सोमवार, 5 मई 2008

गिलहरी का रैम्प शो



























क्या आपने कभी किसी गिलहरी का रैम्प शो देखा है,
यह गिलहरी मुझे पिछले दिनों मुझे कन्नौज के सड़क पर मिली मेरे हाथ में कैमरा देखने के बाद मानों
सड़क ही इसके लिय रैम्प हो गया।

शनिवार, 3 मई 2008

जारी है बुंदेलखंड में चुल्हाबंदी


देश में किसी भी पार्टी की सरकार हो, कोई भी पार्टी अपने शाशन में भूख सेहोने वाली मौतों को स्वीकार नहीं पाती। इस देश में कुपोषित बच्चों कीसंख्या दुनिया भर के कुपोषित लोगों की संख्या का एक तिहाई से भी अधिकहै। बुंदेलखंड के बांदा, महोबा, छत्तरपुर, चित्रकूट, जालौन, झांसी,ललितपुर, हमीरपुर में इस तरह के दर्जनों मामले सामने आय जहाँ स्थानीयप्रशाशन ने भूख या कर्ज की वजह से हुई मौत को कुछ और रंग दे दिया। उदाहरणके तौर पर बांदा जिले के एक गांव पड्वी के एक किसान की मौत को ले सकतेहैं। जिसने बैंक और स्थानीय साहूकारों द्वारा अपने पैसे वापसी के लियलगातार धमकाय जाने से तंग आकर आत्महत्या का रास्ता अपनाया। जबकि स्थानीयपुलिस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि बेटी के बदचलनी से तंग आकर उक्त किसानने आत्महत्या की। इस तरह के दर्जनों उदाहरण आपको बुंदेलखंड में मिलजायेंगे। जिन्होंने इस मुश्किल समय में - जब कई सालों से बुंदेलखंडसुखा का कहर झेल रहा है- अपनों को खोया है।
इसी तरह के परिवारों की मददके लिय बांदा जिले के एक छोटे से गांव से प्रारम्भ हुआ युवा सत्याग्रहीराजेन्द्र सिंह का सत्याग्रह आज पूरे बुंदेलखंड का आन्दोलन बन चुका है।इस सत्याग्रह में शामिल होने की प्रक्रिया बेहद आसान है। इसके लिय गांवके कुछ सम्पन्न लोग सप्ताह में एक दिन अपने घर में चूल्हा नहीं जलातेअर्थात वे घर में एक दिन का उपवास रखते हैं। इस तरह जो खाना बचता है, उसेइक्कठा करके जरुरतमंदों तक पहुचाया जाता है। एक छोटे से गांव से शुरू हुआयह आन्दोलन आज बुंदेलखंड के लगभग २०० गांवों में पहुच चुका है। इसआन्दोलन से हजारों की संख्या में लोग लाभ उठा रहें हैं। इस आन्दोलन केसम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण जानकारी राजेंद्र के निकट सहयोगी रहे रामफल नेदी। रामफल के अनुसार इस आन्दोलन में शामिल सत्याग्रही परिवार के लोगों नेबुन्देली परम्परा के अनुसार पांच-पांच पेड़ भी लगाय हैं।
गत वर्ष कैंसर की वजह से इस आन्दोलन के मुखिया राजेंद्र सिंह की मौत होगई। लेकिन उनके साथियों ने इस आन्दोलन को कमजोर नहीं पड़ने दिया। ०९ मईको राजेंद्र की पहली पुण्यतिथी है, इस अवसर पर उनके कुछ साथियों नेचरखारी (महोबा) में तालाब की सफ़ाई का बीड़ा उठाया है। पुण्यतिथी के अवसरपर एक जनसभा की भी योजना है।बहरहाल बुंदेलखंड में बिना किसी गतिरोध के चूल्हा-बंदी जारी है।

गुरुवार, 1 मई 2008

यह भारत सरकार की तस्वीर है


यहाँ हम आपके लिय आज लेकर आए हैं, भारत सरकार की विशेष तस्वीर,
क्या आपको इस तस्वीर में अपनी सरकार की छवि नजर नहीं आ रही है?

चलो गाँव की बर्फ खाने चले ...


आपने क्या गाँव देखा है, या फ़िर सिर्फ़ कहानियो में पढ़ा है, जो भी हो आज चलिय मेरे संग गाँव की बर्फ खाने ....


















यदि आपने शहर की हवा अधिक खाई है तो गाँव के बर्फ को ज़रा कम देखियेगा, ठंड लग सकती है, या गला ख़राब हो सकता है। हा हा हा हा हा हा हा

पी ए कमाल के ...


इनका नाम है श्री एस एस यादव जी। ये कल्यानपुर कृषी विश्वविद्यालय, कानपुर के उपकुलपति प्रोफेसर बी के सूरी के निजी सचिव हैं।
पिछले दिनों एक पत्रकार ने जब इनसे जाकर पूछा कि - क्या डॉक्टर सूरी से मिलने का समय मिल सकता है?
सचिव साहब का पाडा सातवे के आसपास वाले किसी आसमान पर चढ़ गया।
वे बोले- तुम्हे प्रोटोकाल का ज़रा भी ख्याल नहीं। यह बोलने की तमीज होती है। डॉक्टर सूरी। जैसे वे तुम्हारे कोई दोस्त हों।
जब पत्रकार ने अपनी गलती जाननी चाही तो श्री यादव जी बोले- 'तुम्हे पुछना चाहिय डॉक्टर प्रोफेसर बी के सूरी जी हैं क्या? '
अब अपने पत्रकार को तो प्रोटोकाल का ख्याल नहीं रहा, आपमे से कोई उनसे मिलने जाय तो प्रोटोकाल का ख्याल अवश्य रखे।

मंगलवार, 29 अप्रैल 2008

बुंदेलखंड: एक अच्छे आदमी का परिचय




पंडित प्रेम कुमार द्विवेदी चित्रकूट के अतिपिछडे पाठा क्षेत्र के रहने वाले हैं, पेशे से द्विवेदी जी शिक्षक हैं। इन्होने अपने आस-पास पानी की किल्लत देखकर अपने पैसों से समाज के लिय कुआँ खुदवाने का निर्णय लिया। इनके सामाजिक काम को देखकर बाद में इनकी थोडी मदद ग्राम पंचायत ने भी की।

रविवार, 27 अप्रैल 2008

ईमानदारी की एक परिभाषा यह भी

शम्भू भाई उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े तहसील मौरानीपुर में गाड़ी चलाने का काम करते हैं। उन्होंने ईमानदारी को इन शब्दों में परिभाषित किया।
'हमारे यहाँ भागीरथ चौधरी तीन बार पांच - पांच सालों के लिय कांग्रेस के विधायक रहे। भाई साहब वे इतने ईमानदार थे कि उनके बच्चे भूखों मर रहे हैं।'

आज के समय में क्या यही है, ईमानदारी की सच्ची परिभाषा।

आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम