिस्से है। सर्वेक्षण में शामिल कुछ बड़े उद्योगपतियों ने कहा कि यदि अरविन्द पार्टी की जगह अपना चैनल खोलें तो वे उसमें पैसा लगा सकते हैं।
सर्वेक्षण में शामिल अस्सी फीसदी लोग कमर वाहिद नकवी और राहुल देव जैसे पत्रकारों का नाम नहीं जानते। अरविन्द मोहन को कुछ लोगों ने जरूर टीवी पत्रकार के तौर पर पहचाना और कुछ लोगांें का मानना यह भी है कि संजय झा को वेवसाइट संभालने की जगह कोई चैनल ही संभालना चाहिए।
सर्वेक्षण में शामिल एक भी व्यक्ति यह नहीं बता पाया कि एक बड़े पत्रकार पंकज पचौरी अचानक टीवी पर दिखना बंद क्यों हो गए। एक व्यक्ति का जवाब दिलचस्प था, इंडिया टीवी ने अभी तक उनकी तलाश क्यों नहीं की? क्या वह चैनल सिर्फ अभिनेत्रियों को ही ढूंढ़ता रहेगा? अपने बीच का एक पत्रकार नहीं मिल रहा, उसे क्यों नहीं तलाशते?
अंजना ओम कश्यप का नाम सत्तर फीसदी लोगों ने सुन रखा था लेकिन वह किस चैनल में हैं, यह बीस फीसदी लोग भी सही-सही नहीं बता पाए। दस फीसदी सर्वेक्षण में शामिल लोगों ने उनका नंबर हमारे सर्वेक्षणकर्ताओं से मांगा, जिसे हमारे सर्वेक्षण टीम के होनहार युवाओं ने खुबसूरती से टाल दिया।
सर्वेक्षण में शामिल पचपन फीसदी लोगों का मानना था कि रजत शर्मा अच्छे भले पत्रकार है, इंडिया टीवी में अपना कॅरियर क्यों खराब कर रहे हैं? टीआरपी सबकुछ नहीं होता। उन्हें आजतक या एनडीटीवी में होना चाहिए। वैसे दीपक चौरसिया को लेकर अब भी लोगों में भ्रम है कि वे इंडिया टीवी में गए हैं या फिर इंडिया न्यूज में। सुनने में आया है कि एक गुटखा कंपनी ने दीपक को ऑफर दिया है कि वे चैनल पर ऑन एयर उनकी कंपनी का गुटखा खाते हुए समाचार पढ़े तो गुटखा कंपनी उन्हें एक करोड़ रुपए साल का दे सकती है। (वैधानिक चेतावनीः गुटखा खाना सेहत के लिए अच्छा नहीं है।)
इस सर्वेक्षण को लेकर कुछ लोगों की आपत्ति हो सकती है लेकिन खबरिया चैनल वाले स्वर्ग का दरवाजा ढूंढ़ निकालते हैं और हम एक सर्वेक्षण भी नहीं कर सकते।
(हमारी विश्वनियता संदिग्ध है, बुरा ना मानों होली है)

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन से लौटकर...

दिल्ली में जनवरी का महीना गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन का महीना होता है। हिन्दी कवि सम्मेलन, उर्दू कवि सम्मेलन, भोजपुरी-मैथिली कवि सम्मेलन, पंजाबी कवि सम्मेलन, किसी भी कवि सम्मेलन में चले जाइए, मंच की कविता के कद्रदानों की कमी नहीं मिलेगी, अच्छे कवि और अच्छी कविता की कमी महसूस हो सकती है।
कहते हैं जनवरी महीने में लाल किले में होने वाला कवि सम्मेलन देश का सबसे प्रतिष्ठित कवि सम्मेलन होता है और कभी इस कवि सम्मेलन को सुनने के लिए प्रधानमंत्री रहते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरू पूरी-पूरी रात बैठते थे। यह बात दूसरी है कि अब इसी कवि सम्मेलन के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री तक के पास वक्त नहीं है। दिल्ली सरकार में शिक्षा मंत्री प्रो. किरण वालिया ने जरूर इस बार लाल किले पर बैठकर पूरी कविता सुनी और गिनकर सताइस बार कवियों का आभार भी स्वीकार किया। जिस तरह मंच पर अच्छे कवि दूर होते जा रहे हैं, आने वाले समय में यह भी कवियों के लिए किस्सा ही ना बन जाए कि दिल्ली सरकार की मंत्री पूरी रात बैठकर यहां कविता सुनती थीं।
इस बार गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन में मंच पर आया पहला कवि ही हरी ओम पंवार की फोटो कॉपि होने की कोशिश कर रहा था। फोटो कॉपि होने में कोई बुराई नहीं है। ओम प्रकाश आदित्य की  एक कवि कार्बन कॉपि हो रहे थे लेकिन दुर्घटना में हुई मृत्यु के बाद ओम प्रकाश आदित्य ंमंच पर नहीं आ सकते। उनकी नकल मंच पर सुनने वालों को आगे भी उनकी याद दिलाती रहेगी लेकिन सुरेन्द्र शर्मा और हरी ओम पंवार की कॉपि करने वालों को मंच पर बिठाने की क्या जरूरत है, जबकि यह दोनों कवि अकादमी को उपलब्ध हो सकते हैं और यह दोनों कवि मंचिय कवि समाज के लिए उपलब्धि भी हैं।
इस कवि सम्मेलन में नौशा खां, पवन जैन, नन्दलाल और सविता असीम को मानों हूट करवाने के लिए ही बुलवाया गया था, यदि यह चार नहीं होते तो जुगाड़ तंत्र से अंदर आए दीपक गुप्ता और कुछ कवियों का हाल यही होना था। वैसे कवि सम्मेलन में यह देखना दिलचस्प था, कि कई कवि जिन्हें सुनने वाले हूट कर रहे थे, वे इसे अपनी तारिफ समझ कर दुगुने उत्साह में दो कविता अधिक सुना कर जा रहे थे। वैसे भी मंच पर आगे वालों की ही सुनी जाती है, पिछे वालों की कौन सुनता है? उन्हें तो अनसुना भी किया जा सकता है।
दर्शको में इस बार कवि सम्मेलन को लेकर भारी निराशा थी, मदन मोहन समर ने इस निराशा से दर्शकों को निकाला। उन्होंने जब मंच से कहा कि मेरी कविता सतरह मीनट बारह सेकेन्ड की है तो कुछ लोगों ने इस बात को चुटकुला समझा और कुछ इस कविता को उबाउ समझकर कॉफी पीने चले गए लेकिन इस कविता ने लाल किले में ऐसा माहौल बनाया कि एक-एक श्रोता उनकी कविता पर झूम उठा। उन्होंने अपना वादा पूरा भी किया, सतरह मिनट कुछ सेेकेन्ड में अपनी कविता पूरी करके। यदि समर की वह कविता आपको पढ़ने को मिले तो आप उसे साधारण कविता की श्रेणी में भी ना रखें लेकिन मंच का समीकरण अलग होता है और उस समीकरण में समर का अंदाज ए बयां कुछ और। लोगों ने समर की कविता से अधिक उनके अंदाज ए बयां को सराहा। पसंद किया और झूमे। समर कवि सम्मेलन को जिस उंचाई पर ले गए थे, वहां से कवि सम्मेलन को बचाकर लाना बहुत बडी चुनौति होती है। इस चुनौति में मंच संचालक की परीक्षा होती है क्योंकि कवि सम्मेलन में मंच संचालक की भूमिका कप्तान की होती है। संचालक शशिकांत यादव जो संचालक जैसे भी थे लेकिन उन्होंने साबित किया कि वे एक अच्छे संयोजक और समन्वयक हैं। समर की कविता के बाद जिस खुबसूरती के साथ उन्होंने महेन्द्र अजनबी को मंच पर प्लेस किया, वास्तव में इसके लिए उनकी तारिफ की जानी चाहिए। मंच पर गिनती के नाम थे, जिन्हें सुना जा सकता था, आसकरण अटल, सीता सागर, वेद प्रकाश, कविता किरण, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, विष्णु सक्सेना, अरूण जैमिनी। अशोक चक्रधर कोे मंचिय कवियों के बीच सुपर स्टार स्टेटस हासिल है। वे पिछले पचास सालों से लाल किले के कवि सम्मेलन में आ रहे हैं। अब वे सुनने वालों की शक्ल देखकर पहचान जाते हैं कि उस पर किस तरह की कविता काम करेगी।
लाल किले पर कुछ कवि सालों से आ रहे हैं, क्या वे लाल किले के लिए पूरे साल में एक नई कविता भी नहीं लिख सकते। जिस कविता ने उन्हें पहचान दिलाई है, वे डरते क्यों है कि नई कविता से वह पहचान छीन जाएगी। यह भी संभव है कि नई कविता उन्हें सुनने वालों के बीच फिर से एक नई पहचान दे। इसबार भी सालों से लाल किले पर  आ रहे अधिक कवियों ने अपनी पुरानी कविता ही सुनाई। कुछ लोगो ने जरूर मंच पर लिखी हुई और रास्ते में आते हुए लिखी हुई कविता सुनाई। सुनने वालों ने उन कविताओं को भी पसंद किया। फिर कवियों के मन में यह डर क्यों कि नई कविता सुनने वालों के बीच में जगह नहीं पाती। वैसे मंच पर लिखी हुई और रास्ते में लिखने की बात जिस कविता के लिए कही गई, उसे मंच पर प्रस्तुत करने की वजह वे चार नौजवान भी हो सकते हैं, जिन्होंने यह कहते हुए कवि सम्मेलन का बहिष्कार किया कि कविता के इस मंच से दामिनी को याद क्यों नहीं किया गया और वे चार नौजवान कवियों को धिक्कारते हुए कार्यक्रम से बाहर हो गए। कवि सम्मेलन में मौजूद श्रोताओं की माने तो यदि ये चार युवकों ने आयोजन का बहिष्कार नहीं किया होता तो कवि सम्मेलन का स्वरूप कुछ और होना था। वैसे अनुशासित तरिके से चल रहे कार्यक्रम में इस तरह बाधा डालना भी किसी सभ्य समाज की निशानी नहीं है। जिन युवकों ने विरोध किया, जिस तरह आनन-फानन में उन्होंने अपनी कार्यवायी को अंजाम दिया, उससे साफ पता चलता था कि उनका मकसद कविता सुनना नहीं था, वे अंदर आए ही थे, कवि सम्मेलन में बाधा बनने के लिए।
कविता किरण कविता सुनाने के दौरान श्रोताओं से बार-बार आग्रह कर रही थी, कि उन्हें शांत होकर कविता सुननी चाहिए। कई बार यह दोहराने के बाद उन्होंने मंच की तरफ मुखातिब होकर कहा- जब मंच पर ही लोग कविता नहीं सुन रहे और आपस मेे बात कर रहे हैं फिर मैं आप श्रोताओं से क्या कहूं?
मंच के कवि चाहते हैं कि उन्हें लोग गंभीरता से सुने तो कम से कम मंच पर उन्हें खुद दूसरे कवियों को सुनना होगा लेकिन दिल्ली के लाल किला कवि सम्मेलन को माहल्ले के कवि सम्मेलन से अधिक महत्व देने को कवि खुद तैयार नहीं थे। एक एक कर कवि कविता पढ़ रहे थे और अपना लिफाफा लेकर बाहर निकल रहे थे। क्या यह लाल किले के कवि सम्मेलन का अनुशाशन है। कवि कहते हैं कि यहां जवाहर लाल नेहरू सुबह तक कविता सुनते थे और आज कवि ही दूसरे कवि को सुनने को राजी नहीं है। दूसरे शहरों से आए कवियों की वजह से मंच की गरीमा थोड़ी बच गई, बेचारे इतनी ठंड में और इतनी रात को कहां जाते? वर्ना अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह की बारी-बारी आते पूरा मंच खाली हो जाना था।
इस साल मंच पर सुरेन्द्र शर्मा, हरिओम पंवार, राजगोपाल सिंह, दिनेश रघुवंशी, कुंवर बेचैन, कुमार विश्वास, शैलेश लोढ़ा की कमी लोगों ने मंच पर महसूस की। गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन में किसी मंत्री संतरी से पर्ची लेकर प्रवेश पाने वाले कवि पहले भी हुआ करते थे लेकिन अब ऐेसे कवियों की संख्या बढ़ सीगई है। अब मानों कवि की कविता अकादमी की प्राथमिकता में नहीं है, अकादमी के कवियों को बुलाने के मानक अब मानों बदल गए हैं।
इस बार गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन का ‘मैन ऑफ द सम्मेलन’ का खिताब देने की बात यदि हो तो निसंदेह वह मध्य प्रदेश के खाकी वर्दी वाले मदन मोहन समर को जाता है।
कवियों का नेता सबसे प्रिय विषय होता है, जहां वीर रस के कवि हमेशा पाकिस्तान के खून के प्यासे होते हैं, वहीं किसी रस का कवि हो, उसकी एक आध कविता नेताआंे पर निकल ही आएगी। ऐसे में पूरे कवि सम्मेलन में बैठे रहना दिल्ली सरकार में मंत्री किरण वालिया के लिए कितना मुश्किल रहा होगा, इसका अंदाजा कोई भी सहज ही लगा सकता है। कवि एक के बाद एक देश के नेताआंे की क्लास लेते रहे और पिछे नेताजी मुस्कुराती रहीं। यह अच्छा हुआ कि कविता में नेताओं से पूछे गए सवाल का जवाब देने के लिए बाद में संचालक शशिकांत ने मंत्रीजी को फिर से आमंत्रित नहीं किया।
यह मेरी बात थोड़ी काल्पनिक है, लेकिन इसे ंसभव किया जा सकता है।
क्या दिल्ली में उर्दू अकादमी और हिन्दी अकादमी मिलकर एक इंडियन कवि सम्मेलन-मुशायरा लीग जैसा कुछ नहीं कर सकती। दिल्ली के रामलीला मैदान मंे एक तरफ कवि सम्मेलन इलेवन के ग्यारह कवि और दूसरी तरफ मुशायरा इलेवन के ग्यारह शायर। एक तरफ सुरेन्द्र शर्मा या अशोक चक्रधर कप्तानी कर रहे हैं और दूसरी तरफ वसीम बरेलवी या मुनव्वर राणा ने कमान संभाली है। कवियों की तरफ से हरि ओम पंवार परफॉर्म करके लौटे और दूसरी तरफ मंच पर आने के लिए नवाज देवबंदी उतावले हुए जा रहे हैं। एक बार ऐसा एक प्रयोग करके देखिए फिर मैं देखा जाए कि कौन कहता है कि कविता और शायरी के कद्रदान कम हो गए हैं।

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

आशीष कुमार 'अंशु' की तीन कवितायेँ

                                                                          01
                                                                       -------
संपादकजी,
छापकर आवरण पर
नग्न स्त्रियों की तस्वीर
ललकारते हैं रात में
यही है तुम्हारी संस्कृति
देख लो खजुराहो

याद आते ही मनु स्मृति
कहते हैं
जला दो,
इसमें दलित विरोधी बातें लिखी हैं
दलित अधिकार, आदिवासी अधिकार में
शामिल नहीं है
दलित महिला, आदिवासी महिला,
का अधिकार,
यह जानते हैं हम
पर मानते नहीं।

स्त्री जो घर में छुपाई गई
बाजार में उघाड़ी गई
ना छुपना स्त्री की नियत थी,
ना उघड़ना उसकी मर्जी,
उसका छुपना पुरूष की इच्छा थी
और उघड़ना पुरूष की कुंठा।

                                                                        02
                                                                      --------
पत्नी को बेटी को सात पर्दों में रखा
और प्रेमिका के लिए स्त्री मुक्ति आन्दोलन
तुम दोगले हो और तुम्हारा आंदोलन खोखला
होना-खोना दर्जन भर औरतों के साथ
तुम्हारा पुरूषार्थ है
इसमें तुम्हारी स्त्री मुक्ति है, तुम्हारा स्त्री विमर्श है
यदि बेटी लिखे सोना दस मर्दों के साथ
बीवी लिखे पाना-खोना दर्जन भर मर्दों का हाथ
तुम्हारे पांव तले जमीन निकल जाएगी
हर आंदोलन की शुरूआत घर से क्यों नहीं
मुक्त करो बहनों को, बीवियों को, बेटियों को
अपने नजरों के चंगुल से
जातिय दंभ की तरह पुरूष होना भी दंभी  बनाता है
श्रेष्ठता का बोध कराता है
तुम भी तो पुरूष हो, दंभ और श्रेष्ठता से भरे हुए।

पहले अपने ‘पुरूष’ होने के झूठे दंभ से बाहर आओ
वर्ना स़्त्री मुक्ति की बात उस लोमड़ी की चालाकी है
जिसने भेड़ खाने के लिए भेड़ खाने का कानून बनाया
स्त्री मुक्ति के नाम पर स्त्री शोषण की राह तलाशते तुम
हे! महान साहित्यकार तुम्हारी स्त्री मुक्ति को प्रणाम।

                                                                 03
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गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

माओवादी दुनिया की पड़ताल .....


वर्ष 2008-09 की बात है, जब नेपाल में कुसहा बांध टूटने की वजह से बिहार में भयावह बाढ़ आई थी। बाढ़ के लगभग छह महीने बाद दिल्ली से पत्रकारों का एक समूह  बिहार-नेपाल के बाढ़ प्रभावित रहे क्षेत्र का दौरा करने के लिए गया था। उन में इन पंक्तियों का लेखक भी शामिल था। बिहार में सीतामढ़ी-सुपौल-सहरसा होते हुए नेपाल पहुंचे।
इसी यात्रा के दौरान एक माओवादी नेता से मुलाकात हुई। नेपाल में भारत की तरह माओवादी संगठन प्रतिबंधित नहीं हैं। इसलिए मिलने वाले सज्जन ने सार्वजनिक सभा में जब अपना परिचय माओवादी के रूप में दिया तो चौंकना लाजमी था। वैसे उस दौरान नेपाल में माओवादी शासन में थे।
वह व्यक्ति फिर यात्रा में हमारे साथ था।
शुभ्राशु चौधरी की किताब ''उसका नाम वासु नहीं'' पढ़ते हुए, उस यात्रा की याद आई। उस बातचीत को कहीं लिख नहीं पाया था। लेकिन शुभ्रांशु को पढ़ते हुए उस माओवादी नेता से हुई बातचीत की यादें ताजा हो गईं।
‘भारत में माओवाद से सहानुभूति रखने वाले जितने चेहरों को आप जानते हैं, उससे कई गुणा अधिक चेहरे छुपे हुए हैं। वे उस वक्त सामने आएंगे, जब भारत पर माओवाद का राज होगा।’
उस माओवादी नेता का यह अति आत्मविश्वास थोड़ा चौंकाने वाला था। मैंने धीरे से ही कहा- यह कभी संभव नहीं होगा।
जिस गाड़ी पर हम कुसहा के लिए जा रहे थे, उसमें वही हमारा मार्गदर्शक था। नेपाल में माओवादी सरकार थी। हम दूसरे देश में थे, इन सारी स्थितियों को समझते हुए, मेरे साथ बैठे एक पत्रकार ने आंखों के इशारे से कहा, बातचीत बंद कर दो। उस माओवादी नेता ने बिना असहज हुए कहा- आप निसंकोच कुछ भी पूछिए और आप सब पत्रकार हैं, मुझे हुई हर एक बात को ऑन द रिकॉर्ड समझिए। जहां चाहें इसे लिखें। फिर वे मेरी तरफ मुखितिब हुए- आपकी उम्र 24-25 साल की होगी, यकिन जानिए आप अपनी जिन्दगी में भारत में माओ का शासन देखंेगे। फिर बहुत से चेहरे बेनकाब होंगे।
उन्होंने पटना का एक किस्सा सुनाया, जब वे प्रचंड के साथ पटना हनुमान मंदिर में थे। पटना में प्रचंड की तलाश हो रही थी। इंटेलीजेन्स के पास खबर थी कि प्रचंड पटना में हैं। पटना हाई अलर्ट पर था। हर तरफ पुलिस थी और प्रचंड आसानी से उन सबके बीच से आम आदमी की तरह निकल गए, किसी ने पहचाना नहीं।
उन सज्जन ने बताया था, माओवादी अपनी टीम तीन श्रेणियों में बनाते हैं। एक वे लोग जो जंगल में रहते हैं और हथियार बंद रहते हैं। एक वे जो जंगल और बाहरी दुनिया के बीच समन्वय का काम करते हैं। आन्दोलन के लिए पैसा जुटाने का काम इनका ही होता है। वे सज्जन नेपाल माओवादी आन्दोलन में इसी भूमिका में थे और तीसरे वे लोग, जो समाज में पत्रकार, एनजीओ, अभिनेता, नेता, उद्योगपति या दूसरी भूमिका में होते हैं लेकिन उनकी सहानुभूति इस आन्दोलन के साथ होती है। आन्दोलन के लिए पैसा इन्ही लोगों के पास से आता है। उन सज्जन ने बताया कि नेपाल में माओवादी आन्दोलन की सफलता के लिए सबसे अधिक आर्थिक मदद भारत से मिलती है, इसलिए उन्हें अक्सर भारत आना पड़ता है। भारत में भी दिल्ली में सबसे अधिक मदद करने वाले हैं।
उन्होंने हथियार के संबंध में बताया था- माओवादी आन्दोलन में अधिकतर सस्ते हथियार इस्तेमाल होते हैं। उन्होंने कुकर बम का उदाहरण दिया। जिसमें पुराने कुकर को बम की तरह इस्तेमाल करते थे। एक समय तो इस वजह से भारत से कुकर का आयात भी नेपाल ने बंद कर दिया था। इसी तरह तीन बार झूठा बम रखकर, जब नेपाल पुलिस बम को लेकर लापरवाह हो जाते थे तो जिन्दा बम रखने की जानकारी उन्होंने दी। यह सब घटना नेपाल में माओवादी शासन आनंे के पहले की है।
चीन के हथियार नेपाल में माओवादियों के पास कैसंे आते हैं, क्या चीन उन्हें मदद कर रहा है? इस सवाल पर उन माओवादी नेता ने यही बताया था कि चीन उनका चोरी-छीपे जाना-आना रहा है। वहां के कई हथियार के सौदागरों से उनका परिचय है लेकिन वे आन्दोलन के लिए सारे हथियार खरीद कर लाते हैं, चीन कोई भी हथियार खैरात में नहीं देता। इसके लिए उन्हें पैसा भारतीय मददगारों से चंदा के तौर पर मिलता है।
यदि मैं सही-सही याद कर पा रहा हूं तो उस दौरान उन सज्जन के छोटे भाई की पत्नी प्रचंड सरकार में किसी महत्वपूर्ण भूमिका में थी। छोटे भाई भी सक्रिय राजनीति में थे।
आज शुभ्रांशु चौधरी की किताब पढ़ते हुए लगा, वासु के तौर पर वही नेपाली माओवादी मेरे सामने आ खड़ा हुआ हो।


बुधवार, 28 नवंबर 2012

शेर का राज माने जंगल राज!

तुम कहते हो वह शेर था,
फिर पिंजरे में क्यों रहता था?
इतनी सुरक्षा में क्यों चलता था
और वह शेर था
तो तुम्हे मानना चाहिए, तुम्हारे राज्य में जंगल-राज है.

कमाल है तुम यह भी मानने को तैयार नहीं
और बात-बात पर
गिरफ्तार कराने को उतावले रहते हो!

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम