'कल इतनी इम्पोर्टेन्ट न्यूज़ तुमने मिस कर दी। पता है तुम्हे मालीक का फ़ोन आ गया।'
'कौन सी ख़बर सर ?'
आउटपुट एडिटर अपनी धून में था। प्रोड्यूसर की बात उसने सुनी नहीं या जानबूझकर कर अनसुनी कर दी, कहा नहीं जा सकता है। वह चीख रहा था-
'न्यूज़ सेंस नाम की कोई चीज नहीं है तुम्हारे अंदर। अगर नौकरी नहीं करना चाहते तो चले जाओ, क्यों चॅनल की नाक कटाने पर तुले हो?'
'सर आपने बताया नहीं कौन सी महत्वपूर्ण ख़बर कल चल नहीं पाई ?'
'कल स्टेज पर राखी सावंत की चोली खुल गई। उस इम्पोर्टेन्ट ख़बर को दिखा-दिखाकर सभी चैनलों ने जमकर टीआरपी बटोरी। बस एक भोले बाबा आप तक ही यह ख़बर नहीं पहुच पाई।'
आउटपुट एडिटर मानों अपने आप से बात करता हुआ न्यूज़ रूम से बाहर निकल गया।
'पत्रकार बिरादरी में हमारी कितनी थू-थू हो रही है। न्यूज़ सेंस नाम की कोई चीज नहीं है यहाँ किसी के पास।'
गुरुवार, 3 अप्रैल 2008
बुधवार, 2 अप्रैल 2008
रजत जी, रजत जी ..... माँ, बहन .... खबरों की
रजत जी, रजत जी तुम्हारे घर में कोई मां, बहन नहीं है क्या?
औघट बाबा ने सीधे-सीधे मिलते हीं उनसे यही सवाल पूछा।
रजत ने उनकी बात सुनी तो खी खी या कर हंस पड़े।
औघट बाबा रुकने वाले कहाँ थे सो चालू रहे,
दिन में तुम्हारा चॅनल मनोहर कहानियाँ होता है, और रात को १२ बजते ही इसे तुम मस्तराम की किताब बना देते हो।
मुझे तो लगता अब महिलाओं को तुम्हारे जैसे चॅनल वाले जागरूक बनाकर हीं रहेंगे।
जिस गंदगी को तुम खत्म करने की बात करते हो, तुम्हे पता है, ख़त्म करने के नाम पर तुम पूरे दिन में कितनी गंदगी अपने दर्शकों के सामने पडोसते हो?
औघट बाबा की बात सुनने के बाद रजत हंसा।
'बाबा घर में माँ, बहन, बेटी, पत्नी सभी हैं। लेकिन इनमे से कोई मेरा चॅनल नहीं देखता। सभी अंगरेजी का चॅनल देखते हैं।
वैसे भी हमारा चॅनल आम आदमी के लिय है।
आम आदमी की बात सुन कर बाबा बड़े प्रसन्न हुय। आजकल सुना है वह रजत के चॅनल पर दिखते हैं और रविवार से लेकर शनिवार तक किय जाने वाले व्रतों के लाभ बताते हैं।
औघट बाबा ने सीधे-सीधे मिलते हीं उनसे यही सवाल पूछा।
रजत ने उनकी बात सुनी तो खी खी या कर हंस पड़े।
औघट बाबा रुकने वाले कहाँ थे सो चालू रहे,
दिन में तुम्हारा चॅनल मनोहर कहानियाँ होता है, और रात को १२ बजते ही इसे तुम मस्तराम की किताब बना देते हो।
मुझे तो लगता अब महिलाओं को तुम्हारे जैसे चॅनल वाले जागरूक बनाकर हीं रहेंगे।
जिस गंदगी को तुम खत्म करने की बात करते हो, तुम्हे पता है, ख़त्म करने के नाम पर तुम पूरे दिन में कितनी गंदगी अपने दर्शकों के सामने पडोसते हो?
औघट बाबा की बात सुनने के बाद रजत हंसा।
'बाबा घर में माँ, बहन, बेटी, पत्नी सभी हैं। लेकिन इनमे से कोई मेरा चॅनल नहीं देखता। सभी अंगरेजी का चॅनल देखते हैं।
वैसे भी हमारा चॅनल आम आदमी के लिय है।
आम आदमी की बात सुन कर बाबा बड़े प्रसन्न हुय। आजकल सुना है वह रजत के चॅनल पर दिखते हैं और रविवार से लेकर शनिवार तक किय जाने वाले व्रतों के लाभ बताते हैं।
राम नाम सत्य है .....
राम का नाम सत्य है, इस बात पर किसे आपत्ति हो सकती है। मुझे तो कम से कम नहीं है। वैसे भी भारत में यदि रहना है तो जय श्री राम कहना होगा, जैसे नारे भी मैंने सुने हैं या किताबों में पढ़ा है। ठीक-ठीक बता नहीं सकता।
लेकिन यह शब्द है बड़े काम का यह तो मानना होगा। यदि राम ना होते तो क्या एन डी ऐ की सरकार कभी बन पाती। अटल जी कभी प्रधान मंत्री बन पाते। आडवानी किसके नाम पर रथयात्रा करते? सबसे कमाल की बात यह कि यदि राम ना होते तो आज़ादी के बाद से इस देश पर राज कराने वाली एक के बाद एक सरकार किसके भरोसे चलती।
राम की सच्चाई पर भारतीय जनमानस का भरोसा कितना मजबूत है इस बात का पता शोध के जरिय ही लग सकता है। क्योंकि राम की सच्चाई पर विश्वास कराने वाले हमारे समाज को राम की सच्चाई की याद सिर्फ़ उस वक़्त आती है जब किसी कि मौत होती है।
लेकिन यह शब्द है बड़े काम का यह तो मानना होगा। यदि राम ना होते तो क्या एन डी ऐ की सरकार कभी बन पाती। अटल जी कभी प्रधान मंत्री बन पाते। आडवानी किसके नाम पर रथयात्रा करते? सबसे कमाल की बात यह कि यदि राम ना होते तो आज़ादी के बाद से इस देश पर राज कराने वाली एक के बाद एक सरकार किसके भरोसे चलती।
राम की सच्चाई पर भारतीय जनमानस का भरोसा कितना मजबूत है इस बात का पता शोध के जरिय ही लग सकता है। क्योंकि राम की सच्चाई पर विश्वास कराने वाले हमारे समाज को राम की सच्चाई की याद सिर्फ़ उस वक़्त आती है जब किसी कि मौत होती है।
गुरुवार, 27 मार्च 2008
बुंदेलखंड: तीन युवतियों का प्रयास
महोबा के पनवाडी ब्लोक के पहाडिया गाँव में करीब १७० परिवार हैं। प्राकृतिक आपदा और पानी की कमी से यहाँ की फसलें चौपट हो गई हैं। जिसकी वजह से गाँव के कई परिवार भुखमरी की हालत में पहुच गए। ऐसे समय में ४ लाख रुपए कर्ज तले दबे रामकुमार परिहार की दो बेटियों गुडिया और रीना ने अपनी एक सहेली नीतू के साथ मिलकर ऐसे जरुरत मंद गाँव वालों की मदद करने की ठानी जो दाने-दाने को मोहताज हैं। ये लड़कियां जरुरतमंदों की मदद के लिय गाँव में दादर (गाने बजाने की महफ़िल) आयोजित करती हैं। इससे जो आखत ( गीत सुनने वालों द्वारा दिया गया धन या अनाज) आता है। उसे इकठा कर जरुरत मंद परिवारों तक ये लड़कियां पहुचाती हैं। वाकई इन्हे देखकर प्रेरणा मिलती। शाबाश लड़कियों।
मंगलवार, 25 मार्च 2008
कालाहांडी और विदर्भ के रास्ते पर बुंदेलखंड
बदहाली, सुखा और भुखमरी के हाथों जब बुंदेलखंड के सात जिले झांसी, जालौन ललितपुर , बांदा, महोबा, हमीरपुर, और चित्रकूट का नसीब लिखा जा रहा हो, ऐसे में इन जिलों में पटरियों पर लगाने वाले खोमचे और रेहडियो के साथ-साथ जिला अधिक्षको के आदेश से लगाया गया यह संदेश 'बेकार' बैठना मना है आपको सोचने पर विवश कर सकता है कि इस प्रदेश का बेरोजगार किसान-मजदूर क्या करे ? यहाँ काम तलाश रहे हाथों को काम नहीं है और सरकारी फरमान है कि खाली बैठ नहीं सकते। अब यह मजबूर किसान मजदूर जाय तों कहाँ जायें। करे तों क्या करें? जिसने बेकार बैठने पर प्रतिबन्ध लगाया है वही कोई रास्ता सुझाय?
बुधवार, 2 जनवरी 2008
भगत सिंह का ब्रान्डीकरण
भगत सिंह कुछ समय से कुछ अधिक चर्चा में हैं। कई खेमों के लोग अपने-अपने ब्रांड का स्टीकर लेकर भगत सिंह के ऊपर चस्पा करना चाहते हैं। कोई यह साबित करने पर तुला है कि वह 'मेड इन फलाना थे', कोई यह साबित करने पर तुला है कि वह 'मेड इन ढीकाना' थे। वह किन-किन लोगों से मिले और उन्होने अपने जीवन मैं कौन-कौन सी किताबें पढ़ी हैं। इसकी अपनी-अपनी सुविधा से लोग व्याख्या करने पर जुटे हैं। इन सारी स्थितियों और परिस्थितियों को देखने के बाद लगता है कि यह विचारधारा के ब्रान्डीकरण का दौर है। अपनी विचारधारा को सक्षम और सशक्त ब्रांड साबित करने के लिय इसके नाम पर अपनी दुकान चलाने वालों को कुछ तो प्रोडक्ट दिखाना ही होगा। यहाँ मार्क्स की पंक्ति याद आती है, 'इश्वर का लाख-लाख शुक्र है मैं मार्क्सिस्ट नहीं हूँ।' वास्तव में जब भी कोई तंत्र खड़ा होता है और बड़ा होता है तो उसकी शक्ति वह मंत्र होती है, जिसपर वह तंत्र खड़ा होता है। जब तंत्र विकसित हो जाता है तो लोग अक्सर मंत्र को भूल जाते हैं। जबकि यह गलत है। वास्तव मैं इन मंत्रों मैं इतनी ताकत है कि किसी को भी भगत सिंह बना दे। बस चाहिय भगत सिंह जैसी सच्ची निष्ठा और उनके जैसी दृष्टि। कोशिश ऐसी हो कि आपको कुछ साबित ना करना पड़े। आपके विचार की गर्मी को दुनिया महसूस करे और विचारधारा का लोहा दुनिया माने। यदि आपके हाथ मैं 'विचारधारा' नाम की कोई कीमियां है, जिसके सम्पर्क में आकर भगत सिंह, भगत सिंह हो गए तो इस कीमिया को आपने अब तक अपने देश के युवाओं से छुपा के क्यों रखा है। अगर आपकी बात में ज़रा भी सच्चाई है तो आगे आइय और इस देश के हर युवा को 'भगत सिंह' हो जाने दीजिय।
चिराग के दोहे
तलवे याद न रख सकें मिट्टी का एहसास
इतना ऊंचा मत करो सपनों का आकाश
समझ समझ की बात है, समझ समझ का फेर
सब उसके ही नाम हैं, राम रहीम कुबेर
एक संग आकर कहें, कातिक औ' रमजान
एक जिल्द में बाँध दो, गीता और कुरान
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आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम

