शनिवार, 28 सितंबर 2013

तिमारपुर थाने का एक किस्सा

यह घटना अगस्त तीन की है। इसे इसलिए दर्ज कर रहा हूं ताकि सनद रहे। अगस्त दो की रात एक बजे के आस-पास का वक्त रहा होगा। माने तीन अगस्त को शुरू हुए अभी एक घंटा ही बीता था। मैं अपने दो मित्रों को उनकी गाड़ी तक छोड़ने के लिए घर से लगभग सौ-दो सौ मीटर तक आया था। कई बार दोस्तों में घंटों बात होने के बाद भी विदाई के समय कुछ बातें रह ही जाती है। जैसे घर वालों को ट्रेन ठीक खुलते वक्त कुछ बातें याद आ जाती है। हमारी बात थोड़ी देर में खत्म हुई और वे गाड़ी लेकर आगे बढ़ गए। इस बीच हम तीनों में से किसी ने ध्यान नहीं दिया कि दिल्ली पुलिस के दो कांस्टेबल रात की गश्त पर हैं। वैसे यह ध्यान देने वाली बात भी नहीं थी। वे अपनी नौकरी कर रहे थे।
मेरे दोस्त गाड़ी लेकर आगे बढ़े और मैं अपने घर की तरफ मुड़ा, उस वक्त का यह दृश्य मेरे लिए थोड़ा अजीब था। मोटर सायकिल पर आए दो कांस्टेबल में से पिछे बैठे कांस्टेबल ने अचानक से कहा- ‘गाड़ी रोक, गाड़ी रोक।’
मानों कोई बड़ा अपराध हुआ हो वहां। मेरी नजर उनकी तरफ गई। आगे वाले कांस्टेबल मेरी तरफ मुखातिब थे-‘यह गाड़ी हमें देख कर भागी क्यों?’
यह सवाल मुझे थोड़ा अजीब लगा, यदि उन्हें कोई संदेह है तो गाड़ी रोक कर पूछताछ करनी चाहिए। रात को सड़क पर खड़े होने पर किसी तरह की आपत्ति है तो पूछ-ताछ करते लेकिन ‘यह गाड़ी हमें देखकर क्यों भागी? यह सवाल मुझे थोड़ा अजीब सा लगा। मैने पलटकर पूछा- ‘तो क्या आपसे पूछकर जाना चाहिए था?’
यह सुनना था कि पिछे बैठे कांस्टेबल साहब उछलकर मोटर सायकिल से नीचे उतर आए। उसने धक्का देते हुए कहा- चल थाने (तिमारपुर) तेरी औकात बताते हैं।
वजीराबाद गांव दिल्ली में कम आमदनी वालों की रिहायशी बस्ती है। इसलिए दिल्ली पुलिस के किसी भी कांस्टेबल के लिए यहां किसी की औकात नापने की सोचना आसान सी बात है। मैने इन दोनों कांस्टेबल के साथ थाने जाने का इरादा बना लिया। (यदि मैं उनके साथ थाने जाता तो दिल्ली ट्रेफिक पुलिस का, एक मोटर सायकिल पर तीन लोगों वाला कानून टूटता क्योंकि वे दो लोग थे और अपने साथ ही मोटर सायकिल पर बिठाकर मुझे थाने ले जाना चाहते थे)
एक कांस्टेबल के साथ मैं घर आया और अपना पर्स, कैमरा और मोबाइल साथ लेकर, कांस्टेबल के साथ ही वापस मौका ए वारदात पर पहुंचा। घर से कैमरा लेने के बाद दिल्ली पुलिस के उस कांस्टेबल से जो बात हुई,  उसकी फूटेज मेरे पास है।
कांस्टेबल को मुझसे उलझता देखकर मेरे मित्र वापस आ गए थे।  दोनों दिल्ली की अलग-अलग प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करते हैं। यह बात वे कांस्टेबल नहीं जानते थे। दोनों मित्रों में एक एक लड़की को देखकर, कांस्टेबल धमकाने के लिहाज से बोला- ‘तुम्हे पता है, इतनी रात को लड़का और लड़की का सड़क पर निकलना दिल्ली में जूर्म है!’
कांस्टेबल ने यही सोचा था कि दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले बीए के दोनों बच्चे होंगे और उसकी बात से डर जाएंगे। जबकि मेरी दोस्त को रात, दिल्ली और दिल्ली में गुनाह वाली बात खबरिया चैनल के लिहाज से उपयोगी लगी, सो उसने अपना मोबाइल वीडियो रिकॉर्ड के मोड पर डालकर, उनकी ही बात दोहराते हुए पूछ लिया- ‘क्या वास्तव में गुनाह है?’
दूसरे मित्र थाना ले जाने की बात पर गुस्से में थे और अपना परिचय दे चुके थे कि वे अमुक चैनल में काम करते हैं। इस वक्त दोनों कांस्टेबल की हालत रंगे हाथांे पकड़े गए चोर की तरह हो गई थी। कैमरा ऑन था, एक के बाद एक सवाल दोनों पूछ रहे थे लेकिन उन दोनों ने चुप्पी साध ली। एक ने जाकर पीसीआर (पुलिस कंट्रोल रूम) को फोन किया। उनकी गाड़ी आई और मौके की गंभीरता को मसझते हुए, दस मीनट में चली भी गई। अगले बीस मीनट में एक दर्जन कांस्टेबल और सब इंस्पेक्टर हमारे आस-पास मौजूद थे। इतने पुलिस वाले, किस क्राइम की तफ्तीश के लिए धीरे-धीरे इकट्ठे हो रहे थे, यह अब भी मेरे लिए राज है।
इस मौके को देखकर मैंने कहा भी कि इतने पुलिस वालों की यहां जरूरत तो नहीं है। सभी यहां एक साथ इकट्ठे हों और इस मौके का फायदा कोई वास्तविक अपराधी उठा ले जाए, यह भी तो ठीक नहीं है।
इकट्ठे हुए पुलिस वालों में एक सब इंस्पेक्टर साहब अपने पत्रकार मित्रों के नाम गिनाने लगे। सबके साथ उनके कितने मधुर रिश्ते हैं, इसकी भी दुहाई दी।
दूसरे साहब, कांस्टेबल की कम उम्र का हवाला देकर, उसे माफ करने की गुजारिश करने लगे।
एक साहब ने कहा, बता देते पत्रकार हैं तो शिकायत का मौका ही नही देते।
इस बीच मेरी मित्र ने अपनी एक साथी को फोन करके सारी स्थितियों से अवगत कराया और वह इस मामले को कवर करने के लिए नोएडा से यूनिट के साथ वजीराबाद गांव के लिए चल पड़ी।
जितने पुलिस वाले उस दिन आए थे, उनमें सबसे बुजूर्ग पुलिस अंकल ने हमें समझाते हुए कहा-
‘बच्चों मानता हूं इन दोनों से गलती हुई है। यह कांस्टेबल हैं। खबर चलेगी तो ये सस्पेंड हो जाएंगे। आप कहें तो आपसे अपनी गलती की माफी मांग लें। आज के बाद ऐसी गलती ये नहीं करेंगे।’
मैंने एक घंटे में दिल्ली पुलिस के एक ही आदमी में दो आदमी देखे,
एक वह जो औकात दिखाने की बात कर रहा था और दूसरा वह जिसका माफी में सिर झुका हुआ था।
यदि एक घंटे में दिल्ली पुलिस के एक कांस्टेबल में आए बदलाव की व्याख्या करंे तो हम-आप कई मामले सुलझा लेंगे, जो पुलिस फाइलों में सुलझ जाती है लेकिन न्यायालय में जाकर उलझ जाती है। आप सुलझा लेंगे ओखला सब्जी मंडी का वह मामला जिसमें एक सब्जी का ठेला लगाने वाला युवक दो सौ रुपए की चोरी के आरोप में जेेल गया और जेल में उसने दो सौ रुपए की चोरी कुबूल कर ली होती तो जितनी सजा मिलती उससे अधिक वक्त बिताया लेकिन वह खुद को बेगुनाह साबित नहीं कर पाया। एक दिन मजबूरी में उसने अपना गुनाह कुबूल किया और रिहा हो गया। जेल में रहने के दौरान उसकी मां का इंतकाल हुआ और वह उनकी अंतिम यात्रा में भी शामिल नहीं हो पाया। जेल से निकलने के बाद कई गैर सरकारी संस्थाओं ने उसे तलाशने की कोशिश की, लेकिन वह युवक नहीं मिला। ना जाने वह अब कहां है?
हाल में जिस तरह पुलिस के हाथों इंडिया गेट के पास एक युवक की हत्या मोटर सायकिल चलाते हुए हुई, मेरा अनुमान है कि वह लड़का एक सौ पच्चीस सीसी की मोटर सायकिल की जगह साढ़े तीन लाख की कावासाकी नीन्जा पर होता तो दिल्ली पुलिस उस पर गोली नहीं चलाती। हम लाख इस बात का दावा कर लें कि हम समाजवादी मुल्क में रहते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि सामंतवाद अब भी इस मुल्क में जिन्दा है। उसकी शक्ल थोड़ी बदल गई है।
जमीन्दारों की जगह अब धनकुबेरों ने ले ली है।
इसका सीधा सा मतलब है कि आप दिल्ली की किसी झुग्गी-झोपड़ी कॉलोनी में रहते हैं  या फिर थोड़े गरीब मोहल्ले में रहते हैं, जहां दिल्ली के ऑटो रिक्शा वाले, साहब की गाड़ी चलाने वाले ड्राइवर, दिहाड़ी मजदूर रहते हैं तो आपका आपके घर के बाहर रात डेढ़ बजे खड़े होना भी आपके खिलाफ सबूत माना जाएगा। जिसके लिए आपको दिल्ली पुलिस का कोई कांस्टेबल खींचकर थाने ले जा सकता है। 
पिछले महीने 26 जुलाई को मैं इंडिया ब्राइडल फैशन वीक, बसंत कुंज मंे था। वहां रात ढाई बजे भी मेहमानों का जाना-आना जारी था। रोहित बल की पार्टी पूरी रात चलती रही। वहां कोई पुलिस कांस्टेबल नहीं था, बताने के लिए कि रात डेढ़-दो बजे दिल्ली की सड़कों पर निकलना गुनाह है। ना जाने पार्टी में लड़का-लड़की साथ शराब पीते हुए नजर आए तो उनपर कौन सी धारा लगेगी?
अब दिल्ली में यह कहने का साहस कौन करेगा कि दिल्ली में कानून सबके लिए बराबर है।
यहां बसंत कुंज के लिए अलग कानून है और तिमारपुर थानान्तर्गत वजीराबाद गांव के लिए अलग।

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

विकास बनाम मन्दिर-मस्जिद...

यदि बात मस्जिद की करें तो जिस स्थान के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में इतना विवाद हुआ, उसके डेढ़-दो सौ मीटर की दूरी पर एक दूसरी बड़ी मस्जिद है। गांव से ही पता चला कि जुमे की नमाज ना हो तो आम तौर पर बड़ी मस्जिद में दस लोगों को जुटना भी मुश्किल होता है...


ग्रेटर नोएडा के सोए हुए गांव कादलपुर की तारिफ इस बात के लिए पूरे मुल्क को करनी चाहिए कि उसने प्रदेश की सोई हुई अखिलेश सरकार को जगा दिया। वर्ना चालिस-पैंतालिस मीनट में किसी सरकारी अधिकारी का निलंबन किस राज्य में होता है? इसका संदेश जनता में तो यही जाता है कि समाजवादी पार्टी आवश्यकता समझे तो किसी बड़े से बड़े अधिकारी को आधे घंटे में सस्पेन्शन ऑर्डर दे सकती है।
अधिकारी पार्टी की हां में हां मिलाने वाला हैै तो सिर्फ जांच बिठाई जाएगी। जांच तो सालों साल चलती है और एक दिन उसकी रिपोर्ट भी आ जाती है, उस वक्त तक लोगों में रिपोर्ट के परिणामों को जानने में कोई रूचि नहीं होती। वैसे अखिलेश सरकार में सिर्फ सस्पेन्शन नहीं हुआ, उनके एक बड़े नेता सार्वजनिक सभा में स्वीकार किया कि उसकी वजह से यह निलंबन हुआ। उसके बाद भी अखिलेश सरकार इस बात से पिछे हटने को तैयार नहीं है कि गांव में साम्प्रदायिक हिंसा का माहौल था, जबकि गांव के लोग खुद स्वीकार कर रहे हैं कि मस्जिद के लिए हिन्दूओं में भी सभी जातियों के लोगों ने अपने-अपने सामर्थ से चंदा दिया था। जिस गांव में इतने सहयोग रखने वाले हिन्दू-मुस्लिम हो, वहां तो सिर्फ नेता ही दंगा करवा सकते हैं। इसलिए जनता ही तय करें कि वास्तव में सस्पेन्ड कौन होना चाहिए और हुआ कौन?
मन्दिर-मस्जिद जिसे समाज को जोड़ने का केन्द्र होना चाहिए था, वह इस देश में समाज को तोड़ने का हथियार बन कर रह गई है। इस देश के नेता जानते हैं कि यह एक मात्र फार्मूला है, जिससे एक मुश्त वोट लिया जा सकता है। कादलपुर के एक एक बच्चे को सरकार पढ़ाने की जिम्मेवारी ले ले या फिर गांव के एक एक बेरोजगार युवक को नौकरी देने के काम पर लग जाए तो दूसरे गांव-मोहल्लों के लोग भी रोजगार और शिक्षा के लिए सड़क पर उतर आएंगे। लेकिन कादलपुर में मस्जिद की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी जानती है कि एक मस्जिद के नाम पर पूरे उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के दिल में अपने लिए एक सॉफ्ट कॉर्नर बनाया जा सकता है। बेहतर तो यह हो कि पूरे उत्तर प्रदेश में जितनी मस्जिदें उनके मौलाना नरेन्द्र भाटी को मिले और उनसे मस्जिद मरम्मत के नाम पर इकावन हजार रूपए की मांग करें। वैसे भाटी जी ने अब तक कादलपुर वालों को इकावन हजार रुपए के आश्वासन पर ही रखा हुआ है। मस्जिद निर्माण के लिए अभी भाटीजी के पैसे गांव वालों को मिले नहीं हैं।  वे आश्वासन पर ही मीडिया में इतनी फूटेज ले चुके हैं, जितनी लाखों खर्च करके भी लोग नहीं ले पाते।
गांव के ही एक सज्जन ने कहा- जो सरकार चालिस मीनट में एक बड़े अधिकारी को निलंबित कर सकती है, वह सात दिन में मस्जिद भी बना सकती थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।
अब उस मस्जिद की बात जहां उत्तर प्रदेश पुलिस के दो सिपाही इसलिए बैठे हैं क्योंकि निर्माण कार्य आगे ना बढ़े। यहां नमाज अदा हो इसके लिए धीरेन्द्र सिंह नाम के एक स्थानीय कांग्रेसी नेता ने यहां तक कह दिया कि नमाज यहीं पढ़ी जाएगी और पुलिस गोली चलाती है तो पहली गोली वे खाएंगे। ‘शर्म की बात यह है कि निर्मानाधीन मस्जिद के स्थान के बराबर जो सड़क निकलती है, वहां नाले और सड़क का अंतर मिट गया है। नाले में सड़क है या फिर सड़क पर नाला है, यह अंतर कर पाना मुश्किल है। गांव में दर्जनों बच्चे बीमार हैं, बहुत से बच्चे स्कूल नहीं जाते। गोली खाने को तैयार सिंह साहब ने यह नहीं कहा कि एक महीने के अंदर यदि गांव के अंदर की सड़क दुरूस्त नहीं करवा पाया, गांव के एक-एक बच्चे को अच्छा ईलाज नहीं दिलवा पाया और गांव के एक एक बच्चे के लिए अच्छी शिक्षा बंदोबस्त नहीं कर पाया तो गोली खाने का हकदार बनूंगा।
इस देश में अस्सी कोसी यात्रा के नाम पर और मस्जिद के नाम पर गोली खाने वाले बहुत हैं, लेकिन रोजी-रोटी, शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर कितने लोग हैं, जो गोली खाने को तैयार हैं?
यदि बात मस्जिद की करें तो जिस स्थान के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में इतना विवाद हुआ, उसके डेढ़-दो सौ मीटर की दूरी पर एक दूसरी बड़ी मस्जिद है। गांव से ही पता चला कि जुमे की नमाज ना हो तो आम तौर पर बड़ी मस्जिद में दस लोगों का जुटना भी मुश्किल होता है।
अब तो कहा यह भी जा रहा है कि दुर्गा को योजना बनाकर तो कादलपुर नहीं भेजा गया था क्योंकि इतनी छोटी बात पर, बड़े अधिकारियों का इतनी जल्दी निलंबन नहीं होता। अभी तक उत्तर प्रदेश में वे अधिकारी भी अपने पदों पर बने हुए हैं, जिनके ‘शासन में साम्प्रदायिक दंगे हुए। यह कहीं समाजवादी पार्टी का रेत माफियाओं को लूट की खुली छुट देने के साथ-साथ, उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के बीच अपनी छवि सुधारने की कवायद भी तो नहीं है।


शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

निर्मल कथा : (उंगलबाज.कॉम, हमारी विश्वसनीयता संदिग्ध है)

                                              -एक-
                                    .................................
एक मार्क्सवादी, बाबा निर्मल के दरबार तीन हजार रूपए की पर्ची कटाकर भक्त वेश में पहुंचे। उंगलबाज.कॉम के तमाम संवाददाता यह पता नहीं लगा पाए कि मार्क्सवादी पत्रकार साथी बाबा के भक्त बनकर आयोजन में आए थे या फिर वे अपने चैनल के लिए कोई स्टिंग करना चाहते थे।
मार्क्सवादी साथी के हाथ में माइक आते ही, उन्होंने बाबा के चरणों में शत-शत नमन किया।
बाबा-‘यह तुम्हे देखकर दास कैपिटल क्यों नजर आ रहा है?’
मार्क्सवादी पत्रकारः ‘बाबा मैं मार्क्सवादी हूं। शायद इसलिए।’
बाबाः- ‘क्या दास कैपिटल तुमने पढ़ी है?’
मार्क्सवादी पत्रकारः ‘नहीं बाबा।’
बाबाः- ‘तुम्हारी सारी कृपा वहीं रूकी हुई है। जाओ पहले खुद दास कैपिटल पढ़ो और अपने पांच संघी मित्रों को ‘दास कैपिटल’ खरीद कर भेंट करो। उसके बाद ही तुम पर कृपा आएगी।’

-------------------------------------------------------------------------------
-------------------------------------------------------------------------------
                                                                     -दो-
                                                               ...............................
‘बाबा के चरणों में शत-शत नमन। मेरा नाम दिग्विजय सिंह है। बाबा मध्य प्रदेश से आया हूं।’
‘यह तुम्हे देखकर सोनिया गांधी क्यों नजर आ रही है?’
‘बाबा मैं कांग्रेस पार्टी से ताल्लुक रखता हूं। हो सकता है, यही वजह हो।’
‘अंतिम बार सोनियाजी से कब मिले थे?’
‘तीन दिन हो गए बाबा।’
‘तुम्हारी सारी कृपा वहीं रूकी हुई है। सोनियाजी से सुबह-शाम मिला करो। कृपा बिना रूकावाट बरसेगी।'

----------------------------------------------------------------------------------
----------------------------------------------------------------------------------
                                                                      -तीन-
                                                                -----------------------
‘बाबा मेरा नाम नरेन्द्र मोदी है, गुजरात प्रान्त से आया हूं। वहां मैं सात करोड़ गुजरातियों का नेतृत्व करता हूं।’
‘तुम्हे देखकर यह टोपी क्यों नजर आने लगी?’
‘बाबा अपनी सद्भावना यात्रा में एक मौलाना की टोपी को पहनने से मैने इंकार कर दिया था। संभव है, जो नजर आ रही है, वही वाली टोपी हो।’
‘पूरे देश को टोपी पहनाने का इरादा है तो टोपी पहननी चाहिए थी। तुम्हारी सारी कृपा उसी टोपी पर रूकी हुई है।’
‘निदान क्या है बाबा?’
‘अगली सद्भावना यात्रा में टोपी-तिलक उत्सव करो। टोपी पहनाओ-तिलक लगाओ। कृपा आएगी।’
-----------------------------------------------------------------------------
----------------------------------------------------------------------------
                                                                   चार
                                                           ----------------
'बाबा चरणों में कोटी-कोटी प्रणाम बाबा। उत्तर प्रदेश से आया हूं बाबा। मुलायम सिंह यादव नाम हुआ। पिछले समागम में आपका आशीर्वाद मिला था। अपना बच्चा उसके बाद प्रदेश में सरकार बना लिया है बाबा। आशीर्वाद बनाए रखिए।'
‘यह तुम्हारे आते ही नजर के सामने मस्जिद की दीवार क्यों नजर आने लगी? तुम्हारी सरकार है, तुमने गिरवाई है क्या?’
‘क्या बात कर दी बाबा। मैं तो मस्जिद प्रेमी, धर्म निरपेक्ष नेता हूं। समाजवाद की राजनीति करता हूं। लगता है बाबा उमर का असर आप पर होने लगा है।’
‘रूको! रूको! यह नोट का बंडल कैसा है, मस्जिद के दीवार के साथ। यह नोट क्यों नजर आने लगा?’
‘वह हमारे पार्टी के ही नेता हैं भाटी, उन्होंने मस्जिद निर्माण के लिए पचास हजार रूपए दिए थे। वही रूपया आपको दिख रहा है। बाबा इसी मुसीबत से निकलने के लिए तो आए हैं आपके पास।’
‘उसी नोट के बंडल पर सारी कृपा अटकी हुई है। भाटी से कहो, पचास लाख रूपए मस्जिद के लिए चंदा दे और विशाल मस्जिद निर्माण कराए। और पचास-पचास हजार के नोेट के बंडल कम से कम पांच पीर की मजार के दान पात्र में रख कर चुपके से लौट आए। तुम्हारी पार्टी पर रूकी हुई बड़ी कृपा आएगी।’





रविवार, 4 अगस्त 2013

आशीष कुमार ‘अंशु’ की दो कविताएं:

                                                          -01-
‘हम डरे हुए लोग
कभी नरक से डरे
कभी कयामत से डरे,
और उन्होंने डरा-डरा कर हमें
कभी अल्लाह बेचा,
कभी राम बेच दिया।’

---------------------------------------------
                                                         -02-
तुम मस्जिद बनाओ, हम मन्दिर बना लेते हैं,
तुम मुसलमानों को फंसाओ, हम हिन्दूओं को पटा लेते हैं।
रोटी नहीं, कपड़ा नहीं, शिक्षा नहीं, भूख के सवाल पर नहीं,
मजहब के नाम पर इनको फिर से लड़ा देते हैं।
कभी गधा, कभी उल्लू, और कभी बंदर,
हम लोकतंत्र के जादूगर ठहरे, जिसको जैसा चाहें बना देते हैं।
2014 मे मस्जिद नहीं मजलूमों को आवाज दे दो,
राम मन्दिर तुम रख लो, जनता को राम राज दे दो

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

आपदाग्रस्त रिपोर्टिंग

16 जून 2013 की वह रात उत्तराखंड के इतिहास में एक मनहूस रात के तौर पर ही याद की जाएगी। जो लोग इस घटना के गवाह रहे हैं, वे शायद इस घटना से जुड़ी कुछ और बातों को भी कभी भूल नहीं पाएंगे। इन्हीं कुछ बातों में एक है, उत्तराखंड आपदा की कवरेज के लिए दिल्ली से उत्तराखंड पहुंचे पत्रकारों की भूमिका। यदि कथित राष्ट्रीय खबरिया चैनलों की रिपोर्टिंग को आप अब तक याद रख पाएं हों तो याद करने की कोशिश कीजिए, कि थ्रिल करने वाली उस डिजास्टर रिपोर्टिंग के दौरान आप उत्तराखंड के स्थानीय लोगों के दर्द के साथ कितना जुड़ पाए थे? क्या दिल्लीवाले रिपोर्टरों की रिपोर्टिंग से आप वहां की कठिन जिन्दगी और संघर्ष कर रहे लोगों की जिन्दगी को कितना समझ पाए थे?
दिल्ली से गई एक महिला पत्रकार को एक  स्थानीय बुजुर्ग ने नसीहत देते हुए कहा- बेटी तुम यहां से क्या लेकर जाओगी नहीं जानता, लेकिन वही दिखाना जो तुम्हें नजर आए।'' पत्रकारों से हम यही उम्मीद करते हैं कि वह सच ही दिखलाएंगे, यदि एक बुजुर्ग को इस तरह की बात एक पत्रकार से कहनी पड़ती है तो क्या पत्रकार वह नहीं दिखा रहे थे, जो खुद देख रहे थे? सामाजिक कार्यकर्ता और उत्तराखंड आपदा के समय वहां के लोगों की मदद के लिए तत्पर इन्द्रेश मैखुरी ने बताया कि ''दिल्ली की मीडिया के लिए स्थानीय लोगों में कितना गुस्सा है कि पीटूसी में कुछ गलत बयानी कर रहे एक पत्रकार की स्थानीय लोगों ने धुनाई भी कर दी थी।'' पत्रकारिता की असंवेदनशीलता उत्तराखंड आपदा रिपोर्टिंग में उस दिन भी नजर आई थी, जब एक पत्रकार, एक पीड़ित के कंधे पर चढ़ कर रिपोर्टिंग कर रहा था। उन पत्रकार के लिए पी साईनाथ का कहना है कि ''इस तरह की रिपोर्टिंग को यदि प्रतिकात्मक तौर पर देखें तो इसमें मीडिया के परजीवी की तरह व्यवहार करने के चिन्ह साफ नजर आते हैं।''
यह बात तो उत्तराखंड के पत्रकार भी जानना चाहते हैं कि उनमें क्या कमी थी जो दिल्ली से इलेक्ट्रानिक मीडिया के इतने सारे पत्रकार निर्यात किए गए? उन पत्रकारों को पहाड़ में क्यों धकेल दिया जिन्हें ना पहाड़ की स्थिति का अंदाजा था और ना ही पहाड़ी जीवन का। वैसे अंदाजा ना भी होता और वे होमवर्क करके आते तो भी सवाल नहीं था। उनके पास होमवर्क भी नहीं था। वर्ना श्रीनगर और रूद्रप्रयाग के रास्ते में पड़ने वाली सीडोबगड़ में खड़े होकर एक दिल्ली का पत्रकार उसे केदारनाथ की दरकती पहाड़िया नहीं बता रहा होता। ईटीवी के पत्रकार सुधीर भट्ट इलेक्ट्रानिक मीडिया का बचाव करते हुए कहते हैं, उनकी भी अपनी मजबूरी है। यहां के हालात दिल्ली में बैठे लोग जानते नहीं। उन्हें ‘खबर हर कीमत पर’ चाहिए। उन्हें इस बात की परवाह नहीं कि उनका रिपोर्टर किन परिस्थितियों में है। खबर है भी या नहीं? वह खबर देने की हालत में भी है या नहीं। पहाड़ में रिपोर्टिंग मैदानी इलाकेों जैसी नहीं होती। यहां के बीस किलोमीटर के फासले और दिल्ली के बीस किलोमीटर के फासले में जमीन-आसमान का अंतर है और जब जगह-जगह लैन्ड स्लाइड हुआ हो तो हालात और बिगड़ जाते हैं। भट्ट आगे कहते हैं- सुबह नौ बजे से ही रिपोटर्स के पास फोन आना शुरू हो जाता है। आज क्या भेज रहे हो? कितनी देर में भेज रहे हो? अभी तक नहीं भेजा। ऐसे कैसे चलेगा? खबर चाहिए ही, माने ‘खबर हर कीमत पर।’ जब ऊपर के लोग कुछ सुनने को तैयार नहीं होेगे और नीचे खबर तक पहुंच नहीं होगी तो रिपोर्टर कुछ गलत ही करेगा क्योंकि उसे भी पता है कि नौकरी बचानी है, हर कीमत पर।
बार-बार केदारनाथ की घटना को बादल फटने से जोड़ा गया। इस पर प्रकृति प्रेमी एवं पर्यावरणविद, चंडी प्रसाद भट्ट कहते हैं, ''जैसा कहा गया कि बादल फटा। बादल फटने के लिए एक सौ मिली लीटर बारिश एक घंटे तक एक जगह पर केन्द्रित होनी चाहिए। तो उसे बादल फटना कह सकते हैं। भारी बारीश कहना फिर भी ठीक है। लेकिन यदि पत्रकार और वैज्ञानिक दोनों बादल फटना शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं तो कैसे कह रहे हैं? आपको कैसे पता, कि कितनी बारिश हुई? इसका सीधा अर्थ है आप भय पैदा करना चाहते हैं। केदारनाथ और गंगोत्री में आपके पास आंकड़े नहीं हैं मौसम के फिर आप कैसे कह रहे हैं बादल फटा?'' वैसे कहा जा रहा है कि इस विपदा के समय यदि चैनल स्थानीय पत्रकारों पर भी थोड़ा विश्वास करते और बाहर के पत्रकार स्थानीय पत्रकारों के साथ समन्वय रखकर रिपोर्टिंग करते तो शायद अधिक बेहतर तरिके से पूरी कहानी सामने आ पाती। लेकिन दिल्ली से गए पत्रकारों की बात थोड़ी अलग होती है। कुछ पत्रकार तो अपनी तुलना भी क्षेत्रीय पत्रकारों से कराना पसंद नहीं करेंगे क्योंकि दिल्ली में होते ही पत्रकार राष्ट्रीय हो जाता है। वैसे यह टिप्पणी उन पत्रकारों के लिए नहीं है, जो अपना काम भोपाल हो या दिल्ली, पटना हो या कोलकाता, जहां भी हो ईमानदारी से करते हैं।
उत्तराखंड आपदा की कहानी में दिल्ली से देहरादून की धरती पर लैंड होने वाले कुछ पत्रकार वाया अपने चैनल के स्ट्रींगर और कुछ अपने पुराने रिश्ते निकाल कर अलग-अलग मंत्रियों से जा चिपके। (सभी नहीं)। मंत्रियों से चिपकने की दो खास वजह थी। पहली रिपेार्टिंग के नाम पर मुफ्त हवा खोरी। जिसके लिए पहले ही सूचना और प्रसारण मंत्री ने अलग संदर्भो में डिजास्टर टूरिज्म जैसे शब्द ईजाद किए हुए हैं। मेरी जानकारी में एक भी चैनल या अखबार नहीं है, जिसने इस खबर की महता को समझते हुए, अपने रिपोर्टर को निजी विमान किराए पर लेने की इजाजत दी हो। कई-कई हजार करोड़ का कारोबार करने वाले मीडिया घरानों के लिए यह करना मुश्किल नहीं था। दूसरी वजह, लगे हाथों, विज्ञापन की भी बात करनी थी। जैसाकि हम सब जानते हैं, टेलीविजन चैनल चलाना कितना महंगा सौदा है। ऐसे में चैनलों के चुप रहने की कुछ तो कीमत बनती है। आपदा के नाम पर सरकार ने दोनों हाथों से विज्ञापन बांटे। कुछ पत्रकारों के रहने, खाने-पीने और उड़ने का खर्चा भी चैनल की जगह उत्तराखंड उठा रहा था। दिल्ली की एक महिला पत्रकार पर देहरादून के एक मंत्री की अति कृपा की कहानी देहरादून में खुब चली।
यह सरकारी विज्ञापनों का ही असर रहा होगा कि भूख से मरते ग्रामीणों की कहानी, केदारनाथ में बिना अंतिम संस्कार के कंकाल में तब्दील सैकड़ों शवों की कहानी, राहत के लिए काम कर रही तमाम सरकारी और गैर सरकारी एजेन्सियों के बीच आपसी समन्वय के घोर अभाव की कहानी, राहत के नाम पर हैलीकॉपटर के दुरुपयोग की कहानी कहीं नजर नहीं आई। गोविन्द घाट निवासी उत्तम सिंह मेहता बताते हैं, देश भर का शायद ही ऐसा कोई चैनल होगा जो यहां नही आया हो लेकिन सबकी चिन्ता पर्यटक थे। पर्यटक तो सब वापस लौट जाएंगे, अपना सबकुछ तो यहां के स्थानीय लोगों ने गंवाया है। उनसे बात करने की किसी पत्रकार ने जरूरत नहीं समझी। सभी को पर्यटक प्रिय थे। किसी को यहां के लोगों से मतलब नहीं था। हम जी रहे हैं या मर रहे हैं। यह दिखलाने की फुर्सत किसी चैनले के पास नहीं थी।
आप सबको याद होगा, चैनलों ने स्थानीय लोगों के संबंध में बताते हुए यह जरूर रिपोर्ट किया कि यह लोग यात्रियों को लूट रहे हैं। पन्द्रह रूपए के पानी की बोतल सौ रूपए में बेंच रहे हैं। बिस्किट के लिए दो सौ रूपए मांग रहे हैं। इस तरह की रिपोर्ट दिखलाते हुए, चैनलों ने उन लोगों को दिखलाना जरूरी क्यों नहीं समझा जिन्होंने अपने घर से हजारों रूपए लगाकर पीड़ितों की मदद की, बिना किसी स्वार्थ के। उत्तराखंड में अलग-अलग जगहों पर मदद के लिए हाथ बढ़ाने वाले वे सैकड़ों लोग कैसे इन कैमरों से बच गए, जिन्होंने पीड़ितों की मदद के लिए अपने हाथ बिना किसी स्वार्थ के बढ़ाए थे। आपदा के दौरान राष्ट्रीय अखबारों के स्थानीय संस्करण और कुछ छत्तीसगढ़ के स्थानीय चैनलों ने बेहतरीन रिपोर्टिंग का उदाहरण प्रस्तुत किया लेकिन उत्तराखंड के लोग कथित राष्ट्रीय चैनलों से बहुत निराश हैं।

सोमवार, 22 जुलाई 2013

बदलते पत्रकारिता के सरोकार : पालागुमी साईनाथ

मेरी जानकारी में आपका यह कान्फ्रेन्स तीन दिनों का है। तीन दिनों में औसतन क्या-क्या होता है, अपने देश में? ग्रामीण भारत में तीन दिन के अंदर अगर एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के डाटा का औसत लेते हैं, तो तीन दिन के अंदर 147 किसान इस देश में आत्महत्या करते हैं। आधे घंटे में एक किसान अपनी जान देता है। जब आपका कान्फ्रेन्स खत्म होगा, उन तीन दिनों में एक सौ पचास किसान आत्महत्या कर चुके होंगे। लेकिन यह सब आपके मीडिया को देखकर नजर नहीं आता। वहां यह प्रदर्शित नहीं होता है। सबसे नया 2012 का डाटा भी आ चुका है। डाटा ऑन लाइन है। आप देख सकते हैं। छत्तीसगढ़ ने इस बार जीरो आत्महत्या  दिखलाया है, पश्चिम बंगाल ने डाटा जमा नहीं कराया है। उसके बावजूद आंकड़ा 14,000 तक आ गया है। तीन दिनों में तीन हजार बच्चे कुपोषण और भूख से जुड़ी बीमारियों से मौत के शिकार बनते हैं। इन्हीं तीन दिनों मे ंसरकार बड़े-बड़े कॉरपोरेट हाउस को और कंपनियों को 6800 करोड़ तक की आयकर में छुट देती है। सरकार के पास पैसा, किसान और बच्चों के लिए तो है नहीं। लेकिन आप पांच लाख करोड़ रुपए की सालाना छुट दे सकते हैं। यह पांच लाख करोड़ भी पूरी कहानी नहीं है। यह पांच लाख करोड़ रुपए केन्द्र की बजट से निकलते हैं। राज्य सरकारों और केन्द्र सरकारों द्वारा दूसरी कई तरह की रियायतें अलग से दी जाती हैं। पांच लाख करोड़ में वह सब जुड़ा नहीं है।
बजट में एक सेक्शन है, एनेक्स-टू, उसका शिर्षक है, ‘स्टेटमेन्ट ऑफ रेवेन्यू फॉरगॉन’। इसमें सारी जानकारी विस्तार से होती है। साल 2007 से यह जानकारी मिल रही है। अभी छह साल का डेटा अपने पास है। कितना पैसा कन्शेसन में गया। तीन तरह के कन्शेसन हैं, ग्रेट कन्फिलक्ट इन्कम टैक्स, कस्टम ड्यूटी वेवर और एक्साइज ड्यूटी वेवर। इन तीनों में इस साल पांच लाख करोड़ लगाए गए, इसमें सब्सिडी अलग है। यह सिर्फ केन्द्रिय बजट से दिया गया। हमारे पास यूनिवर्सल पीडीएस के लिए पैसा नहीं है, हमारे लिए स्वास्थ्य के लिए पैसा नहीं है, हमारे पास बच्चों के कुपोषण के लिए पैसा नहीं है। हमारे यहां मनरेगा 365 दिन नहीं 100 दिन का रोजगार है और पीडीएस सीमित है। इस देश में सिर्फ लूट मार ही यूनिवर्सल है। यह सब मीडिया में नजर नहीं आता।
मेरा सिर्फ इतना कहना है कि भारत में मीडिया राजनीतिक तौर पर आजाद है। लेकिन वह मुनाफे के प्रभाव में है। यह मार्शल लॉ नहीं है। कोई सेंसरशिप नहीं है। मीडिया राजनीतिक तौर पर आजाद है। लेकिन वह मुनाफे की कैद में है। यह स्थिति है मीडिया की।
एक शब्द बार-बार मीडिया में पिछले तीन सालों से आ रहा है। आप सबने सुना होगा, एंकर ने बताया होगा। क्रोनी कैपिटलिज्म। इसमें दो शब्द है, पहला कैपिटलिज्म। यह आप सब जानते हैं। दूसरा है, क्रोनी। यह क्रोनी हम हैं। मीडिया। क्रोनी कैपिटलिज्म में मीडिया क्रोनी है। यह स्थिति है मीडिया की। आप सबने पढ़ा था, अप्रैल में शारदा चिट फंड जब कॉलेप्स हो गई। उस वक्त एक खबर आई, बीच मंे फिर गायब हो गई। खबर था, सात सौ पत्रकार नौकरी से निकाले गए। मैं प्रभावित हुआ। यह खबर आ गई क्योंकि अक्टूबर 2005 से अब तक 5000 पत्रकारों की नौकरी गई है और कोई रिपोर्टिंग नहीं हुई। उस दिन एनडीटीवी ने एक इमोशनल स्टोरी किया। ये पत्रकार अब क्या करेंगे? इनका ईएमआई है। इनके बच्चे स्कूल जाते हैं। अब इनका घर कैसे चलेगा? यह सब उसी एनडीटीवी में चल रहा था, जिसने उसी महीने एनडीटीवी प्रोफीट से अस्सी लोगों को बाहर निकाला था और एनडीटीवी से 70 लोगों को बाहर निकाला था। डेढ़ से नौकरी गया एनडीटीवी के एक मुम्बई ऑफिस से। पूरे स्टेट में नहीं। एक ऑफिस में।
अक्टूूबर 2008 में जब फायनेन्सल कॉलेप्स हुआ। उस वक्त से बहुत सारी तब्दिलियां आई। मीडिया में भ्रष्टाचार तो पुरानी चीज है। कुछ नई चीज नहीं है। बुरी पत्रकारिता भी पुरानी चीज है।
कॉन्टेन्ट ऑफ जर्नालिज्म का एक उदाहरण कुछ दिन पहले देखने को मिला, जब एक बाढ़ पीड़ित के कंधे पर बैठकर एक पत्रकार रिपोर्ट कर रहा था। अगर पीड़ित पत्रकार के कंधे पर बैठता तो ठीक है। लेकिन उस रिपोर्ट में मीडिया के परजीवी होने का संकेत नजर आता है।
20 साल पहले जब हम मीडिया मोनोपॉली कहते थे तो साहूजी और जैन साहब का अखबार तीन-चार शहरों से निकलता था। भारत ऐसा देश है, जहां दो शहरों से आपका अखबार निकलता है तो आप नेशनल प्रेस बन जाते हैं। लेकिन मोनोपौली क्या था, इंडियन एक्सप्रेस के मालिक थे रामनाथ गोयनका। साहू और जैन मालिक रहे। यह मोनोपॉली अब खत्म हो गया। आज मीडिया मोनोपॉली का मतलब कॉरपोरेट मोनोपॉली के अंदर मीडिया एक छोटा डिपार्टमेन्ट बन कर रह गया है। आज सबसे बड़ा मीडिया मालिक कौन है? मुकेश अंबानी। जबकि मीडिया उसका मुख्य कारोबार नहीं है। यह उसके बड़े कारोबार का एक छोटा सा डिपार्टमेन्ट है। आप मुकेश भाई को देखिए, एक साल पहले नेटवर्क 18 को खरीदा। मैं सच बता रहा हूं, उनको नहीं पता कि उन्होंने क्या खरीदा? इसके अलावा 22 चैनल आया इनाडू से। तेलगू चैनल छोड़कर सब बिक गया। इनाडू मीडिया में अच्छा नाम है। लेकिन इनाडू का अब असली नाम है मुकेश अंबानी। ईनाडू का चैनल देखिए, वे कोल स्कैम, कैश स्कैम को कैसे कवर कर रहे हैं? ईनाडू का फुल बके मुकेश भाई का है। टीवी 18 का फुल बुके मुकेश भाई का है। उनको नहीं पता कि उन्होंने क्या खरीदा है? यह है उनका मीडिया मोनोपॉली। रामनाथ गोयनका के मोनोपॉली की तुलना आप मुकेश भाई के एक छोटे से दूकान से भी नहीं कर सकते।
आप देखिए कॉरपोरेट स्टाइल कॉस्ट सेविंग क्या है? आप टेलीविजन चैनल में देख सकते हैं, अब समाचार चैनल में समाचार खत्म हो गया है, टॉक शो बढ़ गए हैं। टॉक शो इसलिए अधिक हो गए क्योंकि बातचीत सस्ती है। बातचीत फ्री है। मुम्बई-दिल्ली से बुलाते हैं और महीने-दो महीने के बाद हजार-डेढ़ हजार रुपए का चेक भेजते हैं। यहां सात-आठ लोगों को बिठाकर दो दिन बात करते हैं। टाइम्स नाउ थोड़ा अलग है, वहां नौ लोग बैठकर अर्णव को सुनते हैं। टॉक टीवी शो का एक गंभीर वजह यही है कि यह सस्ता पड़ता है। रिपोर्टर को गांव में भेजने में, अकाल, बाढ़ में भेजने में पैसा डालना पड़ेगा। इससे अच्छा है, पांच लोगों को बिठा दो। मुझे लगता है, मनिष तिवारी और रविशंकर प्रसाद तो हमेशा टीवी स्टूडियो में ही रहते हैं। एक स्टूडियो से निकलते हैं और दूसरे में जाते हैं।

   ( विकास संवाद के सातवें मीडिया संवाद में जैसा पत्रकार पालागुमी साईनाथ ने कहा)



शुक्रवार, 22 मार्च 2013

टीवी पत्रकारों पर दुनियां का सबसे बड़ा उंगलबाज.कॉम का सर्वेक्षण: ---उंगलबाज.कॉम

 उंगलबाज.कॉम ने तीन महीने के अथक परिश्रम के बाद होली के अवसर पर उस सर्वेक्षण को आपके सबके बीच लाने का निर्णय ले ही लिया है, जिसका इंतजार ब्रेकिंग और सिर्फ इसी चैनल पर टाइप पत्रकार कर रहे थे। दो सौ शहरो में ढाई सौ लोगों से बात करने के बाद यह सर्वेक्षण सामने आया है। इस सर्वेक्षण के परिणाम इतने चौंकाने वाले हैं कि आप इस पर विश्वास नहीं कर पाएंगे। आप कह सकते हैं कि सबकुछ पहले से फिक्स है। लेकिन जरा सोचिएगा यह कहने से पहले कि जिस देश में क्रिकेट मैच तक फिक्स हो सकता है, वहां एक सर्वेक्षण का फिक्स होना कौन सा नामुमकिन है।
 वैसे आरोप तो आप इस सर्वेक्षण पर पेड होने का भी लगा सकते हैं लेकिन जब खबरे पैसे लेकर छप सकती हैं तो सर्वेक्षण के परिणाम पैसे लेकर क्यों नहीं बदले जा सकते।
उंगलबाज.कॉम का यह सर्वेक्षण उस वक्त आप सबके सामने आया है, जब सारे टीवी चैनल और अखबार रिसेशन से बाहर आने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि देश की सत्तर फीसदी आबादी को पता ही नहीं है कि एबीपी नाम से भी कोई चैनल है। यह सर्वेक्षण उंगलबाज.कॉम का, खबरिया चैनलों के ऊपर सबसे बड़ा सर्वेक्षण है। इस महा सर्वे के परिणाम वास्तव में बड़े चौंकाने वाले हैं। जिससे सहमत हो पाना बहुत मुश्किल है।

 इस सर्वेक्षण में हमें कई लोगों से मदद मिली। ब्रेकिंग प्राइवेट लिमिटेड और एक्सक्लूसिव फाउंडेशन ने खास तौर से आर्थिक मदद की। वे चाहते थे कि आने वाले दिनों में ऑन एयर होने वाले चैनल हाहाकार टीवी को अपने सर्वे में हम नंबर एक या नंबर दो की जगह दे दें। यह हमने किया भी है। हम उनमें नहीं हैं कि पैसे भी लें और काम भी ना करें। उंगलबाज.कॉम की विश्वनियता संदिग्ध है, लेकिन ईमानदारी पर कोई शक नहीं कर सकता। हमने जिससे पैसे लिए हैं, उनका काम करके दिया है। आप चाहें तो मार्केट में सर्वेक्षण करा सकते हैं, कहंी किसी तरह की शिकायत नहीं मिलेगी।
इस सर्वेक्षण में यह जानना चौंकाने वाला था कि सीएनबीसी आवाज को लोग आशुतोष और करण थापर से जोड़कर देख रहे है, इतना ही नहंीं इस सर्वेक्षण में हमें आजाद, एस वन, एमएच वन, प्रज्ञा, जैसे चैनल देखने वाले भी मिले।





इस सर्वेक्षण में हमने पाया कि देश की पचास फीसदी आबादी उन लोगों को पत्रकार मानने को तैयार नहीं, जिनका नाम राडिया कांड में नहीं था। एनडीटीवी में रविश और अभिज्ञान को इसीलिए बड़ा पत्रकार इस सर्वेक्षण में नहीं माना गया क्योंकि राडिया उनको नहीं जानतीे थी। इस सर्वेक्षण में बरखा दत्त, नीरा राडिया से अपनी जान पहचान की वजह से एनडीटीवी की सबसे बड़ी पत्रकार मानी गई। आज तक से प्रभू चावला के बलिदान को भी सर्वेक्षण ने बेकार नहीं जाने दिया। सर्वेक्षण में यह बात खुलकर सामने आई कि प्रभू को लाइफ टाइम अचिवमेन्ट अवार्ड देकर पत्रकारिता से सेवानिवृत हो जाना चाहिए।
सर्वेक्षण में सबसे आगे जी न्यूज रहा। सुधीर चौधरी जैसे होनहार पत्रकार की वजह से यह हो पाया। आम जनता की राय है कि सुधीर चौधरी ने साबित किया कि मीडिया को किसी नीरा राडिया की जरूरत नहीं है। जरूरत पड़ने पर मीडियाकर्मी आत्म निर्भर हो सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। जी न्यूज छोड़ने की वजह से इस सर्वेक्षण में पूण्य प्रसून वाजपेयी का ग्राफ गिरा। उन्होंने उस समय चैनल छोड़ दिया, जब उसे वाजपेयी की सबसे अधिक जरूरत थी।
स्टिंग ऑपरेशन के लिए अनिरूद्ध बहल को जहां सबसे अधिक वोट मिले, वहीं खोजी पत्रकार के तौर पर सबसे आगे अरविन्द केजरीवाल रहे। रॉबर्ट वाड्रा, नितिन गडकरी, रिलायंस जैसे बड़ी खोज अरविन्द के हिस्से है। सर्वेक्षण में शामिल कुछ बड़े उद्योगपतियों ने कहा कि यदि अरविन्द पार्टी की जगह अपना चैनल खोलें तो वे उसमें पैसा लगा सकते हैं।
सर्वेक्षण में शामिल अस्सी फीसदी लोग कमर वाहिद नकवी और राहुल देव जैसे पत्रकारों का नाम नहीं जानते। अरविन्द मोहन को कुछ लोगों ने जरूर टीवी पत्रकार के तौर पर पहचाना और कुछ लोगांें का मानना यह भी है कि संजय झा को वेवसाइट संभालने की जगह कोई चैनल ही संभालना चाहिए।
सर्वेक्षण में शामिल एक भी व्यक्ति यह नहीं बता पाया कि एक बड़े पत्रकार पंकज पचौरी अचानक टीवी पर दिखना बंद क्यों हो गए। एक व्यक्ति का जवाब दिलचस्प था, इंडिया टीवी ने अभी तक उनकी तलाश क्यों नहीं की? क्या वह चैनल सिर्फ अभिनेत्रियों को ही ढूंढ़ता रहेगा? अपने बीच का एक पत्रकार नहीं मिल रहा, उसे क्यों नहीं तलाशते?
अंजना ओम कश्यप का नाम सत्तर फीसदी लोगों ने सुन रखा था लेकिन वह किस चैनल में हैं, यह बीस फीसदी लोग भी सही-सही नहीं बता पाए। दस फीसदी सर्वेक्षण में शामिल लोगों ने उनका नंबर हमारे सर्वेक्षणकर्ताओं से मांगा, जिसे हमारे सर्वेक्षण टीम के होनहार युवाओं ने खुबसूरती से टाल दिया।
सर्वेक्षण में शामिल पचपन फीसदी लोगों का मानना था कि रजत शर्मा अच्छे भले पत्रकार है, इंडिया टीवी में अपना कॅरियर क्यों खराब कर रहे हैं? टीआरपी सबकुछ नहीं होता। उन्हें आजतक या एनडीटीवी में होना चाहिए। वैसे दीपक चौरसिया को लेकर अब भी लोगों में भ्रम है कि वे इंडिया टीवी में गए हैं या फिर इंडिया न्यूज में। सुनने में आया है कि एक गुटखा कंपनी ने दीपक को ऑफर दिया है कि वे चैनल पर ऑन एयर उनकी कंपनी का गुटखा खाते हुए समाचार पढ़े तो गुटखा कंपनी उन्हें एक करोड़ रुपए साल का दे सकती है। (वैधानिक चेतावनीः गुटखा खाना सेहत के लिए अच्छा नहीं है।)
इस सर्वेक्षण को लेकर कुछ लोगों की आपत्ति हो सकती है लेकिन खबरिया चैनल वाले स्वर्ग का दरवाजा ढूंढ़ निकालते हैं और हम एक सर्वेक्षण भी नहीं कर सकते।
(हमारी विश्वनियता संदिग्ध है, बुरा ना मानों होली है)

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम